Monday, April 12, 2021
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लिंगलहरी कन्हैया कुमार के गुंडे चुनावी गाड़ियों में डंडे-ईंट-पत्थर लेकर क्यों चलते हैं?

सतमासू कम्युनिस्ट और कर भी क्या पाएगा। इन्क्यूबेटर से निकले चूज़ों के लिए बाहर में सर्वाइव करना मुश्किल होता है। ये प्रयोगशाला के अविकसित और विकृत भ्रुण हैं जिन्होंने न विचार को समझा, न समाज को। विचार से हिंसा उठाई और समाज को उपहार स्वरूप बाँट रहे हैं। ये न ठीक से वामपंथी हो पाए, न भारत के नागरिक। वामपंथ से बस लाठी, ईंट और पत्थर ही उठा पाए हैं।

कुछ दिन पहले जेएनयू के पूर्व लिंगलहरी अध्यक्ष श्री कन्हैया कुमार के गुंडों का चुनावी क़ाफ़िला बेगूसराय के टेकनपुरा गाँव से निकला। काली स्थान के पास उनकी गाड़ी रुकी तो कुतूहल में अंकित नाम के लड़के ने गाड़ी के पास जा कर देखने की कोशिश की। अंकित के शर्ट पर भाजपा का सफ़ेद कमल वाला चिह्न लगा हुआ था। फिर गुंडों ने बाताबाती की, और थोड़ी ही देर में गाड़ी से डंडे निकाल कर अंकित को बुरी तरह पीट दिया।

अंकित समेत कई ग्रामीणों ने बताया कि उनके पास ‘हथियार’ या बेगूसराय की बोलचाल की भाषा में ‘समान’ भी था। बेगूसराय में ‘समान’ का मतलब ‘सामान’ यानी पिस्तौल या बंदूक जैसा हथियार होता है। कन्हैया के मुँह से शराब की गंध आ रही थी, और सिर्फ गाड़ी के पास किसी भाजपा समर्थक को देख कर उसने उसका कॉलर पकड़ा और उसके गुंडों ने पुलिस की मौजूदगी में मार-पीट की।

कन्हैया कुमार एक छोटे नेता हैं जो जेएनयू में पहले लड़कियों के सामने लिंग लहरा कर सार्वजनिक स्थल पर मूत्र विसर्जन करने और लड़कियों को धमकाने के दोषी पाए जा चुके हैं। साथ ही उनकी ख्याति में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाला कलंक भी लगा हुआ है। इनकी बुद्धि का स्तर इतना ज़्यादा है कि सिलिंडर चार दिन में खत्म हो जाता है। लेकिन, सब ने इनको चढ़ा दिया है तो ये गाड़ी पर चढ़ कर घूम रहे हैं, और जेएनयू कैम्पस से सीधे सांसद होने के लिए माओवंशी कामपंथियों के सारे तरीके अपना रहे हैं।

अगर वहाँ पुलिस नहीं होती, तो ‘समान’ का वामपंथी तरीके से इस्तेमाल करते हुए सर्वहारा की ख़ूनी क्रांति की बलि अंकित वैसे ही चढ़ जाते जैसे अस्सी और नब्बे के दशक में कन्हैया के गाँव बीहट में हर दूसरे दिन चढ़ जाया करते थे।

बीहट गाँव मेरे पूर्वजों का गाँव है। उस गाँव ने लगभग 15 साल कम्यूनिस्टों के उस ख़ूनी दौर को झेला है जब वामपंथियों और उनके विरोधियों में लाश का जवाब लाश से दिया जाता था। ये बिहार का वह बुरा दौर था जब गुंडई, रंगदारी और हत्याओं के तमग़े सर पर लेने वाले विधायक हुआ करते थे, और किसी को सबक सिखाना, वामपंथी तरीके से उसकी हत्या करना ही हुआ करता था।

बेगूसराय के इस गाँव ने वो बुरा दौर देखा है जब लगातार खबरों में किसी की हत्या हुआ करती थी। बड़े जतन से इस गाँव ने उस दौर से पीछा छुड़ाया है। आपको मौका लगे तो 45-50 साल के ऊपर के किसी भी ग्रामीण व्यक्ति से बीहट के उस दौर की बात कीजिए, पता चल जाएगा कि वो कम्यूनिस्टों का गढ़ क्यों था।

