Tuesday, August 3, 2021
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लोकतंत्र का ककहरा सीखें राहुल गाँधी, क्योंकि यह परिवार का विशेषाधिकार सुरक्षित रखना नहीं

किसानों सहित पंजाब के तरक्कीख्याल लोग तो आखिरकार अवसरवाद की इस भँवर में से अपनी किश्ती निकाल ही लेंगे। लेकिन कॉन्ग्रेस के नेतृत्व की हरकतें अगर ऐसी ही रही तो वे अपने हाथ से पंजाब जैसा प्रदेश हमेशा के लिए खो देंगे। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि राहुल गाँधी देश की गौरवपूर्ण प्रजातांत्रिक व्यवस्था को कोसने के स्थान पर खुद अंदर झाँकने की कोशिश करें।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने यह कहकर देश की जनता का ही मजाक उड़ाया है कि भारत का लोकतंत्र फर्जी है। अपनी तमाम कमियों और कमज़ोरियों के बावजूद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरे विश्व में सम्मान की पात्र है। देशवासियों को इस पर गर्व है। पर शायद राहुल गाँधी के लिए भारत के लोकतंत्र का मतलब उनके और उनके परिवार के विशेषाधिकार सुरक्षित रखने तक ही सीमित है। अन्यथा वे ऐसा हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण बयान देकर देश और देशवासियों का अपमान नहीं करते।

यह बयान उन्होंने उस समय दिया जब वे अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा और कॉन्ग्रेस के कई सारे नेताओं के साथ राष्ट्रपति भवन की तरफ कूच करना चाहते थे। कॉन्ग्रेस पार्टी से पूछा जाना चाहिए कि इतने सारे लोग ले जाकर क्या उनका मकसद राष्ट्रपति भवन का घेराव करना था? क्या वे उसी तरीके से राष्ट्रपति भवन की घेराबंदी करना चाहते थे जैसे कि कुछ किसान नेताओं ने दिल्ली की है?

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस का प्रतिनिधिमंडल तो राष्ट्रपति से मिला। मगर बिना इजाजत के पुलिस ने बाकी नेताओं को पैदल मार्च करने से मना कर दिया और उनकी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा सहित अन्य को आगे जाने से रोक दिया, तो क्या यही प्रमाण है कि देश से लोकतंत्र खत्म हो गया? शायद राहुल गाँधी का लोकतंत्र अपने परिवार से शुरू होकर वहीं खत्म हो जाता है।

वैसे भी राहुल गाँधी को लोकतंत्र का ककहरा शुरू से पढ़ने की जरूरत है। लोकतांत्रिक व्यवस्था और मर्यादाओं की अगर उन्हें रत्तीभर भी समझ होती तो वे भारतीय लोकतंत्र पर ऐसा मजाकिया बयान देने से पहले अपने अंदर झाँक लेते। अगर ऐसा होता तो वह उस दिन अपने आप से ये सवाल पूछते जब उन्होंने सितंबर 2013 में अपनी ही सरकार के एक अध्यादेश को प्रेस कॉन्फ्रेंस में फाड़ फेंका था। उस समय उन्हें यह याद नहीं रहा कि वह देश के प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और लोकतांत्रिक व्यवस्था का कितना गंभीर उल्लंघन कर रहे हैं।

कुछ नहीं तो वे अपनी दादी इंदिरा गाँधी से ही पूछ लेते कि उन्होंने जब जून 1975 में देश में इमरजेंसी लगाई थी तो क्या वह लोकतंत्र के भले के लिए लगाई थी? वैसे इतना दूर भी जाने की जरूरत नहीं है। अगर लोकतांत्रिक मर्यादाओं और मूल्यों को वे किंचित भी मान देते हैं तो वे कहीं बाहर नहीं बल्कि अपनी पार्टी में इसे लागू कर सकते हैं। कॉन्ग्रेस तो अब उनके परिवार की जेबी पार्टी ही है। और कुछ नहीं तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात मानकर कॉन्ग्रेस शासित पुदुचेरी में पंचायतों के चुनाव क्यों नहीं करवा लेते?

