200 करोड़ रुपया गुप्ता का, ब्याह गुप्ता के लौंडे का और आपको पड़ी है बदरंग बुग्याळ और पहाड़ों की!

हमें और आपको घर बैठकर गुप्ता जी के रुपयों की महिमा से सबक लेना चाहिए, ना कि पर्यावरण पर चिंता व्यक्त करनी चाहिए। औली आएँगे-जाएँगे, उत्तराखंड तबाह होगा-बसेगा, लेकिन 200 करोड़ रुपए नहीं जाने चाहिए।

दो सौ से दो हजार तक साल लगते हैं उस परत को बनने में जिस भूरी और बेहद उपजाऊ मिट्टी के ऊपर जन्म लेती है 10 से 12 इंच मोटी मखमली घास यानी बुग्याळ! और मात्र 200 करोड़ रुपए लगते हैं इन सभी तथ्यों को नकारकर अपने उपभोक्तावाद के आगे नतमस्तक होकर पूँजीपतियों के समक्ष समर्पण करने में। आश्चर्य की बात यह है कि बुग्याळ को बदरंग करने की यह भव्य साजिश पूरे विश्व में चिपको आंदोलन का इतिहास रचने वाली गौरा देवी की धरती चमोली जिले में ही हो रही है।

समुद्रतल से 2505 मीटर की ऊँचाई पर बसा औली, उत्तराखंड राज्य के खूबसूरत पर्यटक स्थलों में से एक है, जिसे 500 से ज्यादा बेहद संवेदनशील प्रजातियों के लिए जाना जाता है। यहाँ पर हरी चमकती बुग्याळ पर खड़े होकर सामने बर्फीले पहाड़ों को देखकर हम प्रकृति के मुकुट का चित्रण कर लेते हैं। जो लोग उत्तराखंड की पारिस्थितिकी से बहुत ज्यादा परिचित नहीं हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि यह बुग्याळ देवभूमि का सबसे बड़ा स्वर्ण है। दयारा, वेदनी, औली और आली, ये सभी राज्य के कुछ प्रमुख बुग्याळों में से है। बुग्याळ वस्तुतः एक बेहद मखमली और मोटी लेकिन नाजुक चमकदार घास है, जो कि उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों की सबसे बड़ी खूबसूरती है। जिस किसी छोटे-बड़े हिल स्टेशन में ये घास चमकती नजर आती है उसे किसी अन्य बाजारी सज्जा की जरूरत नहीं पड़ती है।

200 करोड़ रुपए है बुग्याळ को बदरंग करने की कीमत

बुग्याळ अधिकतर बर्फ से ढके रहते हैं, इसलिए उनकी सतह के नीचे का तापमान हमेशा शून्य डिग्री के आसपास ही बना रहता है। बुग्याळ की सतह का तापमान 4 डिग्री से ज्यादा नहीं होता। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक रूप से इतने संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी तरह का निर्माण कार्य और आयोजन भूस्खलन का खतरा पैदा करेगा। ऐसे में औली बुग्याळ में इस प्रकार के बड़े आयोजन में न केवल औली बुग्याळ को नुकसान पहुँचने की संभावना है, अपितु पर्यावरणीय दृष्टि से भी ये कोई शुभ संकेत नहीं है। बुग्याल के साथ मानवीय हस्तक्षेप के नतीजे भयावह होने तय हैं।

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लेकिन धन कुबेरों की नज़रों से यह रमणीय स्थल भी अछूता नहीं रहा और इस काम में उनका साथ देने के लिए कूपमंडूक नेताओं को अपनी ओर मोड़ लेने का आत्मविश्वास तो इन धनाढ्यों में नेहरूकालीन भारत के समय से रहा ही है। और फिर इस बार तो मामला औली में 200 करोड़ रुपए की शाही शादी का है। भारत से जाकर साउथ अफ्रीका में बसे उद्योगपति गुप्ता बंधुओं अजय और अतुल ने अपने दो बेटों की शादी के लिए उत्तराखंड के औली को चुना है।

देवभूमि उत्तराखंड का एक सत्य यह भी है कि इस राज्य निर्माण का सबसे बड़ा फायदा छोटे-बड़े ठेकेदारों का हुआ। जो लोग कभी ग्राम प्रधान बनने का सपना नहीं देखते थे, उन लोगों के हाथ राज्य की बागडोर लगने लगी। कमीशन खाकर समाज सेवक बने घूम रहे लोगों का प्रत्यक्ष नियंत्रण शासन-प्रशासन में हो गया। इसका प्रमाण राज्य के गठन के बाद हमें आज भी मिलता ही है।

शीतकालीन खेल पहले ही बाधित कर चुके हैं औली का संतुलन

बुग्याळों में मानवीय हस्तक्षेप के चलते यहाँ के पारिस्थितक तंत्र को भारी नुकसान पहुँचा है। कुछ साल पहले शीतकालीन खेलों के लिए की गई तैयारियों से औली बुग्याल भूस्खलन का शिकार हो गया, जिसका असर जोशीमठ शहर तक हुआ है। आज भी भारी बारिश में जोशीमठ शहर के लोग सो नहीं पाते हैं, जानें कब औली का नाला तबाही मचा दे।

