बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास की अमानवीय यातना की तस्वीर दिल दहलाने वाली है। इस यातना की हृदयविदारक तस्वीरें देखकर भारत का हर व्यक्ति, खासकर सनातनी हिन्दू, आक्रोश व्यक्त कर रहा है। 1971 में भारत ने पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश के वजूद को स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाई थी और आज 2025 में अंतत: यह देश भी पाकिस्तान की राह पर चला गया।
अब स्थिति यह है कि आज भारत के विरूद्ध पाकिस्तान और बांग्लादेश के मजहबी कट्टरपंथी और जिहादी एक मंच पर आ चुके हैं। पाकिस्तान में फौज- कठमुल्ला- मौलाना एवं मजहबी कट्टरपंथी- जेहादी गठजोड़ के आगे कभी ठीक से लोकतंत्र खड़ा ही नहीं हो पाया। ये दोनों पड़ोसी देश मिलकर भारत के लिए गंभीर धार्मिक-उन्मादी चुनौतियाँ पेश कर रही हैं।
भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश का यह द्वंद्व आखिर है क्या?
इसको समझने के लिए इन तीनों देशों के विभाजन एवं निर्माण की पृष्ठभूमि के साथ जनसांख्यिकी के आँकड़े की ओर ध्यान देना होगा। पाकिस्तान की स्थापना का सबसे बुरा दु:स्वप्न यह रहा कि मुस्लिम राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करने के लिए बने इस नये मुल्क में सिर्फ आधे मुस्लिम गए जबकि शेष भारत में ही रह गए।
अविभाजित भारत में 7.44 करोड़ मुस्लिम थे और 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक्त 3.90 करोड़ मुस्लिम ही पाकिस्तान गए जबकि 3.54 करोड़ भारत में रह गए। दिलचस्प बात यह है कि विभाजन के बाद भारतीय क्षेत्र में मौजूद 4.25 करोड़ मुस्लिमों में से सिर्फ 72 लाख मुसलमान ही पाकिस्तान गए, वहीं पाकिस्तान से 83 लाख हिन्दू-सिख भारत आए।
आँकड़ों के अनुसार, 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान यानि वर्तमान पाकिस्तान में हिन्दू आबादी 20% थी तो पूर्वी पाकिस्तान यानि वर्तमान बांग्लादेश में हिन्दू आबादी 28-30 प्रतिशत थी। 1947 में भारत की जनसंख्या 33-34 करोड़ के लगभग थी जिसमें लगभग 9.8% मुस्लिम थे।
अब 1951 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी, जिसमें हिन्दू 84.1% और मुसलमान 9.8% थे। 1951 में पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 7.5 करोड़ थी, जिसमें से पश्चिमी पाकिस्तान की आबादी 3.37 करोड़ थी और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) की जनसंख्या 4.2 करोड़ थी।
इसमें पश्चिमी पाकिस्तान में 98.4% मुस्लिम के अलावे कुल 2.9% गैर-मुस्लिम थे, जिसमें 1.6% हिन्दू आबादी थी। उसी प्रकार पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में 78% मुस्लिमों के अलावे 23.2% गैर-मुस्लिम थे, जिसमें 22% हिन्दू आबादी थी।
वर्तमान संदर्भ में भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश की जनसंख्या पर गौर करें तो 2023 में जारी पाकिस्तान सरकार के आँकड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या 24 करोड़ में 23.12 करोड़ यानि 96.35% मुसलमान थे। इसके अलावा हिन्दू आबादी 38 लाख यानि 1.61%, ईसाई आबादी 26 लाख यानि 1.37%, सिख आबादी सिर्फ 15,998 और पारसी 2348 बचे थे।
2022 में जारी बांग्लादेश सरकार के आँकड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या 16.5 करोड़ थी, जिसमें 15.03 करोड़ यानि 91% मुसलमान थे। इसके अलावा 1.31 करोड़ यानि 7.95% हिन्दू, बौद्ध 10 लाख यानि 0.61 प्रतिशत, 4.95 लाख यानि 0.30 प्रतिशत ईसाई बांग्लादेश में रहते हैं।
वहीं, भारत में 2024 के अनुमानित आँकड़ों के अनुसार जनसंख्या 145 करोड़ है, जिसमें हिन्दू 115.71 करोड़ यानि 79.8% संभावित हैं। वहीं मुस्लिम 20.59 करोड़ यानि 14.2%, ईसाई 3.33 करोड़ यानि 2.3%, सिख 2.46 करोड़ यानि 1.7%, बौद्ध 1.01 करोड़ यानि 0.7 प्रतिशत, जैन 0.58 करोड़ यानि 0.4 प्रतिशत और पारसी लगभग 50 हजार अनुमानित है।
