मोदी जेल जाएँगे…
अरे, आप चिंता मत करिए। ना हम कोई PIL डालने जा रहे हैं, ना यह लेख उस फैशन का हिस्सा है जिसमें सुबह उठते ही ‘मोदी हटाओ’ से दिन शुरू होता है। यह शीर्षक लिखना जरूरी था। इसलिए नहीं कि नरेंद्र मोदी को सचमुच जेल जाना चाहिए बल्कि इसलिए कि अब ऐसा लगने लगा है कि अगर इस देश में किसी प्रधानमंत्री को बड़ा बनना है तो शायद जेल जाना एक अनिवार्य योग्यता हो गई हो।
आपको यह अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन जरा गौर करिएगा… वामपंथी पत्रकार अजित अंजुम ने लिखा कि नरेंद्र मोदी ‘इस जन्म में’ नेहरू से बड़े नहीं हो सकते। कारण? क्योंकि नेहरू जेल गए, स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, किताबें लिखीं और संस्थान बनाए आदि-आदि।
अब यहाँ थोड़ा रुकिए। बस एक सीधा सा सवाल खुद से पूछिए कि क्या किसी प्रधानमंत्री की महानता का पैमाना सचमुच यही है? और अगर यही है तो फिर नरेंद्र मोदी तो छोड़िए, स्वतंत्रता के बाद पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति कभी बड़ा प्रधानमंत्री हो ही नहीं सकता है।
मोदी इस जन्म में तो नेहरु से बड़े नहीं हो सकते . चाहे मंत्रियों को मंदिर भेजकर पूजा अर्चना करवा लें . चाहे NDA नेताओं से वंदना करवा लें . चाहे भक्तों से तालियां बजवा लें . चाहे मीडिया से चौबीसों घंटे चाटुकारिता करवा लें .
— Ajit Anjum (@ajitanjum) June 10, 2026
नेहरु होने के लिए सालों – साल जेल में गुजारने होते हैं .… pic.twitter.com/4ITKgJkECA
जरा ठहरकर सोचिए। क्या किसी प्रधानमंत्री की महानता का पैमाना वही होगा जो किसी दूसरे युग के नेता पर लागू था? क्या इतिहास को परिस्थिति से काटकर देखा जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल कि जो व्यक्ति 1950 में पैदा हुआ है तो उससे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? क्या मोदी टाइम मशीन में बैठकर अंग्रेजों के खिलाफ जेल यात्रा कर आते, तभी उन्हें ‘योग्य’ माना जाता?
लेकिन चलिए, अंजुम साहब की बात मान लेते हैं कि मोदी बड़े प्रधानमंत्री नहीं हैं। लेकिन आखिर क्यों नहीं हैं? शायद इसलिए कि उन्होंने लाल किले से खड़े होकर किसी बड़े दार्शनिक व्याख्यान की जगह टॉयलेट की बात कर दी। शायद इसलिए कि उन्होंने विश्व इतिहास पर किताब लिखने की जगह गरीब की रसोई का धुआँ देखने की कोशिश कर दी। शायद इसलिए कि वह उस एलीट यानी अभिजात राजनीतिक संस्कृति से नहीं आए जहाँ सत्ता एक विरासत की तरह मिलती रही।
जरा 2014 का वह पहला लाल किले वाला भाषण याद कीजिए। लोगों को उम्मीद रही होगी कि नया-नया प्रधानमंत्री है तो वैश्विक शक्ति, भू-राजनीति, अर्थव्यवस्था, सभ्यता, लोकतंत्र जैसे भारी-भारी शब्दों से अपने लच्छेदार भाषण को सजाएगा। लेकिन नरेंद्र मोदी ने क्या कहा? उन्होंने शौचालय की बात कर दी, उन्होंने सफाई की बात कर दी।
साल दर साल बीतते गए और प्रधानमंत्री मोदी के काम आम लोगों तक पहुँचते रहे। कथित वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग को संतुष्ट करने के बजाय, उन्होंने देश के आम लोगों का जीवन आसान बनाने की बीड़ा उठाया। खुले में शौच से लेकर खुले में कूड़ा फेंकने तक, जो बातें बुद्धिजीवी वर्ग के लिए गरीब-गुरबा की, पिछड़ेपन की बात थी, वो उन्होंने कहनी शुरू कीं। उन्होंने बैंक खाते की बात की। गैस कनेक्शन की बात की। हर घर बिजली की बात की। हर घर नल से पानी की बात की। गरीब के सिर पर छत की बात की।
अब आप सोचिए, यह सुनकर भारत का यह खास बौद्धिक वर्ग असहज ही तो हो गया होगा ना? क्योंकि भाई, प्रधानमंत्री शौचालय की बात करता अच्छा थोड़ी लगता है! प्रधानमंत्री को तो बड़े विजन की बात करनी चाहिए, एलीट क्लास की बात करनी चाहिए, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलनी चाहिए। लेकिन मोदी ने तो जाकर उस भारत की बात कर दी जिसे लंबे समय तक ‘सिस्टम’ ने देखा ही नहीं था, उसकी तरफ से पीठ फेर ली थी।
अब यहाँ एक असहज सवाल उठता है कि अगर 2014 में किसी प्रधानमंत्री को लाल किले से खड़े होकर यह कहना पड़ रहा था कि देश को शौचालय चाहिए, तो आखिर पिछले 67 साल में हुआ क्या था? यह सवाल शायद बहुत लोगों को पसंद नहीं आएगा लेकिन पूछना तो पड़ेगा ना।
आखिर क्यों करोड़ों महिलाएँ खुले में शौच जाने को मजबूर थीं? क्यों गाँव की बेटियाँ शौच के लिए अँधेरा होने का इंतजार करती थीं? क्यों एक महिला की गरिमा राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं थी? क्या इसलिए कि इस विषय पर बात करना ‘लोअर क्लास’ माना जाता था?
जरा गाँवों की जिंदगी को याद कीजिए। शहरों में बैठकर हममें से बहुत लोग समझ ही नहीं पाते कि खुले में शौच सिर्फ सुविधा का नहीं, सम्मान का सवाल था। बीमारी का सवाल था। सुरक्षा का सवाल था लेकिन इस पर ध्यान दिया तो बस मोदी ने।
लेकिन जब स्वच्छ भारत की बात हुई, तब उसका मजाक उड़ाया गया। झाड़ू लेकर फोटो खिंचवाने की बातें हुईं। ठीक है, आलोचना कीजिए। हर नीति की होनी चाहिए। लेकिन एक ईमानदार सवाल तो पूछिए कि क्या समस्या सचमुच थी या नहीं?
इसी तरह बैंक खाते की बात को देख लीजिए। आज बैंक खाते और UPI हमारे लिए इतना सामान्य हो गया है कि लगता है जैसे हमेशा से था। लेकिन जरा पीछे जाइए। करोड़ों गरीब बैंकिंग सिस्टम से बाहर थे। सरकारी पैसे बीच में गायब हो जाते थे।
ओडिशा में 1985 में राजीव गाँधी ने कहा था कि सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण के लिए भेजे गए 1 रुपए में से केवल 15 पैसे ही लाभार्थियों तक पहुँचते हैं, बाकी 85 पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण बैंक खाते ना होना था, फिर DBT आया। अब लाभार्थी को 1 रुपए का पूरा एक रुपया मिलता है।
जनधन योजना आई और इसमें करोड़ों खाते खुले। पहली बार गरीब के हाथ में बैंक पासबुक आई। अब यहाँ कोई कह सकता है कि अरे, खाता खुल गया तो क्या क्रांति हो गई? ठीक सवाल है लेकिन फिर यह भी पूछिए कि दशकों तक क्यों नहीं खुला? आखिर गरीब को अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने में इतना समय क्यों लगा?
और उज्ज्वला योजना? चलिए, उस पर भी बात कर लेते हैं। अगर आपने कभी गाँव की रसोई नहीं देखी तो शायद समझना मुश्किल होगा। लकड़ी के चूल्हे का धुआँ, आँखों में जलन, साँस की दिक्कत, धुएँ से भरा हुआ पूरा घर और यह करोड़ों महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी थी।
शहरों के एसी कमरों में बैठकर शायद यह सिर्फ एक ‘डेटा पॉइंट’ लगता होगा लेकिन मोदी ने इसे समझा और आज करोड़ों महिलाओं का जीवन बदला है। हाँ, सिलिंडर को लेकर सवाल उठते हैं, उठते रहेंगे और उठने भी चाहिए लेकिन बदलाव आया है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है।
इसी तरह बिजली। आज अगर कोई बच्चा रात में पढ़ पा रहा है, मोबाइल चार्ज हो रहा है, पंखा चल रहा है तो हमें यह सामान्य लगता है। लेकिन कुछ वर्ष पहले तक ही भारत में ऐसे गाँव भी थे जहाँ अँधेरा ही जीवन था। लालटेन में पढ़ना, गर्मी में सोना, बिजली का सिर्फ नाम सुनना।
और पानी? क्या हम भूल गए कि 21वीं सदी के भारत में करोड़ों महिलाएँ रोज कई किलोमीटर चलकर पानी लाती थीं? क्या यह सामान्य बात थी? क्या यह विकासशील राष्ट्र की पहचान थी? जब ‘हर घर जल’ जैसी योजनाएँ आईं, तो कहा गया कि अभी सब जगह नहीं पहुँचा। ठीक बात है कि कुछ चुनौतियाँ हैं। लेकिन यह भी तो पूछिए कि 70 साल तक यह राष्ट्रीय प्राथमिकता क्यों नहीं थी?
