Friday, November 27, 2020
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कट्टरपंथी और वामपंथियों का तीन तिकड़म, राम मंदिर लटकाएँगे और टपकाएँगे

दिसंबर 1992 में अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में कहा था कि 'राम का मंदिर छल और छद्म' से नहीं बनेगा। यकीनन हिंदुओं के नैतिक बल पर, अदालत के फैसले से ही राम मंदिर बनेगा। लेकिन, इस छल और छद्म से सावधान रहने की जरूरत है ताकि उसकी काली छाया में राम का वनवास और लंबा न हो।

एक चीफ जस्टिस जो 17 नवंबर को रिटायर होने से पहले दशकों से लटके अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाना चाहता है। इसके लिए वह और उसकी अगुवाई वाली संविधान पीठ में शामिल साथी जस्टिस मध्यस्थता प्रक्रिया नाकाम होने के बाद लगातार 40 दिन मामले की सुनवाई करते हैं। चीफ जस्टिस इस मामले को अहमियत देकर कई मामलों की सुनवाई आगे टाल देते हैं। यहॉं तक कि ‘अनिवार्य कार्य’ का हवाला देकर पहले से तय अपनी विदेश यात्रा रद्द कर देते हैं।

दूसरी ओर, वो साजिशें जिसकी वजह से आज तक अयोध्या मामला का फैसला नहीं हो पाया। लिबरलों, वामपंथियों, कट्टरपंथियों और कॉन्ग्रेसियों का वो गिरोह फिर से सक्रिय हो गया है ताकि भव्य राम मंदिर के निर्माण की हर संभावना को खत्म किया जाए। इसके लिए दोहरा आक्रमण हो रहा है। क्या इसे संयोग माना जाए कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अपना दावा छोड़ने के लिए उस दिन तैयार होता है, जिस दिन सुनवाई का आखिरी दिन होता है। उससे पहले किस तरह सुनवाई को लंबा खींचने की कोशिश की गई उसे याद कीजिए। कभी सुनवाई से एक खास पार्टी को फायदा होने की दलील दी गई। जब अदालत ने रोजाना सुनवाई का फैसला कर लिया तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने दलील दी कि वे पॉंच दिन की सुनवाई से तालमेल बिठाने में सक्षम नहीं है। ऐसा हुआ तो वे केस छोड़ने को मजबूर होंगे। पीठ ने दलील नहीं मानी तो मिड ब्रेक का बहाना बनाया गया और जब मामले को लंबा खींचने का हर तिकड़म नाकाम रह गया तो हलफनामा दायर कर दावे से पीछे हटने की बात कही गई।

इस मामले में मुस्लिम समुदाय की तरफ से जो 7 पक्षकार हैं उसमें सुन्नी वक्फ बोर्ड की अहमियत इस लिहाज से भी ज्यादा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जिन तीन पक्षों के बीच जमीन बॉंटा था, उसमें बोर्ड था। हलफनामा दायर किए जाने के बाद से ही यह अंदेशा जताया जा रहा था कि मामले को लटकाने के लिए शायद ऐसा किया जा रहा है। यह अगले दिन ही जाहिर हो गया, जब अन्य मुस्लिम पक्षकारों ने इस समझौते को खारिज कर दिया। कानून के जानकारों का मानना है कि अब अदालत ने इस समझौते पर गौर किया तो शायद फैसला लटक जाए। यानी उनका मंसूबा पूरा हो जाएगा। वे चाहते भी यही हैं। उन्हें पता है कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई यदि फैसला सुनाए बिना रिटायर हुए तो फिर से एक नया पीठ बनेगा। नए सिरे से सुनवाई होगी और वे फिर से वहीं दलीलें रखेंगे जो कैमियर की अदालत से लेकर आज तक टिक नहीं पाए हैं।

क्या यह भी महज संयोग है कि जिस दिन अयोध्या विवाद के अन्य मुस्लिम पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड के हलफनामे से खुद को अलग करते हैं उसी दिन हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी की निर्मम हत्या कर दी जाती है। यूपी के डीजीपी ओपी सिंह का कहना है कि इस वारदात में शामिल संदिग्धों से प्रारंभिक पूछताछ से पता चला है कि हत्या की साजिश के पीछे मुख्य वजह कमलेश तिवारी का 2015 का एक बयान था। सिंह ने उस समय पैंगबर मुहम्मद को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। इसके लिए उस पर रासुका लगाई गई थी और वह जेल में भी रहा था। उसकी हत्या में यूपी के बिजनौर से मुफ्ती नईम काजमी और मौलाना अनवारुल हक को हिरासत में लिया गया है। गुजरात से राशिद पठान, मौलवी मोहसिन शेख और फैजान को पकड़ा गया। उसकी हत्या के बाद सोशल मीडिया में हा-हा करते शांतिदूतों की प्रतिक्रिया आती है। क्या यह सब महज संयोग हैं?

ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने धर्म के शासकों की बदौलत और हथियारों के दम पर बहुसंख्यकों के पवित्र स्थलों को तबाह किया, उन पर कब्जा किया। ये जानते हैं कि अयोध्या में बनने वाला भव्य राम मंदिर केवल बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था का प्रतीक नहीं होगा। विदेशी अक्रांताओं की, हथियार के बल पर अपना धर्म थोपने वालों की हार होगी। उनके हमदर्द वामपंथी जानते हैं कि भव्य मंदिर के सामने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किए गए उनके तथ्य बौने हो जाएँगे। लिबरल जानते हैं कि उनका यह झूठ औंधे मुॅंह गिरेगा कि बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यकों को डराते हैं। कॉन्ग्रेसी जानते हैं कि भव्य मंदिर में विराजमान रामलला बार-बार बताएँगे कि उन्हें कैसे नेहरू ने बेदखल करने की कोशिश की थी। कैसे उनके नाम पर राजीव गॉंधी ने शाहबानो का पाप धोने की कोशिश की। इसलिए वे नहीं चाहते कि अयोध्या का फैसला आए। वे पर्दे के पीछे से साजिश भी रचेंगे और आपको डराने के लिए खून भी बहाएँगे। वे चाहेंगे कि माहौल बिगड़े ताकि मंदिर निर्माण टलता रहे। वे पूछेंगे कि राम मंदिर का ये डिजाइन किसने बनाया? वे नक्शे को भरी अदालत में फाड़ेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि जिस दिन बहुसंख्यक हिंदू जग जाएगा उस दिन उनका इतिहास हर गली-नुक्कड़ पर फाड़ा जाएगा।

दिसंबर 1992 में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में कहा था कि ‘राम का मंदिर छल और छद्म’ से नहीं बनेगा। यकीनन हिंदुओं के नैतिक बल पर, अदालत के फैसले से ही राम मंदिर बनेगा। काशी और मथुरा का हल भी निकलेगा। लेकिन, इस छल और छद्म से सावधान रहने की जरूरत है ताकि उसकी काली छाया में राम का वनवास और लंबा न हो।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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