Thursday, June 4, 2020
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वामपंथी आतंकवाद और आईसिस के इस्लामी जिहाद में कोई अंतर नहीं, बिलकुल नहीं

वामपंथ ने 'सर्वहारा' का नाम लेकर पिछले 20 सालों में 12000 हत्याएँ कीं, जिसमें 2700 सुरक्षा बलों का बलिदान शामिल है। और मरने वाले कौन थे? प्राइवेट जेट से घूमने वाले जॉन ट्रवोल्टा टाइप के लोग, या प्राइवेट आइलैंड में छुट्टियाँ बिताने वाले जॉनी डेप्प की हैसियत वाले?

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

सबसे पहले मैं यह साफ कर देना चाहता हूँ कि मुझे न तो इससे मतलब है कि पहले के तथाकथित क्रांतिकारी लेनिन, माओ या विचारक मार्क्स ने क्या लिखा था, उनके विचार क्या थे, न ही इससे कि किसी आतंकी के हाथों की आसमानी किताब किसी मज़हब के बारे में क्या कहती है। मतलब इसलिए नहीं है कि विचारों का, या किताबी बातों का, सच्चाई और जमीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इसलिए, मैं किसी के विचारों के नाम पर, किसी किताब की कुछ आयतों के नाम पर जो हो रहा है, उसमें ज्यादा रुचि रखता हूँ, बजाय इसके कि कहीं दूसरी जगह यह कहा गया है कि हम तो शांतिप्रिय लोग हैं, या हम सर्वहारा की क्रांति कर रहे हैं।

मैं उन प्रतीकों का, उन बातों के वीभत्स रूप को हर रोज झेल रहा हूँ, इसलिए मैं अपने अनुभव, अपने समाज के अनुभव और अपने आस-पास देख कर बातें करूँगा न कि लेनिन ने जो हत्याएँ कराईं, माओ ने जो सामूहिक नरसंहार कराए, उसके पीछे की वजह क्या थी। मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि फ़लाँ किताब के फ़लाँ चैप्टर में यह लिखा है कि एक मानव की हत्या पूरे मानवता की हत्या है, क्योंकि ये कहने की बातें हैं, इनका वास्तविकता से कोई नाता नहीं है।

वामपंथ क्या है? एक ख़ूनी विचारधारा जिसका नाम लेकर भारत में पिछले 20 सालों में 12000 हत्याएँ कर दी गईं जिसमें 2700 सुरक्षा बलों का बलिदान शामिल है। ये हत्या किसके नाम पर हुई? ‘पीपुल्स’ यानी आम जनता के नाम पर, सर्वहारा के नाम पर। मरने वाले कौन थे? प्राइवेट जेट से घूमने वाले जॉन ट्रवोल्टा टाइप के लोग, या प्राइवेट आइलैंड में छुट्टियाँ बिताने वाले जॉनी डेप्प की हैसियत वाले?

जी नहीं, भारत में नब्बे प्रतिशत लोग या गरीब हैं, या बहुत ज़्यादा गरीब हैं। मरने वाले आँकड़े सरकारी हैं, और जो मरे हैं, वो अधिकतर वैसे लोग हैं जो भारत के सीमित संसाधनों के बीच किसी तरह जीवनयापन कर रहे थे। वो भी वही आम इन्सान थे जिनका नाम इनके पीपुल्स वार ग्रुप से लेकर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी या कम्यून की बातों में होता है।

हत्या तो महज़ एक संख्या है जो बड़ी या छोटी हो सकती है, जिसे हम या आप आँक सकते हैं, लेकिन उन 68 जिलों का क्या जहाँ माओवादी या नक्सली आतंक के साए में लोग जीने को मजबूर हैं? क्या उस डर को आँका जा सकता है? क्या उन बच्चियों पर किए गए बलात्कार, उन परिवारों पर की गई हर रोज की हिंसा को संख्या में आँका जा सकता है? शायद नहीं।

