जस्टिस गांगुली ने अयोध्या फैसले पर उठाए सवाल: काटजू को कठघरे में खड़ा कर चुके CJI गोगोई करेंगे तलब?

काटजू ने अपने ब्लॉग में लिख दिया था कि जस्टिस रंजन गोगोई को क़ानून की समझ नहीं है। कुछ ही दिनों बाद वो अदालत की अवमानना मामले में उसी कोर्ट में खड़े थे, जहाँ उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई फ़ैसले सुनाए होंगे।

आज़ादी के बाद भारत एक संसदीय लोकतंत्र वाला देश बना। यहाँ अगर संसद को कानून बनाने का अधिकार है तो सुप्रीम कोर्ट को भी इसी व्यवस्था ने कानून की व्याख्या का सर्वोच्च अधिकार दिया है। दोनों ही संस्थाओं की अवमानना अथवा अपमान करने के सन्दर्भ में विभिन्न प्रकार की कार्रवाई के प्रावधान किए गए हैं। यही वजह है कि सियासी दलों से लेकर राजनीति के कई बड़े दिग्गज तक, सभी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर टिप्पणी करने से बचते हैं।

बावजूद इसके कुछ जज ऐसे होते हैं, जो रिटायर होने के बाद ऐसे ही बयान देते हैं, जैसा उनके कार्यकाल के दौरान किसी ने दिया होता तो वो उन्हीं जज के द्वारा तलब कर लिया जाता। अब अशोक गांगुली के बयान को ही देखिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 5 वरिष्ठ जजों द्वारा सर्वसम्मति से दिए गए फ़ैसले पर सवाल उठाया। अगर ये फ़ैसला उन्होंने दिया होता और किसी अन्य व्यक्ति (भले ही वो रिटायर्ड जज ही क्यों न हो) ने उस पर ऐसी टिप्पणी की होती, तो उसे जस्टिस गांगुली ही अवमानना ममले में कठघरे में खड़ा कर लेते। आइए आपको पूरा मामला समझाते हैं।

अयोध्या के सदियों पुराने भूमि-विवाद पर सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद ज्यादातर तबकों ने सामाजिक सद्भाव की बात कहते हुए कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन पर रामलला विराजमान का मालिकाना हक बताया, जबकि मस्जिद के लिए मुसलमानों को 5 एकड़ ज़मीन देने की बात कही। लेकिन कुछ लोगों को यह फैसला पांच नहीं रहा। इनमे जस्टिस गांगुली भी हैं।

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जस्टिस गांगुली ने कहा कि अल्पसंख्यकों ने अरसे तक वहाँ मस्जिद देखी है, जिसे तोड़ डाला गया। साथ ही उन्होंने कहा कि एक संविधान के विद्यार्थी के रूप में उन्हें इस फ़ैसले को समझने में मुश्किल आ रही है। कुछ ऐसा ही रिटायर्ड जज मार्कण्डेय काटजू के साथ हुआ था। काटजू ने अपने ब्लॉग में लिख दिया था कि जस्टिस रंजन गोगोई को क़ानून की समझ नहीं है। कुछ ही दिनों बाद वो अदालत की अवमानना मामले में उसी कोर्ट में खड़े थे, जहाँ उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई फ़ैसले सुनाए होंगे। जस्टिस गोगोई ने उनकी समीक्षा याचिका ख़ारिज कर दी थी। जस्टिस गोगोई ने तो गार्ड को बुला कर काटजू को कोर्ट से निकाल बाहर करने की बात भी कही थी, लेकिन वकीलों के निवेदन के बाद उन्होंने ऐसा नहीं किया।

सम्भावना तो ये भी है कि रिटायर्ड जस्टिस अशोक गांगुली के साथ भी ऐसा हो सकता है। उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का अपमान किया है। जस्टिस गांगुली ने यह भी कहा कि संविधान के लागू होने से पहले वहाँ क्या था, क्या नहीं- ये सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं है। इससे सीधा इंगित होता है कि जस्टिस गांगुली 1950 के बाद से ही भारत के इतिहास की शुरुआत मानते हैं। तभी एक समय ऐसा आया था जब अभिनेता अनुपम खेर ने उन्हें बड़ी विनम्रता से हजारों की भीड़ के सामने कहा था कि माफ़ कीजिए लेकिन आप ग़लत हैं। उस दौरान जस्टिस गांगुली ने असहिष्णुता गैंग के सुर में सुर मिलाया था।

सुप्रीम कोर्ट के जज रहे गांगुली दरअसल यह भूल गए कि उनकी यह टिप्पणी उन्हें महँगी पड़ सकती है। गांगुली खुद भी इस बात से अपरिचित नहीं होंगे कि न्यायालय के किसी आदेश पर टिप्पणी कर उसका निरादर करना कानूनी अपराध है। फैसले पर टिप्पणी करते हुए गांगुली ने कहा कि “इससे मुसलमान क्या सोचेगा”।

जस्टिस गांगुली भले ही कहें कि वहाँ मुस्लिमों ने एक अरसे से मस्जिद ही देखी है, क्या वो फिर संविधान के अस्तित्व में आने से पहले के भी काल का जिक्र नहीं कर रहे? इस तरह वो अपनी ही बातों में विरोधाभास पैदा कर रहे हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी मामले में आज़ादी से पहले क्या हुआ था और क्या नहीं, इस पर अदालत आँख ही मूँद ले? 2017 में जस्टिस कर्णन भी अवमानना मामले में कोर्ट में पेश हुए थे और उन्हें जेल का सामना भी करना पड़ा था। काटजू, कर्णन के बाद क्या अब गांगुली का भी नंबर हो सकता है?

अपने बयान में पूर्व जज गांगुली ने यहाँ तक कहा कि उस मस्जिद में नमाज़ पढ़ी जाती थी तब संविधान अस्तित्व में आया। मगर यह भूल गए कि कोर्ट में पेश साक्ष्यों ने इस बात की पुष्टि की कि मस्जिद बन जाने के बावजूद हिन्दू उसके बाहर अपने अराध्य श्रीराम भगवान की प्रार्थना किया करते थे और मौजूदा वक़्त में भी यह हिन्दुओं की आस्था का केंद्र है। अदालत ने भी सुनवाई के दौरान इस तथ्य को स्वीकार किया। अगर जज गांगुली यह कहते हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता का बचाव किया जाना चाहिए तो फिर यह क्यों भूल जाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी ‘धार्मिक स्वतंत्रता के बचाव’ की ही एक दलील की बात कहता है। इतना ही नहीं दोनों पक्षों की धार्मिक स्वतंत्रता का बचाव करता यह आदेश अपने आप में एक नजीर है।

लिहाज़ा जज रह रह चुके एक व्यक्ति का अदालत के फैसले पर इस प्रकार की टिप्पणी करना आखिर कितना मुनासिब है। जस्टिस गांगुली खुद 2008 में 2जी घोटाले में सभी कम्पनियों के लाइसेन्स रद्द करने वाले फैसले में शामिल रह चुके जज हैं।

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