असल में राहुल गाँधी की चिंता भारत के लोकतंत्र को लेकर नहीं है। उन्हें चिंता सिर्फ अपनी बहन और अपने परिवार के विशेष अधिकारों को लेकर है। उनका गुस्सा सिर्फ अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा को हिरासत में लिए जाने से है अन्यथा दुनिया के सबसे बड़े भारतीय लोकतंत्र को फर्जी नहीं बताते।

राहुल गाँधी अपनी पार्टी के नेताओं के साथ राष्ट्रपति को एक ज्ञापन देने के लिए जाना चाहते थे। यह ज्ञापन था कृषि कानूनों को लेकर। कृषि कानूनों की ही बात की जाए तो इनके बहाने उनकी सरकार उनके मुख्यमंत्री पंजाब में जो कर रहे हैं वह क्या किसी भी तरीके से लोकतांत्रिक है?

यह सही है कि लोकतंत्र में विरोध करने का अधिकार सब रखते हैं। लेकिन विरोध का ये अधिकार जब गुंडागर्दी और अराजकता में बदल जाए तो इसे लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र कहते हैं।

इस बहस में जाए बिना की कृषि कानूनों के साथ क्या होना चाहिए, क्या उनकी पार्टी की सरकार पंजाब में लोगों के जानमाल की रक्षा कर पा रही है? कोरोना के इस नाज़ुक समय में पंजाब की सरकार आम जनता की ऑनलाइन दिनचर्या, कामकाज और संपत्ति को सुरक्षित नहीं रख पा रही।

पंजाब के कुछ इलाकों में तोड़फोड़, गुंडागर्दी, उद्योगों, दूरसंचार उपकरणों और निजी संपत्तियों को क्षति करने का जो तमाशा चल रहा है क्या वह लोकतांत्रिक है? राहुल गाँधी और उनकी पार्टी हिंसा की इस आग में रोज़ घी डालने का काम कर रहे हैं। क्या ऐसा करके वे किसानों, पंजाब और देश का भला कर रहे हैं? यह सवाल राहुल गाँधी और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से पूछा जाना निहायत ही जरूरी है।

पंजाब के लोग और खासकर सिख हमेशा तरक्की पसंद रहे हैं। उन्होंने दुनिया में अपनी इस प्रगतिशील सोच से हमेशा नाम कमाया है। राहुल गाँधी के उलजुलूल बयानों के बाद पंजाब में हिंसा का दौर चल रहा है। आम जनजीवन ठप्प करके उद्योगों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

ये लोकतांत्रिक तो कतई नहीं है। जिस सरकार को सम्पत्तियों की रक्षा करनी चाहिए वह तो हाथ पर हाथ धरकर बैठी है। गुंडागर्दी करने वाले जानते हैं कि जब ‘सैयां भए कोतवाल तो फिर डर काहे का।’ कृषि, उद्योग और शिक्षा के क्षेत्र में हमेशा तरक्की का परचम लहराने वाले पंजाब को ये सब दूसरी दिशा में ले जाने का काम कर रहे हैं।

ये तो तय है कि आम पंजाबी कुछ लोगों की अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने की इन हरकतों को आखिरकार नकार ही देंगे। लेकिन डर है कि तब तक बहुत देर न हो चुकी हो। ऐसा न हो कि राजनीतिक रोटियों के चक्कर में राहुल गाँधी और कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब को हिंसा और विद्वेष की ऐसी डगर पर डाल दें जहाँ से पीछे लौटना मुश्किल हो।

किसानों सहित पंजाब के तरक्कीख्याल लोग तो आखिरकार अवसरवाद की इस भँवर में से अपनी किश्ती निकाल ही लेंगे। लेकिन कॉन्ग्रेस के नेतृत्व की हरकतें अगर ऐसी ही रही तो वे अपने हाथ से पंजाब जैसा प्रदेश हमेशा के लिए खो देंगे। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि राहुल गाँधी देश की गौरवपूर्ण प्रजातांत्रिक व्यवस्था को कोसने के स्थान पर खुद अंदर झाँकने की कोशिश करें। इसी से पंजाब के किसानों, उनकी पार्टी का और खुद उनका भला होगा।

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