Monday, June 17, 2024
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जहाँ से लड़ रही लालू की बेटी, वहाँ यूँ ही नहीं हुई हिंसा: रामचरितमानस को गाली और ‘ठाकुर का कुआँ’ से ही शुरू हो गई थी पटकथा, अपनी शादी ही याद कर लें रोहिणी आचार्य

चूँकि छपरा उनके पिता का गृह क्षेत्र है और कहा जाता है कि सिंगापुर में रोहिणी आचार्य ने ही अपने पिता को किडनी दी है, ऐसे में लालू यादव को लेकर उनके समर्थकों में जो संवेदना और भावनात्मकता है उसका वो फायदा उठा कर वोट लेना चाहती हैं।

बिहार में 1990-2005 के बीच 15 वर्षों का एक ऐसा दौर था, जब हिंसा ही राज्य की पहचान बन चुकी थी। इसके बाद नीतीश कुमार की सरकार बनी और शुरुआती 8 वर्षों में उन्होंने जिस तरह से काम किया, उसके बाद अपराध थमा और विकास की गति बढ़ी। हाँ, 2013 के अंतिम महीनों में उनके भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उबाल मारना शुरू कर दिया और बिहार की राजनीतिक स्थिति डाँवाडोल होती चली गई। हालाँकि, फिर भी जंगलराज के दौर को याद कर लोग आज भी काँप उठते हैं, जब अपहरण-हत्या अपराध नहीं बल्कि उद्योग हुआ करता था।

रोहिणी आचार्य; जिनकी शादी बिहार के आपराधिक इतिहास का हिस्सा

इसी बीच सारण में हिंसा हो गई। वहाँ से लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य RJD की उम्मीदवार हैं। ये वही रोहिणी आचार्य हैं, जिनकी शादी में पटना में नए खुले शोरूम से नई-नई कारें उठा ली गई थीं। अगले दिन हवाई अड्डे पर ‘रोहिणी संग समरेश’ लिखे कारों की लाइन लगी हुई थी। अनुमान है कि करीब 45 कारें उठाई गई थीं। दर्जन भर दुकानों से 100 सोफे सेट और अन्य फर्नीचर लाए गए थे। एक शोरूम से 7 लाख रुपए के डिजाइनर कपड़े उठा लिए गए और 50 किलो ड्राइफ्रूट्स के अलावा खाने-पीने की अन्य सामग्रियाँ भी लूटी गई थीं।

पटना के एक्सहिबिशन रोड पर 2 शोरूम बंद हो गए थे – मिथिला मोटर्स और लॉली सेन। इसका कारण था – रोहिणी आचार्य की शादी। कुछ दिनों बाद टाटा तक ने अपने शोरूम में ताला लगा दिया था। तब लालू यादव के सालों सुभाष और साधु यादव का राज चलता था। सुभाष यादव ने बताया था कि जीजा ने उन्हें ‘राव साहब’ (समरेश के पिता) के स्वागत के लिए कारों की व्यवस्था करने को कहा, जब उन्होंने विधायकों की गाड़ियाँ लाने का सुझाव दिया तो लालू यादव ने मना करते हुए कहा कि नई कारें लेकर आओ।

सारण में हिंसा, जानिए क्या हुआ

अब रोहिणी आचार्य एक बार फिर से विवादों में हैं, हिंसा के केंद्र में उनका नाम है। असल में बिहार के सारण में लोकसभा चुनाव 2024 के 5वें चरण के तहत सोमवार (20 मई, 2024) को मतदान था। इसी दौरान शाम को रोहिणी आचार्य शाम को भिखारी ठाकुर चौक के पास स्थित बूथ संख्या 118 पर पहुँचीं। वहाँ उनका खूब विरोध हुआ। दोनों तरफ से लाठी-डंडे निकल गए, गोलियाँ भी चलीं। आरोप है कि रोहिणी आचार्य अपने समर्थकों के साथ बूथ पर पहुँच कर मतदाताओं से दुर्व्यवहार कर रही थीं।

आक्रोशित भीड़ को देखते हुए रोहिणी आचार्य खुद तो वहाँ से निकल गईं, लेकिन हिंसा को भड़का गईं। अगले दिन मंगलवार को सुबह से ही बवाल शुरू हो गया। 3 लोगों को गोली लगी, जिनमें एक की मौत हो गई है। पुलिस ने इसे RJD और BJP कार्यकर्ताओं के बीच झड़प बताया है। फ़िलहाल जिले में इंटरनेट बंद है। 2 लोग अब भी अस्पताल में हैं। बताया जा रहा है मुख्य विवाद जातीय स्तर पर पहुँच गया था, जहाँ राजपूत और यादव समाज के लोग आपस में भिड़ गए।

सारण लोकसभा सीट: 8 बार लालू-रूडी का कब्ज़ा

सारण (पहले छपरा) लोकसभा सीट बिहार की हॉट सीटों में से एक है, क्योंकि ये राजद सुप्रीमो लालू यादव का गृह क्षेत्र है। वो पहली बार यहीं से 1977 में जीत कर सांसद बने थे। फिर 1989, 2004 और 2009 में वो यहाँ से सांसद बने। इसी तरह भाजपा के राजीव प्रताप रूडी यहाँ हैट्रिक लगाने के लिए उतरे हैं। वो इस सीट से 1996, 1999, 2014 और 2019 में यहाँ से सांसद बने। इसी तरह दोनों बड़े नेता यहाँ से 4-4 बार MP रहे हैं। राजीव प्रताप रूडी राजपूत जाति से आते हैं।

सारण के 6 में से 4 विधानसभा सीटों पर राजद का कब्ज़ा है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा को बढ़त मिली थी। राजीव प्रताप रूडी ने 2014 में यहाँ से बिहार की पूर्व CM और लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी को हराया था। वो अमनौर विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले हैं। वहीं इसी क्षेत्र में परसा भी पड़ता है, जो चन्द्रिका राय का क्षेत्र है। वो राजीव प्रताप रूडी के साथ हैं। लालू यादव के बेटे तेज प्रताप यादव से चन्द्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या की शादी हुई थी।

बाद में ऐश्वर्या के साथ दुर्व्यवहार हुआ और उन्हें घर छोड़ना पड़ा। ऐसे में कहा जा रहा है कि यहाँ के यादव लोग ऐश्वर्या राय के मान-सम्मान को लेकर भी लालू परिवार से नाराज़ हैं। परसा से चन्द्रिका राय 6 बार विधायक बने हैं, उन्होंने कॉन्ग्रेस, निर्दलीय, जनता दल, राजद और जदयू के टिकट पर चुनाव जीते हैं। ऐसे में इस बार काँटे की टक्कर है। ऊपर से लालू यादव की पार्टी की तरफ से जिस तरह के भड़काऊ बयान आए हैं, उससे पता चलता है कि इन सबकी पटकथा काफी पहले से लिखी जा रही थी।

रामचरितमानस को गाली, ‘ठाकुर का कुआँ’: पहले से लिखी जा रही थी पटकथा

सितंबर 2023 में लालू यादव की पार्टी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान ‘ठाकुर की कुआँ’ कविता संसद में पढ़ी, जिस कारण राजद से राजपूत समाज नाराज़ हुआ। उधर आनंद मोहन की तरफ से भी कुछ बयान आए, उनके बेटे चेतन आनंद को लेकर लालू यादव ने नकारात्मक बयान दिया। कुल मिला कर इस मामले को जातिवादी बना दिया गया। हालाँकि, बाद में चेतन आनंद ने पाला बदल कर राजद विधायक होते हुए भी विश्वासमत में नीतीश कुमार के पक्ष में वोट किया और उनकी माँ लवली आनंद को शिवहर से जदयू का लोकसभा टिकट मिला।

ये सारा विवाद तभी शुरू हो गया था जब बिहार के शिक्षा मंत्री रहे राजद नेता चंद्रशेखर यादव ने रामचरितमानस पर नकारात्मक टिप्पणी की थी। जनवरी 2023 में उन्होंने पटना में एक दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए छात्रों के मन में तुलसीदास कृत रामकथा के प्रति ज़हर भरा। इसी तरह सितंबर 2023 में उन्होंने रामचरितमानस को पोटैशियम सायनाइड बता दिया। लालू यादव ने खुल कर मनोज झा का समर्थन किया, चंद्रशेखर यादव के साथ भी पार्टी खड़ी रही।

बिहार में NDA में भाजपा, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास), पशुपति कुमार पारस की RLJP, उपेंद्र कुशवाहा की RLM और जीतन राम माँझी की HAM(S) शामिल है। NDA ने आरोप लगाया है कि जहाँ लालू यादव रहते हैं वहाँ हिंसा होती है, जहाँ ये परिवार हाथ डालता है वहाँ आग लग जाती है। जंगलराज के दौर के बाद इस ताज़ा घटना को देखें तो ये आरोप झूठा नहीं लगता। सारण में रोहिणी आचार्य के पहुँचने के बाद ही हिंसा शुरू हुई।

