वहाँ मोदी नहीं, सनातन आस्था अपनी रीढ़ सीधी कर रही है, इसीलिए कुछ को दिक्कत हो रही है

भले ही मोदी निजी तौर पर अपनी आस्था निभा रहा है, लेकिन आपको सब कुछ स्टेज्ड दिखेगा, आपको पता चल जाएगा कि वो भीतर बैठ कर अमित शाह के साथ ताश खेल रहा है। आपको आधा सेकेंड नहीं लगता किसी की आस्था को नौटंकी कहने में, वो सिर्फ इसलिए कि सामने वाला हिन्दू है, सहिष्णु है, उसके धर्म में विरोध के मत का भी सम्मान है।

कुछ बेचारों की मानसिक स्थिति पर दया आती है जो मोदी को कोसते भी हैं, और उसकी तस्वीर भी शेयर कर रहे हैं। ये वैसे ही मूर्ख हैं जो कहते हैं मुद्दों पर बात नहीं होती। जब मुद्दों पर बात नहीं होती तो तुम क्या कर रहे हो? क्या पीएम के आने पर रेड कार्पेट का प्रोटोकॉल नहीं है? क्या यही आदमी पत्रकारों को अपने पीछे आने से मना कर दे तो तुम ही ‘फ़्रीडम ऑफ प्रेस’ की नौटंकी नहीं करोगे?

क्या जो मीडिया वाले इन तस्वीरों को दिखा रहे हैं, और रो भी रहे हैं, वो ये चुनाव नहीं कर सकते थे कि उनके यहाँ ये तस्वीरें नहीं दिखाई जाएँगी?

मोदी गया केदारनाथ, वो हिन्दू है, उसकी आस्था है। तुम्हें उसकी आस्था को नौटंकी कहने का कोई हक नहीं है क्योंकि तुम भी एक नागरिक के तौर पर फेसबुक पर नौटंकी ही कर रहे हो। तुमने बस रोना रोया है कि मोदी ये कर रहा है, वो कर रहा है। लेकिन तुमने एक भी बार तार्किक होकर, सही आँकड़ों के साथ (पिछली सरकार के आँकड़ों की तुलना में) मोदी को घेरने की कोशिश नहीं की।

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सबसे सही बात तो यह है कि तुम आला दर्जे के घमंडी और नकारे लोग हो जिनके पास कहने को कल्पनाशीलता के अलावा कुछ नहीं है। घमंडी इसलिए कि तुम्हें तुम्हारे वश में होने वाले सारे कार्य सर्वोत्तम और गजब के दिखते हैं, वही कोई दूसरा करता है तो वो नौटंकी हो जाती है। मोदी के केदारनाथ जाने या ध्यान में बैठने पर मीम बनाइए, हँसिए लेकिन दो मिनट के मजाक के बाद अपनी जमीन तलाशिए कि उसके वहाँ जाने से किसको क्या फर्क पड़ रहा है।

किसी ने लिखा कि ध्रुवीकरण हो रहा है। मुझे अच्छे से पता है कि उसने बस लिखने के लिए लिख दिया क्योंकि ध्रुवीकरण किसने किया है और कैसे होता है इसकी जानकारी उसे तो बिलकुल नहीं होगी। ध्रुवीकरण किसी के मंदिर में जाने से नहीं होता। फिर तो सारे लोग मंदिर गए हैं, ऐसे में ध्रुवीकरण स्वतः निरस्त हो जाता है। ये बात और है कि अपनी मूर्खता में लोग सिर्फ मोदी के मंदिर जाने पर ध्रुवीकरण देख लेते हैं, बाक़ियों में नहीं।

मोदी ही इस चुनाव का अकेला ध्रुव है, और ध्रुवीकरण उसकी नीतियों, योजनाओं, विकास कार्यों से हुआ है न कि उसके मंदिर जाने से। वो लोग उच्च कोटि के मूढ़मति हैं जिन्हें लगता है कि भाजपा, जिसका घोषित अजेंडा हिंदुओं का पक्षधर होना है, उसे ध्रुवीकरण के लिए मंदिर जाने की जरूरत होगी।

भाजपा या मोदी मंदिर कब नहीं गया? जो नए-नए मंदिर जाना शुरु करते हैं, उनकी कोशिश होता है ध्रुवीकरण। जो मुसलमानों में डर बिठाकर यह कहते हैं कि मोदी आएगा तो तुमको काट दिया जाएगा, वो ध्रुवीकरण की कोशिश है। ध्रुवीकरण मंदिर जाना नहीं है।

