मुंबई मेट्रो: ऐसे बॉलीवुड वालों को जब दो टके का नचनिया कहा जाता है तो बुरा नहीं लगता

ये वही हैं जो हमेशा अपनी फिल्मों के आने पर सक्रिय हो जाते हैं या चुनावों के समय में सिग्नेचर कैम्पेन चलाते हैं। इन्होंने कब किसी मुद्दे को आखिरी मुकाम तक पहुँचाया है, मुझे याद नहीं है। ये बरसाती मेंढक हैं, और उनमें से भी वैसे वाले जिन्हें ये भी किसी व्हाट्सएप्प मैसेज से पता चलता है कि बरसात आ गई है, टर्राना चालू किया जाए।

जब पेट में भोजन हो, घर में शीतोष्ण तापमान की समुचित व्यवस्था हेतु वातानुकूलन यंत्र काम कर रहे हों, कहीं जाना हो तो कार उपलब्ध हो, सड़के सपाट हों, हवाई जहाज में चढ़ने पर आपकी समस्या हो कि ‘ओ माय गॉड, दैट टर्बुलेन्स फ्रीक्ड मी आउट!’, तब आप खाली समय में एक छद्म-एक्टिविस्ट बन जाते हैं। छद्म एक्टिविस्ट वो लोग होते हैं जिनकी सारी संवेदना, सारा ज्ञान मुद्दे पर नहीं, समय, सरकार और विचारधारा देख कर निकलती है।

एक जंगल है, जो 1000 एकड़ से बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। वहाँ सरकार को उसकी उतनी ही जमीन चाहिए, जिस पर लगभग 2,700 पेड़ हैं। सरकार ने कुछ पेड़ों को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह लगाया और इस कटाई से होने वाले नुकसान की भरपाई, इसका छः गुणा ज्यादा पेड़ लगा कर करेगी। फिर कुछ एक्टिविस्ट पिक्चर में आते हैं जिन्होंने इस मुद्दे को ऐसे दिखाया है कि पूरा जंगल ही काटा जा रहा है, और अब तो विपदा आने वाली है। भाजपा सरकार तो बस बर्बादी फैला रही है।

विकास बनाम पर्यावरण

कभी सोचिए कि हम जिस घर में रहते हैं, जिस सड़क पर चलते हैं, जिस ट्रेन से लम्बी यात्रा करते हैं, जिस मॉल में खरीदारी करते हैं, जिस फूड कोर्ट में खाना खाते हैं, जिस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हैं, इन सारी जगहों के वहाँ होने से पहले वहाँ क्या था? क्या ये सारी जगहें रेगिस्तानों में बनाई गई थी? क्या ये बड़े-बड़े हाउसिंग प्रोजेक्ट, ये छः और आठ लेन के हाइवे और एक्सप्रेस वे, ये रेल की डबल लाइन, चमचमाते मॉल्स, कारों की फ़ैक्टरियाँ, पावर प्लांट, या कोई भी ढाँचा क्या ऐसी जगह पर बनाया गया जहाँ पहले कुछ भी नहीं था?

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जनसंख्या बढ़ती जाती है, नई तकनीक आती है, सरकारों से हम बेहतरी की उम्मीद करते हैं, हमेशा चिल्लाते हैं कि हम कब तक विकासशील या अविकसित देश रहेंगे, हम क्यों नहीं अमेरिका बन रहे। विकास से क्या मतलब है? विकास से मतलब है नागरिकों का जीवन स्तर बेहतर करने के साथ-साथ, उनके दैनिक जीवन के हर कार्य में सुगमता आए। जैसे कि उसके पास खाने को हो, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा मिले, घर से कहीं जाने के लिए सड़कें सही हों, बिजली की सुविधा हो… आप अपनी इच्छा के हिसाब से इसमें और भी चीजें जोड़ते जाइए।

जैसे-जैसे समय बीतता है, जनसंख्या बढ़ती है, राष्ट्र की अर्थव्यवस्था बेहतर होती है, उसका असर हर नागरिक पर दिखता है। आज से पचास साल पहले जब मध्यम वर्ग बेहतर जीवन के बारे में सोचता होगा तो उसके लिए रात में बिजली का होना भी पर्याप्त लगा करता होगा। वो अपने घर में कार रखने की नहीं सोचता होगा। टेलिफोन एक लग्जरी हुआ करती होगी। टीवी का होना एक ऐसा सपना होता होगा जो मुहल्ले में ही किसी एक व्यक्ति के पास हुआ करता होगा।

