‘अगर हथिया ही सब कुछ है तो इतने बड़े-बड़े हाथी जो हम लोगों ने पाल रखे हैं वो क्यों हैं’

अपनी गलतियों को दबाना, हर सरकार के चरित्र में होता है। चाहे वो अमेरिका हो, या फिर वो बिहार हो, अगर नुकसान तब हुआ हो जब सरकारी अमले को होने वाली आपदा का पूर्वानुमान था, तो उसकी ख़बरें दबा दी जाती हैं।

जीत का सेहरा अपने सर बाँधने की होड़ का नतीजा क्या होगा? ये तो सीधी-सी बात है कि कोई अच्छा काम किया जा रहा हो, तभी उसका श्रेय मिलने की संभावना होती है। लेकिन, अलग-अलग संस्थान किसी जीत को अपनी जीत, सिर्फ मेरी जीत, घोषित करने पर तुले हों तो ज्यादातर ये आपसी लड़ाई दुश्मन को जीत दिला देती है।

पुल्तिज़र पुरस्कार से सम्मानित लेखक (पत्रकार) लॉरेन्स राईट की किताब “द लूमिंग टावर: अल कायदा एंड द रोड टू 9/11” कुछ ऐसे ही मसलों पर ध्यान दिलाती है। काफी शोध के बाद लिखी गई इस 500 पन्ने के लगभग की किताब में इस बात पर ध्यान दिलाया गया है कि कैसे सीआईए और एफबीआई की आपसी प्रतिद्वंदिता में एक ऐसी हरकत को अंजाम दिया जा सका जिसकी जानकारी अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के पास पहले से ही थी!

किसी शादी के समारोह में ओसामा बिन लादेन ने तीन बार दोहराया था कि ‘मौत तुम्हें ढूँढ लेगी चाहे तुम किसी ऊँची अट्टालिका में क्यों न छिप जाओ’। ये वाक्य सूरा अल निसा (कुरआन 4.78) का है और इसी से इस किताब का शीर्षक लिया गया है। इसके अलावा इस किताब में 9/11 के हमलावरों के जीवन और उनके कट्टरपंथी नजरिए जैसी चीजों पर भी रोशनी डाली गई है।

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अगर, अमेरिका जैसी जगहों पर ऐसी कोई किताब लिखी हुई हो, शोध पहले ही हो चुका हो तो क्या इस पर फ़िल्में और टीवी सीरीज भी बनेंगे? 2006-07 में दर्जन भर से ज्यादा पुरस्कार जीत चुकी इस बेस्टसेलर पर शायद ही कोई फिल्म बनी। इस पर जो टीवी सीरीज बनी वो आम चैनल और टीवी पर नहीं वेब सीरीज की तरह चलती है।

अपनी गलतियों को दबाना, हर सरकार के चरित्र में होता है। चाहे वो अमेरिका हो, या फिर वो बिहार हो, अगर नुकसान तब हुआ हो जब सरकारी अमले को होने वाली आपदा का पूर्वानुमान था, तो उसकी ख़बरें दबा दी जाती हैं। बिलकुल पास के बिहार में अगर देखें तो जल-जमाव से अस्त-व्यस्त पटना और बिहार के बाढ़ जैसे हालात टीवी पर ही नजर आ जाते हैं। क्या सरकार बहादुर को इसकी खबर पहले से नहीं थी?

मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाले विभागों ने पहले से ही भारी बारिश की घोषणा कर दी थी। बाढ़ आए तो उसे आपदा कहा भी जाए, मगर बारिश का पानी अगर शहरों में ही जमा रह जाए निकल ही न पाए तो आपदा राहत की नहीं जवाब देने की बारी आती है। अफ़सोस कि ऐसे सवाल या तो पूछे नहीं जाते और अगर पूछे जाएँ तो पूछने वालों को भारी दंड भी झेलना पड़ता है।

सवाल पूछे जाने पर पत्रकारों को जागरूकता फैलाने के लिए फटकारते शू-शासन बाबू हाल में ही वीडियो में दिखे हैं। जो बिहार के बाहर आसानी से नहीं दिखा होगा वो था इस जल-जमाव पर स्थानीय अखबारों में छपी कहानियाँ। सरकार के रुख को लेकर “प्रभात खबर” का रवैया काफी तल्ख़ रहा। अक्टूबर की 2-3 तारीख को ऐसी ख़बरों को छापने का नतीजा “प्रभात खबर” में आने वाले विज्ञापनों की गिनती में साफ नजर आ जाएगा।

दुर्गा पूजा के दौरान जहाँ दूसरे अख़बारों में सरकारी और गैर-सरकारी विज्ञापन भरे पड़े हैं, प्रभात खबर विज्ञापनों से खाली ही दिखता है। ऐसा भी बिलकुल नहीं है कि “हथिया नक्षत्र” पर ज्यादा पानी बरसने का दोषारोपण सरकार बहादुर कोई पहली बार कर रही हो। बाढ़ और नदियों पर शोध करने वाले जाने-माने विशेषज्ञ डॉ. दिनेशचन्द्र मिश्र बताते हैं कि ये 1957 में भी हो चुका है। तब जाने-माने साहित्यकार रामबृक्ष बेनीपुरी ने विशालकाय सरकारी अमले की बात करते हुए 28 नवंबर 1957 को बिहार विधानसभा में पूछा था, “अगर हथिया ही सब कुछ है तो इतने बड़े-बड़े हाथी जो हम लोगों ने पाल रखे हैं वो क्यों हैं।”

राजधानी होने के कारण पटना की स्थिति आसानी से नजर आ गई। जिस शहर को “स्मार्ट सिटी” बनाने की बातें बनाई जा रही हैं, वहाँ की नगरपालिका पर भाजपा काबिज है, मेयर भी भाजपा से! कुम्हरार, बांकीपुर, दीघा, पटना साहिब के विधायक भाजपा के हैं, पाटलिपुत्र और पटना साहिब के सांसद भाजपा के हैं, बिहार के स्वास्थ्य मंत्री और नगर विकास मंत्री भी भाजपा के, राज्य में गठबंधन सरकार और उप मुख्यमंत्री भी भाजपा और केंद्र से मदद न आने का बहाना किया जाए तो केंद्र सरकार भी भाजपा की ही है।

डूबते पटना को घर की छत से निहारते सीएम नीतीश कुमार

अक्सर जैसे व्यक्तिगत स्तर पर स्थानीय लोगों को जुटाकर लोगों की मदद करने के प्रयास करते राजनीतिज्ञ नजर आते हैं, वो भी यहाँ नहीं दिखा। एक जो नेता दिखे वो पटना से करीब 300 किलोमीटर दूर के मधेपुरा क्षेत्र से हैं, जो पटना वाले थे वो ट्यूब से बने राफ्ट से फिसलकर पानी में गिरे और हँसी का पात्र बने।

इस दौरान उप-मुख्यमंत्री (भाजपा के) सुशील मोदी को बचाकर निकालने की तस्वीर नजर आती रही। सोशल मीडिया पर उनकी एक पुरानी तस्वीर भी दिखने लगी जिसमें वो 1972 के दौर में हुए जल-जमाव के विरोध में अनशन पर थे। पिछले करीब पचास सालों में क्या बदला मालूम नहीं! आपदा नियंत्रण की कितनी तैयारी थी ये नावों के इंतजाम में नजर आया। ट्रैक्टर और जेसीबी-क्रेन जैसी मशीनें ज्यादा काम आईं। नावें न तो उतनी थीं, न ही उतनी कारगर थीं।

आज के डिप्टी सीएम सुशील मोदी जब विपक्ष में होते थे तो पटना में जल जमाव पर फूट पड़ते थे!

डीएम को आपदा राहत में लगे लोगों को पका भोजन बाँटने से भी मना करना पड़ा, क्योंकि लोग पूड़ी-सब्जी जैसी चीज़ें बाँटने में लगे थे। पका हुआ ऐसा खाना अगर बच जाए तो सीलन और गर्मी से खराब होता है जिससे पानी उतरते-उतरते डायरिया जैसी महामारी फैलने की आशंका रहती है। आपदा नियंत्रण की तैयारी में स्कूल-कॉलेज या सिविल सोसाइटी के लोगों को ये पहले क्यों नहीं बताया गया था ये भी पता नहीं।

इस जल-जमाव को लेकर अदालती मामला भी चला है। हाईकोर्ट ने 23 जून 2015 को (चार साल पहले) ही आदेश दिया था कि पटना में 24 घंटे से अधिक जल-जमाव हुआ तो नगर निगम जिम्मेदार होगा और इसे अदालत की अवमानना भी माना जाएगा। हाईकोर्ट के जिस जज, जस्टिस सुधीर सिंह ने निगम और सरकार को चौबीस घंटे में पानी निकालने का आदेश दिया था, वो भी अपने पिता को गोद में उठाकर पानी से निकालते नजर आए। उनके पिता एनपी सिंह 1991 में पटना हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस थे, उन्होंने भी जल-जमाव से निपटने के लिए कई आदेश दिए थे।

पटना के हालात पर दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट

उस दौर में कोलकाता से मशीनें मँगवा कर जल-जमाव से निपटा गया था। तत्कालीन चीफ जस्टिस एल नरसिम्हा और जस्टिस सुधीर सिंह की पीठ ने ये 2015 का आदेश 2012 में हुए जल-जमाव के खिलाफ दायर हुए पीआईएल के मामले में दिया था। यानी पिछले दस साल में ही ऐसा कई बार हो चुका है।

सिर्फ आपदा की बात करें तो बिहार में आपदा नियंत्रण के लिए लोगों को लगातार जागरूक किया जाना जरूरी होता है। यहाँ बाढ़ और भूकम्प जैसी दो आपदाएँ कभी भी आ सकती हैं। हाल के दो-चार वर्षों में हमने इनका प्रकोप देखा भी है। ऐसी स्थिति में आपदा प्रबंधन के लिए स्वयंसेवक जुटाने, लोगों के खाना-दवाइयाँ वितरित करने, आपदा से बचाव और सुरक्षा के प्रति लोगों की जानकारी आमतौर पर समसेवी संगठनों के जरिए बढ़ाई जाती है।

जागरूकता फैलाने का काम बिहार में काम करने वाले बड़े एनजीओ जैसे यूनिसेफ, ऑक्सफेम, आद्री, आगा खान फाउंडेशन इत्यादि का होना चाहिए था। स्थानीय युवा और नागरिक समूह जब ऐसे राहत-बचाव के कामों में जुटे दिखे तो ये सभी तथाकथित समाजसेवी संगठन पता नहीं कहाँ विलुप्त रहे। सरकारी विभागों का सीधे स्थानीय युवाओं से और उनके समूहों से कोई संपर्क रहा हो, ऐसा भी नहीं लगता।

बाकी अगर अच्छी बातें करें तो कहा जाता है कि हर बुरी स्थिति भी कई अच्छी चीजें साथ लाती है। कुछ घटनाओं में सीख छुपी होती है तो कुछ में अवसर छुपे होते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि भूकंप, बाढ़ और जल-जमाव जैसी आपदाएँ झेलने के बाद बिहारवासी कम से कम ये सीख लेंगे कि आपदा की स्थिति में किसी और के बदले अपने आप पर भरोसा करना होगा क्योंकि जिनके भरोसे बैठे हैं उस सरकार, राजनैतिक दल, एनजीओ वगैरह में से तो कोई आता नहीं! उन्हें जीत का सेहरा अपने सर बाँधने से ही फुर्सत नहीं।

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