डियर दीपिका! नकली पलकों पर भाप की बूंदे टिका कर नौटंकी करना बंद करो

ये तो न कहिए कि ये अचानक हुआ और दीपिका का मन हुआ कि वो जाने कि क्या चल रहा है। शाहीन बाग खत्म हो चुका था, JNU में मीडिया थी, पीआर एजेंसी के लिए सिर्फ जगह बदलनी थी। दीपिका का ट्रैक रिकॉर्ड देख लीजिए कि पद्मावत से दुबई तक, उसने कैसे विवादों को तैयार किया है। उसने दो शब्द भी नहीं बोले, क्यों?

ब्रेव स्टोरी कहेंगे! एसिड अटैक विक्टिम जैसे विषय को छूने के लिए हिम्मत चाहिए। ऐसे विद्रूप चेहरे के साथ पर्दे पर आना अपने आप में एक बेहतरीन जज्बा है। दीपिका पादुकोण को सलाम!

कुछ विषय ऐसे होते हैं जो अपनी पूर्णता में ही प्रतिफलित हों, तभी उनके साथ न्याय हो पाता है। जैसे कि आप किसी जघन्य बलात्कार पीड़िता की कहानी कह रहे हों, तो उसके लिए फिल्ममेकिंग से ले कर, पर्दे पर आने तक और कई बार उसके बाद भी, आप उस विषय के साथ जो भी करते हैं, वो सोच-समझ कर करना होता है।

हमारा समाज ऐसा है कि रूपा गांगुली को सिगरेट पीता नहीं देख पाता और नितीश भारद्वाज को जहाँ देखता, वहीं प्रणाम करने लगता है। यहाँ हम जो विषय उठाते हैं, जो कहानी कहते हैं, और अगर सोच शुद्ध हो तो फिर उसमें छठ के पारण जैसी तन्मयता चाहिए।

- विज्ञापन - - लेख आगे पढ़ें -

सोचिए उस एसिड अटैक विक्टिम के बारे में अब। सोचिए कि दीपिका के एक गलत कदम (विषय के लिए गलत, फिल्म के लिए मास्टरस्ट्रोक) से उन तमाम लोगों को कैसा लग रहा होगा जिसने इस विषय को ले कर उम्मीद बनाई थी। ये एक राजनैतिक विषय नहीं है। ये घोर सामाजिक विषय है।

दीपिका को स्पाइस पीआर की टीम ने कहा कि आपको बस खड़े होना है, पोस्टर पहले से तैयार थे: ‘हीरो इन रील लाइफ़, हीरो इन रीयल लाइफ़’ लिख कर। ट्वीट फ्रेम किए जा चुके थे। दीपिका वहाँ पहुँचती है, इधर ट्विटर पर घंटे भर के भीतर, एक ही टेक्स्ट और पोस्टर के साथ अचानक ‘सपोर्ट दीपिका’ ट्रेंड होने लगता है।

इस सबमें एसिड अटैक गायब हो जाता है। अब वहाँ बस एक फिल्म बची है जिसका प्रमोशन होना चाहिए। जब आप ‘हीरो’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो आपको ध्यान रहना चाहिए कि किसके लिए कर रहे हैं। देखिए कि दीपिका वहाँ जले चेहरे वाली कहानी कहने गई है, या बस कहानी कहने गई है।

मैं ये नहीं कह रहा कि फिल्म वाले प्रमोशन न करें, या वो मुद्दों पर राय न रखें। बिलकुल रखें, बिलकुल प्रमोशन करें, संवैधानिक अधिकार हैं दोनों। लेकिन हाँ, फिर ‘हीरो’ मत बनो समाज के। विशुद्ध व्यवसायी रहो। हमें उससे समस्या नहीं है।

यहाँ जब विचारशून्यता में फाउंडेशन पोत कर, मलिन आत्मा और श्वेत चेहरे के साथ, उन जगहों पर खड़े हो जाते हो, बिलकुल समय देख कर, तब सब साफ़ दिखता है। CAA/NRC तो लम्बे समय से चल रहा है, JNU में फीस वृद्धि का मामला भी डेढ़ महीने से चल रहा है। फिर ये चेहरा, उसी बनावटी दृढ़ता के साथ, क्यों नहीं दिखा?

क्योंकि PR में उसे ‘शीघ्रपतन’ या ‘प्रीमैच्योर इज़ेकुलेशन’ माना जाता है। तब कोई लक्ष्य नहीं सधता। तब आपको कोई हीरो नहीं मानेगा। इनसे तो भले स्वरा भास्कर और जीशान अयूब जैसे लोग हैं जो कम से कम लगातार प्रतिबद्धता तो दिखा रहे हैं जहरीली वामपंथी विचारधारा के प्रति।

किसको क्या देखना चाहिए, क्या नहीं, ये मैं नहीं बता सकता। लेकिन ये ध्यान रहे कि अनभिज्ञता में विवादों की घोड़ी चढ़ने वालों को समाज का प्रतिनिधित्व करने मत दीजिए। साथ ही, याद रखिए कि एसिड अटैक एक भयावह सत्य है हमारे दौर का, उस पर कुछ लोगों ने पानी डाल दिया है।

किसी ने कहा कि दीपिका बहुत जेन्यून तरीके से आई और बिना टीम को बताए जेएनयू पहुँच गई ताकि वो समझ सके कि मुद्दा क्या है। हो सकता है कि समझने गई हो, इसमें कोई समस्या नहीं। हर उस व्यक्ति को हर उस मुद्दे पर जानकारी इकट्ठा करने की आवश्यकता है जो किसी भी बात पर, कुछ भी बोल देते हैं क्योंकि उनके व्हाट्सएप ग्रुप में वो मैसेज आया कि ‘फ्रेंड्स, लेट्स ट्वीट एंड ट्रेंड दिस’।

लोग एक्टर्स से, खिलाड़ियों से, बड़े नामों से हमेशा एक उम्मीद लगा कर बैठते हैं कि वो उनका मार्गदर्शन करें। लेकिन लोग आज के दौर में, जब वो यह भी कह दें कि ‘मुझे इसकी पूरी जानकारी नहीं’ तो भी उस पर धावा बोल दिया जाता है, तो अमूमन अधिकतर लोग विवादों से बचना चाहते हैं। विवादों से ऐसे लोग तभी तक बचते हैं, जब तक उन्हें विवादों की जरूरत नहीं होती।

विवादों की जरूरत उन्हें होती है जो चर्चा में रह कर पैसे कमा सकते हैं। जैसे कि क्रिकेटर चर्चा में रह कर पैसे नहीं कमा सकता। ज्यादा से ज्यादा बिग बॉस में जा सकता है। लेकिन फिल्मी दुनिया के लोग विवादों से खूब कमाई करते हैं। आज के समय में जब फिल्म की लागत के चौथाई से ले कर आधा तक प्रमोशनल बजट का हिस्सा हो जाता है, तब फ्री की पब्लिसिटी के लिए विवादों कि इस देश में कभी थप्पड़ खाया जाता है, कभी बहकी-बहकी बातें की जाती हैं, कभी वैसे मुद्दे पर उस जगह पर खड़े हो जाना होता है जिसके बारे में आपकी पीआर टीम को पता है कि यहाँ से ट्रेक्शन मिलेगा ही।

दीपिका ने वही किया। दीपिका जैसे लोगों का, जब तीन दिन बाद फिल्म रिलीज हो रही हो, कोई भी कदम, उसकी छींक और पिघलते मेकअप को टिशू से पोंछने का तरीका तक तय होता है और आप कह रहे हैं कि दीपिका अपनी इच्छा से JNU चली गई। JNU में हर महीने बवाल होता है, दीपिका भी शायद आती रहती होंगी, लेकिन उन्होंने पूरी फिल्म के दौरान, इस खाली समय में जब देश में कश्मीर हो गया, तीन तलाक हो गया, राममंदिर आ गया, नागरिकता कानून आ गया, NRC पर बवाल हुआ, जामिया में दंगे हुए… तब तक तो गहन चुप्पी थी।

