गरिमा गई घुइयाँ के खेत में: फिर से गाय छोड़ कर मंदिर ढाहने का दिवास्वप्न मत देखो

वीरोचित व्यवहार यह है कि ऐसे ज़हरीले तीर को न सिर्फ नाकाम किया जाए, बल्कि तीर चलाने वाले को खोज कर, उसके सारे अस्त्र-शस्त्र छीन लिए जाएँ, उसका रथ तोड़ दिया जाए और उसे तीरों से बींध दिया जाए। मोदी वही कर रहा है।

सोशल मीडिया के आने से कई बातें अच्छी हुई हैं। लोगों को अभिव्यक्ति की जगह मिली है, मेनस्ट्रीम मीडिया की मोनोपॉली खत्म हुई, मठाधीशों की मठाधीशी पर आम जनता ने लगातार आक्रमण करके उनके क़िलों को ध्वस्त किया और सबसे अच्छी बात यह कि कई लोग अपनी नग्नता और वैचारिक विपन्नता छिपाने में असफल रहे।

देश में राजनीतिक माहौल है, जो कि चुनावों के दौरान लाज़मी है। इस माहौल में लोग विकास के मुद्दों की बात से लेकर राजीव गाँधी के ‘विराट’ पिकनिक से होते हुए, ‘नीच’ मणिशंकर तक पहुँचे हैं। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि मीडिया और सोशल मीडिया पर लोग दो पक्षों में खड़े हैं। ये पक्ष भी दो स्वतंत्र पक्ष नहीं हैं, बल्कि एक पक्ष है, और दूसरा, उसी पक्ष की ऊर्जा से खुद को प्रासंगिक बनाए रखने वाले लोग।

मोदी समर्थक हैं, और मोदी विरोधी। इसका सीधा मतलब है कि सारी चर्चा मोदी को लेकर ही होगी। मोदी ने अगर किसी और की चर्चा की है, तो बाकी लोग उस व्यक्ति या घटना पर भी बातें करेंगे। चूँकि विरोधियों के पास समर्थन के लिए कोई नेता है नहीं, (क़ायदे से कोई डिजर्व करता भी नहीं) इसलिए वो इधर-उधर भटकते रहते हैं।

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इसी भटकने में उन्होंने लालू जैसे अपराधी को सामाजिक न्याय का मसीहा बनाया, ममता जैसी हिंसक प्रवृति की मुख्यमंत्री को महान प्रशासक बताया, अखिलेश जैसे टोंटीचोर में भारत का भविष्य देखा, मायावती जैसी स्वमूर्तिपूजक महिला को दलितों का आईकॉन बताया, टुटपुँजिए कॉलेजिया विद्यार्थी युवाओं के आइडल कहे गए, केजरीवाल जैसे धूर्त लोगों में राजनीति का नया चेहरा खोजा… लिस्ट लम्बी है, रहने दिया जाए।

ये सारे नाम या तो सजायाफ्ता अपराधियों के हैं, या इनके राज्यों में हर तरह की अव्यवस्था फैली हुई है। इन्हीं लोगों पर, यही मेनस्ट्रीम मीडिया किसी अलग समय और संदर्भ में बहुत तीक्ष्ण रही है, और रहती भी। लेकिन, समय और संदर्भ दोनों ही बदल चुके हैं, और मीडिया ने भी पार्टियाँ पकड़ ली हैं। यही कारण है कि इन सबके अपराध, नारकीय प्रशासन, हिंसा को प्रश्रय देना, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे रहना, मीडिया के लिए सामान्य हो गया है, इस पर बात नहीं होती।

बात इसलिए नहीं होती क्योंकि बात के केन्द्र में मोदी का होना आवश्यक है। हर तरह के इंटरव्यू हुए मोदी के। तरह-तरह के सवाल आए। राफेल पर भी, गोधरा पर भी, मुसलमानों पर भी, विकास पर भी, नोटबंदी पर भी, जीएसटी पर भी। हाँ, ये बात और है कि किसी एंकर ने मोदी का कॉलर नहीं पकड़ा और उसके बोलते वक्त बात काट कर उनके बाल नहीं नोचे। कुछ लोगों को भ्रम है कि इंटरव्यू ऐसे ही होना चाहिए। वैसे एक व्यक्ति ने राहुल गाँधी की चाटुकारिता कैसे की, वो सबको पता चल गया।

गरिमा, मर्यादा, और मोदी

अब सोशल मीडिया और मीडिया के लोग सारे सवालों का जवाब पा कर तृप्त हो गए हैं। देश की जनता ने मोदी को वही सारे सवालों के पूछने पर, उन्हीं दोहराए गए जवाबों को इतनी बार सुना है कि उन्हें आँकड़े याद हो गए हैं कि कितने घरों में बिजली पहुँची, सड़क बनने की रफ़्तार क्या है, कितने करोड़ लोगों को मुद्रा लोन मिला, कितने करोड़ लोगों को पक्का मकान मिला, और इन सब में हिन्दू या मुसलमान की शिनाख्त नहीं की गई।

