Thursday, April 2, 2020
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कुरान में बुर्का शब्द का कहीं भी वर्णन ही नहीं… ‘मर्दों की आँखों की दरिंदगी’ से बचाव वाला तर्क फिर कहाँ पैदा हुआ!

बुर्का का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है। बुर्क़ा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है, लेकिन इस्लाम का हिस्सा नहीं है। जहाँ पर इस्लाम का जन्म हुआ, उस हिस्से की औरतों ने कभी भी पर्दा किया ही नहीं।

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बुर्का एक शब्द नहीं बल्कि एक प्रतिबन्ध है| अगर आपको चित्रात्मक तरीके से प्रतिबन्ध को दिखाना हो तो आप बुर्का पहने हुए एक महिला को दिखा सकते हैं। जब पूरे विश्व में महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, उसी समय विश्व का एक बहुत बड़ा तबका बुर्के के द्वारा महिलाओं की आजादी छीनने को सही ठहराने में लगा हुआ है।

किसी मुसलमान से पूछिए बुर्का क्यों ज़रूरी है? जवाब में वो तपाक से यही बोलेगा कि कुरान में लिखा है। अगर थोड़े मौलाना टाइप के किसी आदमी से पूछेंगे कि बुर्क़ा महिलाएँ ही क्यों पहनती हैं? तो वो पूरा तरीका बताने लग जाएगा कि किस टाइप का बुर्क़ा पहनने को कुरान में बोला गया है। इन्हें ये तक नहीं पता है कि कुरान में वास्तव में क्या कहा गया है। ऐसे लोग भले ही अपने आपको इस्लाम का प्रचारक समझते हों लेकिन उनमें बहुत ज्यादा ज्ञान की कमी ही है। इन दोनों व्यक्तियों में इस चीज़ की समानता है कि दोनों ही मुस्लिम महिला को दबाकर रखना चाहते हैं।

मुसलमान कुरान को इस्लाम की एक दैवीय पुस्तक मानते हैं। मुसलमानों के अनुसार उनके हर प्रश्न का जवाब कुरान में दिया हुआ है। अगर पहनावे की बात की जाए तो वो भी उनके अनुसार कुरान में दिया गया है कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए। उनके अनुसार ये बोला जाता है कि कुरान में बोला गया है कि महिलाएँ अपने पूरे शरीर को पूरा ढकें जबकि यह बात पूरी तरह से गलत है कि ऐसा कुछ कुरान में बोला गया है। सच्चाई यह है कि कुरान में बुर्का शब्द का कहीं भी वर्णन है ही नहीं। उसमें केवल यह बोला गया है कि महिलाओं का सर ढका होना चाहिए और कपड़े शालीन होने चाहिए।

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बुर्का शब्द और पहनने का प्रचलन ईरान से आया है। जब इस्लाम मजहब ईरान में आया तब उन लोगों ने वहाँ के प्रचलित परिधान को अपना लिया और धीरे-धीरे ये उनके मजहब का अंग बन गया। अब इसको अगर यह कहा जाए कि कुरान में ऐसा कहा गया है तो उन आदमियों को लानत है, जो केवल महिलाओं को दबाने के लिए मानसिक प्रतिबन्ध के अलावा उनके वस्त्रों का भी सहारा ले रहे हैं।

जब आप किसी से बात करें और वो व्यक्ति सामने हो पर वो आपकी तरफ ना देख रहा हो तो आप यही समझेंगे कि वो आपकी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा है और आप अपनी बात उस तक पहुँचाने में पूरी तरह से विफल रहेंगे। यही बात बुर्के में भी कहीं हद तक सत्य सिद्ध होती है। अगर कोई महिला सामने खड़ी है और उसका चेहरा पूरी तरह से ढका हुआ हो तो आप सामान्य सा महसूस नहीं करेंगे। इसकी जगह अगर उस महिला का चेहरा दिख रहा हो तो आप के शब्दों पर उसके चेहरे के हाव भाव से आप अपनी बात को पूरी तरह से उस तक पहुँचा सकते हैं।

मुसलमान कहते हैं कि बुरका पहनने से महिलाओं का ‘मर्दों की आँखों की दरिंदगी’ से बचाव होता है। उनके अनुसार महिलाओं को केवल अपने खून के रिश्ते के अलावा किसी अन्य को चेहरा नहीं दिखाना चाहिए। इसके लिए वो बुर्के को पहनना जायज ठहराते हैं। जबकि इसका अगर दूसरा हिस्सा देखें तो, मर्दों की आँखों में यदि दरिंदगी है तो उसका उपाय ढूँढना चाहिए ना कि महिलाओं की वेशभूषा की स्वतन्त्रता में रोक लगाना चाहिए। क्या मुस्लिम मर्दों की आँखों में दरिंदगी है? ऐसा है तो उन्हें पहले नैतिक शिक्षा की जानकारी होनी चाहिए और महिलाओं के लिए उनके मन में अगर सम्मान है तो दरिंदगी का मतलब नहीं रह जाता है।

बुर्के से एक बहुत बड़ा नुकसान महिलाओं की त्वचा को भी होता है। बुर्का पहनने से महिलाओं की त्वचा को विटामिन डी नहीं मिल पाता है। इससे उनको त्वचा से सम्बंधित रोगों के होने की संभावना बढ़ जाती है। बुर्का पहनने से मुस्लिम महिलाओं को हड्डी के रोगों के भी होने की भी संभावना रहती है। मुस्लिम महिलाएँ अगर बाहर काम करती हैं तो वो दिन भर बुर्का पहने रहती हैं, जिससे उनकी त्वचा में जो विटामिन मिलने चाहिए उसकी कमी होने लगती है। कभी-कभी यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि स्किन कैंसर का रूप ले लेती है।

बुर्का महिलाओं की आत्मा और उनके स्वाभिमान को पूरी तरह से चोट पहुँचाता है। मुस्लिम महिला अगर सामान्य रूप से शालीन सी कोई पोशाक पहनना चाहती है, फिर भी उसको काले रंग का बुर्का उसके ऊपर डालना होता है। इससे उसके स्वाभिमान को कहीं न कहीं ठेस पहुँचती है। वो महिला जो बुर्का पहने हुए हैं, वो जब अन्य महिलाओं के स्वतंत्र शालीन लिबास को देखती है तो उसके मन में कहीं न कहीं बुर्के के प्रति हीन भावना आ ही जाती है, जिससे उसके आत्मविश्वास को बहुत ज्यादा चोट पहुँचती है।

बुर्के के अगर इतिहास को लोग सही में जान लें तो उन्हें पता चल जाएगा की यह पहनावा भौगोलिक क्षेत्र की आवश्यकता के लिए उस समय की महिलाओं ने अपनाया था, जिससे उस क्षेत्र में चलने वाली रेत भरी हवाओं से बचा जा सके। उसको अगर दूसरे क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं पर जबरदस्ती लागू किया जाता है तो यह एक मानसिक प्रताड़ना कहलाती है। महिलाओं को अगर मुसलमान पुरुष उनको उनके मन से अगर कपड़े तक पहनने नहीं दे रहे हैं तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है|

बुर्का का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है| बुर्क़ा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है, लेकिन इस्लाम का एक हिस्सा नहीं है। जहाँ पर इस्लाम का जन्म हुआ, उस हिस्से की औरतों ने कभी भी पर्दा नहीं पहना था। हजरत मुहम्मद ने कभी भी पर्दा करने के निर्देश नहीं दिए थे। धर्मग्रन्थों में दिए गए विचारों के साथ ही, विद्वानों का ये मत है कि इस्लाम में, सिर ढकने की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसका सीधा संबंध क़ुराम से है। सिर को ढकने की प्रथा का प्रारंभ अरब में इस्लाम के आगमन से पूर्व कुछ अन्य देशों के साथ संपर्क के चलते किया गया था, जहाँ पर हिजाब एक प्रकार की सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था। आवरण में या बुर्के में रहना- इसे अरब में पैगम्बर मोहम्मद द्वारा प्रचलित नहीं किया गया था वरन्‌ ये वहाँ पर पहले से मौजूद था।

