Wednesday, December 2, 2020
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जिसे हर सरकार ने नकारा, उस पूर्वोत्तर में खोले विकास के नए द्वार: एक्ट ईस्ट पॉलिसी का दिखने लगा असर

पूर्वोत्तर में भौतिक ढॉंचे को विकसित करते हुए आसियान क्षेत्र के साथ उसके संबधों और संपर्क को सुदृढ़ करने के लिए निरंतर प्रयास किया जा रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंध और संपर्क को बढ़ाया जा रहा है। 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' की तीन प्रमुख विशेषताएँ- संपर्क, संस्कृति और वाणिज्य ही हैं।

दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत की साझी ऐतिहासिक विरासत, भौगोलिक निकटता और हाल के वर्षों में क्रमशः बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को इस साझेदारी की अनिवार्य धुरी बनाते हैं। भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र 5,300 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा हुआ है तथा एक संकरे गलियारे (चिकेन नेक/सिलीगुड़ी कॉरिडोर) से शेष भारत से जुड़ता है। यह क्षेत्र पिछले काफी समय से उपेक्षा का शिकार रहा है, जिसके कारण यहाँ अलागाववाद भी क्रमशः बढ़ता गया है। जल, जमीन, वनस्पति, जैव विविधता और हाइड्रोकार्बन जैसे प्राकृतिक और अन्यान्य खनिज संसाधनों का असीम भण्डार होने के बावजूद यह क्षेत्र अविकसित रहा है। अतः बुनियादी ढॉंचे की स्थापना के साथ इस उपेक्षित क्षेत्र में विकास की महती आवश्यकता रही है, जिसके लिए बड़ा निवेश भी अपेक्षित था।

मई 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर भारत की 35 से अधिक यात्राएँ की हैं। पूर्वोत्तर की ओर दिए गए उनके व्यक्तिगत ध्यान ने विकास की सभी गतिविधियों को तेजी प्रदान की है। उनकी प्राथमिकता न केवल पूर्वोत्तर को शेष भारत के करीब लाने की है, बल्कि शेष भारत को भी पूर्वोत्तर के निकट ले जाने की है। फलस्वरूप, सरकार द्वारा ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ से कई कदम आगे बढ़कर ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के माध्यम से पूर्वोत्तर में समग्र और समावेशी विकास की अनेक परियोजनाएँ प्रारंभ की गईं हैं।

दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लिए भारत के इस ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ बहुपक्षीय जुड़ाव के माध्यम से आर्थिक सहयोग एवं सांस्कृतिक संबंधों को निरंतर बढ़ावा देना और वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की प्रभावी भूमिका को सुनिश्चित करना है। ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र को पूर्वी देशों के “प्रवेश द्वार” के रूप में महत्व देती है। यह क्षेत्र सम्पूर्ण भारत की प्रगति और समृद्धि के लिए एक विस्तारित गलियारा है। इसलिए इस नीति में उत्तर-पूर्व क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दी गई है।

पूर्वोत्तर में भौतिक ढॉंचे (सड़क, हवाई अड्डे, दूरसंचार, विमानपत्तन, जल/बिजली संयंत्र आदि) को विकसित करते हुए आसियान क्षेत्र के साथ उसके संबधों और संपर्क को सुदृढ़ करने के लिए निरंतर प्रयास किया जा रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंध और संपर्क को बढ़ाया जा रहा है। ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ की तीन प्रमुख विशेषताएँ- संपर्क, संस्कृति और वाणिज्य ही हैं। इसके माध्यम से लोगों की क्षमताओं और कौशल का विकास करते हुए प्रगति और समृद्धि में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। पूर्वोत्तर में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विकास को बढ़ावा दिया गया है। यह क्षेत्र पहाड़, जंगल और नदियों वाला है। इसलिए जलविद्युत की उत्पादकता को बढ़ाने के अतिरिक्त पर्यटन, कृषि से सम्बद्ध उद्योग, देशज कौशल-शिक्षा, कीटपालन तथा नैसर्गिक संसाधनों पर आधारित अवसंरचना में भारी निवेश किया जा रहा है।

पूर्वोत्तर के लिए अपर्याप्त परिवहन सुविधा एक ऐसी गम्भीर समस्या रही है, जिसने लम्बे समय तक इस क्षेत्र के विकास को बाधित किया है। किसी भी क्षेत्र के सम्पूर्ण विकास के लिए आधारभूत ढाँचे का सुदृढ़ होना बहुत आवश्यक है। इससे नागरिकों को मूलभूत सुविधाएँ तथा कच्चे माल और उत्पादों की आवाजाही सुनिश्चित होती है। परिवहन-व्यवस्था बुनियादी भौतिक ढाँचे की मेरुदंड होती है। केंद्र सरकार द्वारा आधारभूत सुविधाओं के साथ-साथ परिवहन के सभी साधनों (रेल, सड़क, उड्डयन, जलपत्तन आदि) में भारी निवेश कर कनेक्टिविटी की कमी को मिटाते हुए पूर्वोत्तर के विकास की मुख्य बाधा को समाप्त किया जा रहा है।

केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर में 900 किलोमीटर रेल पटरियों को ब्रॉड गेज में परिवर्तित कर दिया है और इस क्षेत्र के सभी आठ राज्यों की राजधानी को रेल संपर्क प्रदान करने के प्रयास चल रहे हैं। इसके लिए लगभग 50,000 करोड़ रुपए की लागत से 15 नई रेल लाइनों पर काम शुरू हुआ है। पूर्वोत्तर के दूर-दराज क्षेत्रों का हवाई संपर्क होने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और निवेश को भी गति मिलेगी। अत: केंद्र सरकार की ‘उड़ान योजना’ के तहत, पूर्वोत्तर में 5 नए हवाई अड्डों का निर्माण किया गया है। इस योजना में एक विमानन जनशक्ति प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना, रूपसी हवाई अड्डे का विकास, दीमापुर में हवाई सुविधा का विस्तार आदि भी शामिल हैं। सिक्किम में पाक्योंग हवाई अड्डे का निर्माण पूरा हो गया है। अरुणाचल में ज़ीरो, पासीघाट, विजय नगर, मेचुका, टीट्यूटिंग और तेजू में छह हवाई पट्टियों का नवनिर्माण किया गया है। गुवाहाटी को ड्रुक एयर फ़्लाइट (भूटान – गुवाहाटी – सिंगापुर फ़्लाइट) के माध्यम से भूटान और सिंगापुर से सीधे जोड़ा गया है। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा उड्डयन क्षेत्र में कुछ ऐसी समावेशी परियोजनाओं का क्रियान्वयन किया गया है जिनसे पूर्वोत्तर को शेष भारत के साथ पर्याप्त प्रवेश द्वार मिल सकें।

मोदी सरकार द्वारा 32,000 करोड़ रुपए के निवेश के साथ 4,000 किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्गों को मॅंजूरी दी गई है, और क्षेत्र में लगभग 1,200 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया है। अरुणाचल में होलोंगी- ईटानगर 4 लेन राष्ट्रीय राजमार्ग तथा मेघालय में शिलांग-तुरा (271 किलोमीटर) राजमार्ग का निर्माण किया गया है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड (1,360 किलोमीटर लंबे) त्रिपक्षीय राजमार्ग का निर्माण किया जा रहा है, जो पूर्वोत्तर भारत को आसियान देशों के साथ जोड़ देगा। इससे बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।

इसके अतिरिक्त, वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढॉंचे के विकास पर जोर दिया जा रहा है। असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच संपर्क बढ़ाने और सीमा पर सेना की आवाजाही को आसान बनाने के लिए दो बड़े पुलों का भी उद्घाटन किया गया है। असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने वाले ये दो पुल- लोहित का ढोला सदिया पुल (जो भारत का सबसे लंबा पुल है) और ब्रह्मपुत्र का रेलपुल- बोगीबील पुल (जो भारत का सबसे लंबा रेल-सह-सड़क पुल है और असम में डिब्रूगढ़ और धेमाजी को जोड़ता है) हैं। ये बेहद सामरिक और सैन्य महत्व के पुल हैं। इनसे सशस्त्र बलों और युद्ध उपकरणों की त्वरित आवाजाही हो सकेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा-व्यवस्था सुदृढ़ होगी।

मिजोरम में 1302 करोड़ रुपए की लागत की 60 मेगावॉट की ट्युरिअल जलविद्युत परियोजना को पूरा किया जा चुका है। यह परियोजना मिजोरम में स्थापित सबसे बड़ी परियोजना है। इससे उत्पादित बिजली राज्य को ही दी जाएगी। इससे राज्य में सबको सातों दिन चौबीसों घंटे किफायती और प्रदूषणमुक्त ऊर्जा देकर राज्य का चहुँमुखी विकास किया जा सकेगा। परियोजना से अतिरिक्त 60 मेगावाट बिजली प्राप्‍त होने के साथ ही मिजोरम अब सिक्किम और त्रिपुरा के बाद पूर्वोत्‍तर भारत का तीसरा सरप्लस बिजली वाला राज्य बन जाएगा।

