Sunday, July 25, 2021
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क्या बिहार चुनावों में ‘गॉडफादर’ के माइकल जैसा कमाल दिखा पाएँगे चिराग पासवान?

बिहार, जिसे राजनीति की प्रयोगशाला भी कहते हैं, वहाँ कुछ ही दिनों पहले तक मामला दो गठबंधनों के बीच चुनाव लड़े जाने का था। लेकिन जिस देश में लोकतंत्र ही बहुपक्षीय, कई दलों का हो, वहाँ की राजनैतिक प्रयोगशाला में केवल दो दलों/गठबंधनों के बीच चुनाव हो ऐसा कैसे हो सकता है?

हाल के दौर के बहुचर्चित उपन्यासों की लिस्ट बनाने बैठें तो मारियो पूजो का लिखा ‘गॉडफादर’ उस सूची में काफी ऊपर आएगा। इस उपन्यास पर बनी अंग्रेजी फ़िल्में तो मील का पत्थर रही ही हैं, भारत में भी इनकी सस्ती नक़ल करते हुए ‘सरकार’ जैसी फ़िल्में बनाई गई।

संगठित अपराध की दुनिया और कैसे वहाँ साम, दाम, दंड, भेद इस्तेमाल करते हुए कोई सत्ता में आता है, कोई अपनी सत्ता बनाए रखता है और कैसे कोई स्थापित सत्ता को चुनौती देता है, इन सब विषयों पर लिखी गई ‘गॉडफादर’ अद्भुत कृति है। वर्षों से इसकी लोकप्रियता में कोई ख़ास अंतर नहीं आया है।

इस उपन्यास के मुख्य पात्रों में से एक डॉन कर्लिओने जब बूढ़ा हो जाता है तो उसका परिवार एक गंभीर संकट से जूझ रहा होता है। उसका सबसे बड़ा बेटा सोनी, एक गैंगवार में मारा जा चुका था। मंझला बिलकुल ही नकारा सिद्ध हुआ था और उसके छोटे बेटे को किसी पुलिस अफसर की हत्या के जुर्म में देश से भागना पड़ा था।

अंतिम समय में डॉन एक संधि करता है जिसके तहत उसके सबसे छोटे बेटे को वापस देश में आने की इजाजत मिल जाती है। इस वक्त तक डॉन काफी बूढ़ा हो चला था और वो सबसे छोटे बेटे माइकल को धंधे के गुर सिखाता एक दिन हृदयघात से मर जाता है।

सत्ता हथियाने के लिए पहले से ही लालायित उसके दुश्मन सबसे छोटे बेटे माइकल को मामूली समझकर सब हड़प लेने को लालायित होते हैं। यहीं उनसे एक बड़ी गलती हो जाती है। जिस माइकल को वो सीधा-सादा समझ रहे थे, वो अब उतना भोला नहीं रह गया था। उसे मालूम था कि दुश्मनों की ओर से जो मैत्री सन्देश लेकर आएगा, वही उनसे मिला हुआ है।

जैसे ही उसके पिता के साथ काम करने वाला टेस्सियो ऐसा करने की कोशिश करता है और अपने साथ माइकल को ले जाना चाहता है, उसे पहचान कर निपटा दिया जाता है। एक ही बार में माइकल अपने और अपने पिता के कई भूतपूर्व दुश्मनों की हत्या करवा डालता है। लोगों को जबतक समझ आता कि चल क्या रहा है, माइकल सत्ता हथिया चुका होता है।

बिहार, जिसे राजनीति की प्रयोगशाला भी कहते हैं, वहाँ कुछ ही दिनों पहले तक मामला दो गठबंधनों के बीच चुनाव लड़े जाने का था। लेकिन जिस देश में लोकतंत्र ही बहुपक्षीय, कई दलों का हो, वहाँ की राजनैतिक प्रयोगशाला में केवल दो दलों/गठबंधनों के बीच चुनाव हो ऐसा कैसे हो सकता है?

