Tuesday, January 26, 2021
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जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की नई सुबहः पहली बार शरणार्थी, गोरखा, वाल्मीकि समुदाय के लोग भी डालेंगे वोट

रोशनी एक्ट भूमि घोटाला न सिर्फ सरकारी भूमि की लूट का मामला था बल्कि जम्मू संभाग की जनसांख्यिकी को बदलने की सुनियोजित साजिश भी थी, इसलिए जम्मू संभाग में धर्म विशेष के लोगों के अलावा रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठियों को भी बड़ी तादाद में सरकारी जमीन पर बसाया गया।

पिछले दिनों केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की नई अधिवास नीति, मीडिया नीति, भूमि स्वामित्व नीति और भाषा नीति में बदलाव करते हुए शेष भारत से उसकी दूरी और अलगाव को खत्म किया गया है। भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर राजभाषा अधिनियम-2020 लागू करते हुए पाँच भाषाओं- कश्मीरी, डोगरी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी को राजभाषा का दर्जा दिया है। बहुप्रयुक्त स्थानीय भाषाओं को राजभाषा का दर्जा मिलने से न सिर्फ इन भारतीय भाषाओं का विकास हो सकेगा, बल्कि शासन-प्रशासन में जनभागीदारी भी बढ़ेगी।

बहुत जल्दी जम्मू-कश्मीर की औद्योगिक नीति भी घोषित होने वाली है। अब वहाँ त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के तहत जिला विकास परिषद के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने अक्टूबर महीने में पंचायती राज से सम्बंधित 73 वें संविधान संशोधन को जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह लागू कर दिया था। राज्य में यह कानून पिछले 28 वर्ष से लंबित था। पंचायती राज व्यवस्था न सिर्फ लोकतान्त्रिक व्यवस्था की मजबूत नींव है, बल्कि स्वशासन और सुशासन की भी पहचान भी है।

जम्मू-कश्मीर के नए उप राज्यपाल श्री मनोज सिन्हा ने ‘चलो गाँव की ओर’ और ‘माइ सिटी, माइ प्राइड’ जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत करके शासन-प्रशासन को जनता से जोड़ने और उसे संवेदनशील बनाने की पहल की है। यह कार्यक्रम विकास योजनाओं में जनभागीदारी पर बल देने वाले हैं। सभी हितधारकों ख़ासकर आम नागरिकों में भरोसा पैदा करके और उन्हें साथ जोड़कर ही सरकारी योजनाओं का सफल कार्यान्वयन संभव है।

जम्मू-कश्मीर भू-स्वामित्व कानून में बदलाव के बाद उनके द्वारा आयोजित ‘निवेशक सम्मेलन’ का विशेष महत्व है। इस सम्मेलन में देश के 30 शीर्षस्थ उद्योगपतियों ने भागीदारी करते हुए जम्मू-कश्मीर में भारी आर्थिक निवेश के प्रति आश्वस्त किया है। निश्चय ही, यह निवेशक सम्मलेन नई संभावनाओं का सूत्रपात करने वाला है। 30 अक्टूबर, 2020 को उनके द्वारा जम्मू-कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री के के शर्मा की नियुक्ति के साथ ही जम्मू-कश्मीर में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की बहाली की हलचल तेज हो गई।

लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में सभी नागरिकों की विश्वास बहाली और भागीदारी सुनिश्चित करना किसी भी राज्य का सर्वप्रमुख कर्तव्य है और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। आज केंद्र-शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर इस कर्तव्य को पूरा करने की चुनौती स्वीकार करने की दिशा में अग्रसर है। इसीलिए वहाँ त्रि-स्तरीय पंचायती राज्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण और सबसे बड़े सोपान जिला विकास परिषद के चुनाव पहली बार कराए जा रहे हैं।

4 नवम्बर, 2020 को जारी की गई अधिसूचना के अनुसार, 28 नवम्बर से 22 दिसम्बर के बीच 8 चरणों में जिला विकास परिषद चुनाव और पंचायत और स्थानीय निकायों के उपचुनाव संपन्न होंगे। जम्मू-कश्मीर में 20 जिले हैं। प्रत्येक जिले को 14 निर्वाचन-क्षेत्रों में बाँटा गया है। पंचायती और जिला विकास परिषद चुनाव मतपत्रों द्वारा और स्थानीय निकाय चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों द्वारा सुबह 7 बजे से दोपहर दो बजे के बीच संपन्न होगी।

इतिहास में पहली बार पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थी, गोरखा और वाल्मीकि समुदाय के लोग भी मतदान कर सकेंगे। अभी तक ये अभागे और उपेक्षित समुदाय राज्य के चुनावों में मतदान के अपने लोकतान्त्रिक अधिकार से वंचित रहे हैं। अभी तक पाँच चरण के चुनाव हो चुके हैं। फिलहाल ये चुनाव लगभग शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से संपन्न हो रहे हैं, क्योंकि शासन ने सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था की है।

प्रत्येक प्रत्याशी को शासन की ओर से सुरक्षा मुहैय्या कराई गई है ताकि वह बेख़ौफ़ होकर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में भागीदारी कर सके। अनेक पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद और पूर्व विधायक भी जिला विकास परिषद चुनाव लड़ रहे हैं। इन चुनावों में जम्मू-कश्मीर की जनता भी बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रही है। अभी तक मतदान का प्रतिशत भी उत्साहजनक है। जम्मू संभाग में जहाँ औसत मतदान 65 प्रतिशत के आसपास है, वहीं कश्मीर संभाग में यह 40 प्रतिशत के आसपास है।