रोहिणी आचार्य का क्षेत्र से कोई लेना-देना नहीं, विदेश में रहती हैं

रोहिणी आचार्य छपरा में रहती भी नहीं है। छपरा क्या, वो बिहार या भारत में भी नहीं रहतीं। वो रहती हैं सिंगापुर में। चूँकि छपरा उनके पिता का गृह क्षेत्र है और कहा जाता है कि सिंगापुर में रोहिणी आचार्य ने ही अपने पिता को किडनी दी है, ऐसे में लालू यादव को लेकर उनके समर्थकों में जो संवेदना और भावनात्मकता है उसका वो फायदा उठा कर वोट लेना चाहती हैं। हारने के बाद वो फिर सिंगापुर चली जाएँगी। नेता का अर्थ ये थोड़े होता है कि वो हार कर बैठ जाए, वो जमीन पर जनता से संपर्क में रहता है और उनके सुख-दुःख में साथ रहता है।

रोहिणी आचार्य पर ये परिभाषा फिट नहीं बैठती। न तो उनका कोई जमीनी संपर्क रहा है, न वो श्रद्धा-विवाह जैसे कार्यक्रमों में पहुँची हैं, न ही उन्होंने पिछले 5 साल से जमीन पर मेहनत की है, न ही उन्होंने अपने इलाके के समर्थकों से फोन कॉल कर उनका हालचाल पूछा, न ही उन्होंने जमीनी मुद्दों व समस्याओं को समझा, न ही उन्हें ठीक से पूरे क्षेत्र की जानकारी है और न ही इसकी कोई गारंटी है कि जीतने के बाद वो अपने लोकसभा क्षेत्र में जनता को समय देंगी।

रोहिणी आचार्य तो केवल अपने ट्वीट्स के लिए जानी जाती रही हैं, जो वो सिंगापुर में बैठ कर करती रही हैं। जब महागठबंधन टूटा था तो उन्होंने जम कर नीतीश कुमार को खरी-खोटी सुनाई थी, उन्हें ट्वीट्स डिलीट तक करने पड़े थे। उन्होंने नीतीश कुमार को ‘कचरा’ तक बता दिया था। उनकी एक ही उपलब्धि है और वो ये है कि वो लालू यादव की बेटी हैं। इसी दम पर उन्हें सांसद बनना है। अब लालू परिवार हिंसा और लाशों के सहारे फिर से जीत की राह देख रहा है।

शासन में RJD का प्रभाव, आत्मरक्षा में चली गोली: रूडी

जो भी हो, रामचरितमानस विवाद और ‘ठाकुर का कुआँ’ विवाद से उपजी जातीय घृणा ने लालू यादव की बेटी के क्षेत्र में जंगलराज की यादों को ताज़ा कर दिया है। सारण के भाजपा नेता भी यही आरोप लगा रहे हैं कि लालू परिवार जहाँ भी रहेगा वहाँ इस तरह की वारदातें होंगी ही। सांसद राजीव प्रताप रूडी मानते हैं कि आत्मरक्षा में गोली चली है, उन्होंने पूछा कि 500 लोग घर पर चढ़ आएँगे तो कोई क्या करेगा? उन्होंने रोहिणी आचार्य पर बूथ-बूथ जाकर हिंसा फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि FIR इसीलिए दर्ज नहीं की गई क्योंकि शासन में अब भी RJD से जुड़े लोगों का कब्ज़ा है।

बिहार में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है, जंगलराज के दौर में ये आम थी। लालू यादव ‘मतपेटी से जिन्न’ निकलने की बातें करते थे, मुख्य चुनाव आयुक्त TN शेषन तक बिहार में निष्पक्ष चुनाव करवाने में नाकामयाब रहे। बूथ लूटा जाना आम बात था। आँकड़े कहते हैं कि 14 वर्षों (1990-2004) के दौरान बिहार में चुनावी हिंसा में 641 मौतें हुईं। 23 वर्षों बाद बिहार में 2002 में पंचायत चुनाव हुए थे, 196 हत्याएँ तो उसी में हो गईं। वहीं 2005-15 के बीच 8 लोगों की मौत हुई बिहार में चुनावी हिंसा में। अंतर आप खुद देख लीजिए।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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