जो लोग यह कह रहे हैं कि मुद्दों पर मोदी बात नहीं करता, वो लोग अपना ही लिखा पढ़ते हैं, और स्पीच आदि सुनने में यक़ीन नहीं रखते। मोदी ने हर मुद्दे पर बात की है, जिस जगह पर रैली की, वहाँ के स्थानीय मुद्दे और वहाँ किए गए कार्यों को गिनाया। हाँ, यह बात भी है कि हर जगह हर समस्या नहीं सुलझी है, क्योंकि ऐसा होना असंभव है।

इसलिए, अब डिबेट मोदी के वादे, मेनिफेस्टो, नीतियाँ, तथाकथित घोटालों और विकास के मुद्दों से उतर कर, उसकी भाषा शैली पर आ गई है। चूँकि विरोध में खड़े लोगों को लिए समर्थन के लिए कोई नायक या नायिका है नहीं, इसलिए, उनके खेमों से आते ज़हर बुझे तीरों को देखना तो छोड़िए, उनके अस्तित्व को ही नकार कर आगे बढ़ जाते हैं।

मोदी को सिर्फ इस चुनाव में दसियों अलग-अलग गालियाँ दी गईं। मर्यादा की बात करने वालों ने, मोदी नामर्द है, हत्यारा है, बीवी को छोड़ कर भाग गया, भड़वा है, ख़ून की दलाली करता है, आतंकवादी, चोर, तुग़लक़, हिटलर, नालायक बेटा, मोदी का बाप कौन है, नीच, बीमार, बिच्छू, घटिया आदमी, लहूपुरुष, रैबीज ग्रसित, पागल कुत्ता, गंगू तेली, असफल पति, गंदी नाली का कीड़ा आदि कहा गया। ये सारी गालियाँ समय और कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम के साथ रिकॉर्डेड हैं।

इनमें से अधिकतर नेता कैबिनेट मंत्री और अपने पार्टियों के बड़े नाम हैं। पार्टी अध्यक्ष से लेकर छुटभैये नेताओं तक ने मोदी को हर तरह की गाली दी है। इस समय भी मोदी उसी प्रधानमंत्री पद पर बैठा था, जिसकी गरिमा की याद आज कल लोगों को लगातार आ रही है क्योंकि मोदी ने उन्हें सभ्य शब्दों में उनसे ज़्यादा तीक्ष्णता से, कुछ कड़वे सत्य बोले।

मोदी ने अपने पाँच साल के कार्यकाल में चार साल नौ महीने प्रधानमंत्री पद की गरिमा बढ़ाई ही है। हम उस पद की बात कर रहे हैं जिसे किसी घर से संचालित किया जाता था। जिस पद के आदेश को कोई सांसद मीडिया के सामने फाड़ देता था। जिस पद पर बैठा व्यक्ति अपने डिसीजन तक नहीं ले पाता था। उस पद को मोदी ने वैश्विक पहचान दिलाई और उस पद की करेंसी का इतना बोलबाला है कि जो पहले असंभव-सा दिखता था, आज हर वैश्विक मंच पर संभव हो गया है।

इसलिए, मोदी पर ऐसे आरोप बेकार और मिसप्लेस्ड हैं। अब चुनाव चल रहे हैं। आपके विरोधी लगातार आप पर वैसे आरोप लगा कर आपकी छवि भ्रष्टाचारी की बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो आपने किया ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर विपक्ष के नेता आपको चोर साबित करने पर तुले हों, और आप चुप्पी साधे बैठे रहेंगे?

इस देश के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत एक बहुमत की सरकार है। उस मायने में फ़िलहाल मोदी और भाजपा ही सबसे सटीक विकल्प है। अगर यह विकल्प आपके या मेरे लिए नहीं भी है, फिर भी सत्तारूढ़ पार्टी तो सत्ता से बाहर जाना नहीं ही चाहेगी। इसलिए, उसकी सबसे पहली प्राथमिकता सत्ता को वापस पाना है।

विरोधी नीच हो, तो अच्छाई मारक हथियार नहीं हो सकती

सत्ता प्राप्ति की इस चुनावी जंग में जब विरोधी नीचता पर उतर आए, आपके सामने गायों की भीड़ हाँक दे और आप गौ माता को प्रणाम कर, अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे रख दें, तो आप अपना घर बचा नहीं सकते। भारत का इतिहास ही यही रहा है। हमने सब कुछ इसी मर्यादा के चक्कर में गँवाया है जबकि युद्ध में हर पैंतरा ज़ायज मान कर सामने वाले ने आक्रमण किया है।

