Saturday, September 19, 2020
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हम किस दौर में जी रहे हैं? पैर धोकर फोटो खिंचाए जा रहे हैं! ये रहा जवाब

लोग तो इसे भी नौटंकी कह देते हैं कि मोदी अपनी माँ के पैर छूते हुए फोटो डालता है। ऐसे लोग बहुत ही आसानी से भूल जाते हैं कि इसी सोशल मीडिया पर वो दिन भर अपने मन की बातें करते रहते हैं, अपनी प्रेमिका की तस्वीरें लगाते हैं, माँ के गले लिपटकर उन्हें चूमते हैं।

शीर्षक का सवाल अगर कोई ऐसा व्यक्ति करे जो किसी पार्टी को समर्थन नहीं देता, या किसी पार्टी के विरोध में नहीं है, तो सवाल सही लगता है। सवाल इसलिए सही लगता है कि उस व्यक्ति को पार्टियों और नेताओं के फोटो मोमेंट से ही समस्या हो सकती है। उसे लगता हो कि स्थिति आदर्श है, और चुनाव जीतने के लिए विकास के काम करा लिए जाएँ, वही बहुत है। उसे लगता हो कि हर आदमी को परफ़ेक्ट होना चाहिए।

लेकिन जो व्यक्ति एक विचारधारा, या पार्टी-पोलिटिक्स के साथ जगता, रहता, और सोता हो, दिन के दस पोस्ट उसके राजनैतिक होते हों, वो अगर मोदी द्वारा ‘स्वच्छता दूतों’ के पाँव धोने पर उपहास कर रहा है, तो उसकी मानसिकता पर सवाल उठते हैं। 

जो भी व्यक्ति थोड़ा भी राजनीति से संबंध रखता है, चाहे वो एक सामान्य नागरिक के तौर पर हो, या फिर किसी पार्टी के कार्यकर्ता के तौर पर, वो जानता है कि चौबीसों घंटे मीडिया से घिरे रहना वाले नेता जो भी करते हैं, उसका पब्लिक में जाना तय है। साथ ही, जब बात पब्लिक में जाती है, तो एक संदेश जाता है। संदेश को आप किस तरह से देखते हैं, ये पूरी तरह आपके ऊपर है।

यही कारण है कि राहुल गाँधी को चुनावों के दौरान गोत्र बताने से लेकर जनेऊ पहनने और शिवभक्त से रामभक्त होना पड़ा था। पार्टी के या वृहद् समाज के वोटर्स को समेटने के लिए ऐसे काम होते रहे हैं, और होते रहेंगे। ऐसे ही काम चाहे धरना करने को लेकर हो, या सड़क पर रातों में अपनी ही सरकार में सोने को हो, बहुतों ने किया है। इन सबका महत्व है। 

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महत्व यही है कि आप जिनसे जुड़ना चाहते हैं, वहाँ तक आप शारीरिक रूप से नहीं पहुँच सकते, तो ऐसे संदेशों के ज़रिए पहुँचते हैं। एक पब्लिक फ़िगर का, नेता का, एक समय में सिर्फ स्पीच के माध्यम से ही नहीं, अपने बॉडी लैंग्वेज, अपनी सामान्य जिंदगी और अपनी आधिकारिक यात्राओं के दौरान किए गए छोटे-छोटे कार्यों से भी अपनी जनता से जुड़ने का मौका होता है। 

कल जो मोदी ने किया, या मोदी जो अपनी रैलियों के दौरान करते हैं, उसके मायने होते हैं। आप विरोध में खड़े हैं तो आपको बेशक वो एक ड्रामा लगेगा, लेकिन वही काम आपके मतलब के लोग करते हैं, तो वो सामान्य सी बात होती है जो राहुल गाँधी हमेशा करते थे, लेकिन राजनीति के कारण उन्हें पब्लिक में करना पड़ा। ख़ैर, यहाँ बात राहुल बनाम मोदी की है भी नहीं। 

चाहे वो उत्तर-पूर्व के राज्यों में रैलियों को संबोधित करते हुए उनकी वेशभूषा धारण करनी हो, उनकी जनजातीय परंपरा की पगड़ी, टोपी, कपड़े पहनने हों, मोदी ऐसे मौक़े नहीं छोड़ते। साथ ही, आप में से ही कई उन टोपियों का, कपड़ों का उपहास करते हैं। आप कर सकते हैं क्योंकि आपके लिए जीन्स-पैंट ही कपड़ा है, बाकी चीज़ें जो आपकी समझ में नहीं आती, वो नौटंकी है। 

