Thursday, October 22, 2020
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शाहीन बाग की औरतें: कब माँगेंगी हलाला से, माहवारी आते ही निकाह कर देने की रवायत से आजादी

मैं जामिया की उन पढ़ी-लिखी लड़कियों से इन बातों को समझने की उम्मीद नहीं करती। जिन्होंने ऊँची शिक्षा हासिल करने के बाद भी हिजाब और बुर्के को मॉय लाइफ-मॉय रूल्स का हिस्सा बताया। बल्कि मैं उन औरतों से अपनी बात समझने को कह रही हूँ, जिन्हें आज भी हलाला का नाम सुनकर गुस्सा आता है और इसका समर्थन करने वालों से घृणा होती है।

भारत में मुस्लिमों में निरक्षरता की दर सबसे अधिक है। करीब 43 प्रतिशत। उससे भी दयनीय स्थिति है मुस्लिम महिलाओं की। दो दशक पहले तक भारत में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता का दर 5 प्रतिशत से भी कम था। आज बदलते वातावरण ने और सरकार के प्रयासों ने इन्हें करीब 30 प्रतिशत के लगभग पहुँचाया है। हालाँकि, ये पर्याप्त नहीं हैं। लेकिन फिर भी सराहनीय है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक स्थिति पर बात हमेशा रूढ़िवादी मजहबी पैरोकारों द्वारा तय किए पैमानों के आधार पर की जाती है और मुस्लिम महिलाएँ इसे ही अपना हकूक समझती हैं। इस्लामिक पैरोकार उनके लिए जिन चीजों की परिभाषा तय करते हैं, वो उसी के आधार पर अपने सपने बुनती हैं। उसी की जमीन पर अपनी सीमा तय करती हैं। और, उसी की सीमा में रहकर आवाज़ उठाती हैं। मेरी इस बात का ताजा उदाहरण शाहीन बाग पर बैठीं 500 से अधिक महिलाएँ हैं।

शाहीन बाग में 700-800 मीटर के अच्छे-खासे दायरे में पिछले डेढ़ महीने से 500 से अधिक मुस्लिम महिलाएँ एक प्रदर्शन कर रही है। वो भी सीएए/एनआरसी के ख़िलाफ। एक ऐसे कानून के ख़िलाफ़ जिससे वास्तविकता में उनका या उनके समुदाय के किसी भी वर्ग का कोई सरोकार ही नहीं है। लेकिन फिर भी वे बैठी हैं। यहाँ मुस्लिम समुदाय की छोटी बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिला तक कड़ाके की ठंड में अपने घर से सारे कामकाज़, पढ़ाई-लिखाई छोड़ उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। और इस प्रदर्शन को वो अपने अधिकारों और औचित्य को बनाए रखने की लड़ाई बता रही हैं। खैर! मुझे किसी वर्ग द्वारा अधिकारों के नाम पर उठाई जा रही आवाजों से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन शाहीन बाग पर बैठीं महिलाओं से कुछ सवाल जरूर हैं।

सवाल- उन मामलों से जुड़े हैं, जिनपर वो हमेशा चुप रहीं। सवाल उन मुद्दों से जुड़े हैं, जिनपर मुस्लिम महिलाओं को सदियों से प्रताड़ित किया जाता रहा। सवाल भारत में मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति, राजनैतिक स्थिति से जुड़े हैं। सवाल तीन तलाक से जुड़े हैं, हलाला से जुड़े हैं, बहुविवाह से जुड़े हैं और, साथ ही माहवारी आते ही निकाह कर देने की रवायत से जुड़े हैं। जिसके आधार पर कोर्ट को भी चुनौती दी गई

आज शाहीन बाग पर 15 दिसंबर से धरने पर बैठी मुस्लिम महिलाएँ इस प्रदर्शन को अपनी ताकत और अखंडता का पर्याय बता रही हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि सदियों से हजारों बंदिशों में जकड़ी मुस्लिम महिलाओं को कभी अपने अधिकारों के बारे में सोचने की फुरसत नहीं मिली। उन्हें यही नहीं पता चला कि ये उनका अधिकार कि वो शिक्षा प्राप्त करें। अपनी जरूरत के मुताबिक संपति अर्जित करें। अपने राय अभिव्यक्त करें। हिजाब से आजादी पाएँ। हलाला के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ। और शरिया के अनुरूप नहीं, बल्कि संविधान के मुताबिक जीवन का गुजर बसर करें।

ऐसा शायद इसलिए क्योंकि यदि वे अपने समुदाय के पैरोकारों से इन अधिकारों की माँग करती हैं, तो मजहबी उलेमा और उनके खुद के घरवाले उनके ख़िलाफ़ हो जाते हैं। घर की महिलाएँ ही महिलाओं को उनके लिए बने नियम-कानून बताने लगती हैं। उन्हें निकाह के लिए दबाव बनाया जाता है। निकाह के बाद तीन तलाक आम बताया जाता है। और तलाक के बाद हलाला को केवल अपने शौहर के पास दोबारा लौटने की एक प्रक्रिया।

अभी तक मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में शाहीन बाग का आंदोलन जारी है। लेकिन इसी बीच एक मुस्लिम महिला को उसके शौहर ने तलाक दे दिया। उसके ससुर ने उसका बलात्कार कर दिया। उसका हलाला करवाया गया, उसे मारने की धमकी मिली। लेकिन अधिकारों की दुहाई देने वाली किसी महिला को उसका दर्द नहीं दिखा। अगर मान लिया जाए, कि मुस्लिम महिलाओं का विवेक उनके अधिकारों के लिए सीएए बनने के बाद जागा। तो भी ये घटना बाद की है। क्या डेढ़ महीने से ज्यादा एनडीए सरकार पर आरोप मढ़ने वाली इन महिलाओं को एक भी बार ये मामला आवाज़ उठाने वाला नहीं लगा? या इससे पहले अनेकों बार हुई मजहबी बर्बरता पर इनका दिल नहीं पसीजा?

