दादी का घर घूमने वाली प्रियंका गाँधी ने कुछ ही दूर दादाजी फ़िरोज़ के क़ब्र को पूछा तक नहीं, जानिए क्यों?

अगर कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ गाँधी की बात करती है तो यह भी याद दिलाया जाएगा कि उन्ही की पत्नी इंदिरा गाँधी ने अपने पति के द्वारा बनवाए गए क़ानून को कचरे के डब्बे में फेंक दिया था। आपातकाल के दौरान इंदिरा ने अपने पति के नाम के इस क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी।

प्रियंका गाँधी रविवार (मार्च 17, 2019) की रात स्वराज भवन में गुजारी। इस दौरान ‘भावुक’ प्रियंका ने अपनी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को भी याद किया। उन्होंने बताया कि उनकी दादी बचपन में उन्हें ‘जॉन ऑफ ओर्क’ की कहानी सुनाया करती थी। लेकिन, प्रियंका गाँधी ने अपने दादाजी को याद करना मुनासिब नहीं समझा। आनंद भवन से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित फ़िरोज़ गाँधी की कब्र को प्रियंका ने वैसे ही नज़रअंदाज़ किया, जैसे राहुल व सोनिया करते आए हैं। ऐसे में प्रियंका गाँधी जब अपनी दादी की बात कर रही थी, लोगों द्वारा यह पूछना लाजिमी था कि वह अपने दादा को कब याद करेंगी? पारसी समुदाय से आने वाले फ़िरोज़ जहाँगीर गाँधी का निधन 8 सितंबर 1960 को हो गया था। फ़िरोज़ ने महत्मा गाँधी से प्रेरित होकर अपना सरनेम ‘गैंडी’ से ‘गाँधी’ कर लिया था।

प्रियंका गाँधी से पहले राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी भी फ़िरोज़ गाँधी के कब्र को नज़रअंदाज़ करते आए हैं। कॉन्ग्रेस के प्रथम परिवार सहित सभी बड़े नेता राजीव गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी की समाधी पर तो जाते रहे हैं लेकिन फ़िरोज़ गाँधी की समाधी को कोई पूछता तक नहीं। फ़िरोज़ के अलावा गाँधी परिवार के अन्य पूर्वजों की जयंती या पुण्यतिथि के मौके पर सभी बड़े कॉन्ग्रेसी नेताओं का जमावड़ा लगता है लेकिन फ़िरोज़ की जयंती और पुण्यतिथि कब आकर निकल जाती है, इसका पता भी नहीं चलता। उनका कब्र यूँ ही सूना पड़ा होता है, सभी मौसम में, बारहो मास। चुनावी मौसम में भी कॉन्ग्रेस द्वारा इंदिरा, राजीव और नेहरू तो ख़ूब याद किए जाते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी में फ़िरोज़ का नाम लेने वाला भी कोई मौजूद नहीं है।

ऐसा नहीं फ़िरोज़ गाँधी कॉन्ग्रेसी नहीं थे या राजनीति में उनकी हिस्सेदारी नहीं थी। गाँधी परिवार की परंपरागत सीट रायबरेली के पहले सांसद भी फ़िरोज़ गाँधी ही थे। 1952 में हुए स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1957 में भी उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। राजनीति में सक्रिय रहने वाले फ़िरोज़ गाँधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी काफ़ी मुखर थे। आप जान कर चौंक जाएँगे कि उनके विरोध के कारण प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कैबिनेट में वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। उस दौरान कॉन्ग्रेस नेताओं के बड़े उद्योगपतियों के साथ अच्छे-ख़ासे सम्बन्ध बनने लगे थे, जिसका फ़िरोज़ ने भरपूर विरोध किया था।

- विज्ञापन - - लेख आगे पढ़ें -

क्या कॉन्ग्रेस इसीलिए फ़िरोज़ गाँधी को याद नहीं करना चाहती क्योंकि उनका नाम आते ही उनका नेहरू सरकार की आलोचना करना फिर से प्रासंगिक हो जाएगा? क्या कॉन्ग्रेस इसीलिए फ़िरोज़ को याद नहीं करना चाहती क्योंकि उनका नाम आते ही उनके कारण नेहरू के मंत्री के इस्तीफा देने की बात फिर से छेड़ी जाएगी? क्या कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ खान की बात इसीलिए नहीं करना चाहती क्योंकि बड़े कॉंग्रेस नेताओं व उद्योगपतियों के बीच संबंधों की बात फिर से चल निकलेगी? जब उनका नाम आएगा, तो इतिहास में फिर से झाँका जाएगा। अगर उनका नाम आएगा तो उनके सुनसान कब्रगाह की बात आएगी, कॉन्ग्रेस नेताओं व गाँधी परिवार की थू-थू होगी। अब कॉन्ग्रेस चाह कर भी फ़िरोज़ गाँधी की प्रासंगिकता को ज़िंदा नहीं करना चाहेगी क्योंकि उनसे सवाल तो पूछे जाएँगे।

