जब सूट-बूट वाली सरकार ने आम आदमी को वो दिया जो उन्हें 50 साल पहले मिलना था

प्रोपैगंडा-परस्त मीडिया तंत्र जब सुनता है कि देश में पूर्ण विद्द्युतिकरण हो चुका है, तो यह ऐसे बिजली के खम्बे की तस्वीर ले आता है जिसमें जंग लगा हो। यह शिकायत लेकर विशेष चर्चा बिठाता है कि प्रधानमंत्री ने शौचालय तो बना दिए लेकिन वहाँ जाकर पानी नहीं डाल रहे हैं।

एक ओर जहाँ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का मानना था कि स्वच्छता आज़ादी से ज़्यादा ज़रूरी है, वहीं देश में एक ऐसा गिरोह आज खड़ा हो चुका है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और समस्त मंत्रालय द्वारा की जाने वाली समाज की बेहद बुनियादी जरूरतें और उनको लेकर की गई पहल हास्यास्पद और गैरज़रूरी नज़र आती हैं।

विपक्ष, खासकर कॉन्ग्रेस मोदी सरकार को उन सभी योजनाओं को लेकर मजाक बनाती आई है, जिन्हें वर्तमान सरकार देश के उस आख़िरी नागरिक को ध्यान में रखकर शुरू करती है, जो आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी सरकारी योजनाओं से वंचित रहा है।

चाहे जन-धन योजना हो, स्वास्थ्य बीमा हो, मुद्रा योजना हो, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा हो या फिर सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला स्वच्छ भारत अभियान का मुद्दा हो, विपक्ष हमेशा यही कहता नज़र आता है कि यह सरकार सिर्फ़ पूँजीपतियों का ध्यान रखती है।

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विपक्ष के इस वाक्य में ही विरोधाभास है कि यदि यह सरकार स्वरोजगार को बढ़ावा देती है, कन्याओं के लिए शिक्षा पर बात करती है, स्वास्थ्य बीमा के मुद्दे लाती है, कौशल विकास कार्यक्रम चलाती है, और गरीब को स्वच्छता के साधन उपलब्ध कराती है तो फिर स्पष्ट है कि यह सरकार पूँजीपतियों से पहले देश के आम नागरिक की हितैषी है। ख़ासतौर से उस व्यक्ति की हितैषी जो इतने वर्षों तक अपने पैसे के रखरखाव और आर्थिक रूप से समर्थ हो पाने के लिए एक बैंक खाता तक नहीं रख सका था।

महात्मा गाँधी संविधान सभा के सदस्य नहीं थे, लेकिन उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को एक ‘ताबीज़’ दिया था, यह ताबीज़ कुछ और नहीं बल्कि गाँधी जी की वह राय थी जिसमें वे चाहते थे कि संविधान ‘अन्त्योदय’ और ‘सर्वोदय’ के सिद्दांतों के साथ तैयार किया जाए। लेकिन हालात ये हैं कि अगर प्रधानमंत्री उदहारण के लिए भी सड़क पर पकोड़े तलने वाले का ज़िक्र भी कर दें तो यह हास्य का विषय बन जाता है, इसका कारण यह है कि आज तक हमें इन विषयों पर नहीं बल्कि इटली के महँगे भोजनालयों पर चर्चा करने की आदत रही है। ये हँसने वाले लोग वास्तव में वो लोग हैं जिन्होंने गरीबी को कभी महसूस नहीं किया है और शाही रजवाड़ों में पैदा हुए हैं। एक गरीब व्यक्ति अपना और परिवार का पेट भरने के लिए किन संघर्षों का सामना करता है, ये इन बातों से ताल्लुक नहीं रखते हैं। इन्हें ‘भी’ और ‘ही’ का अंतर मालूम नहीं है।

अगर देखा जाए तो 2014 के आम चुनावों ने इस देश को पहली बार ऐसा प्रधानमंत्री दिया, जो देश के इस सबसे वंचित वर्ग के प्रति संवेदनशील दिखता है। यह प्रधानमंत्री चाहता है कि गरीब व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम बने, उसका अपने धन पर अधिकार हो, उसका परिवेश साफ़ हो, समाज में लैंगिक समानता हो, उसकी बिटिया स्कूल जा सके, युवा स्वरोज़गार का रास्ता पकड़कर अपने लिए और दूसरों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा कर सके।