‘सर्वहारा’ शब्द इन वामपंथी आतंकवादियों के लिए एक ढाल है। ‘जन आंदोलन’ इनके निजी स्वार्थ के लिए पावर तक पहुँचने का एक ज़रिया मात्र है। आप खूब ढोल और डुगडुगी बजा लीजिए और क्रांति के गीत गाइए, लेकिन हर वामपंथी नेता के पीछे हिंसा और व्यभिचार की मेनस्ट्रीमिंग आपको दिख जाएगी। ‘तुम्हारी देह कम्यून की संपत्ति है’ जैसे जुमले सुना कर महिला काडरों का सेक्सुअल मोलेस्टेशन और रेप, इन कामपंथियों का ट्रेडमार्क है।

इनके नेताओं को कभी सुनिए कि कैसे इन्होंने शब्दों का सहारा लेकर सपने दिखाए हैं और जहाँ भी इन्होंने राज किया है, वहाँ पोलिटिकल किलिंग्स की बाढ़ ला दी है। मुझे याद आता है इसी विचारधारा के एक नेता का बयान जो सीपीएम जेनरल सेक्रेटरी विजयन थे, जिसने अपने पार्टी के लोगों को बंगाली कम्यूनिस्टों का तरीक़ा अपनाने को कहा था कि विरोधियों को ज़िंदा गाड़ दो नमक की बोरियों के साथ कि उनकी हड्डियाँ भी पुलिस को न मिले। इस एक वाक्य से भारत के दो कम्युनिस्ट शासित राज्य की सच्चाई बाहर आ जाती है। इन दोनों के राज्य में कितनी राजनैतिक हत्याएँ हुई हैं, वो गूगल कर लीजिए।

अब इस बात पर चर्चा कि मैंने इन्हें आईसिस के जिहादियों से क्यों जोड़ा। बहुत आसान है इन्हें ऐसा मानना। दोनों ही विचारधाराएँ आतंकी हैं, हिंसक हैं, और लोगों की जान लेना इन दोनों में जस्टिफाइड है। इस्लामी आतंकी कहते हैं कि मज़हब के नाम पर सारी मार-काट सही है, माओवंशी कामपंथी और लेनिन की नाजायज़ औलादें कहती हैं कि क्रांति की राह में जो भी आएगा निपटा दिया जाएगा।

दोनों के लिए फ़ंडिंग भी बाहर से ही आता है। अपहरण करके पैसा जुटाना दोनों का मुख्य काम रहा है। धमकी और वसूली से पैसा माँगना भारत में हर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में एक मुख्य तरीक़ा रहा है। दोनों ही तरीक़ों में बाहरी देशों का खूब इन्वॉल्वमेंट है। दोनों ही तरीक़ों में पोलिटिकल हैंडलिंग और संरक्षण, अपने हितों को देखते हुए राष्ट्र या राज्य की सत्ता देती रही है।

एक तरफ लक्ष्य सबको एक ख़लीफ़ा के नीचे लाना है, दूसरी तरफ कम्यून है। एक तरफ इस्लाम मज़हब और मुसलमान होना, अपने समाज और देश से बड़ी चीज है, दूसरी तरफ कम्यून के लिए समर्पण इतना प्रबल कि भारत और चीन लड़े तो भारतीय कम्युनिस्ट चीन के साथ खड़े दिखते हैं। विचारधारा सर्वोपरि हो जाती है, और उसके रास्ते में काफ़िर आए तो मारा जाता है, काटा जाता है, गोलियों से छलनी कर दिया जाता है, शांतिदूत बन कर बाज़ारों में फट जाता है या फिर सड़कों पर ट्रक चला कर लोगों को रौंद देता है।

दूसरी तरफ, कम्यून इतना सर्वोपरि हो जाता है कि सीआरपीएफ़ के जवानों को, स्कूली मास्टरों को, उन सरकारी लोगों को जिनके घर में वो अकेले कमाने वाले हों, बहुत गरीब तबके से आते हों, घेर कर मारने में ये एक बार सोचते भी नहीं। खुद घिर जाने पर बच्चों को ढाल बना कर बचते हैं, और अपने कम्यूनिस्ट कामरेड (कॉमरेड नहीं, कामरेड) की लाश में भी बम सिल देते हैं कि उसकी लाश में भी धमाका करके दो-चार और गरीब घरों के जवानों की बलि वामपंथ के नाम पर चढ़ जाए।

दोनों ही विचारधाराएँ, ख़ौफ़ और आतंक के आहार पर ज़िंदा हैं, और ये जिन लोगों की बेहतरी के सपने बेचते हैं, वो मुसलमान इन इलाकों में सबसे बदतर जीवन जीता है, और वो गाँव वाले बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। बात यह है कि अगर गाँव वाले तक सड़क, स्कूल, हॉस्पिटल पहुँच गए तो फिर इन वामपंथी आतंकवादी नरपिशाचों के जीवन का परपस, यानी लक्ष्य ही खत्म हो जाएगा। क्योंकि जेनएनयू जैसे संस्थानों में चलने वाली दारू की महफ़िलों में, गाँजे के ज्वाइंट फूँकते कामरेड ज्ञान तो बहुत बाँट देते हैं, शब्द तो बहुत जुटा लेते हैं, लेकिन इनकी निजी जिंदगी और इनके आदर्शों की बात में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।

दोनों ही विचारधाराएँ आम जनता, गरीब, निर्दोष, निर्बल लोगों की लाशों के ख़ून से लाल और काले हो चुके झंडों के नीचे चलती हैं। दोनों के प्रवर्तकों ने भले ही मजहब और विचारों में ‘नशे’ आदि को नकारने की बात कही हो, लेकिन नशा और नशे में धुत्त आतंकी, इसी अफ़ीम को लोगों तक पहुँचा कर रिक्रूट करते हैं। नशा सिर्फ नशीली वस्तुओं का नहीं होता, नशा तो बातों का भी हो सकता है कि देखो वो दिन जब पूरा विश्व इस्लाम के झंडे तले होगा, देखो वो दिन जब पूरी दुनिया सर्वहारा के पैरों तले होगी।

किस जगह, किस नेता ने सर्वहारा को दुनिया दे दी? आईसिस के इस्लामी मूल्यों के तथाकथित रक्षक रात में महिलाओं का बलात्कार करते हैं, और दिन में कहते हैं बुर्क़ा पहन कर चलो, वरना दूसरे मर्द तुम्हें देख लेंगे। वैसे ही, लम्पट कामपंथी हास्यास्पद तरीके से लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है, और अपने विरोधियों को ज़िंदा दफ़नाने, बीच सड़क काट देने, और स्टेट मशीनरी का दुरुपयोग करके सैकड़ों लोगों को गायब करने से हिचकिचाता नहीं। इनकी नई पौध, लिंगलहरी कन्हैया बेगूसराय के कोरैय गाँव में विरोध का काला झंडा देखने पर अपने गुंडे छोड़ देता है और जो घर में घुस कर लोगों को पीटते हैं, सर फोड़ देते हैं।

इसलिए, जो ज़मीन पर है उसकी बात करते हैं। जो हो रहा है, उसकी ही बात होनी चाहिए। मार्क्स ने किस समाज की बात की थी, और उसके विचारों से प्रभावित तमाम राष्ट्र और नेता कैसे तानाशाह बन गए, उसे भी याद रखना ज़रूरी है। इस्लाम अगर शांति का मज़हब है, तो फिर उसके नाम पर जो हर दूसरे दिन लोगों को मारा जाता है, उस पर इस्लाम चुप कैसे है?

फिर मैं, किताब में क्या लिखा है, और कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो में कौन सी बात कही गई है, उससे क्या मतलब रखूँ? लिखा तो हमारी भी किताबों में बहुत कुछ था जिसमें इसी इस्लामी आतंक की आग लगा दी गई थी। कहने को तो जेएनयू में भी शिक्षा दी जाती है, और स्वतंत्रता है लेकिन वहाँ ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा तो लगता है।

