Tuesday, March 2, 2021
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द इलेक्टोरल मशीन: TsuNaMo के बावजूद ओडिशा में नवीन पटनायक क्यों जीते?

19 साल की निरंतरता के बाद, 147 में से मात्र 23 सीटें जीतना, वो भी एक ऐसे राज्य में, जिसे भाजपा ने मिशन 120 घोषित करते हुए युद्ध का मैदान बनाया था, यह एक अस्वाभाविक विफलता है।

अप्रैल 2014 में, मैं अपने ससुराल वालों को कार में बैठाकर BJB कॉलेज आर्ट्स ब्लॉक, भुवनेश्वर में उन्हें उनके वोटिंग बूथ पर ले जा रहा था। जिज्ञासावश, मैंने अपनी सास से पूछा कि वो किसे वोट देंगी? जैसा कि ओडिशा में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ था, तो उन्होंने जवाब दिया कि राज्य के लिए शंख और दिल्ली के लिए कमल। जैसे ही वो बूथ में गई और बाहर आई, तो मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने वैसा ही किया जैसा उन्होंने बताया था? इस पर उन्होंने नकारात्मक उत्तर दिया। दरअसल, उन्होंने दोनों ईवीएम में शंख के बटन को दबाया था। इसका कारण उन्होंने मुझे समझाया कि वो इस उलझन में थीं कि कौन-सी ईवीएम लोकसभा के लिए है और कौन-सी विधानसभा के लिए। वह इस बात से चिंतित थीं कि ‘कहीं ऐसा न हो कि उनका वोट नवीन पटनायक को न जाए’। वास्तव में वो भाजपा-विरोधी नहीं थीं बल्कि वो प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन करती थीं। लेकिन वह किसी भी तरह से नवीन पटनायक के ख़िलाफ़ मतदान नहीं कर सकती थीं। उनका मंतव्य स्पष्ट था कि वो नवीन पटनायक को ही वोट देना चाहती थीं, उन्हें वोट देने को वो अपना कर्तव्य समझती थीं, फिर भले ही वो दिल्ली के लिए मोदी को वोट देने से चूक गईं हों।

जैसा कि आमतौर पर कहा जाता है कि राजनीति में किसी से दुश्मनी मोल लेना ठीक नहीं। यह बात ओडिशा की जनता के लिए अब एक गहरी भावना बन चुकी है। नवीन पटनायक को ओडिशा के मतदाताओं की यही भावना विरासत में मिली हुई है। उन्होंने दो दशकों तक शासन किया है, बावजूद इसके अभी भी ओडिशा कई मापदंडों पर खरा नहीं उतरता। वहीं, अगर मतदाताओं से पूछा जाए तो वो सभी कार्यों का श्रेय बीजू जनता दल (बीजेडी) के मंत्रियों को ही देते हैं। नवीन पटनायक के ख़िलाफ़ हर बात को व्यक्तिगत रूप से लिया जाता है। यह लगभग राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के पंथ की तरह ही है, यही वजह है कि राहुल गाँधी ने मोदी को ‘चोर’ कहकर इसकी भारी क़ीमत चुकाई।

29 मई को, नवीन पटनायक ने 5वीं बार भुवनेश्वर के आईडीसीओ प्रदर्शनी मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2024 में उनका 5वाँ कार्यकाल समाप्त होने तक, वह सिक्किम के पूर्व सीएम पवन कुमार चामलिंग के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ देंगे, जिन्होंने 24 साल और 165 दिनों तक राज्य की सेवा की, जो अब तक के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री बने। वह अन्य दिग्गज, दिवंगत ज्योति बसु को भी पीछे छोड़ देंगे जिन्होंने 23 साल और 137 दिनों तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। जबकि ज्योति बसु के शासन में वामपंथियों का वोट था, बसु के बाद भी पार्टी बंगाल को जीतती रही, ओडिशा में लोगों ने बीजेडी को सिर्फ़ सत्ता में लाने के लिए वोट नहीं दिया बल्कि उन्होंने प्रचंड बहुमत के साथ नवीन पटनायक को वोट देकर विजयी घोषित किया।

