लिबरल गिरोह, जले पर स्नेहलेप लगाओ, मोदी के भाषण पर पूर्वग्रहों का ज़हर मत डालो

कुछ मुसलमानों की मौतें आपको सिर्फ इसलिए याद हैं कि इन्हें जलाने-दफ़नाने के बाद भी लेखों, भाषणों, एंकरों के शुरुआती एकालापों में इन्हें कुत्सित विचारों के फॉर्मेलिन लेप में, ठंढी उदासीन संवेदना के बर्फ़ की सिल्लियों पर इन्हें ज़िंदा रखा गया।

कल मोदी ने स्पीच दी। ऐसा भाषण जिसमें आप विरोधी होकर भी ख़ामियाँ नहीं निकाल सकते। ज्ञानी आदमी तो ज्ञानी होता है। ज्ञानी आदमी चुप रहता है। उसे पता है कि किस स्पीच की क्या अहमियत है। उसे पता होता है कि संदर्भ, काल और परिस्थिति क्या है। उसे पता होता है कि सत्य क्या है, असत्य क्या है। इसलिए वो सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही स्थिति में शांत रहना पसंद करता है। ज्ञानी व्यक्ति को पता होता है कि दोनों ही विपरीत परिस्थितियों में, एक सी स्थिति बना कर रहना ही सर्वोपयुक्त अवस्था है। वो जब बोलता है तब भी उसकी बातों में तार्किकता होती है, सिर्फ भावनाएँ नहीं जो कि परिस्थितिजन्य होती हैं, और कई बार तथ्यों से परे।

इसके विपरीत, जो स्वयं को ज्ञानी समझते हैं, वो लोग, जो सामने है, उसके परे जाकर, अपने पूर्वग्रहों के साथ, अपने तथ्य और अपने आँकड़ों के साथ संवाद करते हैं, जबकि उनकी शुरुआत किसी दूसरे व्यक्ति को विषय बना कर होती है। वो शुरु करेंगे कि ‘मोदी ने स्पीच तो बहुत अच्छी दी’ और एक ही पैराग्राफ़ तक उतरते हुए वो अपना प्रोपेगेंडा, फ़रेब और प्रेज्यूडिस (पूर्वग्रह) का वमन कर देंगे।

वो तुरंत ही उसी भविष्य में चले जाएँगे जिसे उन्होंने 2014 की मई में देख कर कहा था कि अब तो सड़कों पर हिन्दू नंगी तलवारें लिए दौड़ेंगे, मुसलमानों को तो काट दिया जाएगा, गली-गली में दंगे होंगे, मस्जिदों का तोड़ दिया जाएगा, मुसलमानों की बस्तियों पर बम गिराए जाएँगे…

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याद कीजिए, क्या ऐसी बातें लिबरलों के गिरोह और इस देश के पढ़े लिखे लोगों ने नहीं उठाई थीं? याद कीजिए कि पाँच साल क्या इस गिरोह के लोगों और फेसबुकिया समर्थकों ने प्रपंच के सच होने के इंतजार में जीभों नहीं लपलपाई? क्या इन रक्तपिपासु बुद्धिजीवियों की आँखों में बिल्लौरी चमक नहीं आई जब कोई मुसलमान किसी भीड़ का शिकार बना?

क्या ये लोग उस हत्या या सामाजिक अपराध पर संवेदना दिखा रहे थे? जी नहीं! ये अपने भीतर की कुंठा को सेलिब्रेट कर रहे थे। ये चाहते थे, और आज भी चाहते हैं कि मुसलमान मरे और ये सरकार को घेरें। ये चाहते हैं कि नजीब अहमद कहीं से कटे सर के साथ, किसी जंगल में किसी को मिले और उसकी जेब में एक पत्र हो कि उसे भाजपा वालों ने मार दिया। फिर नजीब का गायब होना, मुद्दा नहीं रह जाएगा। मुद्दा वो पत्र हो जाएगा जिसकी ऑथेन्टिसिटी संदिग्ध होगी लेकिन माहौल बना कर कोई चुनाव प्रभावित कर दिया जाएगा।

