Wednesday, April 21, 2021
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दिल्ली, लुटियंस जोन और प्रदूषण… लेकिन इसी भारत में गाजियाबाद और झरिया भी है, धुएँ-धूल में दम तोड़ता!

क्या दिल्ली और लुटियंस जोन के निवासियों से गाजियाबाद-झरिया के वोटर को 'जीने का अधिकार' कम है? संवैधानिक स्तर पर शायद नहीं! माननीय न्यायालय का ध्यान इन शहरों पर भी जाना चाहिए, जहाँ के लोग न्यायालय तक पहुँच नहीं पाते।

दिल्ली-एनसीआर के गैस चैंबर में तब्दील होने पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकारों को कड़ी फटकार लगाई। देश की सर्वोच्च अदालत ने इसे जीने के अधिकार का उल्लंघन बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने पराली जलाने पर तुरंत रोक लगाने के लिए कहा है। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार (नवंबर 5, 2019) को यूपी, पंजाब और हरियाणा सरकार को आदेश जारी करते हुए कहा कि अगर उनके राज्य में एक भी ऐसी घटना घटती है तो पूरे प्रशासन के साथ-साथ राज्य के मुख्य सचिव से लेकर ग्राम प्रधान तक जिम्मेदार होंगे।

कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्यों के मुख्य सचिव, जिलाधिकारी, तहसीलदार, संबंधित थाना, एसपी, आइजी और पूरी पुलिस व प्रशासनिक मशीनरी सुनिश्चित करे कि उनके यहाँ बिल्कुल पराली न जले। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसान अपनी आजीविका के लिए दूसरे लोगों को मौत के मुँह में नहीं धकेल सकते। कोर्ट ने कहा, “अगर वे (किसान) पराली जलाना जारी रखेंगे तो उनके प्रति हमारी कोई सहानुभूति नहीं रहेगी। किसान यह नहीं कह सकते कि उन्हें दूसरी फसल लगानी है इसलिए पराली जलाना उनका अधिकार है।”

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा

“प्रदूषण की वजह से दिल्ली में लोगों का दम घुट रहा है, लोग घरों के अंदर भी प्रदूषण से सुरक्षित नहीं हैं। बेडरुम और लुटियंस जोन में भी एक्यूआइ का स्तर 500 से ऊपर पहुँच गया है। कोई भी दिल्ली नहीं आना चाहता। हर साल यही होता है। किसी सभ्य समाज में ऐसा नहीं होता।”

प्रदूषण को लेकर माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश महत्वपूर्ण है। महत्वपूर्ण इसलिए क्योंकि यह आम जीवन को प्रभावित करता है, लोगों की जिंदगियाँ छीन रहा है। लेकिन क्या यह मसला सिर्फ दिल्ली तक सीमित है? पराली जलाने की जिस समस्या से दिल्ली और आस-पास के इलाके में बसे लोग प्रभावित हो रहे हैं, क्या प्रदूषण की यह समस्या सिर्फ दिल्ली तक सीमित है? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। दिल्ली और इसके दिल में स्थित लुटियंस जोन से कहीं ज्यादा प्रदूषण देश के दूसरे शहरों में है। हाँ, यह सच है कि वहाँ का शोर हमें सुनाई नहीं देता। या शायद वहाँ के लोग इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा मान बैठे हैं और खुश हैं, जी रहे हैं।

अगर सिर्फ पराली ही प्रदूषण का एकमात्र कारण होता तो नीचे दिया हुआ ग्राफ कभी भी बन नहीं पाता। ग्राफ से स्पष्ट है कि गैस चेंबर बने दिल्ली की जहरीली हवा का जिम्मेदार सिर्फ पराली जलाना नहीं बल्कि इसके अन्य कारक भी ही हैं। और यही अन्य कारक भारत के उन शहरों को प्रदूषण से जकड़े हुए हैं, जहाँ दूर-दूर तक पराली जलाने की परंपरा भी नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा प्रदूषण संबंधित दिया हुआ डेटा