2014 के आम चुनावों के ठीक बाद, बीजेपी ने अपने अगले चुनावी युद्ध के मैदान के लिए ओडिशा और पश्चिम बंगाल को चुना था। बीजेपी ने पहली बार 2014 में ओडिशा में अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की। तब से पीएम मोदी, शाह और अन्य कैबिनेट मंत्रियों ने पार्टी कार्यक्रम या उद्घाटन समारोह में भाग लेने के लिए ओडिशा की अनगिनत यात्राएँ की थी। बीजेपी ने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को जुटाने के लिए बूथ स्तर के एक बड़े कार्यक्रम ‘Mo Booth Sabuthu Majboot’ को अंजाम दिया। इसका परिणाम 2017 के पंचायत चुनावों में दिखा जहाँ पार्टी ने 849 पंचायतों में से 306 पर जीत दर्ज की। यह उनके पिछले रिकॉर्ड का 8.5 गुना था। राम मंदिर के पास पार्टी मुख्यालय में पार्टी का जश्न ख़ुशी से मनाया गया।

जब लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम घोषित किए गए, तो मोदी सुनामी ने देश को झुलसा दिया। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल, साथ ही गठबंधन ताश के पत्तों की तरह गिर गए। लेकिन एक व्यक्ति (नवीन पटनायक) जो मोदी लहर के बीच न सिर्फ़ तटस्थ होकर खड़ा रहा बल्कि तमाम चक्रवातों और आपदाओं से निपटने में पूरी तरह सक्षम भी रहा। मोदी सुनामी और 20 साल के सत्ता-विरोधी के चेहरे पर, नवीन ने 21 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में से 12 पर अपनी जीत सुनिश्चित की और 147 विधानसभा क्षेत्रों में से 112 पर अपनी जीत हासिल की। हालाँकि, 2014 की तुलना में पार्टी को 5 सीटों का नुकसान भी हुआ। आख़िर, भारतीय राजनीति में नवीन बाबू की इस अभूतपूर्व सफलता का क्या कारण है?

लोगों का कहना है कि नवीन पटनायक की जीत का कारण वहांँ किसी दूसरे विकल्प का नहीं होना है। भारतीय चुनाव की प्रक्रिया जटिल होती है। पाँच मोदी प्रशंसकों को इकट्ठा करके उनसे पूछें कि उन्होंने मोदी को वोट क्यों दिया, तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि वे आपको पाँच अलग-अलग कारण दें। यदि चुनाव जीतने का केवल एक ही कारण बताया जाए तो वो जवाब बहुत ही सरल और सपाट होगा।

2015 में, ओडिशा में एक बड़े चिट फंड घोटाले का ख़ुलासा किया गया था। बीजेडी के कई नेताओं सहित कुछ विधायकों और सांसदों ने लंबा समय जेल में बिताया। बाद में, उनमें से कुछ को पार्टी में फिर से शामिल करने के लिए बीजेडी से निलंबित कर दिया गया था। उनमें से कुछ या उनके बेटों को 2019 में बीजेडी का टिकट दिया गया और उन्हें चुनाव में जीत भी मिली। हालाँकि, नवीन पटनायक की छवि को कोई आँच नहीं आई।  इसमें से किसी ने भी अपने मिस्टर क्लीन (नवीन पटनायक) की इमेज पर कोई सेंध नहीं लगाई। लोग उन्हें (नवीन पटनायक) ठगों से घिरे एक अच्छे आदमी के रूप में देखते हैं; हालाँकि, अच्छे आदमी ने यह सुनिश्चित किया है कि ठगों को सजा दी जाए।

नवीन पटनायक जो भी मदद करते हैं वह उनका गैर-टकराव वाला रवैया होता है। 2014 के बाद, जब बीजेपी ने ओडिशा को अपनी लड़ाई का मैदान बनाया, तब राज्य के बीजेपी नेता नवीन पर हुए हमले से बौखला गए थे। लेकिन वह शांत रहे और उन्होंने कभी भी शांति भंग नहीं होने दी। उनकी प्रतिक्रियाओं को गरिमापूर्ण रवैये के रूप में देखा गया।

