नेहरू-शेख की दोस्ती के कसीदों में ही छिपा है कश्मीर का शोकगीत, खुसरो की कविता से नहीं बदलेगा इतिहास

विचारकों को नेहरू के जुमले याद हैं, ताकि वो उस भीषण गलती को भूल सकें जो नेहरू की कमजोरियों का परिणाम थी। वही नेहरू, जिन्हें सरदार पटेल अविवेकी नेता कहते थे।

जम्मू-कश्मीर में जब से मोदी सरकार ने आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किया है, ​इसके विरोधियों से लेकर समर्थक तक न केवल इतिहास के प्रसंगों से जूझ रहे हैं, बल्कि अपने तर्क को धार देने के लिए गद्य और कविता तक का हवाला दे रहे हैं। इसी कड़ी में कश्मीर को लेकर जवाहरलाल नेहरू की भूमिका का बचाव करने के लिए अमीर खुसरो की एक फारसी कविता परोसी जा रही है। यह कविता विशारदों से लेकर सोशल मीडिया तक आजकल नजर आ रही है।

श्लाघ्य विचारकों की मानें तो नेहरू ने कहा था कि कश्मीर के भाग्य का का फैसला कश्मीर की जनता ही करेगी और उसे अपने राजनैतिक भविष्य को चुनने का मौका दिया जाएगा। नेहरू ने यह बयान नवंबर 02, 1947 को दिया था। कश्मीर के भविष्य को लेकर यह बयान उस शख्स का है जिसके फैसलों का आज तक वहॉं के लोग भुगत रहे। इन फैसलों के पीछे एक बड़ी वजह शेख अब्दुल्ला से नेहरू की गाढ़ी दोस्ती भी थी।

श्रीनगर का लाल चौक इस दोस्ती का गवाह रहा है। यहीं शेख अब्दुल्ला ने अपने दोस्त पंडित नेहरू की जमकर प्रशंसा करते हुए खुसरो की वह कविता पढ़ी थी जो आजकल इनके गुनाह छिपाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। फ़ारसी की वह कविता है;
मन तू शुदम तू मन शुदी
मन तू शुदम, तू जान शुदी

इस कविता का अर्थ है-
मैं अब तुम हो जाता हूँ और तुम मैं बन जाओ
मैं तुम्हारा शरीर और तुम मेरी आत्मा बन जाओ
ताकि कोई यह न कह सके कि हम-तुम अलग-अलग हैं।

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हैरानी की बात है कि अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद प्रगतिशील इस कविता की दुहाई दे रहे। नेहरू की गलती को उनकी यारी-दोस्ती में पढ़े गए कसीदों से भुलाया जा रहा है ताकि किसी को नेहरू के किए छल की भनक भी ना लग सके। कश्मीर में आज मानवता की दुहाई देने वाले लोग नेहरू की गलती के कारण सदियों से चले आ रहे रक्तपात और वैमनस्य को नेहरू-शेख की शायरी और नज्मों के आवरण में छुपा देना चाहते हैं।

विचारकों को नेहरू के जुमले याद हैं, ताकि वो उस भीषण गलती को भूल सकें जो नेहरू की कमजोरियों का परिणाम थी। वही नेहरू, जिन्हें सरदार पटेल अविवेकी नेता कहते थे। हालाँकि, वर्तमान प्रगतिशील विचारक चाहें तो वो सरदार पटेल को भी नेहरू के प्रति इस मत के लिए ‘हाइपर नेश्नलिस्ट’ का विशेषण देकर नेहरू के गुनाहों को फिर से नजरअंदाज कर सकते हैं।

एक समय था जब 1946 में महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया था और जवाहरलाल नेहरू इससे इतने आक्रोशित हो गए थे कि अपने मित्र की वकालत करने तुरंत कश्‍मीर पहुँच गए थे। नेहरू स्वयं एक कश्मीरी थे और राज्य के प्रति उनका रवैया निहायत भावुकतापूर्ण था। जून, 1946 में अपने गिरफ्तार मित्र शेख अब्दुल्ला को वे प्रोत्साहित करना चाहते थे, लेकिन राज्य सरकार ने उनके प्रवेश पर रोक लगा दी। फिर भी नेहरू नहीं माने और गिरफ्तार कर लिए गए। कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी इसके पक्ष में नहीं थी कि नेहरू राज्य का कानून तोड़ें और वहाँ गिरफ्तार कर लिए जाएँ, फिर भी नेहरू गए।