परिवारवाद में लिप्त यह विपक्ष कहीं ना कहीं इस बात से परेशान है कि राजनीति में ऐसे लोग आ चुके हैं जो इस परिवेश को जी कर आए हैं, और जो वास्तव में देश के आम आदमी का चेहरा है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री स्वयं को देश का चौकीदार कहता है। इस देश की जनता इन्हीं वजहों से इस प्रधानमंत्री को अपना नेता मानती है, क्योंकि उसे यहीं पर उस ‘एलीटिज्म’ की काट मिल जाती है जिसके नीचे वो वर्षों रह चुका है।

यदि हम कौशल विकास योजना की बात करें तो इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण मेरे सामने अपने ही गाँव के गोपाल का आता है। गोपाल लगभग 17-18 साल का लड़का, जो बड़ी मुश्किल से अपनी पढ़ाई बारहवीं तक भी पूरी कर पाया है, उसके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी बेहतर नहीं रही है कि वो आगे कोई डिप्लोमा या स्नातक करने के बाद नौकरी के लिए आवेदन करने लायक हो सके।

मैं अपने गाँव और आसपास के तमाम ऐसे परिवारों की 2 पीढ़ियों को जानता हूँ, जिनमें ऐसे लड़कों पर घर से दबाव रहता है कि वो अपने गाँव से बहुत दूर कहीं जाकर अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर सकें। नतीजा होता है कि लड़के या तो घर से भाग जाते हैं, या फिर शादी कर के घर बसाकर अपने उसी दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाते हैं जैसा उसकी पिछली पीढ़ियाँ करती आई हैं। यानी इस युवा के पास सपने देखने का अधिकार इसकी गरीबी और अवसरों की असमानता छीनती आई है।

इस बार जब गोपाल मुझे मिला तो उसने बताया कि स्किल इंडिया प्रोग्राम की मदद से अब वो इलेक्ट्रिशियन का काम करता है और उसने सरकार से लोन लेकर अपना खुद का बिज़नेस भी शुरू कर दिया है।

मैं आश्चर्यचकित था कि आखिर उसने ये सब कैसे किया, जहाँ एक 17-18 साल के युवा के सामने रोज़गार जैसे विकल्प तक मौज़ूद नहीं थे, ना ही इस बारे में सोच पाने तक की आज़ादी थी, वहीं अब उसके पास अपनी एक पूरी टीम है। यह एक बेहद छोटा-सा उदाहरण उत्तराखंड के एक दूरस्थ इलाके का है, तो मेरा मानना है कि ये योजनाएँ तो बेशक़ जनता के लिए वरदान से कम नहीं हैं।

दुखद पहलू यह है की वर्तमान समय में देश का विपक्ष और प्रोपैगंडा-परस्त मीडिया तंत्र जिस शिद्दत से मोदी सरकार की योजनाओं को विफल साबित करने में लगा है, यदि उसका 1% भी वो इन योजनाओं को वंचितों तक पहुँचाने का काम करें, तो वाकई में देश की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।

लेकिन हालात एकदम उलट हैं, यह प्रोपैगंडा-परस्त मीडिया तंत्र जब सुनता है कि देश में पूरी तरह से विद्द्युतिकरण हो चुका है, तो यह जाकर ऐसे बिजली के खम्बे की तस्वीर लेने अपने पत्रकारों को भेज देता है जिसमें जंग लगा हो। यह शिकायत लेकर विशेष चर्चा बिठाता है कि प्रधानमंत्री ने शौचालय तो बना दिए लेकिन वहाँ जाकर पानी नहीं डाल रहे हैं, प्रधानमंत्री लोन तो दिला रहे हैं लेकिन लोन घर तक चलकर नहीं आ रहा है, देश में बाग़ तो हैं लेकिन बहार गायब है।

सवाल सीधा सा है कि क्या यह तंत्र वाकई में समाज की बदलती तस्वीर देखकर खुश होता है?
जवाब भी एकदम सीधा सा है कि नहीं, यह तो उस जंज़ीर से बंधा है जिसमें इनके पसंदीदा अवार्ड देने वाले लोग सत्ता में नहीं बैठे हैं या जो इन्हें शाबासी देते आये हैं। इसलिए इनकी दुविधा और छटपटाहट समझ आती है।