फिर कम्यूनिस्टों के सत्ता से विरोधियों को किसी भी क़ीमत पर हटाने और आईसिस के ख़िलाफ़त के लक्ष्य में कौन-सा अंतर है? दोनों ही रक्तरंजित विचारधाराएँ हैं। उसके लिए इनके मैनिफेस्टो और मार्क्स की दाढ़ी कितनी अच्छी थी पर मैं क्यों स्खलित होता रहूँ, मेरे लिए तो इनके झंडे का लाल रंग उन करोड़ों लोगों की सामूहिक हत्या का रंग है जो इस आतंकी नक्सल माओवादी लेनिनवादी कामपंथी विचार की बलि चढ़ गए।

इसलिए, जब मैं लिखता हूँ कि अब ऐसी क्रांतियों की प्रासंगिकता नहीं है, तब मैं यह कहना चाहता हूँ कि अब दुनिया से ज़ारशाही और राजाओं का चलन जा चुका है। अब सर्वहारा ही वोट कर के अपने नेता को चुनती है। अब सर्वहारा के ही सर पर कोई पार्टी छत ला रही है, कोई सिलिंडर दे रहा है, कोई बिजली पहुँचा रहा है, कोई सड़क, हॉस्पिटल, स्कूल।

आयुष्मान योजना क्या सर्वहारा के लिए नहीं? गरीब किसानों के लिए तमाम योजनाएँ क्या सर्वाहारा के लिए नहीं? गाँवों की सड़कें क्या सर्वहारा के लिए नहीं? घरों में लटकते बल्ब क्या सर्वहारा के लिए नहीं? शौचालय की व्यवस्था और साफ होती गंगा क्या सर्वहारा के हिस्से नहीं आती? करोड़ों छतें क्या सर्वहारा के परिवार के लिए नहीं?

फिर ये कम्युनिस्ट लम्पट, कामांध कामरेड, लेनिन और माओ जैसे आतंकियों को अपना आदर्श मान कर किसका भला करने का लक्ष्य लिए चल रहे हैं? सर्वहारा की बात तो हर पार्टी कर रही है। कॉन्ग्रेस भी ‘गरीबी हटाओ’ ही कह रही है, भाजपा भी हर भारतीय पर 1,08,000 रूपए हर साल सब्सिडी या योजनाओं के नाम पर ख़र्च कर रही है। केजरीवाल, मायावती, अखिलेश, लालू, नायडू, ममता, कुमारस्वामी, योगी, मोदी सब तो ग़रीबों की ही बात कर रहे हैं।

फिर किस सर्वहारा को सत्ता दिलाने की योजना बना रहे हैं वामपंथी? मतलब साफ है कि ये सब चोर हैं, जिनका उद्देश्य कुछ और ही है। सर्वहारा को सत्ता किस वामपंथी या समाजवादी व्यक्ति ने दे दी, ये इतिहास जानता है। लालू जैसा सर्वहारा जब सत्ता में पहुँचा तो न सिर्फ अपने समय का सबसे बड़ा घोटाला किया बल्कि जानबूझकर शिक्षा से पूरी आबादी को वंचित रखा। कानून व्यवस्था की बर्बादी को चरम तक ले गया। बंगाल और केरल की बात पहले कर चुका हूँ।

इसलिए, ये जंगलों में छुप कर, अपने स्वार्थ के लिए, देश को तोड़ने, सरकारों को डीएस्टेबिलाइज करने, और दूसरी तरह के आतंकियों के लिए एक सपोर्ट सिस्टम बन कर खड़े हो रहे हैं। इनका उद्देश्य अब चिरकुटों वाला हो गया है जिसमें ये किसी गाँव वाले को वोट करने से रोक देते हैं तो खुश हो जाते हैं। आने वाले पाँच सालों में इनको कॉम्बिंग कर के जंगलों से घसीट कर निकाला जाएगा, और इस विचारधारा के ताबूत में अंतिम कीलें बहुत जल्द ठोकी जाएँगी। ज़रूरत थी एक सही तरह के सरकार की, जो आतंकी को आतंकी कहे, वामपंथी चरमपंथी उग्रवादी कह कर, उसे डाउनप्ले न करे।

वो सरकार आई तो ये सिमट गए, वो सरकार फिर आएगी, तो ये लाल सलाम कहाँ जाएँगे, ये कहने की आवश्यकता नहीं है।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
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