Thursday, August 13, 2020
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घरेलू हिंसा में इजाफे का लॉकडाउन से नहीं नाता, असल वजह सिर्फ विश्वव्यापी पितृसत्ता

जब तक बर्दाश्त और सहनशीलता के भाव आदर्श नारी और उसके हॉर्मोन्स को जस्टिफाई करने के लिए प्रयोग किए जाएँगे, तब तक ये घरेलू हिंसा बढ़ती रहेगी और इसके पीछे लॉकडाउन एक कारण कभी नहीं होगा।

विश्व भर में कोरोना के मद्देनजर लागू लॉकडाउन के बावजूद संक्रमण के आँकड़ों में इजाफा देखा जा रहा है। इसके साथ घरेलू हिंसा के आँकड़ों में वृद्धि एक व्यापक समस्या बनकर सुर्खियों में आई है। भारत, ब्राजील, चीन के अलावा यूके, यूएस और फ्रांस में भी इस बीच घरेलू हिंसा के मामलों में उछाल देखने को मिला है।

भारत की राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस संबंध में जानकारी देते हुए पिछले दिनों भी कहा है कि लॉकडाउन के बाद मामलों में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है। इस साल 27 फरवरी से 22 मार्च तक यह आँकड़ा 397 था। 23 मार्च से अप्रैल 16 के बीच यह बढ़कर 587 हो गया। WHO ने भी वैश्विक स्थिति देखते हुए इस मामले पर कॉन्फ्रेंस कर हर देश से उपयुक्त कदम उठाने को कहा है

अब हालाँकि, कुछ लोग लॉकडाउन के बीच बढ़े इन आँकड़ों के लिए सरकार, प्रशासन, कानून, निरक्षरता व पिछड़े समाज को जिम्मेदार ठहराएँगे। कुछ इन बढ़े आँकड़ों के पीछे लॉकडाउन को ही वजह समझना शुरू कर देंगे। मगर इससे पहले इन आँकड़ों को देखकर हम अतिभावुक हों व लॉकाडउन को कोसना शुरू करें, सरकार, प्रशासन, कानून, अदालत पर सवाल उठाएँ, उससे पहले कुछ बातों पर गौर करना बेहद जरूरी है।

पहली बात तो ये कि पूरे देश में लॉकडाउन वर्तमान की वह आवश्यकता है जिसका इस समय कोई और विकल्प नहीं है। यदि मानव जाति को कोरोना के कहर से संरक्षित करना है तो उन्हें कुछ दिन घरों में लॉकडाउन रहना ही होगा। इसके उलट दूसरी बात घरेलू हिंसा जिसके आँकड़ों में उछाल को लॉकडाउन से जोड़ा जा रहा है, वह देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैली पितृसत्ता का प्रमाण है। वो पितृसत्ता जो एक जहरीली व्यवस्था के रूप में सदियों से समाज में तटस्थ रही। मगर भागती दुनिया की बराबरी करने की होड़ में हमें ऐसा लगा कि ये बीते समय की बात है। 

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इतिहास की यही कुरीति आज महामारी के बीच पैदा हुई मजबूरियों का फायदा उठाकर फिर उभर आई है। हालाँकि खत्म ये कभी नहीं हुई थी। लेकिन भ्रम में जीने वालों ने खुद के ख्यालों से इसे डायवर्ट कर दिया था। आज जब हर देश में घरेलू हिंसा की समस्या को प्राथमिकता से दिखाया जा रहा है, तो समझ आता है कि इसका लेना-देना निरक्षरता या पिछड़े समाज से नहीं है। बल्कि इसका एकमात्र कारण वो सोच है जो पुरुषों को ये मानने का अधिकार देती है कि उनके घर की महिलाएँ व बच्चे उनकी वो वस्तु हैं जिस पर वे जब जी चाहे अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।