1947 के बाद मुस्लिम आबादी बढ़ी, हिंदू आबादी घटी
उपर्युक्त आँकड़ों से भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश में 1947 से अबतक के हिन्दू एवं मुस्लिम आबादी की संरचना में बदलाव को आसानी से समझा जा सकता है। भारत में हिन्दू आबादी 84.1% से घटकर 79.8% हो गई तो मुस्लिम आबादी 9.8% से बढ़कर 14.2% हो गई।
पाकिस्तान में हिन्दू आबादी 20% से घटकर 1.61% हो गई तो बांग्लादेश की हिन्दू आबादी 28-30 प्रतिशत से घटकर 7.95 प्रतिशत हो गई। दिलचस्प बात यह है कि पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) में 1947 से 1951 के बीच ही हिन्दू आबादी 9.8% से घटकर 1.61 प्रतिशत हो गई थी और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में इस दौरान हिन्दू आबादी 28-30 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत हो गई थी।
हालाँकि, पाकिस्तान के आँकड़ें हमेशा थोड़े संदेह के घेरे में रहे हैं। लेकिन जारी आँकड़ों पर ही भरोसा करना होगा। यह भी जानना जरूरी है कि 1971 में बांग्लादेश के जन्म के वक्त बांग्लादेश की कुल आबादी लगभग 7.10 करोड़ थी, जिसमें अनुमानित हिन्दू आबादी 1.7 करोड़ यानि 20-22 प्रतिशत के लगभग थी।
भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के द्वंद्व की पृष्ठभूमि में धर्म निश्चित तौर पर रहा है क्योंकि राष्ट्र विभाजन का मुख्य कारण और आधार ही हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक विभाजन रहा है। यह भी कम दिलचस्प नहीं कि धर्म के आधार पर बँटे इन देशों में पाकिस्तान और बांग्लादेश जहाँ घोषित तौर पर इस्लामिक देश बने, वहीं भारत को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया।
सबसे बुरी स्थिति यह रही कि हिन्दू-मुस्लिम के धार्मिक भेदभाव के आधार पर बने पाकिस्तान के वजूद में आने के बाद भी भारत में 3.50 करोड़ से ज्यादा मुसलमान रह गए थे। सवाल भी यही है कि भारत का विभाजन पूरी तरह धार्मिक आधार पर जिन्ना ने स्वीकार कर पाकिस्तान बना लिया तो फिर गाँधी-नेहरू ने भारत में इसको पूरी तरह साकार क्यों नहीं होने दिया?
हकीकत है कि धार्मिक आधार पर बँटवारे के बावजूद गाँधी-नेहरू तो मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोकने में लगे थे और यहाँ तक की पाकिस्तान गए लोगों के वापस भारत आने का आह्वान भी कर दिया था। भारत ने मुसलमानों को भारत में रूकने का खुल्लम-खुल्ला विकल्प दिया, जिससे बड़ी संख्या में मुसलमान भारत में रूक भी गए।
क्या यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं कि धार्मिक आधार पर देश का बँटवारा हुआ और भारतीय हिस्से में रह रहे कुल मुसलमानों की सिर्फ 18% आबादी ही पाकिस्तान गई। यही नहीं, बँटवारे के बाद बड़ी संख्या में जो मुसलमान पाकिस्तान के बुरे हालात से निराश होकर भारत लौटे उन्हें तत्कालीन भारत सरकार ने नीतिगत निर्णय लेकर दुबारा भारत की नागरिकता प्रदान की।
साम्राज्यवादी ब्रिटेन द्वारा भारत के विभाजन की सबसे बड़ी दलील थी कि दो अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लोग एक साथ मिलकर नहीं रह सकते। लेकिन गाँधी-नेहरू जैसे नेताओं ने भारत का विभाजन तो करा ही दिया, विभाजन के कारणों को विफल कराकर भारत के समाज-राजनीति में मुस्लिम परस्ती एवं मुस्लिम तुष्टीकरण का स्थायी भाव जोड़ दिया।
समय के अंतराल में भारत के भीतर लंबे समय तक सफल होती रही तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की राजनीति ने देश को सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक तौर पर खोखला करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