ख़ैर, लिंगलहरी कन्हैया कुमार छोटे नेता हैं, इसलिए जान नहीं ली। ‘समान’ लेकर चलते हैं, लेकिन फायर नहीं कर पाए क्योंकि ये नब्बे का बिहार नहीं है कि पुलिस भी मूक दर्शक बनी देखती रहती। बड़े नेता होते और बीहट में नब्बे की तारीख़ होती तो अंकित शायद अगले दिन किसी खेत में, कई टुकड़ों में कटा हुआ मिलता। वो अगले दिन के अख़बार में ‘बीहट में हुई एक और हत्या’ की एक संख्या बन कर रह जाता।

लेकिन, ये नब्बे का बीहट नहीं है, ये नब्बे का बिहार नहीं है, और ये नब्बे का वामपंथ नहीं है। हिंसक विचारधारा से और क्या उम्मीद की जा सकती है। कन्हैया उसी माहौल की पैदाइश है जहाँ विश्वविद्यालय चुनावों में अपने मतलब के लिए नजीब अहमद को गायब कर दिया जाता है। ये उसी माहौल से बाहर आए हैं जहाँ विरोधियों को पीटना, घेर कर बुरी तरह से मार देना, और हाँ, सीडी देने के बहाने नशा मिला कर बलात्कार करना एक आम बात है।

कन्हैया कुमार के पीछे उसके विश्वविद्यालय के वामपंथी कामरेडों का पूरा इतिहास चलता है जहाँ वो अपने महिला काडरों का इस्तेमाल विरोधियों पर सेक्सुअल मोलेस्टेशन के आरोप लगा कर उनकी छवि धूमिल करने के लिए करते रहे हैं। हिंसा और सेक्स तो कामरेडों का प्रमुख हथियार है, यूनिवर्सिटी में तो जबरदस्ती करते ही हैं, बाद में, विद्यार्थी से नक्सली बनने तक, जंगलों में ‘नारी देह कम्यून की प्रॉपर्टी है’ के नाम पर महिला काडरों को आईसिस की तर्ज़ पर सेक्स स्लेव बना कर रखते हैं। जब कोई इस नर्क से बाहर निकल कर आती है, तो पता चलता है कि सर्वहारा की क्रांति में महिला काडरों की योनियों का कितना बड़ा योगदान, वामपंथी जबरदस्ती लेते हैं।

तो, कन्हैया ने जो किया या जो आगे भी करेगा, वो आश्चर्यजनक नहीं है। आश्चर्यजनक यह है कि अंकित ज़िंदा है और विडियो पर हिम्मत के साथ बता पा रहा है कि कन्हैया के गुंडों ने उसके साथ डंडों से मार पीट की और उसकी गाड़ी में ईंट-पत्थर और डंडे थे, तथा उसके साथ के गुंडों की कमर में ‘समान’ था।

ये बात और है कि कल को रवीश कुमार कन्हैया की गाड़ी में डंडे, ईंट और पत्थर के टुकड़े होने की बात पर चालीस मिनट का प्राइम टाइम या रवीश की रिपोर्ट कर दें और कन्हैया की गाड़ी में कैमरा घुसा कर यह स्क्रिप्ट पढ़ दें: “मैं अभी कन्हैया की गाड़ी के पास हूँ। यह वही गाड़ी है जिसके भीतर डंडे, ईंट और पत्थर के टुकड़े होने की बात कही गई है। मैं अपने सहयोगी कैमरामैन से कहूँगा कि वो गाड़ी खोलने से लेकर, उसकी सीटों के नीचे तक दिखाएँ ताकि पता चले कि मोदी जी के समर्थक डर के मारे कन्हैया पर जो आरोप लगा रहे हैं उनमें कितनी सच्चाई है।

“आप देख सकते हैं कि मटिहानी के बलुआ मिट्टी और बभनगामा के गोरकी माटी की धूल के अलावा, इस गाड़ी में कुछ भी नहीं है। हाँ हैं तो कुछ पानी की बोतलें जो एक गरीब घर का बेटा किसी के दिए चंदे से पी पा रहा है। कन्हैया से मैंने पूछा कि वो मिनरल वाटर कैसे पीते हैं तो उन्होंने कहा कि सिर्फ बोतल ही मिनरल वाटर की है, इसमें पानी तो रास्ते के किसी चापाकल का ही है।