समय बदलता गया, हर सरकार ने अपने समय के हिसाब से, उन नागरिकों की जरूरतों के लिए काम किए। बिजली के लिए पावर प्लांट बने, पहले दो, फिर दस… सुगम आवागमन के लिए पतली सड़कें बनीं, जो बाद में चौड़ी हुईं, फिर पतली सड़कें गाँवों में पहुँची, फिर छोटे शहरों की सड़कें चौड़ी हुईं, फिर एक्सप्रेस वे बने… लोगों ने कार लेना शुरु किया, डिमांड बढ़ा होगा तो फ़ैक्ट्री बनी होगी। घरों में एसी लगने लगे।

फिर नौकरियों के बढ़ने के कारण ऑफ़िस स्पेस बने। लोग गाँवों से शहरों की ओर निकले। शहरों में जमीन उतनी ही थी, लोग बढ़ते गए। नए घरों की जरूरत पड़ी, तो आवासीय परिसर बने, नए कॉलेज खुले, कार्यलयों के लिए बड़ी-बड़ी इमारतें बनीं। इन कार्यालयों तक पहुँचने के लिए एसी बस चले, एसी कारें चलीं, मेट्रो ट्रेन चली।

विकास हमेशा पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाता है

कहने का तात्पर्य यह है कि विकास के कार्यों के लिए, ऊपर देखती अर्थव्यवस्था के लिए, नागरिकों के जीवन स्तर की बेहतरी के लिए आप उसी जमीन का दोहन करते हैं, जो आपके पास है। अगर मुंबई में ट्रैफिक की समस्या है, तो उसके लिए सरकार को मेट्रो ट्रैक बनाना होगा। वो मेट्रो ट्रैक उसी इलाके से जाएगी जहाँ से उसे एक जगह से दूसरी तक जाने के लिए कम से कम दूरी तय करनी पड़े। और आपको पता ही है कि मुंबई में रेगिस्तान तो है नहीं कि वहाँ से ट्रैक निकाला जाए या मेट्रो के डिब्बों के डीपो के लिए समंदर में प्रोजेक्ट लगाया जाए।

वैसा करना निहायत ही बेवकूफी की बात होगी। कुछ चीजें आपको करनी होती हैं क्योंकि वैसा करना वृहद परिदृश्य में उचित होता है। ऐसा नहीं है कि सरकार बस पेड़ काट ही रही है। इस प्रोजेक्ट के लिए तो छः गुणा पेड़ कटने के बदले लगाए जा ही रहे हैं, इसके अलावा हर हाइवे के किनारे सरकार ने सवा अरब पेड़ लगाने का भी लक्ष्य लिया है और उसके लिए काम भी चालू है। तो, ये पेड़ किसके लिए लगाए जा रहे हैं?

इसी तरह की वाहियात बात विकसित देश करते हैं कि पर्यावरण को बहुत नुकसान हो रहा है इसलिए विकासशील देश पावर प्लांट न लगाएँ, ये न करें, वो न करें! मतलब, आपने अपने विकास के लिए पर्यावरण को बर्बाद कर दिया, फ़ैक्ट्री लगाए, पावर प्लांट बनाए, कारों से जमीन पाट दी, हर घर में एसी और हीटर चल रहे हैं, लेकिन गरीब देश अपने नागरिकों को बिजली भी न दे!

विकास के प्रोजेक्ट्स चुनाव नहीं, मजबूरी हैं। कौन चाहता है कि वो ट्रैफिक में फँसा रहे? कौन चाहता है कि बिजली हमेशा न हो? क्या हाल ही में अर्थव्यवस्था पर लोग ज्ञान नहीं दे रहे थे कि जीडीपी ग्रोथ कम हो रही है? आखिर ये सड़कें अर्थव्यवस्था में योगदान नहीं देती जब ट्रकों से सामान नियत समय से पहुँचता है? आखिर ये मेट्रो जो लाखों लोगों को हर दिन कहीं से कहीं ले जाता है, धुआँ नहीं छोड़ता, स्टेशनों के ऊपर सोलर पैनल लगा कर आत्मनिर्भर होना चाहता है, तो क्या उससे राष्ट्रहित के कार्य नहीं होते? क्या इससे इकॉनमी की बेहतरी नहीं होती?

यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि गरीबों के पेट में अन्न भी जरूरी है और चंद्रयान भी। विज्ञान और तकनीक में विकास, वैसे प्रोजेक्ट्स में निवेश करना अंततः उस आखिरी इंसान की ही मदद है जो हर तरह से उपेक्षित है। विकास के कार्यों का फल धीरे-धीरे नीचे तक पहुँचता है। सड़कें बनेंगी तो व्यापार सुगम होगा, व्यापार सुगम होगा तो लोगों के पास पैसे होंगे खर्च करने को, लोग पैसे खर्च करेंगे तो चीजों का उत्पादन होगा, उत्पादन होगा तो रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, रोजगार मिलेगा तो सरकार को दोनों तरह के टैक्स का लाभ होगा, उस टैक्स के पैसे से उस गरीब को दो रुपए किलो के हिसाब से गेहूँ देना संभव हो पाएगा।

छद्म-एक्टिविस्ट और इनके मौसमी विरोध

लेकिन हमने हमेशा देखा है कि कई बार एक अस्वस्थ चर्चा पैदा करने की कोशिश होती है जहाँ सड़कें बनाना या फ़ैक्ट्री लगाना एक राक्षसी कृत्य की तरह दिखाया जाता है, और साथ ही, मैनुफैक्चरिंग सेक्टर के परफॉर्मेंस के नीचे जाने पर भी सरकार को मूकदर्शक कह कर नकारा बताया जाता है। लोग पूछते हैं कि बुलेट ट्रेन की क्या जरूरत है, उसकी जगह इतने हजार ट्रेन आ जाएँगे। फिर तो चंद्रयान की भी जरूरत नहीं, अमेरिका भेज ही रहा है, किताबों में पढ़ लेंगे कि क्या हो रहा है। राजधानी ट्रेन भी क्यों बनाएँ, उतने पैसों में तो लाखों सायकिल आ जाएँगे, जो कि हर नागरिक को बाँट दी जाए ताकि वो पटना से दिल्ली, पहले से ही बनी सड़कों पर रैमसन्स का रेडियो पर ‘लहरिया लूटा ए राजा’ बजाते हुए निकल ले…

ये कुतर्क है क्योंकि अगर आपकी समझ में यह नहीं आता कि टेक्नॉलॉजी से मानवता की समस्याओं को दूर किया जा सकता है, तो आपका विरोध सिर्फ विरोध करने के लिए है। ये जो लोग विरोध के लिए जुटे हैं, वो वही लोग हैं जिनकी बात शुरुआत में की गई है। इनका पेट भरा हुआ है, घरों में एसी है, कारों में एसी है, बड़ी अट्टालिकाओं में रहते हैं और समय से काम पर न पहुँचना इनके लिए एक वांछित गुण है, “अरे! सर आ गए, शूटिंग चालू करो।”

ये बॉलीवुड के वो सेलिब्रिटी हैं जो किसी व्हाट्सएप्प ग्रुप का हिस्सा हैं जहाँ एक मैसेज फॉर्वर्ड किया जाता है कि फलाँ बात को ट्रेंड कराना है, चर्चा में लाना है। बेचारे कॉपी-पेस्ट करके, एक ही ट्वीट कर देते हैं। वो रीट्वीट होता है, अनभिज्ञ लोग चिंतित हो जाते हैं कि सरकार तो जंगलों को काटने पर तुली है, भावावेश में वो भी हैशटैग-हैशटैग खेलने लगते हैं।

इनके नाम देखिए आप कि ये लोग कौन हैं! ये वही हैं जो हमेशा अपनी फिल्मों के आने पर सक्रिय हो जाते हैं या चुनावों के समय में सिग्नेचर कैम्पेन चलाते हैं। इन्होंने कब किसी मुद्दे को आखिरी मुकाम तक पहुँचाया है, मुझे याद नहीं है। ये बरसाती मेंढक हैं, और उनमें से भी वैसे वाले जिन्हें ये भी किसी व्हाट्सएप्प मैसेज से पता चलता है कि बरसात आ गई है, टर्राना चालू किया जाए।

