Saturday, October 16, 2021
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हिन्दुओ! भारत में समुदाय विशेष वाला कानून आ गया है, इन्तज़ार खत्म हुआ

इस बार तो हिन्दू मरा है, क्या आप सड़क पर आएँगे? क्या आपसे यह उम्मीद की जाए कि आप भारत में चल रहे इस मजहबी कानून को खुलेआम लताड़ सकेंगे? क्या आप सामूहिक रूप से हर शहर में हजारों की तादाद में आ कर यह कह सकेंगे कि हिन्दुओं के सब्र की परीक्षा न ली जाए?

बागों में बहार है, कलियों पे निखार है, तुमको मुझसे प्यार है… बारह बार ‘न’ कह देती है नायिका। अब समझदार जनता पूछेगी कि इसका इस लेख से क्या मतलब है? बिलकुल कोई मतलब नहीं है, जैसे कि कमलेश तिवारी के कातिलों को भारतीय दंड विधान, भारतीय न्यायिक व्यवस्था, या सरकारों के होने या न होने से कोई मतलब नहीं है।

फ़्रान्स का एक बहुत ही कुख्यात अखबार था जो तरह-तरह के कार्टून छापा करता था। उसमें भगवान गणेश को भी नग्न दिखाया गया था और जीसस को भी, लेकिन पूरे कार्यालय में बारह लोगों को जान से मारने का काम उन लोगों ने किया जो इस बात को बहुत ज्यादा गम्भीरता से लेते हैं कि कोई उनके मजहब से जुड़ी चीजों को किसी भी रूप में प्रदर्शित न करे। अगर कहीं का कानून इनके विचारों (वस्तुतः विकारों) से मेल नहीं खाता तो ये स्वयं अपना कानून अपनाते हैं और काफिरों को मौत की नींद सुला देते हैं।

कमलेश तिवारी ने इस्लाम के एक पैगंबर को समलैंगिक कहा था। भारतीय कानून इसकी इजाजत नहीं देता और इसके लिए ‘ईशनिंदा कानून’ का प्रावधान है। ये बात और है कि हिन्दुओं के देवी-देवताओं की नग्न पेंटिंग, अश्लील प्रदर्शन, उन्हें गालियाँ देना, मूर्तियों को तोड़ना, मंदिरों पर पत्थरबाजी करना, इस कानून के अंतर्गत नहीं आता। हिन्दू कभी भी इतने आहत नहीं होते कि इसके लिए किसी की जान लेने पर आ जाएँ।

लेकिन कुछ मुसलमानों में ये समझदारी नहीं पाई जाती। वो आहत होते हैं तो शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों को भून देते हैं। वो आहत होते हैं तो मानवता के खिलाफ अनंतकाल तक के लिए जंग छेड़ देते हैं जो होता तो सीरिया में है लेकिन उसकी छाप पूरे विश्व में दिखती है। इतना ही नहीं, लोग घर-बार छोड़ कर इस्लामी आतंकी का करियर चुनने में परहेज नहीं करते। ये इसलिए संभव होता है क्योंकि कहीं न कहीं आतंक को एक खास समुदाय की मौन सहमति मिली हुई है कि ये लोग तो इस्लाम का काम कर रहे हैं।

यही कारण है कि कमलेश तिवारी की मौत पर ‘अल्लाह के घर देर है, अंधेर नहीं’ जैसी बातें लिख कर मुसलमान नाम वाले अपनी खुशी जाहिर कर रहे हैं। पहले भी कमलेश तिवारी को पैगम्बर-ए-इस्लाम की तौहीन के नाम पर फाँसी की डिमांड मुस्लिम संगठनों ने किया था। यहाँ तक तो ठीक है कि संगठन हैं, जज्बाती हैं, माँग कर रहे हैं।

लेकिन, इन संगठनों के अलावा कई बार, कई जगह पर, कई मुसलमान लोगों द्वारा कमलेश तिवारी का सर काटने वाले के लिए इनाम की घोषणा कैमरे पर हुई है। वो लोग कौन हैं, तस्वीरों में दिख रहा है, लेकिन उन लोगों पर कोई कार्रवाई हुई हो, ऐसा संभव नहीं दिखता। अंततः, जेल से बेल पर बाहर कमलेश तिवारी के घर दो लोग आते हैं, बाहर ड्यूटी देता बूढ़ा सिपाही लाठी ले कर बैठा रहता है, नौकर को चाय और मसाला लाने कहा जाता है, जब तक वो आता है, तब तक टेबल के नीचे गले से खून का फव्वारा छोड़ते कमलेश तिवारी का तड़पता शरीर मिलता है।