COVID-19 isolation could create 'fertile ground for domestic ...
साभार: euractiv

लॉकडाउन में कमियाँ निकालने से पहले और उससे जोड़कर कोई भी घोषणा करने से पहले हमें समझने की जरूरत है कि इस बीच बाहरी अपराधों जैसे रेप, हत्या, मार पिटाई, चोरी-चकारी आदि मामलों में बहुत कमी कैसे आई है और आखिर क्यों डोमेस्टिक वायलेंस बढ़ा है? क्षण भर विचार करने पर मालूम होगा कि आधुनिकता का राग अलापे जो पुरुष लॉकडाउन से पहले जगह-जगह विचरण कर अपना मन बहलाया करते थे, वो अब घर में बैठे हैं। इसके कारण बाहर का समाज सुरक्षित होता जा रहा है लेकिन घरों में रहने वाली महिलाएँ व बच्चे खतरे में आ गए हैं। 

विश्व भर में हो रही घटनाएंघरेलू हिंसा में वृद्धि के मायने

वास्तविकता में सच तो ये है कि ये घरेलू हिंसा का लॉकडाउन से कोई संबंध नहीं है। ये केवल पितृसत्ता से जकड़े समाज का एक परिणाम है जो एक जगह स्थिर होने के कारण फिर से अपना असली चेहरा दिखाने लगा है। ऐसे समाज के लिए बराबरी और समानता सिर्फ़ दोयम दर्जे का विषय है या फिर दिखावे का। पुरुष प्रधानता इनके लिए मुख्य विषय है।

अगर हर देश से आते आँकड़ों को देखकर भी हम इन बातों से तसल्ली कर रहे हैं कि इनके लिए हमें सरकार मदद करेगी, कानून सहायता देगा, अदालत फैसला करेगी, तो समझ लीजिए, ये समस्या का हल नही बल्कि समस्या को दुसरे के सहारे टालने की प्रक्रिया है। जब तक पितृसत्ता है तब तक घरेलू हिंसा के पीड़ितों को रेस्क्यू करने का सिलसिला साल दर साल चलता रहेगा। भले ही लॉकडाउन के बाद ये आँकड़े सामान्य हो जाएँगे, लेकिन खत्म कभी नहीं होंगे। हर दूसरे नहीं हर दसवें घर से एक मामला जरूर आएगा।

और, सत्ता कब किसके हाथ में आएगी और वे कब आपके लिए क्या कदम उठाएगी ये भी अनिश्चितकाल की प्रक्रिया है। आज मलेशियन सरकार के एक फैसले को सुनकर हम इसे और अच्छे से समझ सकते हैं। वहाँ घरेलू हिंसा के आँकड़ों को बढ़ता देख सरकार ने महिलाओं को सुझाव दिया कि वे घर में रह रहे पुरुषों को टोके नहीं, बल्कि अगर उनसे कुछ काम करवाना है तो फिर उनके सामने डोरेमॉन की आवाज निकालें या अपनी बात मजाकिया अंदाज में कहें, जिससे उन्हें टोकना न बुरा लगे। इसके अलावा वे घर में मेकअप करके भी रखें और अच्छे कपड़े पहनकर भी रखें। 

गौरतलब है कि सरकार के इस तरह के सुझाव (मेकअप आदि को लेकर) भी एक तरह से स्त्रियों के ऑब्जेक्टिफिकेशन की ही बात है। इसकी कई कार्यकर्ताओं व संस्थाओं ने आलोचना भी की है और इसके कारण वहाँ की सरकार को अपने इन सुझावों के लिए माफी माँगनी पड़ी।

मलेशियन सरकार द्वारा पोस्ट किया गया सुझाव

ऐसे ही फ्रांस सरकार को देखिए। फ्रांस में लॉकडाउन के बाद घरेलू हिंसा में 36 प्रतिशत का उछाल आया तो उन्होंने एक्शन लेने की बात पर महिलाओं के लिए होटल के रूम बुक कर दिए। भारत में तसल्ली की बात ये है कि न्यायपालिका इन बढ़े आँकड़ों पर गंभीर है और हर जगह बंदी के बावजूद इस पर कदम उठाने की दिशा में सुनवाई कर रही है।