इसलिए, जब इन्हें कोई दो टके की नचनिया कह कर हिकारत भरी निगाहों से देखता है तो मुझे बुरा नहीं लगता। अगर इस फिल्म इंडस्ट्री के सेलेब्स इस तरह के महामूर्ख और मालाफाइड इंटेशन वाले मोटिवेटेड लोग हैं, तो इन्हें हर तरह से धिक्कारना चाहिए। इनसे उम्मीद की जाती है कि ये लोग विचारधारा से परे जा कर, विवेक का इस्तेमाल करते हुए, या किसी जानकार से समझते हुए, दोनों पक्षों को तौलने के बाद, अपनी राय रखें।

लेकिन होता क्या है? होता है इसके उलट यह कि किसी के कहने पर, अपनी फिल्म के रिलीज के समय, चार लोग दस मिनट के भीतर एक ही तरह की शब्दावली के साथ ट्वीट करते हैं, और अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं यह सोच कर कि वो जागरूक नागरिक हैं।

विकास इसलिए जरूरी है क्योंकि किसी मेट्रो परियोजना के कारण, धुँआ छोड़नेवाली गाड़ियों में कमी आएगी, लोग अपनी कार छोड़ कर मेट्रो से चलेंगे जिसके परिचालन में पर्यावरण को सीधा नुकसान नहीं होता। आप कहेंगे कि मेट्रो की बिजली भी तो किसी थर्मल पावर प्लांट से आती होगी। आपकी बात बिलकुल सही है, लेकिन एक मेट्रो कोच की लंबाई में तीन से चार कारें आती हैं, जिसमें अगर चार लोग भी बैठें तो कुल सोलह होंगे। जबकि एक मेट्रो कोच में पचास तो सीटें होती हैं, और डेढ़ सौ लोग खड़े हो सकते हैं। ये फर्जी के कुतर्क हैं जहाँ आपको बताया जाएगा कि सड़क पर थूक कर तुमने गलती की है, इसलिए तुम अब किसी बलात्कारी को गलत नहीं कह सकते।

ऐसी परियोजनाओं के आने या न आने से इस तरह के अमीरों को फर्क नहीं पड़ता। वो शायद मेट्रो में कभी नहीं चढ़ेंगे, क्योंकि उनके पास ड्राइवर के साथ कार उपलब्ध है। वो बुलेट ट्रेन पर भी नहीं बैठेंगे, क्योंकि वो हवाई जहाज से आते-जाते हैं। वो अगर सेट पर लेट भी पहुँचेंगे तो उनकी सैलरी नहीं कटेगी। उनके बारे में खबरें छपती हैं कि फलाँ साहब के पास सी-फेसिंग अपार्टमेंट है और उन्हें कारों का बड़ा शौक है। इसलिए ये अपने घर के सामने से फ्लाइओवर के जाने पर भी विरोध करते हैं कि इनके घर का व्यू खराब हो जाएगा, शोर आएगा घर में।

इन्हें इससे मतलब नहीं है कि लाखों लोगों के जीवन में किसी फ्लाइओवर के आने से, मेट्रो ट्रैक बिछ जाने से समय की बचत होगी, क्योंकि पब्लिक के मुद्दे उठाने के नाम पर इन्होंने हमेशा निजी स्वार्थ या फिर किसी व्यक्ति, किसी विचारधारा के प्रति घृणा को हवा दी है। ये कुतर्की लोग हैं जो अपनी मूर्खता में फॉर्मूला वन के रेस पर सवाल उठा देंगे कि ये कार तो एक लीटर में बस दो किलोमीटर चलती है, लेकिन वो भूल जाते हैं कि साल के बीस रेस में, जितनी तकनीक का इस्तेमाल इन कारों में होता है, जितने वैज्ञानिक और इंजीनियर इस पर काम करते हैं, वो अंततः दुनिया की हर कार तक एक नए फीचर के रूप में पहुँचता है। और वही फीचर या तकनीक, पूरी दुनिया के कारों का करोड़ों लीटर तेल बचाती है, सुरक्षित बनाती है और ब्रेकिंग से उत्सर्जित होनी वाली ऊर्जा का पुनः इस्तेमाल कर पाती है।

लेकिन इन्हें क्या, मेकअप पोतना है, व्हाट्सएप्प देखना है, और हैशटैग ट्रेंड कराना है क्योंकि क्यूटनेस में इनका कोई सानी नहीं।

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