खबर फैलती है और एक खास तबका, एक खास मजहब के नाम वाले लोग, मूलतः मुसलमान, पूरे सोशल मीडिया पर प्रसन्नता जाहिर करते हैं। तब कोई यह सवाल नहीं उठाता कि इस मजहब के लोगों में कितनी घृणा भरी हुई है, इसके लोग कितने कट्टर हैं, और मौत को जश्न की तरह मना रहे हैं। मैं ये इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि जब आठ हिन्दुओं ने कठुआ में एक मुस्लिम बच्ची का रेप किया था, उसे मार दिया था, तब भले ही कोई उसका जश्न न मना रहा हो, लेकिन उसे मजहबी रंग देने में, हर हिन्दू को बलात्कारी बताने में यही लोग आगे थे।

ये एक बीमारी है, जो भारत में फैलती ही जा रही है। जो तुमसे सहमत न हो, उसका गला रेत दो। ऐसा करना आम होता जा रहा है। कमलेश तिवारी की सुरक्षा के लिए शायद दो गार्ड थे, जिसमें एक हथियारबंद जवान भी था लेकिन वो दस दिनों से ड्यूटी पर नहीं था। लेकिन जब मकसद फायनल हो, पकड़े जाने का भय न हो, जब पता हो कि फलाने की राह में नेक काम होने जा रहा है, तो आप गनर रखिए, गार्ड रखिए, उन्हें बस एक मौका चाहिए।

आप यह देखिए कि मारने वाला चाकू और बंदूक दोनों ही ले कर गए थे। मकसद क्या है? मारना ही है तो सर में गोली मार दो, क्लोज रेंज से मारो, मौत तय है। फिर चाकू क्यों ले कर जाना? क्योंकि चाकू कासिद है, संदेशवाहक। चाकू जब चलता है तो वो एक चिट्ठी लिख रहा होता है एक मजहब की तरफ से दूसरे धर्म के नाम। ‘कासिद पयाम-ए-खत को देना बहुत न तूल, बस मुख्तसर ये कहना अंजाम होगा यही’।

अब सवाल यह है कि मैं कैसे कह सकता हूँ कि हत्यारे खास मजहब के ही हैं? मैंने वर्षों तपस्या की है इस देश के उन पत्रकारों की तरह जो बस आधे घंटे में बता देते हैं कि गौरी लंकेश के हत्यारे किस विचारधारा के थे। मैंने भी उन्हीं गुरुओं से दीक्षा ली है जिससे प्रेस क्लब की तरफ मार्च करते रवीश, राजदीप, बरखा, वरदराजन, बहल टाइप के पत्रकारों ने ली है।

दूसरी बात यह है कि मैं उतना मूर्ख नहीं हूँ कि गला रेतने और कमलेश तिवारी के सर पर ‘बिजनौर ही नहीं पूरे भारत के मुसलमानों’ द्वारा 51 लाख के इनाम रखने वाले मजहब में इस विषय को ले कर फैली घृणा और कट्टरता को न देख सकूँ।

बिजनौर के मुसलमानों के वीडियो का स्क्रीनशॉट जो अब दोबारा वायरल हो रहा है

ये बात और है कि ममता बनर्जी की पुलिस की तरह कहीं यूपी पुलिस भी किसी ईंट ढोने वाले मजदूर को न ले आए, और कह दे कि केस सुलझ गया है, कमलेश तिवारी ने बीड़ी पी कर पैसे नहीं दिए थे, तो मजदूर ने गुस्से में आ कर उसकी हत्या कर दी। संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि होने को तो कुछ भी हो रहा है आज कल!

