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सड़कों पर नमाज पढ़ने की जिद: मजबूरी या मजहब की आड़ में ताकत का मुजाहिरा

मुसलमानों की यह आदत सालों से चल रही है जहाँ वे जानबूझकर सड़कों को ब्लॉक करके, ट्रैफिक को ठप करके और आम लोगों को परेशान करके यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे बहुमत में आकर क्या-क्या कर सकते हैं।

एक हफ्ते में ईद है, कहने को तो ये शांति और भाईचारे का दिन है लेकिन कट्टरपंथियों के एक बड़े तबके के लिए यह शक्ति प्रदर्शन का भी दिन भी होता है। हमारे ऐसा कहने के पीछे कि कई वजह हैं और उनमें से एक प्रमुख वजह है- ‘सड़क बंद कर नमाज पढ़ने की जिद’। ये कोई गढ़ी हुई थ्योरी नहीं है बल्कि यही हकीकत है। अभी से सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल होने लगे हैं जिनमें मुस्लिमों को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया जाने लगा है।

इन दिनों सैयद अयूब नाम के एक मुस्लिम इन्फ्लुएंसर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। अयूब इस वायरल वीडियो में कह रहा है, “संभल नहीं पूरे हिंदुस्तान में रोड पर नमाज अता की जाएगी। किसी की माँ जनी तो इंशाअल्लाह मुसलमानों को रोककर दिखाए।” अयूब ने आगे कहा, “रोड पर नमाज पढ़ने नहीं देंगे, रोड पर नमाज पढ़ेंगे तो हम केस करेंगे, हम जेलों में डालेंगे। ये धमकियाँ दूसरों को देना, मुस्लिम इससे डरने वाला नहीं है।”

यह इकलौते अयूब की धमकी नहीं है, यह जिद एक बड़े तबके की है। सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हुए सैकड़ों ऐसे वीडियो आपको नजर आ जाएँगे। सवाल उठते है कि क्या यह केवल मजहबी क्रिया है या बात इससे आगे की है। यह जिद और धमकी सुनकर साफ समझ आता है कि बात इससे आगे की ही है। इसके पीछे एक गहरा संदेश छिपा हुआ है और वो संदेश है ‘शक्ति प्रदर्शन’ का।

जब किसी शहर की व्यस्त सड़क, चौराहे या सार्वजनिक स्थान पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर नमाज पढ़ते हैं और उस कारण ट्रैफिक रुक जाता है, आम लोगों की आवाजाही बाधित होती है और पूरा इलाका ठहर जाता है यानि एक अघोषित ‘बंद’ जैसी स्थिति बन जाती है। यह एक प्रतीकात्मक संदेश देने की कोशिश है कि हम यहाँ इतने हैं, हमारी संख्या इतनी अधिक है और हम सार्वजनिक जगहों पर भी अपने तरीके से व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

इस मानसिकता के पीछे भीड़तंत्र वाली सोच है। यह कोई कल शुरू हुई प्रथा नहीं है, दशकों से यही चल रहा है और अब तो दायरा बढ़ने लगा है। अब शुक्रवार को जुमे की नमाज के लिए सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर कब्जा जमाया जाने लगा है।

भारत में मुस्लिम आबादी 16-17% है लेकिन मस्जिदों की संख्या लाखों में है। वक्फ बोर्ड के पास लाखों एकड़ जमीन है, जहाँ नई मस्जिदें बन सकती हैं। फिर क्यों सड़कें? क्योंकि यह मजबूरी नहीं बल्कि इरादतन किया जाने वाला काम है। यह दिखावा है कि ‘हम जहाँ चाहें, वहाँ कब्जा कर सकते हैं’।

सड़कों पर नमाज का यह तमाशा मजहबी नहीं है बल्कि एक सुनियोजित धमकी और शक्ति प्रदर्शन है। मुसलमानों की यह आदत सालों से चल रही है जहाँ वे जानबूझकर सड़कों को ब्लॉक करके, ट्रैफिक को ठप करके और आम लोगों को परेशान करके यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे बहुमत में आकर क्या-क्या कर सकते हैं। यह प्रदर्शन कहता है कि ‘देखो, हम सड़क पर नमाज पढ़ सकते हैं तो कल हम और बड़े पैमाने पर निकलेंगे और तुम क्या कर लोगे?’। यह जिहादी मानसिकता है जो हिंदू बहुल भारत में बहुसंख्यकों को चुनौती देती है।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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