हैदराबाद में बवाल हुआ, कुछ नहीं लिखा। कुछ नहीं बोला। तो क्या इतना आसान है यह मान लेना कि वो कन्सर्न्ड है? वो कन्सर्न्ड होती तो आज के दौर में वो फोन ले कर वीडियो बनाती रहती कि मुझे बताओ कि ये सब क्या हो रहा है, जामिया में क्या चल रहा है, अलीगढ़ में क्या हुआ। अंग्रेजी में इसको साइलेंस ऑफ़ कन्विनिएंस कहा जाता है, कि जब मन किया चुप रहे, जब मन किया बोल पड़े।

कुछ ही देर में खूबसूरत, पोस्टराइज्ड तस्वीरें, जिसे बनाने में समय लगता है, ट्विटर पर ‘बोल्ड इन रील, बोल्ड इन रीयल’ के कैनवस पर उतर आती हैं और हजारों लोग शेयर करने लगते हैं। पीआर एजेंसी घास नहीं छीलती, उनकी पूरी योजना होती है। वो अवसर पा कर अपना काम करते हैं। अगर JNU का यह कांड नहीं होता तो मैं दावे के साथ कहता हूँ कि दीपिका शाहीन बाग में बीस दिन की उम्मी हबीबा को गोद में लिए, 90 साल की असमा से गले लग कर ग्लिसरीन वाले आँसू बहाती रहती।

इसलिए ये तो न कहिए कि ये अचानक हुआ और दीपिका का मन हुआ कि वो जाने कि क्या चल रहा है। शाहीन बाग खत्म हो चुका था, JNU में मीडिया थी, पीआर एजेंसी के लिए सिर्फ जगह बदलनी थी। दीपिका का ट्रैक रिकॉर्ड देख लीजिए कि पद्मावत से दुबई तक, उसने कैसे विवादों को तैयार किया है। उसने दो शब्द भी नहीं बोले, क्यों?

स्टेटमेंट देती तो शायद पता चल जाता कि तैयारी तो जामिया नगर की थी, बोलना CAA/NRC पर था, यहाँ कहाँ ला कर रख दिया! इसलिए कहा गया कि दृढ़ता के साथ एक जगह तन कर खड़ी रहे, वो तस्वीर आइकॉनिक हो जाएगी, फिर बाकी समय में घायलों से भी मिले। नकली पलकों को कर्ल करने के बाद, इंडस्ट्री में इतने समय से होने पर, दो बूँद तो निकाल ही लेगी दीपिका… स्वरा भास्कर से तो वो भी नहीं ह पाया था, लेकिन वो तो अलग मुद्दा है।

मैं आपसे ये नहीं कह रहा कि आप इस फिल्म को मत देखिए। मैं बस यह कह रहा हूँ कि वो चाहते हैं, चर्चा हो और लोगों तक बात पहुँचे। आप इस पर बात ही मत कीजिए। मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं ये देख रहा हूँ कि हर बार वो जो चाहते हैं, ये नचनियों की इंडस्ट्री जो चाहती है, वही होता है। जब नचनियों की इंडस्ट्री कहता हूँ तो सोच-समझ कर कहता हूँ क्योंकि यहाँ मुद्दे पर या तो चुप्पी दिखती है, या फिल्म की रिलीज़ का समय देख कर लोग दार्शनिक बन जाते हैं। बात मत कीजिए, विराम दीजिए, बात खत्म हो जाएगी।

शेयर करें, मदद करें:
Support OpIndia by making a monetary contribution

बड़ी ख़बर

दिल्ली दंगे
इस नैरेटिव से बचिए और पूछिए कि जिसकी गली में हिन्दू की लाश जला कर पहुँचा दी गई, उसने तीन महीने से किसका क्या बिगाड़ा था। 'दंगा साहित्य' के कवियों से पूछिए कि आज जो 'दोनों तरफ के थे', 'इधर के भी, उधर के भी' की ज्ञानवृष्टि हो रही है, वो तीन महीने के 89 दिनों तक कहाँ थी, जो आज 90वें दिन को निकली है?

सबसे ज़्यादा पढ़ी गईं ख़बरें

ताज़ा ख़बरें

हमसे जुड़ें

155,450फैंसलाइक करें
43,324फॉलोवर्सफॉलो करें
179,000सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

ज़रूर पढ़ें

Advertisements
शेयर करें, मदद करें: