सिर्फ और सिर्फ जिहादी हिंसा का संरक्षक है आतंकवाद

4 दोस्तों के समूह में 1 मुसलमान होने से तब तक फ़र्क़ नहीं पड़ता है, जब तक धर्म के नाम पर की गई ऐसी कोई कोई ऐसी कायराना हरकत सामने नहीं आती है। नतीजा यह होता है कि अगले दिन हमारे मुसलमान भाई वर्कप्लेस पर आने में संकोच महसूस करते हैं, दोस्तों के फ़ोन रिसीव करने में खुद को लज्जित महसूस करते हैं।

14 फरवरी के दिन पुलवामा में हुई हिंसक आतकंवादी घटना में एक नौजवान सिर्फ इसलिए फिदायिनी हमले का रास्ता चुनता है, क्योंकि उसे गो-मूत्र पीने वालों से नफरत है? एक युवक जिसके सपनों में देश के संस्थानों का हिस्सा बनकर एक समुदाय विशेष के विरुद्ध बनी विचारधारा को झूठा साबित करने का होना चाहिए था, उसे इस हद तक ब्रेनवॉश किया जाता है कि वो कुछ देर में जन्नत में होने के ख्वाब देखता है? और इसका परिणाम क्या रहा?

40 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए, खुद वो नवयुवक आज 72 हूरों को पाने तथाकथित जन्नत पहुँच चुका है और अपने पीछे लाखों लोगों के लिए एक अन्धकार छोड़कर अपना रास्ता चुन चुका है। क्या उसे अब फ़र्क़ पड़ता है कि पूरे होशोहवास में लिए गए उसके एक फैसले की वजह से अपने ही धर्म विशेष के लोगों को कितनी समस्या छोड़कर वो शख्स चला गया है? स्पष्ट है कि इस फिदायिनी को जश्न मनाने तक का मौका नहीं मिला, जबकि उसे इस आत्मघाती काम के लिए उकसाने वाले भारतीय सैनिकों की इस क्रूर हत्या पर जश्न मना रहे हैं। लेकिन फिर भी हालात ये हैं कि बुराई को स्वीकार करने के बजाय उसे तुरंत नकार दिया जाता है।

एक घटना मात्र इस देश की सभ्यता और संस्कृति के समीकरण को उधेड़कर रख देती है। डिप्लोमेटिक होकर कहने वाले कुछ भी कहें लेकिन हक़ीक़त ये है कि हर व्यक्ति अपने साथ वाले मुसलमान मित्र, कर्मचारी, सहयोगी को शंका की नजर से देखना शुरू कर देगा। आतंकवाद को आतंकवाद न कह पाने की हमारी झिझक का ही परिणाम है कि आज निर्दोष कश्मीरी विद्यार्थी भी पत्थरबाज़ों की श्रेणी में गिने जाने लगे हैं।

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आप बात समझिए, ये आतंकवाद के पोषक किसी दबे, कुचले, शोषित और वंचित की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। ये लड़ाई वही है जो आगाज के समय थी। तब शायद आक्रामकता और रक्तपात अलोकतांत्रिक और गैर संवेदनशील न माने जाते रहे हों। हालाँकि, किसी भी प्रकार का रक्तपात और बर्बरता किसी भी दौर में न्यायपूर्ण बताना मूर्खता से अधिक कुछ नहीं।

भारत देश में अंग्रेजों की गुलामी के अन्धकार के युग के दौरान तरह-तरह के समाज सुधार और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने जन्म लिया। इस पुनर्जागरण से तत्कालीन युवा चिंतनशील और तत्पर हो उठा। तरुण और वृद्ध, सभी इस मसले पर सोचने के लिए मजबूर हुए। लगभग सभी लोगों ने धर्म, परंपराओं और रीति-रिवाजों को तर्क की कसौटी पर कसना आरम्भ किया। उस दौरान प्रचलित वाक्य थे कि ‘पुनर्जागरण के बिना कोई भी धर्म सम्भव नहीं हो पाएगा’।

ऐसे में हिन्दूओं के आर्य समाज, ब्रह्म समाज ने तत्परतापूर्वक कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन चलाए और धर्म में आवश्यक परिवर्तन कर, समाज के एक हिस्से को मजबूत नींव प्रदान की। वहीं हिंदुओं के धार्मिक सुधार और मुसलमानों के अहमदिया और अलीगढ़ जैसे आंदोलन को आकार लेने में अन्य समुदायों की तुलना में अधिक समय लगा, जिसे एक बड़ी वजह माना जाता है कि मुसलमान शिक्षा और अन्य सामाजिक स्तरों पर पिछड़ गए और यही अंतराल आज तक चला आ रहा है। लेकिन वर्तमान में यदि इस प्रकार के उदाहरण देकर स्वयं को संतुष्ट करने का प्रयास कोई करता है, तो वह स्वयं से किया गया एक छलावा मात्र है।

यह युग विज्ञान और तकनीक का है, और ऐसे में हर हाल में धार्मिक शिक्षा का एक तार्किक युवा के निर्माण में बहुत कम प्रतिशत योगदान होगा। वर्तमान समय के साथ कदम मिलाने के लिए यह धर्म विशेष खुद कितना तैयार है इस पर आत्मविश्लेषण किया जाना चाहिए। लेकिन शायद ‘मालिक’ के स्मरण में ही रोजाना लोग इतना वक़्त बिता देते हैं कि आत्मविश्लेषण का समय नहीं मिल पाता है।

इस्लाम, धर्म और राजनीति का एक बेहतरीन केंद्र ऐसे समय में बनकर उभरा था, जब राजनीति और धर्म को एक ही परिधि में बिठाने की जद्दोजहद में समाज आडम्बर और द्वेष में जी रहा था। यह धर्म प्राकृतिक रूप से एक अच्छा विकल्प बनकर उभरा था, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी समय के साथ कदम ना मिलाने की कट्टरता है।

21वीं सदी में समाज दौड़ रहा है, परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं। हम संस्कृति और सभ्यता के उसूलों पर गर्व कर सकते हैं, लेकिन इसके आधार पर अपनी शिक्षा व्यवस्था से लेकर रहन-सहन में बदलाव को नकार दें, तो यह बात अतार्किक नजर आती है।

आप सोचिए, खुद को सुरक्षित और श्रेष्ठ साबित करने की इस लड़ाई के लिए आतंकवाद, बर्बरता और भय पैदा करने की ये नीति आखिरकार किन लोगों के लिए घातक साबित होती है?
स्पष्ट है, ये आतंकवाद सिर्फ वंचितों को ही प्रभावित करता है और हर कायरतापूर्ण घटना के बाद समाज में उनकी स्थिति को और कमजोर कर देता है ना कि आतंकवाद के प्रायोजकों को।

4 दोस्तों के समूह में 1 मुसलमान होने से तब तक फ़र्क़ नहीं पड़ता है, जब तक धर्म के नाम पर की गई ऐसी कोई कोई ऐसी कायराना हरकत सामने नहीं आती है। नतीजा यह होता है कि अगले दिन हमारे मुसलमान भाई वर्कप्लेस पर आने में संकोच महसूस करते हैं, दोस्तों के फ़ोन रिसीव करने में खुद को लज्जित महसूस करते हैं। सिर्फ उसी एक धर्म से जुड़े होने के कारण सोशल मीडिया पर लोगों को आतंकवादियों के कृत्य के लिए स्पष्टीकरण देते हुए देखना सबसे ज्यादा दुखद रहा है, जबकि हर कोई जानता है कि बारूद का ट्रक लेकर हिन्दुओं को सबक सीखने के मकसद से जिहाद करने वो लोग नहीं गए थे।

लेकिन शहीदों के शव देखने से ज्यादा दुखद घटना यह भी थी कि कुछ समुदाय विशेष के लोग ही सोशल मीडिया से लेकर तमाम जगहों पर जश्न मनाते देखे गए। हैरानी की बात यह थी कि ये लोग कोई विदेशी नहीं बल्कि इसी देश की सीमाओं के भीतर रहने वाले लोग हैं। ये इसी देश के संसाधनों का उपयोग करते हैं, यहीं के विद्यालयों में पढ़ते हैं, सरकार इन्हें अस्पताल से लेकर घर तक की सुविधाएँ देने के लिए लगातार प्रयासरत है, फिर भी 40 सैनिकों की निर्मम हत्या पर धार्मिक कारणों से संवेदनशीलता को नजरअंदाज करने से नहीं रुकते। विचार कीजिए कि क्या आपको ऐसे अवसरों पर स्वयं आगे आकर धर्म के नाम पर हो रहे इन कुकर्मों के ख़िलाफ़ आवाज नहीं उठानी चाहिए?