स्वाभाविक सी बात है कि जब 1947 में लगभग 4 करोड़ मुस्लिम आबादी वाला पाकिस्तान आजतक लोकतांत्रिक नहीं बन पाया और 1971 में लगभग 5.5 करोड़ मुस्लिम आबादी वाले बांग्लादेश में भी लोकतंत्र ने दम तोड़ दिया है तो आज की तारीख में भारत लगभग 21 करोड़ मुस्लिम आबादी के साथ लोकतंत्र और समाज-राजनीति की किन गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा होगा, समझा जा सकता है।
पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में इस्लामिक धार्मिक कट्टरता ही राष्ट्रवाद का प्रयाय है, लेकिन इन दोनों देशों की उत्पत्ति जिस भारत के विभाजन से हुई है वहाँ हिन्दू सनातन धार्मिक चेतना को ही आजादी के बाद से ही संदेह एवं सवालों घेरे में डालने की कोशिश सामाजिक-राजनीतिक तौर पर होती रही है।
इन सबका मनोवैज्ञानिक तौर पर इतना बुरा प्रभाव पड़ा है कि एक आम सनातनी हिन्दू भी मौलाना टोपी लगाने में जितना गौरवान्वित महसूस करता है, उतना ही टीका लगाने एवं धार्मिक प्रतीकों के उपयोग से परहेज करने लगा है। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की बड़ी भूमिका भारत में सनातन हिन्दू धार्मिक चेतना को जीवंत करने में रही है।
भारत में लिबरल सॉफ्ट डेमोक्रेसी यानि नरम लोकतंत्र की जो नींव गाँधी-नेहरू ने डाली उसके कारण भारतीय राजनीति में मुस्लिम परस्ती या मुस्लिम तुष्टीकरण को धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया गया। लेकिन साथ ही, भारत की सांस्कृतिक विरासत, सनातन हिन्दू धार्मिक चेतना, राष्ट्रवादी विचाधारा को प्रकट करने वालों को सांप्रदायिक घोषित किया गया।
हाल के दिनों में पूरी दुनिया जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान सहित यूरोप के लगभग सभी देश बढ़ते इस्लामिक कट्टरपंथ एवं जिहादी मानसिकता के गिरफ्त में आता जा रहा है। पश्चिमी देशों में ग्रुमिंग गैंग इस मानसिकता की निम्नतम घटिया स्तर है जो भारत जैसे देश में बुर्का नकाबपोशी, लव जिहाद, लैंड जिहाद, धर्म परिवर्तन, आतंकवाद के सहारे अपने पैर पसार रहा है और पूरी रणनीति के साथ इस्लाम साजिशन विस्तार कर रहा है, जिसकी गिरफ्त में अपार्टमेंट- सोसाइटी, गली- मुहल्ले, गाँव- शहर, राज्य और देश आता जा रहा है।
भारत में लगभग 1 करोड़ रोहिंग्या, बांग्लादेशी एवं अन्य घुसपैठियों के कारण अनेकों राज्य में स्थानीय जनसांख्यिकी में बड़ा बदलाव हुआ है, जिसने समाज-राजनीति-अर्थव्यवस्था सभी पर प्रभाव डाला है। अब भारत के भीतर ही अनगिनत मिनी पाकिस्तान और मिनी बांग्लादेश बने हुए हैं जो देश को दीमक की तरह चाट कर खोखला बनाने में लगे हैं। भारत के भीतर मौजूद इन तत्वों को विदेशी ताकतों के साथ वामपंथी, नरमपंथी, चरमपंथी, धर्मनिरपेक्ष, हिन्दू सनातन विरोधी एवं राष्ट्र-विरोधी ताकतों से मजबूती मिल रही है।
दक्षिण एशिया विशेषकर पाकिस्तान और बांग्लादेश में जिस तरह से इस्लामिक कट्टरपंथी प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ रही हैं, उसने वैश्विक लोकतांत्रिक ताकतों को झकझोर कर रख दिया है। बांग्लादेश में हिन्दुओं के नरसंहार ने संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम सहित वैश्विक समुदाय को बेनकाब कर दिया है, जो मूकदर्शक की तरह चुप बैठा है।
भारत के भीतर मौजूद और पड़ोस से उभरे धार्मिक कट्टरपंथी एवं जिहादी चुनौतियों से न सिर्फ सतर्क और जागरूक रहने की जरुरत है, बल्कि मुस्तैदी से मुकाबला करने का वक्त आ गया है। भारत के भीतर एवं बाहर मौजूद सनातन हिन्दू विरोधी-भारत विरोधी ताकतों के मंसूबों को हरसंभव रणनीति से करारा जवाब देने की जरूरत है। फिलहाल बांग्लादेश की घटना पर भारत के हर एक राष्ट्रवादी एवं सनातन हिन्दू धर्म मानने वालों का खून खौल रहा है।
(डॉ निखिल आनंद बिहार से भाजपा के नेता हैं और वर्तमान में भाजपा ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं।)


