Sunday, May 9, 2021
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शरद पवार लिबरल हिप्पोक्रेसी का नया नमूना, ब्रोकन चेयर ले जाकर कोई दिखाए पाकिस्तान की बर्बरता

कश्मीर के नाम पर शोर मचाने वाले केच में 31 महीने से जारी इंटरनेट शटडाउन पर खामोश हैं। रोज मिलती लाशों पर उनके होठ सिले हैं। असल में उन्हें अल्पसंख्यकों की फिक्र नहीं है, बस उनकी दुकानदारी चलती रहनी चाहिए।

मजहब को लुभाने की राजनीति टोपी-चादर से आगे बढ़कर अब पाकिस्तान का गीत गाने तक पहुॅंच गई है। बलूचिस्तान में रोज मारे जा रहे मुस्लिमों के दर्द को अनसुना कर अपनी ही सरकार को झूठा साबित करने तक आ गई है।

यदि ऐसा नहीं होता तो कभी मराठा क्षत्रप कहे जाने वाले एनसीपी के मुखिया शरद पवार पाकिस्तान की मेहमाननवाजी के गुण नहीं गा रहे होते। मुंबई में अपनी पार्टी की तरफ से अल्पसंख्यकों के लिए आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि राजनीतिक फायदे के लिए भारत की सरकार पाकिस्तान को लेकर झूठी खबरें फैला रही है। वहॉं के लोग खुश हैं। उनके साथ कोई अन्याय नहीं हो रहा।

पवार ने यह बयान ऐसे वक्त में दिया है जब पाकिस्तान सीमा पर लगातार संघर्षविराम का उल्लंघन कर रहा है। आतंकियों को भारत में दाखिल कराने की फिराक में है। बड़े हमलों को अंजाम देने की साजिश रच रहा है।

ऐसा लगता है शरद पवार 26/11 को भूल गए हैं। भूल चुके हैं कि किस तरह पाकिस्तान से आए आतंकियों ने मुंबई को दहला दिया था। जरूरत है आतंकवाद को पालने-पोसने वाले पाकिस्तान की बर्बरता याद दिलाने के लिए शरद पवार को ब्रोकन चेयर ले जाने की।

ब्रोकन चेयर जिनेवा का एक स्मारक है। इसे स्विट्जरलैंड के कलाकार डैनियल बरसेट ने बनाया है। आजकल यहॉं बलूचिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता पोस्टर अभियान चला रहे हैं। ये पोस्टर बलूचिस्तान में पाकिस्तान प्रायोजित नरसंहार के प्रतीक हैं। ये बताते हैं कि कैसे बलूचिस्तान में लोग अगवा कर लिए जाते हैं और बाद में उनकी लाशें ही मिलती हैं।

बलूच मानवाधिकारी परिषद (बीएचआरसी) का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर उनके इलाके में अब चीन ने भी लूट मचा रखी है। बीएचआरसी के अनुसार, “पाकिस्तान की सेना गॉंवों में कत्लेआम करती है और आग लगा देती है ताकि चीन अपनी कॉलोनी बसा सके। बलूचिस्तान के जिन लोगों के घर नष्ट कर दिए गए हैं उन्हें पाकिस्तानी सेना के शिविरों के पास दयनीय हालत में रहने के लिए बाध्य किया जा रहा है।”

ऐसे हालात में भी पाकिस्तान की भाषा बोलने वाले भारतीय नेताओं में पवार अकेले नहीं हैं। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के बयान के सहारे पाकिस्तान अपने प्रोपगेंडा को हवा दे चुका है। पूरा का पूरा लिबरल गिरोह और मानवाधिकारों के कथित पैरोकार बलूचिस्तान में नरसंहार पर चुप हैं।