आपको लगता है कि इन लिबरलों को, इन वामपंथियों को, कॉन्ग्रेसियों को, पत्रकारों के समुदाय विशेष को, इन सारे तरह के दोगलों को कोई फ़र्क़ पड़ता है कि अखलाक़ जैसे व्यक्ति की हत्या कर दी गई या कोई जुनैद सीट के झगड़े में मारा गया, या किसी वेमुला ने आत्महत्या कर ली? आप ग़लतफ़हमी में है। ये सारी मौतें, आपको इसलिए याद नहीं कि आप संवेदनशील हैं, ये सारी मौतें आपको सिर्फ इसलिए याद हैं कि इन्हें जलाने-दफ़नाने के बाद भी लेखों, भाषणों, एंकरों के शुरुआती एकालापों में इन्हें कुत्सित विचारों के फॉर्मेलिन लेप में, ठंढी उदासीन संवेदना के बर्फ़ की सिल्लियों पर इन्हें ज़िंदा रखा गया।

आप इन चेहरों को पहचान लीजिए। ये शब्दों की समुराय तलवार भाँजते हुए छद्म-बुद्धिजीवी चाहते हैं कि रक्त बहे और उसे रंगा जाए। ये चाहते हैं कि समाज में कोई हिन्दू भीड़ किसी मुसलमान की हत्या करे। उन्हें बस हेडलाइन ही चाहिए, भीतर में ज़मीन का झगड़ा हो, या बेटी को छेड़ने की बात, उससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। उसे शब्दों से ये ऐसे रच देंगे कि वहाँ लाशों का रंग निखर जाएगा और भीड़ के सर पर एक विचारधारा की बात पटक दी जाएगी।

ये हुआ है, और ये आगे भी होगा। जब वेटिकन और मक्का आज तक भारत को ईसाई और मुसलमान बनाने के लिए आक्रमण से लेकर उपनिवेश बनाने तक, और वैचारिक से लेकर राजनैतिक तक, हर तरह के तंत्र का प्रयोग कर रहा है, तो ऐसे लोग गायब कैसे हो जाएँगे। इसलिए, ये तो भूल कर भी मत सोचिए कि इन वैचारिक दोगलों की जमात साँस लेने के लिए भी रुकेगी। इनका ज़हर और तेज होगा।

मोदी के भाषण के बाद जिस तरह की लाइन इन लोगों ने ली है, उससे एक दुर्गंध आप सूँघ सकते हैं। इनकी बदबू आप तक न चाहते हुए भी पहुँच जाएगी। ये इतने नीच लोग हैं, ये इतने गिरे हुए इन्सान हैं, कि पाँच सालों के कार्यकाल के बाद, पहले से भी अधिक बहुमत, अधिक वोट शेयर पाने वाली सरकार को, अपनी अभिजात्यता के घमंड से आँकने में कसर नहीं छोड़ रहे।

इन्हें लगता है कि देश के कुछ लोगों के वोट का मूल्य बाक़ियों के वोट को मूल्य से करोड़ गुणा ज्यादा होना चाहिए। ये चाहते हैं कि इनके जैसे लोगों के पास सत्ता को चुनने की शक्ति होनी चाहिए। इसीलिए ये सड़ाँध मारते छद्मबुद्धिजीवी यह शेयर करते पाए जाते हैं कि लोकतंत्र को जनता के हाथों में छोड़ देना गलत है क्योंकि ये बहुत ज़्यादा मूल्यवान है। इस पंक्ति में घमंड है। इस पंक्ति में असफल लोगों के लिए, हारी हुई विचारधाराओं के लिए, और सामान्य मानव को लेकर एक घृणा है कि वो ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, अतः उनके विचारों की अहमियत, उन 25 करोड़ मतदाताओं से ज्यादा है जिसने मोदी को वोट दिया है।