भाजपा और जदयू के साथ आए दलों का मुकाबला पहले तो राजद-कॉन्ग्रेस और कई वामपंथी कहलाने वाले दलों के गठबंधन से था। धीरे-धीरे इसमें एक तीसरे मोर्चे की जगह भी बन आई। विपक्ष यानी राजद-कॉन्ग्रेस-वाम से निराश कुछ छोटे दलों ने एक तीसरे मोर्चे की जगह बना ली थी।

हाल का दौर देखें तो तीसरे मोर्चे की ओर से भूतपूर्व संसद पप्पू यादव (जिनकी पत्नी कॉन्ग्रेस के टिकट पर जीती हैं), ने कई क्षेत्रों में लोकप्रियता हासिल कर ली थी। पिछले वर्ष हुए पटना में जलजमाव और चमकी बुखार इत्यादि के दौर में उनके दौरे और मदद का काम लगातार चलता रहा।

इसकी वजह से मीडिया में भी उन्हें अच्छी लोकप्रियता मिली। सोशल मीडिया के जरिए लोकप्रियता हासिल करने के प्रयास में एक पुष्पम प्रिया चौधरी और उनकी ‘प्लुरल्स’ नाम की पार्टी भी दिखी। इनके अलावा कई छोटे क्षेत्रीय दल भी उठकर हर चुनाव में सामने आ ही जाते हैं।

इन सबके बीच गौर करने लायक रामविलास पासवान और उनकी पार्टी भी रही है। रामविलास पासवान अक्सर चुनावों का बैरोमीटर नाम से जाने जाते थे, और उनका समर्थन जिसे मिला हुआ हो, वही सत्ता में आएगा, ऐसा समझा जाता था। शायद यही वजह रही कि पुलिस (डीएसपी) की नौकरी को छोड़ राजनीति में उतरे रामविलास 1996 से लेकर 2019 तक, चाहे जिस भी गठबंधन की सरकार बने, ज्यादातर समय मंत्री जरूर बने रहे। हृदय के ऑपरेशन के बाद अभी जब उनकी मृत्यु की खबर आई तो राजनैतिक हलकों में थोड़ी सुगबुगाहट हुई।

उनके पुत्र चिराग पासवान पिछले कुछ दिनों से खुलकर भाजपा का समर्थन तो करते हैं, मगर जद-यू से उन्होंने बैर साध रखा है। अब तक के आँकलनों की मानें तो वो करीब-करीब 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने को तैयार हैं। काफी कुछ ‘गॉडफादर’ के माइकल की ही तरह पिता के गुजरते ही वो सभी प्रतिद्वंदियों को निपटा कर आगे आने की तैयारी में दिखते हैं।

नीतीश कुमार के फ्लैगशिप प्रोग्राम ‘सात निश्चय’ के विरोध में उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने प्रचार भी शुरू कर दिया है। कुछ-कुछ राजस्थान की ही तर्ज पर ‘भाजपा तुझसे बैर नहीं पर नीतीश तेरी खैर नहीं’ के नारे भी सुनाई देने लगे हैं।

चुनावी नतीजों के आधार पर देखा जाए तो उनकी पार्टी एलजेपी ने अब तक अधिकतम 29 सीटों पर विजय प्राप्त की है। अगर पिछले (2015) चुनावों के नतीजे देखें तो एलजेपी अब केवल दो पर सिमट आई है। ऐसे में रामविलास पासवान के ना रहने पर चिराग कोई ‘गॉडफादर’ के माइकल जैसा कमाल दिखा पाएँगे, इसपर शक रहता है।

इस पूरे वाकये में भाजपा की भूमिका परदे के पीछे वाली ही रही है। जेपी नड्डा और अमित शाह की चिराग से लगातार बातचीत जारी थी। इसलिए उन्हें पहले से अंदाजा ना हो कि चिराग क्या करने वाले हैं, ये तो नहीं हो सकता।

भाजपा और आरएसएस के कुछ करीबी भी हाल ही में एलजेपी में शामिल होकर उसके टिकट पर उतरने की मंशा जता चुके हैं। दिनारा से पिछले चुनाव में लड़कर हार चुके राजेन्द्र सिंह और नवादा के भाजपा के जिला प्रमुख अनिल कुमार पहले ही भाजपा छोड़कर एलजेपी का दामन थाम चुके हैं।

इसके अलावा भी भाजपा कार्यकर्ताओं के एलजेपी में आना जिस गति से जारी है, उससे लगता है कि ‘नीतीश ही नेता होंगे’ के सुशील मोदी के वादों के बावजूद, भाजपा के अन्दरखाने में नीतीश को किनारे करने की खिचड़ी पक चुकी है।

बाकी समीकरणों में भी पक्ष और विपक्ष तय ही है, अब बस जनता के मुहर लगाने की देर है। उसके बाद ही कहा जाएगा कि चुनावी ऊंट चिराग की करवट में बैठा भी या नहीं!

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Anand Kumarhttp://www.baklol.co
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