नवीन की अद्वितीय सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनके व्यक्तित्व का सुलझा हुआ होना है। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के संदर्भ में उनकी कोई अस्पष्टता नहीं है। उनका एकमात्र उद्देश्य ओडिशा पर शासन करना है, जहाँ वह अपनी पूरी ऊर्जा लगाते हैं, और इसके परिणाम से सभी वाक़िफ़ हैं। इस स्थिति की तुलना अगर अन्य क्षेत्रीय दिग्गजों व उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और उनकी घटती राजनीतिक किस्मत से करें तो पता चलेगा कि हर कोई दिल्ली में अपने पैर पसारना चाहता है। सभी अपनी विस्तारवादी नीति को अपनाते हुए दिल्ली पर निशाना साधे रहते हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि वे यह भी नहीं जानते कि वास्तव में नवीन पटनायक काम क्या करते हैं, लेकिन फिर भी वो हर चुनाव में जीत हासिल करने में क़ामयाब रहते हैं। यही वो कारण है जो रहस्य पैदा करता है। दरअसल, वो एक अकेला ऐसा शख़्स नहीं है जो अपने काम का राग अलापता है बल्कि नवीन पटनायक मतदाताओं को अच्छे से समझते हैं, वह अपनी सीमाओं, अपनी महत्वाकांक्षाओं को बख़ूबी जानतें हैं और वो अपनी ऊर्जा और ताक़त को उसी जगह केंद्रित करते हैं जहाँ उसकी आवश्यकता होती है। यदि उनकी प्री इलेक्टोरल वेलफेयर स्कीम्स, उनके अभियानों और रणनीतियों पर एक सरसरी निगाह डाली जाए तो आपको यह समझने में देरी नहीं लगेगी कि लोकसभा चुनाव को लेकर उनकी तैयारी आधी ही थी, क्योंकि उनका पूरा ध्यान केवल ओडिशा विधानसभा चुनाव पर लगा हुआ था।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2019 में ओडिशा में जबरदस्त सफलता पाई है। संसदीय सीटों में 8 गुना वृद्धि और विधानसभा चुनावों में दोगुने से अधिक लाभ प्राप्त किया है। दोनों चुनावों में वोट शेयर भी लगभग दोगुना है। लेकिन, यह संख्या राजनीतिक रणनीतिकारों और विश्लेषकों के लिए हैं। 19 साल की निरंतरता के बाद, 147 में से मात्र 23 सीटें जीतना, वो भी एक ऐसे राज्य में, जिसे भाजपा ने मिशन 120 घोषित करते हुए युद्ध का मैदान बनाया था, यह एक अस्वाभाविक विफलता है। इसका कारण राज्य के नेताओं के बीच संगठन की कमी, आंतरिक तोड़-फोड़, कोई लोकप्रिय चेहरा ना होना है। अगर संक्षेप में कहा जाए, तो यह कहना ग़लत नहीं होगा कि यह सभी कारण नवीन पटनायक के ख़िलाफ़ थे। सच्चाई यह है कि राज्य भाजपा के पास केवल उस व्यक्ति से निपटने के लिए कोई सक्षम उम्मीदवार था ही नहीं।

जैसा कि नवीन पटनायक 5वें कार्यकाल के लिए तैयार हैं, उनके सामने कई चुनौतियाँ हैं। एक चक्रवात से तबाह राज्य को पुनर्जीवित करने और विकास की पटरी पर वापस लाने की ज़रूरत है। हेल्थकेयर, खेती, शिक्षा और रोज़गार पर तत्काल ध्यान देने की ज़रूरत है। नवीन पटनायक को बड़े पैमाने पर जनादेश मिला है और उन्हें सभी सुविधाएँ उपलब्ध करनी होगी। हम अगले पाँच वर्षों के कार्यकाल के लिए उन्हें शुभकामनाएँ देते हैं।

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