जबकि वो लोग यह बात भूल जाते हैं कि उन 25 करोड़ में, 25 लाख लोग ऐसे होंगे जिनकी मानसिक अवस्था और अकादमिक क्वालिफ़िकेशन इन गिरोह के सरगनाओं से बेहतर होगी। यही कारण है कि ये अपनी विचारधारा, या जिसका भी ये समर्थन करते हैं, उसकी बुरी हार के बाद भी, किसी प्रधानमंत्री के आशावादी भाषण को अपनी घृणा के चश्मे से देखने में संकोच नहीं करते।

इन्होंने मोदी के भाषण के बाद, बिना किसी तथ्य के, सिर्फ अपनी फैंटसी और फेटिश को आधार बना कर यह लिख दिया कि भाषण तो ठीक है लेकिन अल्पसंख्यकों के मन में भय है उस पर मोदी को काम करना होगा। जबकि, यह भय पूरी तरह से, मीडिया का बनाया हुआ एक वाहियात-सा ग़ुब्बारा है जहाँ मुसलमानों को हर रात, स्टूडियो से, डराने की कोशिश की गई है। आपसी रंजिश की घटनाओं को धर्म से जोड़ा गया, मुसलमानों द्वारा किए गए अपराधों पर चुप्पी साध ली गई, बंगाल के दंगों की मीडिया कवरेज यह कह कर नहीं हुई कि मीडिया को हवा नहीं देनी चाहिए वरना दूसरे इलाकों में भी भय फैल जाएगा…

लेकिन क्या बात इतनी सीधी है? क्या देश में मुसलमान सच में डरा हुआ है? किस आधार पर? क्योंकि कहीं किसी गौतस्कर को दस लोगों ने घेर कर पीटा? फिर हिंदुओं को भी तो यह कहने का अधिकार है कि वो मुसलमानों से डर कर जीते हैं कि कैराना से, कश्मीर से, बंगाल के कई गाँवों से उन्हें घेर कर निकाल रहे हैं। उन्हें भी तो हर ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे के साथ बम धमाके करने वाले मज़हब के लोगों से डरना चाहिए। उन्हें भी तो यह हक़ मिले कि वो यह कह सके कि तुम तथाकथित गौरक्षकों द्वारा की गई भीड़ हत्याओं के सही आँकड़े रखो, और हम हर आतंकी घटना के आँकड़े रखते हैं, फिर तय करेंगे कि डर कौन फैला रहा है।

वहाँ आप भटके हुए नौजवान, सच्चा मुसलमान और पता नहीं कौन-कौन से मासूम तर्क ले आएँगे। आपसे आज़म खान जैसे बेहूदा लोगों की निंदा तक नहीं हो पाती। आपसे हाजी अली के ट्रस्टी की निंदा तो हो नहीं पाती। आप तो मौन रहकर मौलवी द्वारा किए जा रहे मजहबी बलात्कारों को समर्थन देते हैं। आप तो उस समय बैलेंस बनाने लगते हैं कि हिन्दुओं में भी कुरीतियाँ हैं! क्या हिन्दुओं की कुरीतियाँ ख़त्म होने से मौलवी निकाह हलाला के नाम पर करने वाले बलात्कार बंद कर देगा? क्या उसके ये मजहबी कानून हिन्दुओं के कारण हैं या कारण कुछ और है?

आपकी संवेदना आपके अल्पज्ञान से उपजती है। आपकी संवेदना आपकी विचारधारा के सापेक्ष चलती है। आप बहुत ही घटिया क़िस्म के धूर्त और आवारा लोग हैं जिन्हें किसी की मृत्यु से नहीं, उसके मुसलमान होने और मरने से मजा आता है। आपको लेख के लिए एक विषय मिल जाता है। इसलिए आपको मोदी की स्पीच में सकारात्मक बातों से ज्यादा इस बात पर नकली चिंता हो जाती है कि क्या मायनोरिटी सुरक्षित महसूस करेगी?