कुछ गिने-चुने मुसलमान ही ऐसे थे, जो सोशल मीडिया पर कुरीतियों और बुराइयों को स्वीकार कर उनका विरोध करते थे। लेकिन हालात ये हैं कि उनके एकाउंट को रिपोर्ट कर डिलीट करवा दिया गया। उनकी अभिव्यक्ति की आजादी ही छीन ली गई, सिर्फ इसलिए कि वो सुधार की बात करते हैं?

हिंसा और आतंकवाद, सहिष्णुता और साम्प्रदायिकता की खाई को बढ़ावा ही देता है। किसी भी उद्देश्य के लिए की गई क्रूरता किसी भी समय में निंदनीय है। हमें विचारधारा की लड़ाई के लिए पोषित किए जाने वाली इस संस्कृति के खिलाफ आवाज उठानी तो होगी। ठीक उसी तरह, जैसे एक महिला की समस्याओं और उनके अधिकारों के लिए एक महिला द्वारा चलाया गया अभियान अधिक प्रभावशाली होता है और आज नहीं तो कल वह अभियान सफल हो जाता है। ठीक उसी प्रकार धर्म के नाम पर उपज रही इस भय और आतंकवाद की क्रूरता के विरोध में उन्ही लोगों को आगे आना होगा, जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले हैं और होते आए हैं।

पढ़ाई के उद्देश्य से घर से बाहर निकले निर्दोष कश्मीरी युवाओं को कश्मीर घाटी जाकर आतंकवाद के लिए उकसाने वाले गुटों को स्पष्ट सन्देश देना चाहिए कि वो बन्दूक और पत्थर नहीं बल्कि किताबें उठाना चाहते हैं। उन्हें बताना होगा कि ज़न्नत से पहले उन्हें इस धरती पर मानवता के लिए किए जाने वाले कार्यों से जुड़कर और समाज की मुख्यधारा में आकर अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुन्दर भविष्य तैयार करना उनकी ज़िम्मेदारी है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से लोग उम्मीदें लगाए बैठे थे कि आतंकवाद जैसी मुद्दों पर शायद उनका बर्ताव कुछ और हो, लेकिन उनके द्वारा ज़ारी बयानों से स्पष्ट है कि ‘नकारने की प्रथा’ को ही वो आगे बढ़ाते नज़र आ रहे हैं। पाकिस्तान की हक़ीक़त ये हो चुकी है कि उनके राष्ट्र के नाम दिए जाने वाले सन्देश आतंकवादियों द्वारा भेजे गए ‘प्रेम पत्र’ से ज्यादा कुछ नहीं होते। यदि हम बदलाव चाहते हैं तो सबसे पहले हमें बुराई को स्वीकारना होगा। ठीक इसी तरह भारत देश का वर्तमान मीडिया गिरोह यह कभी स्वीकार नहीं करना चाहेगा कि वह वाकई में राजनीतिक पूर्वग्रहों के कारण इतना दूर निकल चुका है कि उसे सेना के त्याग को भी अवसरवाद में बदलते देर नहीं लगती।

याद रखिए कि मर गए लोग परिणाम की चिंता नहीं करते। ना ही किसी व्यक्ति की मृत्यु को समस्त संसार की वाह-वाही सही साबित कर सकती है। जीवन ऐसे उसूलों के लिए जिया जाए जो मानवता का कल्याण करें और अगर इसके आड़े धर्म आ जाए तो उसकी बाधाओं को त्याग दिया जाना चाहिए।

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