साभार: indian express

आज यदि हम ये भी मान रहे हैं कि औरतें जागरूक हो रही हैं, आधुनिक हो रही हैं, पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, तो ये भी अपवादों का उदाहरण है। विश्व भर में ऐसी अनेकों महिलाएँ हैं जो पुरुषों के अत्याचार को सहने के लिए खुद को मानसिक तौर पर तैयार किए हुए हैं। ऐसी महिलाओं का किसी संस्कृति, समाज, सभ्यता, सीमा से कोई लेना-देना नहीं है। बस इसकी एक वजह है कि वे अपने साथी या परिवार से भावनात्मक तौर पर इस कदर जुड़ी हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आता कि उनके साथ क्या हो रहा है। भारत में तो डोमेस्टिक वायलेंस सह रही महिलाओं के कई उदाहरण हमारे पास पहले से ही हैं। मगर, जिन देशों की सभ्यता को प्रगति के मानक मानते हैं वहाँ भी औरतें इतनी ही लाचार हैं। इनके अतिरिक्त वे महिलाएँ जो वर्तमान में नारी विषयों पर लिखती हैं उनमें से भी कई इसकी पीड़िता होती हैं।

क्रेजी लव्स की लेखिका लेस्ली मॉर्गन वर्तमान में अमेरिकन राइटर होने के अलावा नारीवाद का एक बड़ा चेहरा हैं। वे खुद एक वीडियो में कहती हैं कि उन्हें घरेलू हिंसा समझने में सालों साल लगे और जब उन्हें समझ भी आया तो करीब दो साल उन्होंने अपने साथी से अलग होने में लगाए। उनका मानना है कि लॉकडाउन ने भले ही घरेलू हिंसा के मामले को बढ़ावा दिया है। लेकिन इसे एक अवसर की तरह देख सकते हैं कि पीड़िताएँ अपने साथी को छोड़ने के लिए खुद को तैयार करें या फिर उनकी शिकायत करें।

आज कई नारी विषय पर लिखने वाले कार्यकर्ताओं और लेखकों का ये भी मानना है कि इस लॉकडाउन में घर पर ज्यादा समय बिताने के कारण हिंसा हो रही हैं। जहाँ पुरुष कभी दारू न मिलने के कारण अपराध कर रहे हैं, तो कभी घरेलू कामों का दबाव बनाए जाने के कारण ऐसा कर रहे हैं। आउटलुक ने पदमा रेवाड़ी नामक मनोवैज्ञानिक के हवाले से बताया है कि उनके घरेलू कार्यों में सहायता करने वाली खुद घरेलू हिंसा का शिकार हैं। वे कहती हैं कि उनकी सहायिका को इन दिनों  और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उसका पति बिना शराब के अधिक हिंसक होता है।

अंत में यही जानिए कि आज के समय में कई ऐसी संस्थाएँ हैं जो महिलाओं को इस नर्क से निकालने के लिए अथक प्रयास कर रही हैं। अमेरिका से लेकर भारत तक में इनका विस्तार है। इसके अलावा देश की सरकारें भी अपनी ओर से समाज में औरतों को अधिकार दिलवाने के लिए कार्य कर रही हैं। न्यायपालिका और प्रशासन भी इसी पर मंथन करते हैं कि कैसे बढ़ते समाज में महिलाओं की स्थिति को सुधारा जाए। उन्हें कैसे स्वावलंबी जीवन प्रदान किया जाए। मगर, अधिकांश महिलाओं की मनोस्थिति को समझकर लगता है कि जिन्हें घरेलू हिंसा से निजात पानी है, उन्हें अपने अधिकारों के लिए अब खुद आवाज उठानी होगी।

उन्हें खुद आत्मसम्मान के साथ या तो उस माहौल से खुद को अलग करने का फैसला लेना होगा या फिर उस व्यक्ति विशेष और सोच को सबक सिखाने के लिए दंड दिलवाना होगा। इसके लिए ये जरूर है कि उन्हें जागरूक होना पड़ेगा, मजबूत होना होगा। मगर जब तक बर्दाश्त और सहनशीलता के भाव आदर्श नारी और उसके हॉर्मोन्स को जस्टिफाई करने के लिए प्रयोग किए जाएँगे, तब तक ये घरेलू हिंसा बढ़ती रहेगी और इसके पीछे लॉकडाउन एक कारण कभी नहीं होगा।

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