जबकि आप ये सारी बातें महज़ कल्पनाशीलता से कहते हैं। आपके पास कोई तथ्य नहीं है जो साबित कर सके कि पिछले पाँच साल में कितने देंगे हुए जो भाजपा शासित प्रदेशों में हुए, और उनकी संख्या ग़ैर-भाजपा शासित प्रदेशों से ज्यादा है। आप यह साबित नहीं कर पाएँगे कि मोदी की सरकार बनने के बाद मनमोहन की सरकार या कॉन्ग्रेस की किसी भी सरकार से ज़्यादा बड़े पैमाने के दंगे हुए हैं। छोटे दंगों की गिनती में भी आप हार जाएँगे। इसीलिए, आप घूम फिर कर गौरक्षकों पर आ जाते हैं, जैसे आप कुछ साबित नहीं कर पाए तो राफेल पर आ गए थे।

गौरक्षकों की घटनाओं की संख्या पता कीजिए, कितने मामलों में केस दर्ज नहीं हुआ, यह पता कीजिए और यह भी पता कीजिए कि कितनी बार गौतस्करों ने पुलिस पर गाड़ी चढ़ा दी। यह भी पता कीजिए कि गायों को चोरी से क्यों काटा जा रहा है। आपको बहुत बातें पता करने की ज़रूरत है, लेकिन आप नहीं करेंगे क्योंकि आपको लगता है कि आप लिख देंगे, और लोग मान लेंगे।

यही दंभ आपकी विचारधारा और टट्टी लेखों को अप्रासंगिक बन चुका है। आपको नहीं लगता कि आपने पाँच साल जो विषवमन किया है, जो ज़हर समाज में घोला है, जिस आग को हवा देते रहे, उसे लोगों ने नकार दिया? आपको लगता है कि मुसलमान महिलाओं ने मोदी को वोट नहीं दिया होगा? आपको लगता है कि बनारस में मोदी की जीत का जश्न मनाते मुसलमान टिकटॉक का विडियो बना रहे थे?

आपकी क़िस्मत बहुत अच्छी है कि इस देश का प्रधानमंत्री मोदी है जिसके कार्यकाल में किसी अख़बार पर प्रतिबंध नहीं लगा, किसी फिल्म का प्रदर्शन नहीं रुका, किसी दुर्गा के कार्टूनों के कारण उसे सजा नहीं हुई। आप स्वतंत्र हैं लिखने को और आप पर कोई हमले नहीं कर रहा। जिस सहजता से आपके तारणहार पत्रकार यह लिख देते हैं कि सरकार आवाज़ों को दबा रही है, वो किसी और कार्यकाल में नहीं दिखा। आप अगर यह लिख और बोल पा रहे हैं कि अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं, इसका यही मतलब है कि इतनी आज़ादी है कि सरकार के खिलाफ आप पाँच साल पत्रकारिता के नाम पर कैम्पेनिंग कर सकते हैं।

इसलिए, घृणा फैलाना बंद कीजिए। अगर ज्योतिषी नहीं हैं तो फिर चुप रहना सीखिए क्योंकि मुँह खोलने पर आप विष्ठा ही कर रहे हैं। कुछ ढंग का नहीं हो पा रहा तो मोदी ने जो कहा है उसी को शब्दशः लिखिए। विश्लेषण की कोशिश मत कीजिए क्योंकि उसमें आपका ज़हर घुलना तय है। अगर आप भीतर से जानते हैं कि आप ज्ञानी बनने की कोशिश कर रहे हैं, तो ठहर जाइए। ज्ञानी व्यक्ति स्थिर होता है, वो ज़हर की खुली पुड़िया हवा में खोले नहीं चलता।

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