इंटेलेक्चु‌ल लेजिटिमेसी और फेसबुक पर प्रासंगिक बने रहने, ज्ञानी कहलाने और एक खास गिरोह के लोगो में स्वीकार्यता पाने के लिए आप भले ही मोदी की हर बात पर लेख लिखिए, लेकिन ध्यान रहे कुतर्कों, ठिठोलियों और मीम्स की उम्र छोटी होती है।

मोदी प्रधानमंत्री भी है और हिन्दू भी। उसे इस देश का संविधान एक व्यक्ति के तौर पर भी और एक प्रधानमंत्री के तौर पर भी मंदिरों में घूमने की इजाज़त देता है। वो न भी चाहे फिर भी प्रोटोकॉल के तहत उसकी सुरक्षा का घेरा उसके साथ ही जाएगा। जैसे कि राहुल गाँधी कुछ भी नहीं है, फिर भी उसकी सुरक्षा का खर्च भी सरकार वहन करती है।

इसलिए, अगर आपकी लाइन ये है कि मोदी मंदिर क्यों गया तो जवाब है कि ऐसा करना ग़ैरक़ानूनी नहीं है। अगर आपकी लाइन ये है कि इससे वोटर इन्फ्लूएन्स होते हैं तो आपको राजनीति की कुछ भी जानकारी नहीं है और आप दूसरों के शब्द चुराकर मायकल बनने के लिए फेसबुक पर कुछ भी लिखते रहते हैं। अगर आपको यहाँ ध्रुवीकरण दिखता है तो आपको ध्रुवीकरण कैसे होता है इस पर जानकारी जुटाने की जरूरत है।

भगवा कपड़े धारण करना, मंदिर में जाना और ध्यान करना किसी का व्यक्तिगत चुनाव है। आप भी छुट्टियों में घूमने जाते हैं, आपका पड़ोसी आपको कहे कि ये चोरी के पैसों से घूमने जाते हैं, तो आपको बहुत अच्छा नहीं लगेगा। प्रधानमंत्री जब इफ़्तार पार्टी देते थे तो सेकुलर हो जाते थे, आज कोई अपनी आस्था से कहीं जा रहा है तो आपको कष्ट क्यों हो रहा है?

आपको कष्ट दो कारणों से होता है। पहला इस कारण से कि आपको यह पच नहीं रहा कि कोई व्यक्ति तय परिपाटी से अलग तुष्टीकरण की नीतियों से परे, अपनी आस्था को ऐसे दिखाता है जैसे वो प्रतीक हो उन करोड़ों लोगों के लिए जिनकी आस्था को ही साम्प्रदायिक बना दिया गया। हमने वो दौर झेला है जब हिन्दू होना ही साम्प्रदायिक होना माना जाता है, और एक हिस्से से अभी भी वही तर्क चल रहा है।

दूसरा कारण है कि जिन लोगों ने मोदी की आलोचना से फेसबुक या सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाई थी, उनके पास अब बोलने को कुछ भी नहीं बचा। उन्होंने इस पूरे पाँच साल में, बिना किसी आधार के रेटरिक (कल्पनाशील बातों) पर ध्यान दिया है। किसी ने कुछ लिख दिया, तो उन्होंने भी लिख दिया। धीरे-धीरे आलोचना का स्तर गिरता गया, और वो कब एक कम्पल्सिव सायकॉलोजिकल डिसॉर्डर के रूप में भीतर घुस गया इन लोगों को पता तक नहीं चला।

अब ये मोदी की हर बात में, हर तस्वीर में नुक़्स निकालने लगे। वही कार्य मोदी के विरोध में खड़ा अपराधी करे, घोटालेबाज़ पार्टी करे, आतंकियों का हिमायती करे, नक्सली करे तो वो सब ‘पोलिटिकल स्ट्रोक’ से लेकर ‘समझदारी’, ‘रणनीति’, ‘मोदी की राजनीति का जवाब देनेवाला’ हो जाता है, लेकिन मोदी के करने पर उसमें सारी नकारात्मक बातें निकाल ली जाती हैं।

अब ये तथाकथित बुद्धिजीवी कहीं जा नहीं सकते। ये चाह कर भी सेंसिबल बातें लिख नहीं सकते क्योंकि ये अपने ही सर्कल से डिसऑन कर दिए जाएँगे। इन्हें अपने ही दायरे से भगा दिया जाएगा। इनकी मजबूरी है कि अपने गिरोह के विचारों की लाइन में प्रलाप करते रहना ताकि दस लोग कहें कि ‘वाह मैडम, क्या गजब लिखा है’, ‘वाह सर, काश आपको ये भक्त पढ़ते तो उनकी आँखें खुल जातीं।’