फ़िरोज़ गाँधी की सूनी पड़ी कब्र

आपको बता दें कि पारसी फ़िरोज़ गाँधी का अंतिम संस्कार पूरे हिन्दू रीती-रिवाजों के साथ किया गया था। बीबीसी के अनुसार, उन्होंने कई बार अंतिम संस्कार के पारसी रीति-रिवाजों से नाख़ुशी जताई थी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका क्रिया-कर्म हिन्दू तौर-तरीकों से ही किया जाए। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने राहुल गाँधी को उनके दादा की याद दिलाई। जनवरी 2019 में शर्मा ने राहुल गाँधी को कुम्भ में आने का आमंत्रण देते हुए उन्हें फ़िरोज़ गाँधी के कब्रगाह पर मोमबत्ती जलाने की सलाह दी थी। शर्मा ने कहा था कि राहुल के ऐसा करने से दिवंगत आत्मा को शांति मिलेगी, फ़िरोज़ गाँधी की कब्रगाह भी प्रयागराज में ही है।

पारसी कब्रगाह के एक कोने में फ़िरोज़ गाँधी की कब्र अभी भी आगुन्तकों की बाट जोह रही है। राहुल गाँधी शायद एक-दो बार वहाँ जा चुके हैं लेकिन पिछले 8 वर्षों से शायद ही गाँधी परिवार का कोई व्यक्ति वहाँ गया हो। पिछले एक दशक में प्रियंका गाँधी के वहाँ जाने के कोई रिकॉर्ड नहीं हैं। आलम यह है कि कब्रिस्तान की रखवाली के लिए एक चौकीदार है जिसके रहने के लिए दो कमरे बने हुए हैं। इसके अलावा कब्रिस्तान में एक कुआँ और एक मकान है। कब्र और कब्रिस्तान की स्थिति जर्जर हो चुकी है। अपने ही परिवार की उपेक्षा के कारण यह स्थिति हुई है। कहा जाता है कि 1980 में उनकी बहू मेनका गाँधी ने यहाँ का दौरा किया था। मेनका गाँधी अभी मोदी कैबिनेट में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।

अगर कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ गाँधी की बात करती है तो यह भी याद दिलाया जाएगा कि उन्ही की पत्नी इंदिरा गाँधी ने अपने पति के द्वारा बनवाए गए क़ानून को कचरे के डब्बे में फेंक दिया था। नेहरू काल में नियम था कि संसद के भीतर कुछ भी कहा जा सकता था लेकिन अगर किसी पत्रकार ने इस बारे में कुछ लिखने या बोलने की कोशिश की तो उसे सज़ा तक मिल सकती थी। इसे हटाने के लिए फ़िरोज़ गाँधी ने संसद में प्राइवेट मेम्बरशिप बिल पेश किया। बाद में इस क़ानून को फ़िरोज़ गाँधी प्रेस लॉ के नाम से जाना गया। आपातकाल के दौरान इंदिरा ने अपने पति के नाम के इस क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी। क्या कॉन्ग्रेस को इस बात के चर्चा में आने का डर है? बाद में विरोधी जनता पार्टी की सरकार ने इस क़ानून को फिर से लागू किया। इस तरह से फ़िरोज़ गाँधी को अपनों ने ही दगा दिया, विरोधियों ने अपनाया।

क्या कारण है कि देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवार के पूर्वज की कब्रगाह पर कचरों का ढेर लगा पड़ा है? दशकों तक केंद्र से लेकर यूपी तक कॉन्ग्रेस की सरकार रही लेकिन फ़िरोज़ गाँधी उपेक्षित क्यों रहे? सवाल तो पूछे जाएँगे। प्रियंका से भी पूछे जाएँगे। दादी को याद कर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाली प्रियंका को दादा को याद करने से शायद कोई राजनीतिक फ़ायदा न मिले। अफ़सोस कि भारत में एक ऐसा भी परिवार है जो अपने पुरखों को याद करने के मामले में भी सेलेक्टिव है। आशा है कि प्रियंका गाँधी उत्तर प्रदेश कैम्पेन के दौरान एक न एक बार तो फ़िरोज़ गाँधी की समाधी पर ज़रूर जाएँगी।

शेयर करें, मदद करें:
Support OpIndia by paying for content

यू-ट्यूब से

बड़ी ख़बर

इनकी सावरकर से दुश्मनी केवल इसलिए है क्योंकि वह हिंदूवादी थे, और कॉन्ग्रेस की राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण की है। हिन्दूफ़ोबिया इनकी वैचारिक नसों में है, तो इसलिए हिन्दू हितों की बात करने वाले को खलनायक या कमज़ोर दिखाना तो हिन्दूफ़ोबिया की तार्किक परिणति होगा ही।

ज़्यादा पढ़ी गईं ख़बरें

पति ने TIK-TOK चलाने से किया मना, पत्नी ने की आत्महत्या, रिकॉर्ड किया मौत का वीडियो

24 वर्षीय अनीता की शादी 29 साल के पलानीवेल के साथ हुई थी। उनके चार साल की एक बेटी और दो साल का एक बेटा भी है।
दीदी, सुरक्षा दो या इस्तीफा

सईद की मौत पर 200 दंगाईयों को बुलाकर डॉक्टरों पर हमला करने वालों को ममता क्यों बचा रही है?