पर्यावरण गया ऑइल लेने, 200 करोड़ रुपए गिनिए बैठकर

औली में 20 जून को अजय गुप्ता के पुत्र सूर्यकांत का विवाह होना है। इसके बाद 22 जून को अतुल गुप्ता के पुत्र शशांक का विवाह होना है। सोमवार से वैवाहिक समारोह की शुरुआत हो गई है। लोक गायक पद्मश्री और पुरस्कार सम्मानित प्रीतम भरतवाण ने जागर गाकर भगवान का आह्वान किया।

इस शाही शादी में शामिल होने के लिए बॉलीवुड से करीब 55 कलाकार औली पहुँच रहे हैं। खबर है कि कैटरीना कैफ, सिद्धार्थ मल्होत्रा और उर्वशी रौतेला समेत कई कलाकार इस विवाह के गवाह बनेंगे। गायक कैलाश खेर भी औली पहुँच चुके हैं। यहाँ तक कि अभिनेता सलमान खान के भी इस शाही शादी में आने की संभावना है। अब जिस समारोह में इतना सब कुछ हो तो आप ही बताइए कि हमारे और आपके द्वारा पर्यावरण के नाम पर दिए जाने वाले तर्कों की कोई हैसियत है?

उत्तराखंड में ऐसा पहली बार हो रहा है। यहाँ के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की मानें तो उत्तराखंड की किसी लोकेशन में डेस्टिनेशन वेडिंग के रूप में ये पहली शाही शादी है, जिस पर 200 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री का यह भी लक्ष्य है कि उत्तराखंड को यूरोप की तर्ज पर ही वेडिंग डेस्टिनेशन की तरह तैयार किया जाएगा। हालाँकि, मुख्यमंत्री ऑफिस से राज्य में वर्षों से लोक सेवा आयोग के नोटिफिकेशन के इन्तजार में बैठे युवाओं के भविष्य पर कोई राय नहीं आई है।

बुग्याळ में स्थानीय लोगों को नहीं मिलती है सरकारी इजाजत

उत्तराखंड में कभी पर्यटन तो कभी विशेष आयोजन व धार्मिक आयोजनों के नाम पर इन बुग्याळों का लगातार दोहन किया जाता रहा है। दयारा, वेदनी, औली और आली राज्य के कुछ प्रमुख बुग्याळों में से है, लेकिन इन सब पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। माननीय उच्च न्यायालय ने वेदनी, आली, बगजी बुग्याळ सहित अन्य बुग्याळों में तो रात्रि विश्राम के लिए प्रतिबंध लगाया है। लेकिन औली में निजी शादी हेतु चार दिन के लिए जो शहर बसाया जा रहा है वो बेहद चिंताजनक है। एक ओर जहाँ बुग्याळों में स्थानीय लोगो को एक भी टेंट नहीं लगाने दिया जा रहा है, पशुओं को घुसने की आजादी नहीं है, वहीं एक शादी के लिए दर्जनों टेंट की अनुमति मिलना वाकई दुःखद है।

शाही परिवार ने नगर पालिका को नहीं चुकाए सफाई के लिए 28 लाख रुपए

शादी में आने वाले मेहमानों के लिए 200 हेलीकॉप्टर लगाए गए हैं। लेकिन पर्यावरण प्रदूषण को देखते हुए यहाँ हेलीकॉप्टर की लैंडिंग को लेकर विरोध भी हुआ। नैनीताल हाईकोर्ट की ओर से औली में हेलीकॉप्टर लैंडिंग पर रोक लगाए जाने के बाद NRI गुप्ता बंधुओं के बेटों की शादी में आने वाले मेहमानों के हेलीकॉप्टर अब जोशीमठ में उतर रहे हैं। और हाईकोर्ट ने प्रबंधन कंपनी से 3 करोड़ रुपए की राशि सिक्योरिटी के रूप में जमा कराने को कहा है।

जोशीमठ नगरपालिका अध्यक्ष शैलेंद्र सिंह पंवार ने कहा है कि पालिका ने गुप्ता बंधुओं को शादी के दौरान साफ सफाई व पर्यावरणीय क्षति न करने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया था। उन्होंने कहा कि पालिका द्वारा अनुमति नहीं दी गई थी। अनुमति देना प्रशासन का काम है। पालिका की जिम्मेदारी साफ-सफाई की है। इसके एवज में पालिका ने 13 लाख साफ-सफाई और 15 लाख रुपये सफाई वाहन के लिए माँगे थे, जिसका भुगतान अभी तक नहीं हुआ है।

‘वेडिंग डेस्टिनेशन सरकार’ को NRI के काला धन कनेक्शन से आपत्ति नहीं है?