तो सवाल मोदी का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसने दशकों तक यह स्थिति रहने दी। अब यहाँ कुछ लोग कहेंगे कि अच्छा, तो क्या नेहरू ने कुछ किया ही नहीं? बिल्कुल किया और इसे नकारना मूर्खता होगी। उन्होंने नए भारत की संस्थागत नींव रखी। बड़े शैक्षणिक संस्थान बने। लोकतंत्र को शुरुआती स्थिरता मिली। इतिहास के साथ ईमानदारी का मतलब है कि योगदान को स्वीकार किया जाए।
लेकिन इतिहास के साथ ईमानदारी का मतलब यह भी है कि सवाल पूछे जाएँ। चीन नीति पर सवाल होंगे। लाइसेंस-परमिट राज पर सवाल होंगे। कश्मीर की जटिलता पर सवाल होंगे।
लेकिन भारत में एक अजीब चलन है कि नेहरू पर सवाल पूछो तो आप ‘इतिहास विरोधी’ हो जाते हैं। वहीं, अगर आप मोदी की आलोचना करें तो आप ‘बौद्धिक’ कहलाते हैं। दूसरी ओर मोदी की किसी उपलब्धि का जिक्र करो तो आपको ‘भक्त’ कह दिया जाता है। इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा वर्षों से यह कैसा लोकतांत्रिक विमर्श खड़ा कर दिया गया है?
क्या करोड़ों लोग जो मोदी को वोट देते हैं, सब अंधभक्त हैं? क्या गरीब महिला जिसे घर मिला, गैस मिली, बैंक खाता मिला क्या वह किसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है? या वह अपने अनुभव से फैसला कर रही है? असल में शायद समस्या मोदी नहीं हैं। समस्या वह बदलाव है जिसका मोदी प्रतीक बन गए।
एक ऐसा नेता जो खुलकर मंदिर जाता है। जो भारतीय सभ्यता की बात करता है। जो हिंदू प्रतीकों से दूरी बनाकर राजनीति नहीं करता। जो अंग्रेजी बौद्धिक एलीट वर्ग से मंजूरी लेने की कोशिश नहीं करता। यहीं टकराव पैदा होता है। और शायद इसीलिए बार-बार यह साबित करने की कोशिश होती है कि मोदी चाहे कुछ कर लें, वे बड़े प्रधानमंत्री नहीं हो सकते।
अंजुम साहब, इतिहास थोड़ा निर्दयी होता है। वह पत्रकारों की सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं लिख जाता है। वह लोगों की जिंदगी देखकर फैसला करता है। उसने नेहरू को भी उनके दौर से आँका, इंदिरा को भी, वाजपेयी को भी और आगे मोदी को भी करेगा।
और जब इतिहास यह देखेगा कि क्या गरीब के जीवन में बदलाव आया है, क्या बुनियादी सुविधाएँ बढ़ीं है, क्या शासन अंतिम व्यक्ति तक पहुँचा है, क्या भारत का आत्मविश्वास बदला है तो शायद बहस कुछ और होगी।
शायद नरेंद्र मोदी एक वर्ग के लिए बड़े प्रधानमंत्री नहीं हैं। क्योंकि उन्होंने किसी एलीट विचार की नहीं बल्कि गाँव, गरीब और रसोई की बात की। उन्होंने गाँव की बेटी के शौचालय की बात की। उन्होंने सिर्फ इतिहास लिखने की नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी बदलने की राजनीति की। शायद यही बात इस एलीट वर्ग को सबसे ज्यादा असहज करती है। या यूँ कहें कि गरीब पृष्ठभूमि से आना वाला ‘चायवाला’ प्रधानमंत्री बुद्धिजीवी वर्ग को कभी पचा ही नहीं।