इसके मायने यही हैं कि मोदी अपने कुरते में भी स्पीच दे सकते थे, लेकिन उन्होंने उस इलाके की जनजातीय परंपरा को यह संदेश दिया कि देश का प्रधानमंत्री उनकी परंपरा का सम्मान करता है। आपको इसमें कुछ भी असामान्य नज़र नहीं आएगा क्योंकि आप न तो लोयथम रिचर्ड को जानते हैं, न ही नाइदो तनियम को। आप उन हजारों उत्तर-पूर्व के लोगों को नहीं समझ पाते, और मजाक करते हुए, टिप्पणियाँ करते हुए, उसके बालों के कारण उसकी जान ले लेते हैं। 

आप जान ले लेते हैं क्योंकि आप उस समाज का हिस्सा हैं, जिनके लिए विविधता उपहास का विषय है। समाज ऐसे लोगों को मार देता है क्योंकि वो उनसे अलग दिखते हैं। नागालैंड की जनजाति की टोपी या फिर अरुणाचल से न्यासा जनजाति की पगड़ी को आप आजीवन देख नहीं पाते, अगर मोदी ने न पहना होता। इससे कम से कम यह तो हुआ ही होगा कि कोई आपको वैसा पहने दिख जाए तो उसे आप सीधा अफ़्रीका का नहीं मान लेंगे, और आपके अपने देश की विविधता का भान होगा! 

उसी तरह, कितनी बार रुककर सफ़ाई कर्मचारी से ठीक से बात की है आपने? सीवरों में घुसकर मरने वाले लोग वही लोग हैं, जो हमारे समाज को साफ रखते हैं। कितनी बार अपने घर में झाड़ू लगाने आती महिला को आपने प्रेम से कुछ कहा है? कितनी बार आपने उसके बच्चे की मदद करनी चाही है? कितनी बार उसके परिवार के बारे में जानने की कोशिश भी की है? याद करेंगे तो शायद दो-तीन बार ऐसा किया होगा। हम में से बहुत वो भी नहीं करते। 

गाँधी जी ने जब कहा था कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता, तो हमने किताबों से वो लाइन रट ली, लेकिन समझ नहीं पाए। इन बातों की समझ बाहर के कई देशों में है, इसलिए वहाँ नाली साफ करने वाले को एक प्रोफेसर से ज़्यादा पैसे मिलते हैं। वहाँ की समझ यह है कि कोई हमारी गंदगी हटा रहा है, कोई वह काम कर रहा है जो मैं स्वयं नहीं करना चाहता। इसलिए उस कार्य को करने वाले की अहमियत बढ़ जाती है। 

मोदी जब स्वच्छता दूतों के पाँव धोता है तो वो सिर्फ एक ड्रामा नहीं है, वो एक स्टेटमेंट है कि राष्ट्र का मुखिया उन लोगों के कार्यों को, उनकी कोशिशों को, उनकी अहमियत को पहचान रहा है, जिनके कारण विश्व का सबसे बड़ा मेला सफ़ाई के मामले में बेहतरीन रहा। ये महज़ एक विडियो नहीं है, यह एक संदेश है कि हमें अपने घर की सफ़ाई करने वाले, हमारे काम निपटाने वाले लोगों को आभार प्रकट करना चाहिए। 

पैर धोना एक प्रतीकात्मक कार्य है। लेकिन कभी-कभी ऐसे प्रतीक हमारे समाज में ज़रूरी होते हैं जहाँ हम हमेशा ही ऐसे लोगों को नीची निगाह से देखते हैं। आप नहीं देखते होंगे, हो सकता है, लेकिन समाज कैसे देखता है, वो हम सब जानते हैं। ये सिर्फ पाँव धोकर फोटो खिंचाना नहीं है, ये सद्भावना का संदेश है कि हमें अपना व्यवहार कैसा रखना चाहिए। 

ऐसे में कोई अपने जीवन के आधे घंटे निकालकर, प्रतीक के लिए ही सही, उनके पास जाने की कोशिश करता है, उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि वो जो कार्य कर रहे हैं, वो महान कार्य है, तो आपको समस्या क्यों होती है? आप ही तो वो लोग हैं जिन्होंने ‘स्वच्छता अभियान’ पर मोदी के झाड़ू पकड़ने को लेकर मजाक उड़ाया था। लेकिन आप आज भी उसके इम्पैक्ट को स्वीकारने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि आपके लिए तो मोदी को हर व्यक्ति के घर में जाकर झाड़ू लगाते हुए दिखना था। 

आप इन मामूली बातों के बड़े असर से वाक़िफ़ नहीं हैं। शायद आपका अनुभव वैसा न हो, या सोशल मीडिया के बाइनरी में आप भी मिडिल ग्राउंड तलाशने में परेशान हो रहे हों। ‘स्वच्छता अभियान’ और ‘हर घर में टॉयलेट’ के मायने उन औरतों से पूछिए जिन्हें अंधेरे में शौच को जाना पड़ता था। लेकिन आप नहीं समझ पाएँगे क्योंकि आपके लिए झाड़ू और ट्वॉयलेट तो मामूली चीज़ें हैं, इन पर पीएम अपना समय क्यों दे रहा है। 