भारतीय जनता पार्टी, कॉन्ग्रेस, पैंथर्स पार्टी जैसे दल तो इन चुनावों में जोर-आजमाइश कर ही रहे हैं। इनके अलावा नेशनल कॉन्फ्रेस, पीडीपी, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी जैसे कई चिर- प्रतिद्वंद्वी दल ‘पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लरेशन’ के बैनर तले गठबंधन बनाकर जिला विकास परिषद का चुनाव लड़ रहे हैं। यह मतलबपरस्तों और जम्मू-कश्मीर के लुटेरों का मौकापरस्त गठजोड़ मात्र है।

पहले गुपकार गठजोड़ चुनाव में भागीदारी को लेकर असमंजस में था और चुनाव बहिष्कार की योजना बना रहा था किन्तु बाद में उन्हें लगा कि कहीं चुनाव बहिष्कार करके वे भी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की तरह अलग-थलग पड़कर अप्रासंगिक न हो जाएँ और ‘राजनीतिक स्पेस’ को नए खिलाड़ी घेर लें, इसलिए वे गठबंधन बनाकर पूरी मजबूती से यह चुनाव लड़ रहे हैं और इन चुनावों के परिणामों के माध्यम से कोई बड़ा राजनीतिक सन्देश देने की फिराक में हैं।

हालाँकि, इन चुनावों का वास्तविक और सबसे बड़ा सन्देश राज्य में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की बहाली और उसमें व्यापक जन भागीदारी ही होगा। आतंकवादी और अलगाववादी संगठनों को ठेंगा दिखाते हुए न सिर्फ भारी संख्या में लोग चुनाव लड़ रहे हैं, बल्कि पूर्ववर्ती चुनावों से कहीं ज्यादा मतदान भी कर रहे हैं। जनता के इस मूड को भाँपकर ही ‘पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लरेशन’ को चुनाव लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। किन्तु जिन मंसूबों के तहत यह अवसरवादी, अपवित्र और बेमेल गठबंधन चुनाव लड़ रहा है, वे इस चुनाव से पूरे नहीं होंगे, क्योंकि इन चुनावों के परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण इस प्रक्रिया में जनता की भागीदारी और इसका समयबद्ध, शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से संपन्न होना है।

‘रोशनी एक्ट’ के अंधेरों से जम्मू-कश्मीर का आम नागरिक परिचित है। नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और कॉन्ग्रेस के तमाम राजनेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपति भूमाफियाओं ने इस एक्ट की आड़ में बड़े पैमाने पर सरकारी भूमि को हड़प लिया था। अब उस जमीन का हिसाब-किताब किया जा रहा है और उसे इनके कब्जे से मुक्त कराकर आम जनता की आवश्यकताओं और हितों के अनुरूप उपयोग किया जाएगा।

रोशनी एक्ट भूमि घोटाला न सिर्फ सरकारी भूमि की लूट का मामला था बल्कि जम्मू संभाग की जनसांख्यिकी को बदलने की सुनियोजित साजिश भी थी, इसलिए जम्मू संभाग में धर्म विशेष के लोगों के अलावा रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठियों को भी बड़ी तादाद में सरकारी जमीन पर बसाया गया।

ऐसी तमाम असंवैधानिक और सांप्रदायिक नीतियों के पर्दाफाश और अंधेरगर्दी और अराजकता पर अंकुश लगने से घबराए हुए नेशनल कॉन्फ्रेस और पी डी पी जैसे चिर-प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल गुपकार घोषणापत्र के बहाने एक मंच पर आ गए हैं। अनुच्छेद 370 की बहाली के फारुख अब्दुल्ला द्वारा चीन से सहायता लेने की बात करना और महबूबा मुफ़्ती द्वारा अनुच्छेद 370 की बहाली तक तिरंगा न उठाने की बात कहना इनकी राष्ट्रभक्ति और असल इरादों का खुलासा करते हैं।

राज्य में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया शुरू हो जाने और शांति बहाल हो जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में पूँजी निवेश और विकास की अपार संभावनाएँ हैं। जिला विकास परिषद् चुनाव लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की बहाली की दिशा में उठाया गया पहला और निर्णायक कदम है।

उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर की राज्य विधान-सभा में क्षेत्रीय असंतुलन रहा है। इसलिए चुनाव आयोग विधानसभा चुनाव कराने से पहले वहाँ विधान-सभा क्षेत्रों का परिसीमन करा रहा है। यह परिसीमन कार्य अगले वर्ष तक पूरा होने की सम्भावना है। परिसीमन प्रक्रिया के पूर्ण हो जाने के बाद लोकतान्त्रिक व्यवस्था और विकास-प्रक्रिया में सभी क्षेत्रों और समुदायों का समुचित प्रतिनिधित्व और भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।

शासन-प्रशासन की कश्मीर केन्द्रित नीति भी संतुलित हो सकेगी और अन्य क्षेत्रों के साथ होने वाले भेदभाव और उपेक्षा की भी समाप्ति हो जाएगी। ये सारी कोशिशें जम्मू-कश्मीर को न सिर्फ आपस में जोड़ने बल्कि उसे शेष भारत और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रतिफलन है।

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प्रो. रसाल सिंह
प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे। दो कार्यावधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। संपर्क-8800886847

 

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