मैं व्यक्तिगत रूप से ‘स्वच्छ भारत मिशन’ प्रधानमंत्री के इस कार्यकाल की सबसे बड़ी सफलता मानता हूँ। आज से लगभग 2500BC पहले हड़प्पा सभ्यता के दौरान हम लोग इतने जागरूक थे कि भारत में उस समय पानी के माध्यम से संचालित होने वाला शौचालय लोथल में मौज़ूद था। जिसे हम दिल्ली स्थित सुलभ इंटरनेशनल म्यूजियम में देख सकते हैं।

हड़प्पा सभ्यता के नगर, लोथल में पानी से संचालित होने वाला Toilet प्राप्त हुआ था। ईंट और चिकनी मिट्टी से बने इन शौचालयों में मेनहोल और चैंबर हुआ करता था, जहाँ जाकर मल इकठ्ठा होता था।

वहीं देश ने एक ऐसा भी दौर देखा जिसमें महिलाओं और पुरुषों को शौच के लिए सुबह 4-5 बजे अँधेरे में उठकर खेतों में जाना होता है और यह समस्या आज तक देश के कई ग्रामीण इलाकों में जस की तस विद्यमान है।

इस बारे में विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल ने 1964 में आई अपनी पुस्तक ‘An Area of Darkness’ में अपने अनुभव लिखे हैं। नायपॉल ने लिखा है कि भारतवासी कहीं भी शौच कर सकते हैं: चाहे वह रेलवे ट्रैक हो, बस अड्डा, समुद्र का किनारा, पहाड़ी, सड़कें या नदी का किनारा। भारतीयों को खुले में शौच करने से कोई परहेज नहीं होता।

हमें शौचालय के प्रयोग और स्वछता के महत्व को समझने में 50 वर्षों से अधिक का समय लगा। शौचालय को लेकर मनःस्थिति में परिवर्तन आज से 5 वर्ष पूर्व देखने को मिला था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं आगे आकर स्वच्छ भारत अभियान का नेतृत्व किया था। स्वच्छ भारत अभियान के पीछे सरकार की मंशा यह थी कि लोगों की मानसिकता में परिवर्तन हो।

हर घर शौचालय के मिशन ने लोगों के स्वाभिमान को पहचाना और उस दिशा में कार्य किया। इस मुद्दे पर अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ भी दर्शकों के सामने आ चुकी है। घरों में शौचालय निर्माण समाज का एक भावनात्मक पहलू है, जिसे पहचानने में हमें इतने साल लगे।

यदि मैं अपना उदाहरण दूँ तो उत्तराखंड के एक गाँव में रहने वाले एक परिवार ने जब साल 1990 में पहली बार शौचालय बनाया था तो लोगों में यह एक हँसी का विषय बन गया था। हास्य का विषय ये इसलिए था क्योंकि उनका मानना था कि आख़िर घर के अंदर कोई ‘झाड़’ (शौच) कैसे कर सकता है?

1990 का वह समय था और आज का समय है जब लोगों को यह महसूस हुआ कि शौच वास्तव में बेहद व्यक्तिगत विषय हो सकता है और खुले आसमान में शौच करने के लिए जाना स्वाभिमान का विषय हो सकता है। वरना इतनी पीढ़ियाँ इस अन्धकार में गुजर गईं कि ‘आसमान के नीचे यह प्रक्रिया नहीं हुई तो तो शौच होगी तक नहीं’। पिछले कुछ वर्षों में इस जागरूकता ने जोर पकड़ा है। हालाँकि, अभी भी एक वर्ग है जो मानता है कि उसे घर के भीतर बने किसी शौचालय में मलत्याग नहीं करना चाहिए।

यह सब पढ़ने और सुनने में हस्यास्पद लग सकता है, लेकिन उन लोगों के बारे में सोचिए और उन महिलाओं के बारे में सोचिए जिन्हें शौच आदि के लिए जंगलों में जाना होता है। जहाँ सुबह अँधेरे में बाघ और भालू का भी डर रहता है। और जिस दिशा में पुरुष गए हों उन्हें उस दिशा में भी नहीं जाना है।

लड़कियाँ स्कूल सिर्फ इस कारण नहीं जाना चाहती हैं क्योंकि वहाँ उनके पास शौचालय जाने जैसे सुविधाएँ ही नहीं मिल पाती हैं। उन्हें उन तमाम मनोवैज्ञानिक असुविधाओं से गुजरना होता है, जिनके बारे में हम कल्पना तक नहीं कर सकते हैं।

शौचालय बेटियों को शिक्षा से जोड़ने की समस्या का सिर्फ़ एक हिस्सा था, लेकिन हाल ही में अपने राजनीतिक विरोधाभासों के कारण मीडिया यह समाचार लेकर आया कि सरकार अपनी योजनाओं में रुपया खर्च कर रही है। लेकिन इसमें बुराई भी क्या ?