सरदार पटेल की नजरों में भावुक और अविवेकी नेता थे नेहरू

शेख अब्दुल्ला से मित्रता के पीछे जवाहरलाल नेहरू की इस दीवानगी से सरदार पटेल बेहद नाराज थे। सरदार पटेल ने जुलाई 11, 1946 को डीपी मिश्र लिखे एक पत्र में कहा था-

अभी- अभी उन्होंने (नेहरू ने) ऐसी अनेक नादानियाँ की हैं, जिनकी वजह से हमें बड़ी परेशानियाँ हुई हैं। कश्मीर में उठाया गया उनका कदम, संविधान सभा के लिए किए गए सिख चुनाव में उनका हस्तक्षेप और कॉन्ग्रेस महासमिति की बैठक के तुरंत बाद उनका अखबारी परिषद, ये सब भावुकतापूर्ण अविवेक के कृत्य हैं। इनकी वजह से परिस्थितियों को सही मार्ग पर ले जाने में हमें जबर्दस्त तनाव से गुजरना पड़ता है। परंतु इन सारे अविवेक के बावजूद जवाहरलाल में स्वाधीनता के लिए अनुपम उत्साह और उत्कट लगन है।

नेहरू के मित्र शेख अब्‍दुल्‍ला के खानदान ने जम्मू-कश्मीर को हमेशा त्रिशंकु बने रहने दिया। इसी दोस्ती की वजह से अब्दुल्ला की सांप्रदायिक, राजनैतिक महत्वकांक्षा कश्मीर की नियति बन गई। अलीगढ़ से पढ़े शेख अब्दुल्ला प्रगतिशील विचारक माने जाते थे। इस तरह से वो हर समय, हर काल के ‘प्रगतिशील विचारकों’ के मानसिक खोखलेपन का प्रतीक भी अपने आप बन जाते हैं। शेख के दादा एक हिंदू थे और उनका नाम था राघौराम कौल। शेख अब्दुल्ला के जन्‍म के महज 15 साल पूर्व ही, यानी वर्ष 1890 में उन्‍होंने इस्‍लाम स्‍वीकार किया था।

दोस्ती की वजह से हाशिए पर सरदार के विचार

नेहरू और शेख की इसी मित्रता ने कश्मीर के अत्याचार और नरसंहार की पटकथा लिखी। कालांतर में इसी मित्रता ने बहुसंख्यक आबादी के नेता शेख़ अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर के आपातकालीन प्रशासन का मुखिया बना दिया। इसके बाद इतिहास गवाह है कि आपातकालीन प्रशासन के मुखिया बनते ही शेख़ अब्दुल्ला तानाशाही पर उतर गए। कुछ ही दिन बाद शेख़ सरकारी ही नहीं, व्यक्तिगत तौर पर भी महाराजा हरि सिंह का कड़ा विरोध करने लगे। यह वो समय था जब नेहरू की नीतियों से नाराजगी के बावजूद उनके सम्मान में सरदार पटेल का अस्तित्व हाशिए पर जाता रहा।

प्रोग्रेसिव, सेकुलर, लिबरल शेख़ अब्दुल्ला अचानक से सांप्रदायिक नहीं हुए, वो बस इस मौके के इन्तजार में थे। उन्होंने हिन्दुओं को जेल में डालना और मुस्लिमों को प्रश्रय देना शुरू कर दिया था। शेख़ की साम्प्रदायिकता का जिक्र महाराजा हरि सिंह के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन द्वारा सरदार पटेल को लिखे गए पत्रों में मिलता है।

कश्मीर के इतिहास में हमारे नेताओं की, जिन्हें महामानव बनाने में एक पूरे इकोसिस्टम ने आज भी पूरा जोर लगाए रखा है, की अनगिनत ग़लतियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं। मुद्दा चाहे रक्तपिपासु वामपंथियों के प्रतीक लाल चौक का हो, या फिर घाटी में तनाव का, इन सबके पीछे नेहरू-शेख की जुगलबंदी सबसे ज्यादा जिम्मेदार थी। यह कहना कोई अतिरेक नहीं होगा कि नेहरू खुद को जहाँ भारत का प्रधानमंत्री मानते थे वहीं शेख को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री देखना चाहते थे। दूसरी ओर, इस सब घटनाक्रम के बीच सरदार पटेल को नजरअंदाज किया जाना, नेहरू की अनीतियों के सामने नतमस्तक होते रहना जारी रहा।