भाजपा सरकार के केंद्र में आने के बाद तीन तलाक कानून अस्त्तिव में आया। यूपी समेत देश की कई महिलाओं ने इसके लिए नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की इसके लिए तारीफ की। जाहिर है, इस प्रथा के लिए मुस्लिम महिलाओं में कहीं टीस थी। लेकिन बिना आवाज़ के ये टीस दबी थी। जैसे ही तीन तलाक कानून बना, पीड़िताओं में खुशी की लहर दौड़ गई।

इसी तरह हलाला, बहुविवाह जैसी प्रथाएँ भी हैं। गाँव कनेक्शन की एक रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम महिलाओं के हित में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन की अध्यक्षा ने नाम न छापने की शर्त पर बताया था कि सहारनपुर जिले में महिलाओं का हलाला करवाने के लिए मदरसों में लड़कों को रखा जाता है। यही नहीं, उम्र और सुन्दरता के अनुसार वो महिलाओं के हलाला का पैसा लेते हैं। अब सोचिए, इनकी स्थिति कितनी बदतर हैं। लेकिन फिर भी आवाज़ उसपर उठानी है, जिसपर इनका समुदाय इजाजत दे।

मैं जामिया की उन पढ़ी-लिखी लड़कियों से इन बातों को समझने की उम्मीद नहीं करती। जिन्होंने ऊँची शिक्षा हासिल करने के बाद भी हिजाब और बुर्के को मॉय लाइफ-मॉय रूल्स का हिस्सा बताया। बल्कि मैं उन औरतों से अपनी बात समझने को कह रही हूँ, जिन्हें आज भी हलाला का नाम सुनकर गुस्सा आता है और इसका समर्थन करने वालों से घृणा होती है। जिन्हें संविधान में मिला अपना शिक्षा का अधिकार एक लोकतांत्रिक अधिकार लगता है। 18 साल से कम उम्र में शादी गैरकानूनी लगती है। जो माहवारी होते ही खुद को निकाह करने का सामान नहीं समझतीं। जिसके पीछे कट्टरपंथियों की दकियानूसी सोच, कठमुल्लों के दबाव और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट-1937 बहुत बड़ी वजह हैं।

हलाला

आज अपने मजहब को ‘हलाला’ जैसे गंभीर रोग से पीड़ित देखने के बावजूद शाहीन बाग पर बैठी महिलाएँ चुप हैं और एक बिन सिर-पैर के विषय पर नारे बुलंद कर रही हैं। बड़े-बड़े लेखक उन्हें नई क्रांति लिखने वाला करार दे रहे हैं। महिलाओं की आजादी और नारी सशक्तिकरण पर बात करने वाले बुद्धिजीवि इन महिलाओं का समर्थन कर रहे हैं। उनके हिजाब को उनकी पहचान बता रहे हैं। इसलिए ये हलाला से जुड़े कुछ बयान, जो शायद किसी के भी प्रोपगेंडा को ध्वस्त करें और समझने में मदद करें कि मुस्लिम महिलाओं के पास अपने लिए सही विषय पर आवाज उठाने की भी आजादी नहीं है। नीचे दिए बयान बता रहे हैं कि वास्तविकता में हलाला क्या है?

लखनऊ के चौक में रहने वाली फिरदोस (27 वर्ष) बताती हैं, “बीवी से मन भर गया या कोई दूसरी औरत पसन्द आ जाए तो पहली बीवी को तलाक दे दो। जब पहली औरत की कमी महसूस होने लगे तो हलाला करवा दो और निकाह कर लो। औरतें मजबूरी में या अपने बच्चों के कारण हलाला करवाने के लिए तैयार हो जाती हैं।”

पीसीएस अधिकारी रहे और पूर्व विशेष सचिव गृह मोहम्मद इदरीस अम्बर बहराइची के मुताबिक “मेरे गाँव में मेरा एक दोस्त है जिसकी बीवी बहुत सुन्दर है। कई लोगों ने उसकी बीवी की तारीफ कर दी तो गुस्से में आकर तलाक दे दिया। उसके बाद अफसोस करने लगे। लेकिन तलाक दे चुके थे। बीवी सुन्दर थी इसलिए हलाला करवाने में डर था कि कही दूसरे आदमी ने निकाह के बाद तलाक न दिया तो क्या करेंगे। इसलिए उसने हलाल के लिए अपने बहनोई को तैयार किया। लेकिन उसकी बीवी ने हम बिस्तर होने से मना कर दिया।”

बिजनौर की रहने वाली 40 वर्ष की एक महिला ने बताया, “मेरे पति ने शराब की हालात मुझे तलाक दे दिया और उसी रात वो मेरे साथ सोये, सुबह मुझे मायके छोड़ आए और बोले, तेरा मेरा कोई रिश्ता नहीं, न जिस्मानी, न जुबानी। मैंने अपने ससुराल और मायके में सब कुछ साफ-साफ बता दिया तो बोले ये तलाक नहीं माना जाएगा। क्योंकि दुबारा सोये थे। लेकिन काज़ी ने इसे तलाक मान लिया। मेरे पति बोले एक शर्त पर साथ रखेंगे जब ये हलाला करवा ले। हमने अपने बच्चों के खातिर हलाला करवा लिया, मगर मैं अपने को कभी माफ नहीं कर पाई। यह औरत की इज्ज़त के साथ खिलवाड़ करना है। यह वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देना है।”

नोट: हलाला पर उपरोक्त बयान गाँव कनेक्शन की रिपोर्ट से लिए गए हैं।

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