‘बिजनौर के मुसलमान’ खुद सजा देंगे अगर कोर्ट सजा नहीं देती! पहले तो आप यह देखिए कि यहाँ एक मुसलमान हिन्दू देवियों की नग्न और अश्लील तस्वीरें बना सकता है, वो हर दिन लाखों बार हिन्दुओं के देवी-देवताओं का उपहास कर सकता है, लेकिन मुसलमानों के किसी पैगम्बर या किसी भी मजहबी बात पर आप दो लाइन लिखिए तो शायद आपका गला रेत दिया जाएगा क्योंकि यहाँ भारतीय कानून नहीं कुछ और ही चलता है, और ये मजहबी तौर पर जायज है।

आयतें और त्रिभुज चमका दिए जाएँगे, चतुर्भुज दिखा दिए जाएँगे कि देखो ये लिखा है कि ये करना तो भयंकर गुनाह है, लेकिन वो ये नहीं बताते कि दूसरे त्रिभुज में क्या बताया गया है। इन वृत्तों और समकोण चतुर्भुजों में बंद लेख किसी भी व्यक्ति की हत्या को जायज ठहरा देते हैं क्योंकि मकसद बड़ा ही पाक और साफ है। ये एक गर्दन नहीं है जो रेती गई है, ये पहली बार नहीं है।

और हाँ, ये आखिरी बार भी नहीं। इनके मजहब के पढ़े-लिखे मुसलमान इस नृशंस हत्या पर शोक नहीं मना रहे, वो यह जानने में व्यस्त हैं कि मुर्शिदाबाद वाले में तो ममता को कोस रहे थे, अभी योगी को क्यों नहीं कोस रहे। चूँकि भाषाई बाध्यता है कि इन जिहादी मानसिकता वाले मुसलमानों को आप एक स्तर तक ही कुछ कह सकते हैं वरना इनकी परवरिश तो नाली के कीचड़ में मिली विष्ठा में लोटते उस जीव की तरह ही है जिसका नाम लेना मैं चाहता नहीं।

ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोगों का क्या किया जाए?

इसलिए हिन्दुओ, संदेश तो मिल ही गया है। अब इस संदेश को कैसे देखना है ये आपके ऊपर है। आपको लिबरलों से इसका जवाब चाहिए, तो आप निहायत ही मूर्खतापूर्ण उम्मीद लगाए बैठे हैं। आपको मीडिया के कुछ लोगों से शो करवाना है जो तबरेज पर बवाल काट रहे थे, तो भी आप गलत उम्मीद कर रहे हैं। आपको जो करना है, वो आपको सोचना होगा। लिबरल तो इस कृत्य को यह कह कर सही बात देगा कि कमलेश ने पैगम्बर को समलैंगिक क्यों कहा?

उनका इकोसिस्टम सही है। उनका नैरेटिव सही तरीके से चल रहा है। वो इस बात पर योगी सरकार को घेर लेंगे कि कानून व्यवस्था इतनी खराब कैसे है कि कोई किसी के घर में मिठाई के डब्बे में चाकू और गोली ले कर घुस जाता है। ये कहते हुए कमलेश तिवारी और एक हिन्दू की गला रेत कर हलाल की गई गर्दन से रिसता रक्त हवा हो जाएगा, और फिर मुख्य मुद्दा यह बन जाएगा कि यूपी में कानून-व्यवस्था बहुत खराब है, इस सरकार को बस दीवाली में दिए जलवाने हैं, अयोध्या में दीपोत्सव करवाना है।

आप तैयार रहिए, क्योंकि यही होगा आज के प्राइम टाइम में। क्योंकि ये हत्या हिन्दू की हत्या से बदल कर यूपी में हुई एक हत्या हो गई है। क्योंकि ये हत्या हेट क्राइम नहीं, योगी सरकार के राज में हुई एक और हत्या बन चुकी है। इसलिए, इस हत्या पर भी चुप रहना है, बेशक रहिए। जबकि झारखंड में एक कथित चोर की हत्या पर, गुजरात के सूरत में मुसलमान सड़कों पर निकल कर बाहर आते हैं, कहीं लाख मुसलमान उसी चोर के लिए रैली करते हैं कि मुसलमानों को मारा जा रहा है।

इस बार तो हिन्दू मरा है, क्या आप सड़क पर आएँगे? क्या आपसे यह उम्मीद की जाए कि आप भारत में चल रहे इस मजहबी कानून को खुलेआम लताड़ सकेंगे? क्या आप सामूहिक रूप से हर शहर में हजारों की तादाद में आ कर यह कह सकेंगे कि हिन्दुओं के सब्र की परीक्षा न ली जाए? मैं उकसा नहीं रहा, मैं बस याद दिला रहा हूँ कि संघे शक्ति कलौयुगे!

 

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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