पथराव शुरू हुआ, डॉक्टरों पर जानलेवा हमले हुए तो पुलिस ने क्यों नहीं रोका? क्यों डॉक्टरों की जान बचाने के लिए दंगाईयों पर नियंत्रण के लिए कड़ी कार्रवाई नहीं की गई? जवाब हम सब को पता है। क्योंकि हमलावर मुसलमान थे- अगर उन्हें कुछ हो जाता तो ममता के वोट बैंक को खतरा था।
दि प्रिंट और दीपक कल्लाल

सेक्स ही सेक्स… भाई साहब आप देखते किधर हैं, दि प्रिंट का सेक्सी आर्टिकल इधर है

बढ़ते कम्पटीशन के दौर में सर्वाइवल और नाम का भार ढोते इन पोर्टलों के पास नग्नता और वैचारिक नकारात्मकता के अलावा फर्जीवाड़ा और सेक्स ही बचता है जिसे हर तरह की जनता पढ़ती है। लल्लनपॉट यूनिवर्सिटी से समाज शास्त्र में पीएचडी करने वाले ही ऐसा लिख सकते हैं।
कमांडो निराला (फाइल फोटो)

देश के लिए बलिदान हुए थे कॉर्पोरल निराला, गरुड़ कमांडो ने पैसे जुटाकर कराई बहन की शादी

कमांडो निराला की बहन की शादी के लिए गरुड़ कमांडो यूनिट ने आपस में चंदा कर ₹5 लाख इकठ्ठा किए थे। यही नहीं, शादी की रस्म पूरी करने के लिए कमांडोज़ ने शादी में शिरकत भी की।

NDTV के प्रणय रॉय और राधिका रॉय को झटका, SEBI ने 2 साल के लिए किया बैन

NDTV पिछले कई सालों से वित्तीय अनियमितताओं और टैक्स फ्रॉड के कारण जाँच एजेंसियों के रडार पर थी। सेबी ने सिक्योरिटी एक्सचेंज मार्केट में लेन-देन और NDTV मैनेजमेंट में किसी भी पोस्ट से 2 साल के लिए बाहर कर दिया है।
सावरकर (साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

सावरकर ‘वीर’ तब तक नहीं होंगे जब तक हिन्दू अपनी कहानियाँ खुद सुनाना नहीं सीखते

इनकी सावरकर से दुश्मनी केवल इसलिए है क्योंकि वह हिंदूवादी थे, और कॉन्ग्रेस की राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण की है। हिन्दूफ़ोबिया इनकी वैचारिक नसों में है, तो इसलिए हिन्दू हितों की बात करने वाले को खलनायक या कमज़ोर दिखाना तो हिन्दूफ़ोबिया की तार्किक परिणति होगा ही।

सरकारी डॉक्टर की जान बनाम मुस्लिम वोटबैंक को निहारती निर्मम ममता जो दंगे पीती, खाती और सोती है

ये भीड़ इतनी जल्दी कैसे आती है, कहाँ हमला करती है और किधर गायब हो जाती है? क्या पुलिस ने नहीं देखा इन्हें? क्या हॉस्पिटल में सुरक्षा के लिए पुलिस आदि नहीं होती या फिर इस पहचानहीन भीड़ का सामूहिक चेहरा ममता की पुलिस ने पहचान लिया और उन्हें वो करने दिया जो वो कर गए?
ममता बनर्जी

घमंडी, फासीवादी, सांप्रदायिक, स्वेच्छाचारी, हिंसक, असंवैधानिक, तानाशाह, भ्रष्ट, अलगाववादी: यही हैं ममता

यह इकोसिस्टम कुतर्क में उस्ताद है। बंगाल की हर हिंसा में तृणमूल के साथ बराबर का भागीदार भाजपा को बना देता है। सांप्रदायिकता में भी यही रवैया अपनाता है।
अमित शाह, जदयू प्रवक्ता

अमित शाह और BSF को कोसने के बाद JDU प्रवक्ता ने खुद दिया इस्तीफ़ा

11 तारीख़ को आलोक ने ट्विटर पर एक पोस्ट किया था। इस पोस्ट में उन्होंने बांग्लादेशी शरणार्थियों के मुद्दे पर गृह मंत्री अमित शाह पर तंज कसा था। साथ ही एक ट्वीट में उन्होंने बीएसएफ अधिकारियों पर भी निशाना साधा था।
सौम्या पुष्पाकरन की हत्या

पुलिसकर्मी एजाज़ ने सिविल पुलिस अधिकारी सौम्या पर तलवार से हमला कर जलाया

आग लगने से सौम्या की मौक़े पर ही मौत हो गई जबकि एज़ाज 40 फ़ीसदी तक जल गया। फ़िलहाल, उसे अलाप्पुझा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कराया गया।

ताज़ा ख़बरें

हमसे जुड़ें

50,219फैंसलाइक करें
8,766फॉलोवर्सफॉलो करें
69,736सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

ज़रूर पढ़ें

शेयर करें, मदद करें: