Saturday, October 16, 2021
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मोदी के ग्रेजुएशन की डिग्री बनाम राहुल का बर्थ सर्टिफ़िकेट: सबूत नहीं माँगोगे शोना बाबू?

यह बात जाननी ज़रूरी है कि वह व्यक्ति जो सत्ता के शीर्ष पर बैठना चाहता है, उसकी पार्टी के मुख्यमंत्री देश के बड़े राज्यों में हैं जहाँ मिलिट्री एवं अन्य सुरक्षा संबंधी संस्थान हैं, उसकी प्रतिबद्धता एक व्यवसाय के लिए अंग्रेज़ होने से है, एक चुनाव के लिए भारतीय होने से है, या फिर उस हिन्दुस्तान से जहाँ उसकी बहन ने कहा कि वो सबके सामने पैदा हुए थे।

माताजी इटली की हैं। पिता जी भारत के प्रधानमंत्री थे। शादी हुई थी, तब प्रधानमंत्री दादी थीं। बालक पैदा हुआ, सबके सामने पैदा हुआ ऐसा बहन प्रियंका गाँधी का ताजा बयान है। बालक का नाम रखा गया राहुल। सुब्रह्मण्यम स्वामी कहते हैं कि असली नाम राओल विंची है, लेकिन हम उतने भीतर नहीं जाएँगे क्योंकि हम इन बातों पर चालीस मिनट के सत्रह प्राइम टाइम नहीं करते कि देश जानना चाहता है।

देश को कुछ नहीं जानना होता है। देश जान भी ले तो क्या कर लेगा इस सूचना का? लेकिन लोग लगे रहे, केस हुआ, सूचना का अधिकार इस्तेमाल किया गया, डिग्रियाँ निकलवाई गईं, डिग्री सही निकली तो उसे ही फेक कहा जाने लगा। मतलब यह है कि मतलब इस बात से नहीं था कि मोदी कितना पढ़ा लिखा है, बल्कि मतलब इससे था कि इनका झूठ सच साबित हो जाए। हुआ कुछ नहीं, खलिहर पत्रकार नौटंकी करते रहे और ‘देश जानना चाहता है’ के नाम पर वाहियात बातें परोसते रहे।

मुझे भी इससे कोई मतलब नहीं है कि राहुल गाँधी का नाम राओल है कि राकरेला। नाम चाहे जो भी हो, वो रहेगा राहुल गाँधी ही जिसका दैनिक कार्य है सहजता से झूठ बोलना और देश की हर संस्था को अपनी जेब का सिक्का समझकर जहाँ-तहाँ उछालते रहना। कभी सीआरपीएफ़ पर झूठ, कभी सैन्य कार्रवाई पर झूठ, कभी सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर झूठ और बाकी टाइम तो प्रपंच चलता ही रहता है।

इसलिए, ऐसे आदमी के शर्ट में एक छेद हो, तो उँगली डाल कर पूरा फाड़ कर देख ही लेना चाहिए कि भाई तुम्हारे 2009, 2014 और 2019 के चुनावी हलफ़नामे में इतने बदलाव क्यों हैं? आखिर बैकऑप्स नामक कम्पनी का डायरेक्टर प्रियंका को चुनावों के तुरंत पहले क्यों बना दिया गया था? ऐसे काग़ज़ात क्यों बाहर आ रहे हैं जिसमें राहुल गाँधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया है? फिर भारत में जो दस्तावेज हैं उसमें कुछ और क्यों लिखा हुआ है?

इससे हासिल क्या होगा? वही, जो मोदी की डिग्री का पोस्टमॉर्टम कर के हुआ था। अगर मोदी को डिग्री के नाम पर घेरने वाला आदमी इंग्लैंड में व्यवसाय करने के लिए ब्रितानी हो जाता है, और भारत में चुनाव लड़ने के लिए भारतीय, तो फिर रवीश कुमार के गंभीर शब्दों में, “इसकी जाँच क्यों नहीं करवा ली जाए। अगर इतने लोग कह रहे हैं तो क्या दिक्कत है, जाँच करा ली जाए।”

इससे किसी बात पर फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, बस यह बात जाननी ज़रूरी है कि वह व्यक्ति जो सत्ता के शीर्ष पर बैठना चाहता है, उसकी पार्टी के मुख्यमंत्री देश के बड़े राज्यों में हैं जहाँ मिलिट्री एवम् अन्य सुरक्षा संबंधी संस्थान हैं, उसकी प्रतिबद्धता एक व्यवसाय के लिए अंग्रेज़ होने से है, एक चुनाव के लिए भारतीय होने से है, या फिर उस हिन्दुस्तान से जहाँ उसकी बहन ने कहा कि वो सबके सामने पैदा हुए थे।

सवाल यह उठता है कि इस आदमी ने नागरिकता के बारे में झूठ क्यों लिखा। कहीं तो लिखा ही, या तो भारत के दस्तावेज़ों में, या ब्रिटेन के। अंग्रेज़ों को अगर पागल बनाया तो ठीक है क्योंकि उन्होंने दो सौ साल राज किया, तो थोड़ी टैक्स चोरी भी अगर कर ली तो माफ किया जाए, लेकिन भारत सरकार को उस कमाई का टैक्स दिया कि नहीं?

टैक्स भी छोड़िए, बस यह बता दीजिए कि सच क्या है। ब्रिटेन के अंग्रेज़ ही हैं तो कोई दिक्कत नहीं। आपकी माताजी को देश के लोगों ने दस साल ‘प्रधानमंत्री’ के तौर पर स्वीकारा ही है। उन्होंने देश चलाया है। आप भी चला लीजिएगा, इसमें संदेह नहीं। लेकिन देश की राष्ट्रीय सुरक्षा की चाभी क्या ऐसे व्यक्ति के हाथ में दी जा सकती है जो इटली में राओल विंची है, लंदन में ब्रिटिश नागरिक है, और भारत में राहुल गाँधी है जिसके कुर्ते की जेब फटी हुई है, जो दीवारों में कुछ ढूँढता रहता है, जो आँख मारता है, जो प्यार की बातें करता है, जो महिलाओं की बात करते हुए पता नहीं क्या-क्या बोल जाता है!

 

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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