लोगों को इस बात से आपत्ति हो जाती है कि मोदी अपनी माँ के पैर छूते हुए फोटो डालता है, बग़ीचे में घुमाते हुए फोटो डालता है। ऐसे लोग बहुत ही आसानी से भूल जाते हैं कि इसी फेसबुक, इन्स्टाग्राम या ट्विटर पर वो दिन भर अपने मन की बातें करते रहते हैं, अपनी प्रेमिका की तस्वीरें लगाते हैं, माँ के गले लिपटकर उन्हें चूमते हैं। 

क्या प्रधानमंत्री को अपनी माँ के प्रति प्रेम दर्शाने का हक़ नहीं है? क्या वो पत्थर हो जाए? आखिर किस बेटे की लालसा नहीं होती कि वो जीवन में कुछ करे, और अपनी माँ को उसका एक हिस्सा न दे? जिस माँ के रक्त और मांस से ये शरीर बना है, जिस माँ का हिस्सा हम हैं, उसे अगर हम प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने आवास पर न लाएँ, उसके व्हील चेयर को ढकेलते हुए बग़ीचे में न घुमाएँ तो फिर प्रधानमंत्री बनकर अपने वैयक्तिक स्तर के आनंद से हम वंचित रह जाएँगे। 

सोशल मीडिया का दौर है, तो जैसे आप अपनी माँ के गले लगकर फेसबुक पर लगा देते हैं, और लोग उसे देखकर खुश होते हैं, वैसे ही एक प्रधानमंत्री भी करता है। इसमें समस्या क्या है? प्रधानमंत्री अपने निजी जीवन के क्षण, अपने वैयक्तिक पोस्टों के माध्यम से शेयर न करे? मैं तो चाहूँगा कि हर व्यक्ति ऐसा करे क्योंकि न तो एक बेटे द्वारा अपनी माँ को चूमने से बेहतर कोई तस्वीर हो सकती है, न ही किसी सफ़ाई कर्मचारी के पाँव धोते प्रधानमंत्री से ज़्यादा समावेशी संदेश। 

इसलिए, आप जब ऐसी बातों पर प्रश्न करते हैं, तो अपने आप को एक बार देख लिया कीजिए। दौर बहुत ही अच्छा है। हर दौर अच्छा होता है। हर दौर के लोग अच्छे होते हैं। जहाँ तक इस तंज का सवाल है कि ऐसे लोगों के बच्चे होते तो वो उनके ‘मूतने की तस्वीरें’ भी लगाता, तो यह जान लीजिए कि जो पहली बार पिता बनता है, वो इन बातों पर भी अपार आनंद पाता है। क्या पता आप ही जब उस स्थिति में होंगे तो अपने बच्चों के साथ की हर वैसी तस्वीर शेयर करेंगे। 

ये ड्रामा नहीं है। ये ड्रामा आपके लिए हो सकता है क्योंकि आपको लगता है कि इसकी ज़रूरत नहीं है। और वो आप ही होंगे जो यह भी कहते पाए जाएँगे कि दलितों को पीटा जा रहा है, मोदी जी बयान क्यों नहीं देते। वही मोदी उसी दलित के घर चला जाएगा, तो आप कहेंगे चुनावों के समय नौटंकी हो रही है। 

आप ही कहेंगे कि भाजपा और मोदी ‘सूट बूट की सरकार’ चलाते हैं, जिसका मतलब है कि उसे आम आदमी से कोई मतलब नहीं। वही आदमी जब किसी बुजुर्ग महिला के पाँव छूता है, तो आपको लगता है कि सब कैमरे के लिए हो रहा है। आप ही कहते हैं कि वंचितों के लिए मोदी ने क्या किया, उन्हें सताया जा रहा है, और जब मोदी उनके पाँव धोता है, तो आपको लगता है कि नौटंकी हो रही है। 

आप शायद इन बातों के प्रभाव को समझ नहीं सकते। शायद समझना नहीं चाहते। या, आपकी समझ का दायरा इतना संकुचित है कि आपके लिए आप जो चाहते हैं, उससे इतर कुछ भी होता अजीब लगता है, नौटंकी लगती है। जो मोदी से जुड़े हैं, वैचारिक स्तर पर, या पार्टी के स्तर पर, उनमें ऐसे लाखों लोग हैं जो ऐसे तबक़ों से आते हैं जिन्हें हमेशा हेय दृष्टि से देखा गया है। इन लोगों तक अगर जुड़ाव का एक संदेश ही जा रहा है कि मोदी उनके कार्यों की सराहना करता है, तो उनके लिए ‘सम्मान’ नाम के शब्द के मायने व्यापक हो जाएँगे। लेकिन आपको क्या, आप नहीं समझेंगे, क्योंकि आप समझना नहीं चाहते। 

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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