आवरण में रहना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था और ग्रीक, रोमन, ज्यू और असायरियन्स में ये प्रथा थोड़ी या ज्यादा मात्रा में उपस्थित थी। ये पता नहीं चल पाया है कि ये रिवाज़ आमजनों तक कैसे पहुँचा। मुस्लिम समाज में, अपनी प्रतिष्ठा व धन प्रदर्शन का मुद्‌दा बनाकर आवरण को ग्रहण करने की प्रथा धीरे-धीरे पैगम्बर मोहम्मद की पत्नियों को अपना आदर्श बनाकर आगे चल पड़ी। अरब के लोगों ने इस्लाम में हिजाब और नकाब को मिलाकर बुर्क़ा पहनने को अनिवार्य कर दिया। ब्रिटेन के एक कैबिनेट मंत्री ने सुझाव दिया था कि अगर वो बुर्के वाली महिला से बात करती हैं तो वो सहज महसूस नहीं करती हैं। उन्होंने कहा था कि अगर कोई महिला हिजाब पहनकर आती है तो उन्हें ज्यादा अच्छा लगता है क्योंकि उसमें महिला का चेहरा दिखता है।

कुरान में हिजाब का जिक्र है, जिसमें महिला का चेहरा दिखता रहता है। बुर्का केवल कट्टरपंथी इस्लाम की सोच है जिसमें वो महिला को जबरदस्ती चेहरा ढकने के लिए बाध्य करते हैं। श्रीलंका ने वहाँ पर हुए आत्मघाती हमले के बाद बुर्क़ा पहनने पर रोक लगा दिया है। बहुत से यूरोपियन और अफ़्रीकी देशों ने बुर्क़े पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। अरब देशों में बुर्का पहनने का चलन वहाँ पर चलने वाली आँधियों से बचने के लिए था। धीरे-धीरे उस क्षेत्र में इस्लाम धर्म के फ़ैलने के कारण बुर्का इस्लाम का अंग बन गया। कुरान में ‘जिलबाब या खिबर’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ होता है बदन को ढकने वाली एक चादर या दुपट्टा। इसमें चेहरे को ढकने को नहीं बोला गया है। बुर्क़ा की शुरुआत फारस यानी ईरान से हुई। फारस में जब इस्लाम का प्रवेश हुआ तो वहाँ पर एक संस्कृति पहले से ही मौजूद थी। इस्लामी संस्कृति में कई चीज़ें फारसी संस्कृति से आई हैं।

जैसे, अल्लाह की जगह खुदा और सलात की जगह नमाज जैसे शब्द। इसी तरह ईरानी संस्कृति के प्रभाव में मुसलामानों ने बुर्क़ा अपना लिया। बुर्क़ा का आत्मघाती कार्रवाइयों में इस्तेमाल तथा उसका अपराधियों द्वारा स्वयं को छुपाने के उपकरण के रूप में प्रयोग करने की घटनाओं के बाद उसके सार्वजनिक स्थलों में प्रयोग पर गंभीर विवाद खड़ा हो गया। इसके पश्चात अनेक इसाई बहुल पश्चिमी देशों ने सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने को प्रतिबंधित कर दिया। फ्रांस में 2011 में सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। वर्ष 2018 में डेनमार्क में सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने का प्रतिबन्ध लगा दिया गया। नीदरलैंड की सीनेट ने जून 2018 में विद्यालयों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने के प्रतिबन्ध का कानून पास किया।

जर्मनी की संसद ने गाड़ी ड्राइव करते समय किसी भी तरह से चेहरा नहीं ढकने का कानून पास किया। वर्ष 2017 में ऑस्ट्रिया में विद्यालयों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने के प्रतिबन्ध का कानून पास किया। बेल्जियम में जुलाई 2011 में पूरे चेहरे को ढकने को प्रतिबंधित करने वाला कानून पास किया गया। नॉर्वे में 2018 में पारित एक कानून के तहत शिक्षण संस्थानों में चेहरा ढकने वाले कपड़े पहनने पर रोक है। बुल्गारिया की संसद ने 2016 में एक बिल पारित किया था। इसके अनुसार, सार्वजानिक जगहों में चेहरा ढकने वाली महिलाओं को मिलने वाली सरकारी मदद में कटौती की जा सकती है। लिसबर्ग में भी इसी तरह के आंशिक प्रतिबन्ध हैं। वहाँ अस्पतालों, अदालतों और सार्वजनिक इमारतों में चेहरा नहीं ढका जा सकता है।