अगर एक परिवार सिर्फ इसलिए रुपए खर्च कर सकता है ताकि वो अपने पूर्वजों के नाम के इश्तिहार छपवा सके, तो क्या बुराई है कि सरकार की बेहद मूलभूत और जरूरी योजनाओं को उनके असल हकदारों तक पहुँचाने के लिए प्रयास किए जाएँ। यह बेहद छोटे मुद्दे हैं जिन्हें वर्तमान प्रधानमंत्री ने प्रकाश में लाने का काम किया है।

शौचालय जैसे विषयों पर यातायात का ये हाल था कि अगर पश्चिम बंगाल के ओखिल चंद्र सेन की ‘प्रसाधन सम्बन्धी’ समस्याओं के कारण ट्रेन ना छूटती तो शायद ट्रेन में शौचालय आज तक ना होते। हुआ यूँ कि साल 1909 तक भारत के ट्रेनों में शौचालय नहीं हुआ करता था और ओखिल चंद्र सेन ट्रेन से सफर कर रहे थे। उस समय यात्री गाड़ी रुकने के दौरान ही खुले में शौच के लिए जाया करते थे, ऐसे में कई बार ट्रेन भी छूट जाया करती थी।

सेन साहब शौच के लिए बाहर निकले और गार्ड की सीटी सुनने के बाद खुद को संभाल नहीं सके और गिर पड़े। ओखिल सेन ने चिट्ठी लिखकर इस बात की सूचना रेलवे ऑफिस को दी थी। मज़ेदार तरीके से लिखी गई इस चिट्ठी में टॉयलेट न होने के कारण परेशानियों का ज़िक्र था। इसके बाद से ही ट्रेन में टॉयलेट की सुविधा दी जाने लगी, ये चिट्ठी अब भी रेलवे म्यूजियम दिल्ली में रखी गई है।

वर्तमान आँकड़े बताते हैं कि स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत अब तक देश भर में 9 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए जा चुके हैं। 2014 में देश में सैनिटेशन कवरेज 39% था, जो अब बढ़कर 98% तक पहुँच चुका है।

स्वच्छता और शौचालय अब ऐसे विषय बन गए हैं, जिन पर बात होती है, फ़िल्म बनती है, प्रशंसा और आलोचना भी होती है। इस दृष्टि से अब हम खुले में शौच करने के कारण होने वाली बीमारियों के प्रति सचेत हो चले हैं। मानसिकता में यह परिवर्तन जो स्वतंत्रता के इतने वर्षों तक नहीं आया था अब दिखने लगा है।

ऐसा भी नहीं कि यह एकदम से आया और इसके लिए केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही ज़िम्मेदार हैं। इसके लिए सारा परिवेश और समाज जिम्मेदार है, जो देर से ही सही लेकिन अपने स्वाभिमान और अधिकारों के प्रति जागरूक हुआ है।

इस तरह से हम देखते हैं कि स्वच्छता एक बहुत ही व्यापक मुद्दा है, जो मात्र घर की साफ़-सफाई से ही नहीं बल्कि हमारे स्वास्थ्य और शिक्षा से लेकर सभी पहलुओं को भी प्रभावित करने में सक्षम है।

देश का मीडिया तंत्र को चाहिए कि बजाए देश के शीर्ष नेतृत्व को नीचा दिखाने और उसके ख़िलाफ़ झूठे आँकड़े एकत्रित कर अफ़वाह और भ्रम फैलाने के, वो इन योजनाओं को अपने संचार के माध्यम से लोगों तक पहुँचाएँ। सूचना के सभी तरीकों की प्राथमिकता होनी चाहिए कि वह आम आदमी को जागरूक कर सके कि देश में क्या चल रहा है ताकि वो उस खाई को कम कर सके और मुख्यधारा से स्वयं को जोड़ सके।

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