नारीवाद की आड़ में कामुकता बेचने वाले लल्लनटॉप, आप किसी की मदद नहीं कर रहे

ऐसे शब्द उसी कामुकता को हवा देते हैं जिसकी बात पत्रकार ने भीतर कही है। यही वो शब्द हैं जिससे दो सेकेंड का वही उन्माद ऐसे लड़कों को मिलता है जिसकी बात पत्रकार ने अपने 22 फ़रवरी वाले आर्टिकल में की है। इसलिए, ये अपने आप में विरोधाभासी है।

जब हम नारीवाद, स्त्रीत्व जैसे मुद्दे छूते हैं तो हमारे शब्द, उनके भाव, उनका संदर्भ, हमारा दौर और दुनिया की आधी आबादी के प्रति सम्मान अपनी पूर्णता में प्रदर्शित होने चाहिए। अगर आप इस विषय को लेकर, इसके दायरे और प्रभाव को लेकर चिंतित हैं, तो आपके शब्दों से ऐसा झलकना चाहिए।

पिछले साल की होली के दौरान लिखा एक आर्टिकल इस साल लल्लनटॉप नामक वेबसाइट से दोबारा शेयर किया गया जिसका शीर्षक ‘वीर्य का त्योहार ख़त्म, अब भीगी हुई लड़कियों की तस्वीरें देखें’ है। आपको शायद ध्यान में आया होगा कि ‘वीर्य का त्योहार’ से क्या मतलब है लिखने वाले का। पिछले साल एक ख़बर फैलाई गई कि कुछ लड़कियों पर वीर्य भरे ग़ुब्बारे फेंके गए थे, जबकि कुछ ही समय में ये ख़बर झूठी साबित हुई थी।

आमतौर पर वामपंथी लम्पटों और पत्रकारिता का समुदाय विशेष हर हिन्दू त्योहार पर, अगर कुछ घटना हो जाए तो ठीक, वरना अपनी कहानी बनाकर उस पूरे त्योहार और हिन्दू धर्म को लपेट लेते हैं। हर बार ऐसी ख़बरें बनाई जाती हैं जिससे कि एक धर्म कटघरे में दिखे। ख़ैर, ये तो बिलकुल ही अलग विषय है, और इसमें ज़्यादा जाने की ज़रूरत भी नहीं।

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इस ख़बर को लल्लनटॉप ने दोबारा क्यों शेयर किया जबकि उनके हेडलाइन का पहला हिस्सा पिछले ही साल ग़लत साबित हो चुका था? लल्लनटॉप को मैं कोई आदर्श पत्रकारिता करने के लिए नहीं कह रहा हूँ, क्योंकि वैसा करना किसी से संभव नहीं! पिछले साल, हो सकता है कि ये ख़बर आर्टिकल लिखने तक न मिली हो कि वीर्य के ग़ुब्बारे कुछ लड़कियों की फ़र्ज़ी शिक़ायत थी, लेकिन इस साल ये शेयर क्यों हो रहा है? क्योंकि वीर्य, ग़ुब्बारा, ‘लड़कियों की भीगी तस्वीरें’ वाली हेडलाइन देखकर भीड़ जुटती है साइट पर।

अजीब बात यह है कि पहले पैराग्राफ़ से ही पत्रकार ने स्त्रीत्व जैसे शब्दों से ज्ञान देना शुरू किया है और शायद अपनी हेडलाइन पढ़ना भूल गई। आगे आधे आर्टिकल में जो होली के नाम पर यौन शोषण की बात की गई है, उस पर चर्चा की जा सकती है। साथ ही, यौन शोषण को ही होली का प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता। होली पर छेड़-छाड़ की छिटपुट घटनाएँ होती हैं, लेकिन होली को बलात्कारियों की चलती भीड़ जैसा बता देना, प्रपंच है।

होली के नाम पर लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ की घटनाएँ ख़ूब होती हैं, ये न तो झुठलाने की बात है, न ही आँख मूँदकर आगे बढ़ने की। लेकिन जब आप ऐसे मुद्दों पर इस तरह से लिखकर, एक ग़लत ख़बर को हेडलाइन का हिस्सा बनाकर, एक साल बाद दोबारा शेयर करते हैं तो फिर आपकी मंशा स्त्रीत्व के समर्थन से ज़्यादा की-वर्ड्स से ट्रैफिक लाने की होती है।