इसलिए, विरोधियों की प्रत्यक्ष गाली, अपनी माँ और पत्नी पर किए गए हमले, अपनी ईमानदारी पर लगाए गए लांछन आदि के जवाब में, कोई नेता अगर सभ्य शब्दों में किसी के बाप को भ्रष्टाचारी नंबर वन भी न कहे तो दूसरा उपाय क्या है? वह अपने समर्थकों को क्या विपक्ष में बैठ कर, उन्हीं लुटेरों के हाथों शासित होने दे, जिन्होंने इस देश को बर्बादी के सिवाय और बहुत कुछ दिया नहीं?

आप गरिमा की बात कहाँ से ले आते हैं? क्या पूरा भार भाजपा और मोदी पर ही है? क्या कॉन्ग्रेस का हर शब्द ज़ायज है क्योंकि उसके पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड के दो लोगों की हत्या हो गई? हत्या हो जाने से वो संत हो गए जिन्होंने अपने परिवार को लूट का हिस्सेदार बनाया? लुटेरों के परिवार के लोग दूसरे को घोटालेबाज़ बताते हैं, और आप सोचते हैं कि सामने वाला मर्यादा का पालन करे?

इसे मर्यादा नहीं कायरता कहते हैं। मिथ्याचार को सहना स्वयं और समाज के साथ अन्याय करना है। सामने से आते तीर को यह कह कर छोड़ देना कि उनके खेमे का एक आदमी आधे घंटे पहले मरा है, मूर्खता है। वीरोचित व्यवहार यह है कि उस तीर को न सिर्फ नाकाम किया जाए, बल्कि तीर चलाने वाले को खोज कर, उसके सारे अस्त्र-शस्त्र छीन लिए जाएँ, उसका रथ तोड़ दिया जाए और उसे तीरों से बींध दिया जाए। हाँ, अंतिम संस्कार उसकी पारिवारिक मान्यताओं के साथ हो सके, इसलिए लाश सौंप दिया जाए।

आज हम समय के उसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ मुसलमान आक्रांताओं ने एक बार फिर रूप बदल लिया है, और गायों का झुंड हमारी तरफ छोड़ दिया है। वो जानते हैं कि वाजपेयी जी की भाजपा इन गायों को प्रणाम कर के, उनके सींगों में झुनझुने बाँधने में व्यस्त हो जाती। वो जानते हैं कि इस भाजपा का मूल चरित्र अभी भी वाजपेयी जी से कहीं न कहीं जुड़ा हुआ है। इसलिए वो अपनी शब्दों की गरिमा को लगातार गिराते जा रहे हैं, गायों की संख्या बढ़ा रहे हैं, और गढ़ों पर चढ़ाई भी कर रहे हैं।

विपक्ष इस नई भाजपा के सामने अपनी क़िस्मत आज़माने निकला था। पिछले चुनाव में भी उसे ‘पचास करोड़ की गर्लफ़्रेंड’ सुनने को मिला, और इस चुनाव में भी राहुल गाँधी को अप्रासंगिक बना कर, उसके भ्रष्टाचारी पिता को सामने लाकर, मोदी ने युद्ध के नियम पलट दिए। इस बार मोदी और भाजपा ने सारी गायें अपनी तरफ आने दी, उनको तबेले तक ले गए, उनका दूध पिया, और वापस दुगुनी ऊर्जा से उन पर चढ़ाई कर दी।

इसलिए, गरिमा की बात वही करे जिसने जीवन में कभी गाली न दी हो। वेश्या पर पत्थर वही चलाए जिसने पूरे जीवन में एक भी पाप न किया हो। मर्यादा की बात वही करें जो यह बात दावे के साथ कह सकते हैं कि उन्होंने विरोधियों के ऐसे पचासों बयान पर यह लिखा था कि नेताओं के मुँह से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते। जो ऐसा नहीं कर सकते, उन्हें टिप्पणी का भी अधिकार नहीं।

आप भाषा की मर्यादा और चुनावी माहौल में आरोपों को गिरते स्तर पर ज़रूर लेख लिखें, लेकिन केन्द्र में कटघरा सिर्फ एक ही नहीं होना चाहिए। मोदी के खिलाफ अगर कटघरे लगाने निकलेंगे तो एक कटघरे के सामने दसियों कटघरों में खड़े लोगों की भीड़ से पूरा मैदान भर जाएगा। इसलिए, दिन में दस बार माँ-बहन की गालियाँ देने वाले, मोदी विरोधियों की गालियों पर मज़े लेने वाले, विपक्ष के क्रूर शब्दों पर ख़ामोश रहने वाले, गरिमा की बात न करें।

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