इटली के कई शहरों में चेहरा ढके रहने पर प्रतिबन्ध है। स्पेन के बार्सिलोना शहर में साल 2010 में नगर पालिका कार्यालय, सार्वजनिक बाजारों और लाइब्रेरी जैसी जगहों पर चेहरा ढकने पर रोक लगी थी। स्विटज़रलैंड के भी कुछ इलाकों में इस तरह का प्रतिबन्ध लगा हुआ है। साल 2015 में बुर्काधारी महिलाओं ने अफ्रीका में कई आत्मघाती हमले किए थे। इसके बाद कार्ड, गबान, कैमरून के उत्तरी क्षेत्र, निजिरिया और रिपब्लिक ऑफ़ कॉम्बो में पूरा चेहरा ढकने पर रोक लगा दी गई। अल्जीरिया में साल 2018 में सरकारी कर्मचारियों पर सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा पूरा ढकने पर रोक लगा दी गई। चीन में कुछ जगहों पर चेहरा पूरा ढकने या बुर्का पहनने पर प्रतिबन्ध है। आतंकवाद को रोकने के लिए भारत को बुर्का प्रतिबंध की आवश्यकता है। फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सार्कोजी ने दो साल पहले बयान दिया था महिलाओं को ढकने वाला बुर्का गुलामी का प्रतीक है।

पिछले साल ऐसा किस्सा भी सामने आया था, जब फ्रांस की सरकार ने एक विदेशी व्यक्ति को नागरिकता देने से इसलिए इनकार कर दिया था क्योंकि उसने अपनी ‘पत्नी को बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया। वहीं सऊदी अरब के एक मजहबी चैनल ‘वतन टीवी’ ने नियम बनाया हुआ है कि महिला एंकर नकाब पहनें। जब महिलाएँ कार्यक्रम पेश कर रही होती हैं तो स्टूडियों में पुरुष तकनीकी कर्मचारियों को घुसने की इजाजत नहीं होती है। बुर्के को लेकर अलग-अलग दुविधाएँ सामने आती रही हैं। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के एक जज के सामने जब धोखाधड़ी का एक मामला आया तो उन्होंने आदेश दिया कि मुस्लिम महिला गवाही देने के लिए अपने चेहरे से नकाब हटाएँ। जज का कहना था कि ये उचित नहीं होगा कि गवाह का चेहरा ढका रहे।

ईरान में भी बुर्के को लेकर दिलचस्प किस्सा सामने आ चुका है। दरअसल, ईरानी लड़कियों की फुटबॉल टीम को युवा ओलिम्पिक खेलों में भाग लेना था, लेकिन उसका कहना था कि वे हिजाब पहनकर खेलेंगी, जिस पर फीफा राजी नहीं था। बाद में फीफा ने बालों को पूरी तरह से ढकने वाले हिजाब के स्थान पर सिर को ढकने वाले एक विशेष कैप की पेशकश की ताकि बीच का रास्ता निकल सके। 2009 के अपने भाषण के तत्कालीन फ़्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने कहा कि बुर्का महिला की अधीनता का प्रतीक है। राष्ट्रपति सरकोजी ने आगे बताया कि जो महिलाएँ पर्दा करती हैं, उन्हें फ्रांस में अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि देश महिलाओं की पहचान उनके कारावास और वंचितता में विश्वास नहीं करता।

मिस्र में भी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ अधिकारियों ने विश्वविद्यालय में नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया है। अधिकारियों का तर्क है कि उन्होंने सुरक्षा कारणों की वजह से ये पहल की। फ़्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी के लिए बुर्का एक निहत्थे जेल का प्रतीक है, जो महिलाओं को द्वितीय श्रेणी के नागरिकों के रूप में प्रस्तुत करता है। लेखक ऐनी अप्पलम्ब्याउम के अनुसार, बुर्का को शालीनता और स्थानीय रीति-रिवाजों के सम्मान के लिए प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

(लेखक: गौरव मिश्रा)

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