एक बात और है, ऐसे लोग निजी जीवन में आपको सेंसिबल बातें करते नजर आएँगे। वो कहेंगे कि हाँ, अभी तो मोदी ही काम कर रहा है, बाक़ियों को तो जनता देख चुकी है। ऐसे लोगों की बातें रिकॉर्ड कर के पब्लिक के सामने रख दिया जाए तो पता चलेगा कि इनके सर्कल के अधिकतर लोग सोशल मीडिया पर मजबूरी में मोदी को गरियाते हैं।

ये लोग अपने ही प्रोजेक्शन से लड़ रहे हैं। ये दस-बीस-पचास लोगों की लाइक के लिए लिखते हैं। इनके पोस्ट एक मजबूरी का परिणाम हैं क्योंकि इनके दूसरे पोस्ट की कमेंट पर कोई लिख देगा कि ‘आपने तो मोदी की केदारनाथ यात्रा पर कुछ तड़कता-भड़कता लिखा ही नहीं’। आपमें फिर लिखने का कम्पल्शन जगेगा कि आपके गिरोह के बाकी लोगों ने तो लिख दिया, आप तो पीछे रहे गए। आप अपने ही नकली प्रोजेक्शन से बँध गए हैं। आप चुप रहेंगे तो आपकी मंडली कमेंट कर-कर के आपकी जान खा जाएगी, अगर सच बोल देंगे, तार्किक हो जाएँगे तो आपकी विचारधारा वाले आपको तुरंत ही त्याग देंगे। आपको एक लाइन में कह दिया जाएगा कि ‘ये भी संघी निकला’, ‘ये तो भक्त हो गए’।

इसलिए, भले ही मोदी निजी तौर पर अपनी आस्था निभा रहा है, लेकिन आपको मीडिया के वहाँ होने के कारण सब कुछ स्टेज्ड दिखेगा। इसलिए, मोदी भले ही सच में ध्यान कर रहा हो, लेकिन आप तो दुनिया के सबसे बड़े सर्वज्ञ हैं तो आपको मालूम हो जाएगा कि वो भीतर बैठ कर अमित शाह के साथ ताश खेल रहा है। आपको आधा सेकेंड नहीं लगता किसी की आस्था को नौटंकी कहने में, वो सिर्फ इसलिए को सामने वाला हिन्दू है, सहिष्णु है, उसके धर्म में विरोध के मत का भी सम्मान है।

उसके खड़े होने पर आपको दिक्कत है क्योंकि जब वो उठता है तो वो हिन्दुओं की सामूहिक आस्था पर सुव्यवस्थित तरीके से लगातार की जा रही क्षति को सही करने के लिए उठता है। आप अपने निजी विचार रखिए कि ‘मैं तो मंदिर जाता/जाती हूँ तो फोटो नहीं खिंचाता/खिंचाती’ लेकिन आपको मीडिया द्वारा ली गई तस्वीरों (या खुद ही ली गई तस्वीरों) पर आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं।

अगर मोदी ने आपके घर के मंदिर में घुस कर प्रार्थना करने का ढोंग रचा। आपको मोदी के मंदिर जाने से निजी तौर पर कठिनाई का सामना करना पड़ा, तो आप लिखिए कि आपको निजी क्षति पहुँची है। आप अपने सीमित ज्ञान के आधार पर पूरे भारत का स्वघोषित प्रतिनिधि मत बनिए क्योंकि आपको फेसबुक पर आने वाले बीस लाइकों के अलावा कोई नहीं जानता।

आस्था निजी होती है। ये इतनी व्यक्तिगत बात है कि आप अपनी कैसे दिखाते हैं, कैसे छुपाते हैं, इस पर सिर्फ और सिर्फ आपका हक है। आपको इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि मैं किसी देवता की पूजा कैसे करता हूँ। आपको इस पर नकारात्मक टिप्पणी करने का कोई हक नहीं है कि मोदी वहाँ क्यों गया क्योंकि मोदी की आस्था, प्रधानमंत्री होते हुए भी, उतनी ही निजी है जितनी आपका अपनी बिटिया के लिए प्रेम। इसमें बाहरी व्यक्ति की कोई जगह नहीं है कि आप उसे कैसे देखते हैं, कैसे दिखाते हैं।

अंत में, आपमें से कितने लोग मंदिर जाते हैं और तस्वीरें नहीं लगाते? आपकी हैसियत हो, या संसाधन हों तो आप उस पर चालीस मिनट का प्रोग्राम बना कर टीवी पर चलवा देंगे। आत्ममुग्ध फेसबुकिया बुद्धिजीवी पीढ़ी जब मोदी को ‘कैमरा ऑब्सेस्ड’ कहता है तो बड़ा क्यूट लगता है।

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