इस सारे घटनाक्रम के बीच जम्मू-कश्मीर और उसकी जनता का भाग्य तय होता रहा। इन्हीं कमजोर नीतियों की वजह से इस राज्य में अलगाववाद,आतंकवाद, चरमपंथ, वामपंथ आराम से पैर पसारता रहा। हालत इस तरह बन गए कि महाराजा हरि सिंह को ही कश्मीर से निकाल दिया गया। पहले शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और फिर उन्हीं की संतुष्टि के लिए उनकी रिहाई की गई।

इसके बाद एक विशेष विचारधारा के तुष्टिकरण के लिए घाटी में हमेशा के लिए अनुच्छेद-370 का बीजारोपण कर दिया गया। यह विशेष राज्य का दर्जा जम्मू-कश्मीर की जनता के लिए कम और नेहरू की ओर से शेख अब्दुल्ला के लिए मित्रता का उपहार ज्यादा था।

वर्ष 2013 में भाजपा नेता अरुण जेटली ने जम्मू में आयोजित नरेंद्र मोदी की ललकार रैली के बाद अपने ब्लॉग में लिखा था- “जम्मू और कश्मीर को भारत में पूरी तरह मिला लेना भारतीय जनसंघ और अब बीजेपी की विचारधारा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।” अनुच्छेद-370 भाजपा सरकार की एक बड़ी विजय है, इसीलिए इसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को समर्पित किया जा रहा है।

नेहरू की कविताएँ शायद तब लोगों का दिल जीतने के लिए काफी थीं, जब घाटी में भारतीय सेना पर पत्थरबाजी करने के लिए किराए पर लोग नहीं बुलाए जाते थे। आज कश्मीर पर जनमत का विचार उठाने वाले पकिस्तान द्वारा दिए गए घावों का जिक्र नहीं करना चाहते हैं। कश्मीर की समस्या के मूल में जाए बिना कश्मीर का समाधान एक कोरी कल्पना ही है।

आज चाहे बुद्धिजीवी किसी भी पक्ष की वकालत कर रहे हों लेकिन यह तो स्पष्ट है कि वो कम से कम मानवता की वकालत नहीं कर रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 पर लिया गया फैसला इस सरकार के विराट स्वरुप और उसकी इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह निर्णय ऐतिहासिक है।

हम कह सकते हैं कि इस सरकार ने नेहरू की एक महान भूल को ठीक करने का काम किया है। इसलिए खुसरो की कविताओं से पहले कल्हण की राजतरंगिणी को याद करना जरूरी है, जिसमें कश्मीर को ‘कश्यपमेरू’ बताया गया है।

कल्हण की राजतरंगिणी में कश्मीर का वृहद इतिहास है। इसमें कश्मीर के इतिहास को अति प्राचीनकाल से दर्शाया गया है। कश्यपमेरू या कश्यपमीर; कहा जाता है कि महर्षि कश्यप श्रीनगर से तीन मील दूर हरि-पर्वत पर रहते थे। जहाँ आजकल कश्मीर की घाटी है, वहाँ अति प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में एक बहुत बड़ी झील थी, जिसके पानी को निकाल कर महर्षि कश्यप ने इस स्थान को मनुष्यों के बसने योग्य बनाया था। यही कश्मीर आठवीं सदी के सम्राट मुक्तापीड ललितादित्य की भूमि है, यह विवरण भी राजतरंगिणी में ही मिलता है।

हमारा इतिहास हर तरह से सम्पन्न है, और इसे ठीक करने की दलीलों के लिए हमें ना ही फ़ारसी कविता की जरूरत है और ना ही किसी अंतरराष्ट्रीय सुलह संस्था की। इसलिए नेहरू-शेख़ की मित्रता के क़सीदों को शोक गीत की तरह ही देखा जाना चाहिए न कि नेहरू की गौरवगाथा के तौर पर।

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