यही कारण है कि वे कभी केच का जिक्र नहीं करते। बलूचिस्तान के इस जिले में फरवरी 2017 से ही मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद है। इस जिले में करीब नौ लाख लोग रहते हैं। केच सहित बलूचिस्तान के हर इलाके में पाकिस्तानी सेना का डेथ स्क्वायड यहॉं आए दिन लोगों की हत्याएं करता है। गौरतलब है कि बलूचिस्तान पाकिस्तान के चार प्रांतों में क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा और आबादी के हिसाब से सबसे छोटा है। 2017 की जनसंख्या के अनुसार यहॉं की आबादी करीब सवा करोड़ है।

इस्लाम के नाम पर जिन्ना ने छला

बलूचिस्तान को 1948 में हथियार के दम पर पाकिस्तान ने खुद में मिलाकर खान ऑफ कलात मीर अहमद यार खान को जेल में डाल दिया था। मीर अहमद यार खान उन लोगों में से थे, जो इस्लाम के नाम पर अलग पाकिस्तान के पैरोकार थे। जिनके मुहम्मद अली जिन्ना दोस्त थे। जिन्होंने ब्रिटेन के सामने अपना पक्ष रखने के लिए जिन्ना को कानूनी सलाहकार बनाया था। जिसने मुस्लिम लीग को खूब पैसा दिया। 11 अगस्त 1947 को मुस्लिम लीग ने जिनके साथ साझा घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसमें कहा गया था कि कलात एक भारतीय राज्य नहीं है। उसकी अपनी अलग पहचान है। मुस्लिम लीग कलात की स्वतंत्रता का सम्मान करती है।

ब्रिटिश राज में बलूचिस्तान

कलात, खारान, लॉस बुला और मकरान पर ब्रिटिश साम्राज्य का सीधा शासन नहीं था। इनके पास भारत और पाकिस्तान में से किसी एक में मिलने या फिर खुद को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने का अधिकार था। कैबिनेट मिशन के सामने 1946 में अपना पक्ष रखते हुए कलात ने कहा था कि उसकी संधि ब्रिटेश इंडिया साम्राज्य के साथ नहीं, बल्कि ब्रिटिश क्राउन के साथ है। 4 अगस्त 1947 को दिल्ली में एक राउंड टेबल मीटिंग में तय किया गया कि 5 अगस्त 1947 को कलात ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्र होगा। खारान, लॉस बुला, मारी और बुग्ती इलाके कलात में शामिल होंगे, ताकि पूरा बलूचिस्तान कलात का हिस्सा बन जाए।

कलात, खारान, लॉस बुला और मकरान पर ब्रिटिश साम्राज्य का सीधा शासन नहीं था। इनके पास भारत और पाकिस्तान में से किसी एक में मिलने या फिर खुद को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने का अधिकार था। कैबिनेट मिशन के सामने 1946 में अपना पक्ष रखते हुए कलात ने कहा था कि उसकी संधि ब्रिटेश इंडिया साम्राज्य के साथ नहीं, बल्कि ब्रिटिश क्राउन के साथ है। 4 अगस्त 1947 को दिल्ली में एक राउंड टेबल मीटिंग में तय किया गया कि 5 अगस्त 1947 को कलात ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्र होगा। खारान, लॉस बुला, मारी और बुग्ती इलाके कलात में शामिल होंगे, ताकि पूरा बलूचिस्तान कलात का हिस्सा बन जाए।

कलात का कानूनी दर्जा भी अन्य भारतीय रियासतों से अलग था। 1876 की संधि के अनुसार ब्रिटेन उसके आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। वह चेंबर ऑफ प्रिंसली स्टेट्स का सदस्य भी नहीं था। इसके कारण वह भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं था।

पाकिस्तान बनने के अगले दिन मीर अहमद खान ने कलात को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया। कलात की नेशनल असेंबली की बैठक में यह फैसला किया गया कि वह एक स्वतंत्र राष्ट्र होगा और पाकिस्तान से उसके दोस्ताना ताल्लुक रहेंगे।