पोर्टल पर ट्रैफिक लाने के लिए लल्लनटॉप ने हिटलर के लिंग नापने से लेकर चुड़ैलों द्वारा लिंग खा जाने और तमाम तरह की वाहियात ख़बरें बनाई और शेयर की हैं। पत्रकारिता में नए आयाम रचने के लिए समाज इसके लिए लल्लनटॉप का आभारी रहेगा। लेकिन ये तो नॉर्मल रिपोर्ट्स थे जिसे पढ़वाने के लिए एडिटर ने जो ‘कैची हेडलाइन’ सुझाया होगा, वो नीचे के लोगों ने लगाया होगा।

लेकिन, ये शीर्षक बहुत ही चालाकी से चुना गया है। कहने को तो इसे ‘कटाक्ष’ वाला हेडलाइन कह दिया जाएगा लेकिन बात जब ‘यौन हिंसा’ और ‘स्त्रीत्व’ को लेकर शुरू हो रही हो, तो ऐसे हेडलाइन न सिर्फ़ मुद्दे को बौना बना देते हैं, बल्कि उन लोगों को भी ठगते हैं जो कुछ और सोचकर ऐसे आर्टिकल पढ़ते हैं।

ये बहुत ही धूर्त एडिटर का कमाल होता है जब वो लड़की के वक्षस्थल को घूरने को ‘ग़लत बात’ कहते हुए हेडलाइन बनाता है, और इमेज में वैसी ही तस्वीर लगाता है। इस आलोचना से वो अपने आप को इम्यून करना चाहता है कि ‘मैं तो इस तरह के इमेज को शेयर न करने की सलाह दे रहा था’।

इस आर्टिकल में यही हुआ है। लड़कियों के शरीर के ऑब्जेक्टिफिकेशन की बात बाद में की गई, और पूरा शीर्षक फ़्लैट टोन में यही कह रहा है कि ‘आइए, भीगी लड़कियों की तस्वीरें देखिए’। ऐसा नहीं है कि इस पोर्टल पर आपको ये ख़बर एक ही बार मिलेगी। लगभग इसी हेडलाइन के साथ इस ख़बर के बारह दिन पहले एक और ख़बर शेयर की गई, “होली आ गई, भीगी लड़कियों की हॉट तस्वीरें नहीं देखोगे?”

इस कीवर्ड ‘भीगी लड़कियों की तस्वीरें’ से लल्लनटॉप को विशेष प्रेम है

क्यों देखेंगे?

फेमिनिज्म और उससे जुड़े तमाम मुद्दों को जब तक इस तरह से शेयर किया जाता रहेगा, इस समाज में इस विषय पर स्वस्थ चर्चा संभव ही नहीं। ये पूरे इशू को ट्रिवियल बनाने का एक तरीक़ा है जहाँ केन्द्र में नारी शरीर, उससे जुड़ी यौन कुंठा, उसे पुकारते हुए कामुकता जगाने वाले शब्दों की स्टफिंग होती है न कि मुद्दे पर चर्चा आगे बढ़ाने की। 

ऐसे शब्द उसी कामुकता को हवा देते हैं जिसकी बात पत्रकार ने भीतर कही है। यही वो शब्द हैं जिससे दो सेकेंड का वही उन्माद ऐसे लड़कों को मिलता है जिसकी बात पत्रकार ने अपने 22 फ़रवरी वाले आर्टिकल में की है। इसलिए, ये अपने आप में विरोधाभासी है।

नारीवाद का मुद्दा वीर्य के ग़ुब्बारों से निकल कर पीरियड्स के धब्बों तक समेटने के लिए नहीं बना है। न ही इस तरह की शेयरिंग से इसे कोई समर्थन मिलता है। अच्छे विषय को ग़लत शब्दों के साथ लिखकर, झूठी ख़बर का हिस्सा बनाकर जस्टिफाय करना बेकार की कोशिश है। लल्लनटॉप बेशक इस कार्य से ट्रैफिक लाने में सफल हो रहा होगा लेकिन लिखने वाली ये कैसे जस्टिफाय करेंगी कि उसने रंगो के त्योहार को ‘वीर्य का त्योहार’ कहा है?

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