गुप्ता बंधु अजय गुप्ता और अतुल गुप्ता दक्षिण अफ्रीका छोड़कर अब दुबई में रह रहे हैं। अफ्रीका में उनकी तमाम अचल संपत्तियां, निजी हवाई जहाज, कारें जब्त की जा चुकी हैं। गुप्ता बंधुओं पर काले धन को अवैध रूप से सफेद करने के आरोप भी लगते आए हैं।

हाईकोर्ट में इस शाही शादी से जुड़े केस की सुनवाई हुई है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शादी पर तो रोक नहीं लगाई लेकिन आयोजकों को 3 करोड़ रुपए हाईकोर्ट में जमा करने के आदेश दिए हैं। आयोजकों को 21 जून तक ये रकम दो किश्तों में जमा करानी होगी। चमोली के जिलाधिकारी को आदेश का पालन करने की जिम्मेदारी दी गई है। कोर्ट का कहना है कि पर्यावरण मानकों का उल्लंघन हुआ, तो डीएम ही जिम्मेदार होंगे। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस शादी की मॉनिटरिंग करने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट का कहना है कि पर्यावरण मानकों का उल्लंघन हुआ तो तीन करोड़ की रकम वापस नहीं होगी। इन सभी खबरों ने स्थानीय लोगों को खूब खुश कर दिया है। स्थानीय अखबार से लेकर TV चैनल तक में शाही शादी का हल्ला मचा हुआ है। इस बीच पर्यावरण की चिंता करने की फुरसत फिलहाल किसी को नहीं है।

शाही शादी से अति-उत्साहित उत्तराखंड सरकार के लक्ष्य स्पष्ट हैं

खैर, फिलहाल शासन और प्रशासन की जुगलबंदी ठीक चल रही है। परेशान सिर्फ जनता है। संवेदनशील इलाकों में बढ़ते हुए मानवीय हस्तक्षेप का नमूना हम केदारनाथ में 2013 में घटी आपदा में देख चुके हैं। लेकिन 200 करोड़ रुपए के सामने ऐसे सबक बहुत छोटे हैं। इस घटना के साथ ही उत्तराखंड सरकार की प्राथमिकता के नमूने को भी हम समझ चुके हैं। बच्चों के मुंडन, जन्मदिन, शादी विवाह से फुरसत होने पर ही यहाँ पर किसी नेता को वास्तविक विषयों पर कान रखते देखा जाता है। 200 करोड़ रुपए की शादी के साथ ही उत्तराखंड सरकार की यह विलक्षण प्रतिभा, जो अब तक सिर्फ उत्तराखंड राज्य तक ही चर्चित थी, अब सारी दुनिया के सामने है।

पहाड़ों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाना चाहिए। वेडिंग डेस्टिनेशन के लिए NRI गुप्ता जैसे लोग 200 करोड़ रुपए कहीं भी खर्च कर के उसे औली की शक्ल दे सकते हैं। यह भी देखा जाना चाहिए कि शायद गुप्ता जी यह तथ्य जानते हैं कि रुपयों से बुग्याळ का सौंदर्य नहीं खरीदा जा सकता, लेकिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के लिए यह समझ पाना मुश्किल लगता है। सिर्फ शौक़ीन प्रवृत्ति मनुष्यों की संतुष्टि के लिए प्रकृति के साम्य से खिलवाड़ करना उत्तराखंड की छवि और पर्यावरण दोनों को भारी पड़ सकता है।

हम पहले ही देखते आ रहे हैं कि उत्तराखंड के पवित्र तीर्थस्थलों से लेकर खूबसूरत पहाड़ों तक को वो लोग आए दिन नुकसान पहुँचाकर निकल जाते हैं, जिन्हें प्रकृति से कोई वास्ता और लगाव नहीं है। इसी क्रम में बुग्याळ को बदरंग कर दिया जाएगा और मुख्यमंत्री इसे यूरोपियन शैली कहते नजर आएँगे। देवभूमि को देवभूमि ही रहने दिया जाए, उसका हरियाणा-करण करने की आवश्यकता नहीं है। यह भी चिंता का विषय है कि बड़े-बड़े पर्यावरणविद भी 200 करोड़ रुपए एकसाथ सुनकर चुप बैठ चुके हैं। ऊँची आवाज वाले लोग खुद इस सजावट में मेहमान हैं। राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक इस विषय पर मौन है।

हमें और आपको घर बैठकर गुप्ता जी के रुपयों की महिमा से सबक लेना चाहिए, ना कि पर्यावरण पर चिंता व्यक्त करनी चाहिए। औली आएँगे जाएँगे, लेकिन 200 करोड़ रुपए नहीं जाने चाहिए। कॉन्ग्रेस के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और हॉर्स ट्रेडिंग विशेषज्ञ हरीश रावत ये बात अच्छे से जानते हैं कि 1-1 करोड़ से कितना फर्क पड़ जाता है। वो आज मुख्यमंत्री होते तो जरूर कहते कि ‘अच्छा हुआ मामला सस्ते में निपट गया।’वर्तमान सरकार को यह रिस्क नहीं लेना चाहिए।

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