फिर कुरान की कसम खा ठगा

अप्रैल 1948 में पाकिस्तानी सेना ने कलात पर हमला किया। मीर अहमद यार खान ने आत्मसमर्पण कर विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। बावजूद बलूचिस्तान की आजादी की हसरत ने दम नहीं तोड़ा। खान के भाई प्रिंस अब्दुल करीम के नेतृत्व में विद्रोह हुआ। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। 1954 में पाकिस्तान ने ईस्ट पाकिस्तान और वेस्ट पाकिस्तान नाम से यूनिट बनाने का फैसला किया। वेस्ट पाकिस्तान के सभी स्टेट्स, प्रोविंसिज और कबिलाई इलाकों को मिलाकर वेस्ट पाकिस्तान बनाया गया। इन इलाकों के सारे अधिकार और स्वायत्ता छीन ली गई। बलूचिस्तान ने इसका जबरदस्त विरोध किया। अक्टूबर 1958 में अयूब खान ने पाकिस्तानी आर्मी को बलूचिस्तान में भेज कलात के खान और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया।

लेकिन, खान के सहयोगी नवाब नवरोज खान ने संघर्ष जारी रखा। कहते हैं कि 1959 में कुरान की कसम खाकर पाकिस्तानी कमांडर ने नवरोज खान को आत्मसमर्पण के लिए राजी किया। लेकिन, हथियार डालते ही उनके बेटों, भतीजों और रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर फॉंसी दे दी गई। खान की करीब 90 साल की उम्र में 1962 में जेल में ही मौत हो गई।

इसके बाद 70 के दशक में फिर बलूच आंदोलन ने जोड़ पकड़ा। 1971 के चुनाव में बलूचिस्तान और नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में नेशनल अवामी पार्टी की जीत हुई जो नेशनलिस्ट बलूचों की पार्टी थी। बलूचों पर आरोप लगाया गया कि वे ईरान के साथ मिलकर बड़े संघर्ष की तैयारी कर रहे हैं। सरकार को बर्खास्त कर बलूचिस्तान को सैनिकों से पाट दिया गया। बलूचों पर हवाई हमले तक किए गए।

इसके बाद से बलूचिस्तान में नरसंहार का सिलसिला जारी है। वहाँ के हजारों लोग गायब हैं। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट भी जुलाई 2010 से मई 2011 के बीच लापता 140 लोगों की लाशें मिलने की पुष्टि करती है। डिप्लोमेट की एक रिपोर्ट बताती है कि पूरे बलूचिस्तान में कुछ-कुछ किलोमीटर पर साजो-सामान से लैस पाकिस्तानी सेना की सुरक्षा चौकियॉं हैं।

वकील शकील जमुरानी के मुताबिक केच में इंटरनेट शटडाउन को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। लेकिन, सुनवाई पूरी होते नहीं देख उन्होंने मामला वापस ले लिया। वे बताते हैं कि कुछ लोग सादे कपड़ों में उनके पास आए और कहा कि मोबाइल इंटरनेट पर पाबंदी के खिलाफ सवाल उठाकर वे राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं। समझा जा सकता है कि बलूचिस्तान में सुरक्षा का खतरा कैसा है।

अब याद करिए उन शोरों को जो सीमा पार आतंकवाद से जूझ रहे कश्मीर में लॉकडाउन पर मचा है। याद करिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दे सेना पर प्रताड़ना के झूठे आरोप लगाने वाले बयान और सोशल मीडिया के पोस्ट को। याद करिए अल्पसंख्यकों को दबाने का, उनकी आवाज कुचलने का मोदी सरकार पर लगे आरोपों को। और अब पवार का बयान। जाहिर है, ऐसे लोगों को न तो समुदाय विशेष की फिक्र है और न ही मानवाधिकारों को। उन्हें चिंता केवल अपनी दुकान की है, जिसके लिए वे आए दिन मजहब के नाम पर माहौल बिगाड़ने की साजिश रचते रहते हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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