माननीय सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली में प्रदूषण की वजह पराली नहीं, बल्कि सड़कों पर धुआँ उड़ाती हुई गाड़ियाँ, धूल-कण और शहर में चलने वाले औद्योगिक संस्थाएँ हैं, जो काफी हद तक प्रदूषण फैलाते हैं। अगर दिल्ली-एनसीआर में 2018 में फैले प्रदूषण की बात करें, तो तकरीबन 41 फीसदी प्रदूषण गाड़ियों से, 21.5 फीसदी हवा में समाहित धूल-कणों से, 22.3 फीसदी औद्योगिक क्षेत्रों से और इसके अलावा अन्य कई वजहों से है।

नासा द्वारा जारी किए गए आँकड़े

बात करते हैं गाजियाबाद की। यह शहर रिकॉर्डधारी शहर है – अच्छे कामों के लिए नहीं बल्कि प्रदूषण रैंकिंग में लगातार देश के अग्रणी शहरों की सूची में बने रहने के लिए। हालात यह है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने भी यहाँ की स्थिति पर चिंता जताई है। दिलचस्प बात यह है कि यहाँ आस-पास पराली भी नहीं जलाई जाती (है भी तो बहुत ही छिटपुट) है, फिर भी प्रदूषण की स्थिति सालों से बनी हुई है। लोग रह भी रहे हैं। और ‘जीने का अधिकार’ जितना लुटियंस जोन वालों को संविधान ने प्रदान किया है, उतना ही यहाँ के लोगों के पास भी है, ऐसा मेरा मानना है।

अब चलते हैं गाजियाबाद से 1200-1300 किलोमीटर दूर झारखंड का वो शहर, जो झरिया के नाम से मशहूर है। कहते हैं कि लोग यहाँ चाहे जिस भी रंग का शर्ट पहन सुबह घर से निकलें, शाम को लौटते सभी एक ही रंग का शर्ट पहन कर – काला! गाजियाबाद की ही तरह देश का सबसे अधिक प्रदूषित शहर का तमगा लिए यह शहर भी जी रहा है, शहर के लोग भी जी रहे हैं। झरिया में प्रदूषण का कारण कोयला है। कोयला वो जो यहाँ की जमीन के नीचे जल रहा है, साल-दर-साल से जलता ही जा रहा है। इस कारण कोयले का कण, धूआँ हवा में मिश्रित होकर प्रदूषण के स्तर को बढ़ाते हैं। ऐसा सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है। ऐसे में यहाँ प्रदूषणजनित बीमारियाँ आम हैं। और उसी प्रदूषण का शिकार होकर कम होती जिंदगी एक दिन दम तोड़ देती है। लेकिन क्या लुटियंस जोन के निवासियों से यहाँ के वोटर को ‘जीने का अधिकार’ कम है, संवैधानिक स्तर पर तो नहीं ही।

प्रदूषण को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला स्वागतयोग्य है। प्रदूषण वाकई में आज के समय में जानलेवा बीमारी है और लोग इससे काफी परेशान हैं। इसका निवारण करना अति आवश्यक है। लेकिन यह फैसला दिल्ली-NCR के हित में है, जबकि समस्या से ग्रसित भारत का लगभग-लगभग हर शहर है। माननीय न्यायालय का ध्यान उस ओर भी जाना चाहिए, जहाँ से या तो शोर उठता ही नहीं (शायद नियति मान बैठे हैं) है या उठने वाला शोर ट्विटर के माध्यम से दिल्ली पहुँच ही नहीं पाता।

स्वच्छता आंदोलन देश का आंदोलन है। यह दिल्ली-NCR की सड़कों तक जगमग करता न रह जाए, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। कोर्ट के आदेश का सख्ती से पालन हो और कोर्ट भी वहाँ तक पहुँचे, जहाँ के लोग कोर्ट तक पहुँचने में सक्षम नहीं हैं – और शायद यही हमारे बापू गाँधी के सपनों का भारत होगा!

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