“कार में तो खैर कुछ नहीं निकला, अब मैं इनके साथियों की कमर में कैमरा घुसाऊँगा और दर्शकों को दिखाऊँगा कि कन्हैया के साथियों की कमर में सिवाय काली डोरी के, जिसे बेगूसराय में डरकडोर कहते हैं जो बुरी नज़रों से बचाने के लिए बच्चों की कमर में बाँधा जाता है, यहाँ कोई हथियार या समान नहीं है। मैं यह देख पा रहा हूँ कि सत्ताधीश, सुप्रीम लीडर जब डर जाता है तो वो एक छोटे से लड़के पर, जो चंदा माँग कर चुनाव लड़ रहा है, जिसके समर्थन में कश्मीर से लेकर कर्नाटक और बम्बई से लेकर बिहार तक के लोग आ जाते हैं, वो सत्ताधीश इन पर किस तरह के हमले करता है।”

मीडिया के एक गिरोह को केजरीवाल से लेकर प्रियंका गाँधी ने जिस तरह से धोखा दिया है, अब उनकी सारी उम्मीद इस लिंगलहरी पर ही टिकी हुई है। लेकिन कन्हैया कुमार नामक चैप्टर इस देश की परिचर्चा से तीस मई तक गायब हो जाएगा, जब वामपंथियों के ढाबे की उड़ी हुई छत और बैठने के पत्थरों के नीचे की ज़मीन जा चुकी होगी।

कन्हैया इस गिरोह का एक प्रयोग है। कन्हैया की गुंडई में पुरानी वामपंथी परिपक्वता नहीं आई है। वो अभी लिंग लहराने और नारेबाज़ी में शरीक होने तक ही आ पाया है। उसे केरल के वामपंथियों की तकनीक नहीं पता कि कैसे सड़क पर भाजपा या संघ के कार्यकर्ता को फूल बेचते वक्त काट दिया जाता है। उसे अपने केरल के वैचारिक पूर्वजों की वह तकनीक नहीं मालूम कि नमक की बोरियों के साथ कैसे ज़िंदा दफ़नाने पर हड्डियाँ भी नहीं मिलती।

कन्हैया कुमार इस चुनाव के बाद डिबेट से भी गायब हो जाएगा, और उसकी आमदनी जो भाषणों से होती थी, वो भी बंद हो जाएगी। उसे एक उम्मीद के तौर पर पाक अकुपाइड पत्रकारों से लेकर छद्म बुद्धिजीवियों का समर्थन मिलता रहा है वरना इस व्यक्ति को न तो बोलने का सहूर है, न सही तरीके से मूत्र त्यागने का। ये वो महानुभाव हैं जो लालू के पाँव छूते हैं जिसने चंद्रशेखर जैसे प्रभावशाली छात्र नेता को सहाबुद्दीन की मदद से मरवाया था।

वही चंद्रशेखर जो मेरे सैनिक स्कूल के सीनियर थे। वही चंद्रशेखर जिसकी वक्तृता का ‘व’ कन्हैया अपने पूरे जीवन में हासिल नहीं कर सकता। वही चंद्रशेखर जिसमें यह हिम्मत थी कि वो सड़कों पर खड़े होकर लालू के प्राइम टाइम में उसकी गुंडागर्दी के खिलाफ घंटों बोल सकता था। वही चंद्रशेखर जिसे सुनने के लिए जेएनयू के प्रांगण में लोग अटते नहीं थे।

दुर्भाग्य से कन्हैया भी उसी विश्वविद्यालय की एक सड़ी-गली सोच की पैदाइश है। कन्हैया भी उसी बिहार का बदबूदार उत्पाद है जिसने महानता के सिवाय और कुछ देखा ही नहीं था। कन्हैया उसी बेगूसराय की धरती का बेटा बन कर आज कल खुद को बेच रहा है जहाँ से दिनकर जैसे लोग पैदा हुए हैं।

सतमासू कम्युनिस्ट और कर भी क्या पाएगा। इन्क्यूबेटर से निकले चूज़ों के लिए बाहर में सर्वाइव करना मुश्किल होता है। ये प्रयोगशाला के अविकसित और विकृत भ्रुण हैं जिन्होंने न विचार को समझा, न समाज को। विचार से हिंसा उठाई और समाज को उपहार स्वरूप बाँट रहे हैं। ये न ठीक से वामपंथी हो पाए, न भारत के नागरिक। वामपंथ से बस लाठी, ईंट और पत्थर ही उठा पाए हैं। इनकी बैसाखियाँ मई के अंत तक झटके से खींच ली जाएगी, तब यही यूथ आइकॉन रेंग भी नहीं पाएगा।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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