शिक्षा, सूचना-प्रौद्योगिकी, कला-कौशल,शिल्प, खेल, पर्यटन तथा स्वास्थ्य जैसी सामाजिक बुनियादी संरचना एवं सुविधाएँ उस क्षेत्र के मानव विकास और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अतः खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए केंद्र सरकार ने मणिपुर में प्रथम राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी है तथा भारत की बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक मैरीकॉम को राज्यसभा का नामित सदस्य बनाया है। पूर्वोत्तर भारत गिरते स्वास्थ-स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण हमेशा खबरों में रहा है। आयुष्मान भारत ने इस परिदृश्य को बदलने में मदद की है। जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचाने के लिए असम के चांगसारी में AIIMS तथा लखीमपुर, डुबरी, दीफू, नौगॉंव में 4 नए मेडिकल कॉलेज और तिनसुकिया, कोकराझार, करीमगंज और नलबाड़ी में भी 4 मेडिकल कॉलेज खोलने का काम शुरू हुआ है।

उत्तर-पूर्व की अर्थव्यवस्था के लिए बाँस महत्वपूर्ण है। वहाँ की अर्थव्यवस्था में इसके अत्यधिक महत्व के कारण ही इसे “हरा सोना” कहा जाता है। सरकार ने बाँस को पेड़ों की सूची से हटा कर उसे काटने, लाने-ले जाने और इसके उपयोग सम्बन्धी नियमों से 90 वर्ष पुरानी पाबंदियों को हटा दिया है। 50 करोड़ रुपए की लागत से 75 हेक्टेयर क्षेत्र में असम के दीमा हसाओ जिले के मंडेरदिसा में एक बाँस औद्योगिक पार्क की भी स्थापना की जा रही है। यह कदम बाँस आधारित हस्तकला को बढ़ावा देते हुए असंख्य स्थानीय लोगों को रोजगार देगा। इसके अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश में नॉर्थ ईस्ट रीजन टेक्सटाइल प्रमोशन स्कीम (एनईआरटीपीएस) के तहत बड़े पैमाने पर ईरी फार्मिंग शुरू की गई है। इसके अंतर्गत 4000 लाभार्थियों को वित्तीय सहायता की घोषणा तथा एरी रेशम किसानों और बुनकरों के कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई है।

भारत सरकार की प्रतिबद्धता को देखते जापान ने भी पूर्वोत्‍तर भारत के विभिन्‍न राज्‍यों में कुछ वर्तमान और कुछ नई परियोजनाओं में 205.784 अरब येन (13,000 करोड़ रुपए) की धनराशि निवेश करने का फैसला किया है। इससे असम में गुवाहाटी जलापूर्ति परियोजना और गुवाहाटी सीवेज़ परियोजना, असम और मेघालय की पूर्वोत्‍तर सड़क संजाल संपर्क सुधार परियोजना, सिक्किम में जैव-विविधता संरक्षण और वन-प्रबंधन परियोजना, त्रिपुरा में सतत वन प्रबंधन परियोजना, मिजोरम में निरंतर कृषि और सिंचाई के लिए तकनीकी सहयोग परियोजना, नगालैंड में वन प्रबंधन परियोजना आदि को पूरा किया जा सकेगा।

इन नवीन विकास योजनाओं के माध्यम से पूर्वोत्तर में समावेशी संवृद्धि और समृद्धि लाने और मूलभूत सेवाओं के क्रियान्वयन के लिए स्थानीय समुदाय के समर्थन और सहयोग को सुनिश्चित करना भी परम आवश्यक है। अतः सरकार ने समग्र विकास के लिए त्रिपुरा में वर्षों से चल रहे अलगाववाद तथा उग्रता का अपनी समावेशी नीतियों से शमन किया है। पूर्वोत्तर के समग्र विकास के लिए विभिन्न विद्रोही/उग्रवादी समूहों के साथ संकल्प और संवेदनशीलता के साथ संवाद करते हुए वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान करते हेतु ब्रू समझौता, बोडो समझौता तथा नागा समझौतों के माध्यम से शांति और विकास की आधारभूमि निर्मित की है।

वास्तव में, उत्तर-पूर्व के रहवासियों की समृद्धि भारत के विकास की धुरी है। यह भारत की एकता, अखण्डता, शांति और सुरक्षा की आधारशिला है। विगत कुछ वर्षों से पूर्वोत्तर में बुनियादी अवसंरचना, समावेशी विकास और शान्ति-वार्ता के स्तर पर तीव्र परिवर्तन दिखाई दे रहा है। यहाँ की भौगोलिक दुर्गमताओं और कठिनतम जीवन-स्थितियों को प्राकृतिक संसाधनों और जनांकीय-क्षमताओं की पहचान तथा दूरगामी एवं समावेशी विकास योजनाओं द्वारा सरल किया जा रहा है। वस्तुतः ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ भारत की विश्वशक्ति बनने की महत्वाकांक्षी परियोजना की सकर्मक आयोजना है जो निश्चय ही फलीभूत भी होगी।

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प्रो. रसाल सिंह
प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे। दो कार्यावधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। संपर्क-8800886847

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