रवीश कुमार जी वाह! KFC में बैठकर शाकाहार पर प्रवचन…

कसम नीरा राडिया टेप केस की, 2014 से पहले रवीश कुमार कितना सरकार से सवाल पूछते थे? आराम से स्टूडियो में बैठकर 'कौन जात हो भाई?' वाला पत्रकारिता का मॉडल फेल हो गया और इसीलिए 2014 के पहले जो रवीश कुमार कहते थे बागों में बहार है, अब वह उजड़ा चमन में बदल चुके हैं।

देसी और विदेशी भाषाओं में अपने फेसबुक पोस्ट का दैनिक अनुवाद करवाने के कारण देश और दुनिया में पत्रकारिता के सबसे बड़े मापदंड बन चुके सबसे निष्पक्ष पत्रकार और कॉन्ग्रेस नेता बृजेश पांडे के भाई श्री रवीश कुमार जी राष्ट्रीय चर्चा बने रहना खूब जानते हैं। रवीश कुमार पिछले दिनों ‘द वायर’ के स्टूडियो में बैठकर निष्पक्षता, गोदी मीडिया और एजेंडा पत्रकारिता पर चर्चा कर रहे थे तो लग रहा था, जैसे KFC रेस्टोरेंट में बैठकर शाकाहार पर प्रवचन कर रहे थे। ये मीडिया गिरोह की टुकड़ी वही ‘द वायर’ है, जो हर दूसरे दिन अपने ही देश को नीचा दिखाने वाले या फिर ‘हिंदू फोबिया’ से ग्रस्त आर्टिकल लाकर पब्लिसिटी बटोरता है, और फ़र्ज़ी आर्टिकल लिखकर लोकतंत्र का प्रहरी बनने की कोशिश करता है।

दिलचस्प बात ये है कि द वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वर्धराजन भारत के नहीं बल्कि अमेरिका के नागरिक हैं और इनकी पत्नी हैं नंदिनी सुंदर। वही नंदिनी सुंदर, जिस पर छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की हत्या का केस चल रहा था। हालाँकि, कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद सरकार ने वहाँ से वापस ले लिया था। उसी ‘द वायर’ के स्टूडियो में बैठकर रवीश कुमार निष्पक्षता पर नीति वचन सुना रहे थे और अक्सर अपने प्राइम टाइम शो में भी ‘द वायर’ की तारीफ करते देखे जाते हैं। वैसे यह तथाकथित लिबरल लॉबी का पुराना गुण है, जिसमें वह खुद एक दूसरे की तारीफ करते रहते हैं कि तुम मेरी तारीफ करना और बदले में समय आने पर मैं तुम्हारी तारीफ कर दूँगा, फिर दोनों फेमस हो जाएंगे। नॉट सो?

निष्पक्ष रविश कुमार और तथाकथित गोदी मीडिया

रवीश कुमार तथाकथित गोदी मीडिया जैसे बिल्कुल नहीं हैं, वह कभी हिंदू-मुसलमान नहीं करते हैं, बल्कि वह तो हर समय अगड़ा-पिछड़ा ब्राह्मण-दलित करते रहते हैं। पिछले दिनों रवीश कुमार के वैचारिक साझेदारों ने तो पूरा रिकॉर्ड तोड़ दिया था। पुलवामा हमले में बलिदान हुए देश के जवानों के चिता की अग्नि अभी शांत भी नहीं हुई थी, तभी इन लोगों ने यह जानने की कोशिश शुरू कर दी थी कि कौन जवान किस जाति का है। वास्तव में रवीश कुमार हिंदू-मुस्लिम भी करते हैं, लेकिन उसकी एक शर्त है और वो ये कि जब कभी कोई हिंदू धर्म के विषयों की बात आए तो रवीश कुमार पर्यावरण पर चिंता जाहिर करते हैं।

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उदाहरण के लिए इखलाक कांड पर रवीश कुमार जी बहुत विचलित हुए थे। लेकिन डॉ. नारंग हत्याकांड, दिल्ली के अंकित सक्सेना हत्याकांड, पश्चिम बंगाल में मालदा और हावड़ा के हिंदू विरोधी दंगे और तत्कालिक रामालिंगम द्वारा धर्म परिवर्तन ना करने पर जिहादी तत्वों द्वारा हत्या कर दिए जाने पर रवीश कुमार साइलेंट मोड में चले जाते हैं। अगर मजबूरन उस दिन उन्हें प्राइम टाइम करना भी हो, तो उस दिन उनकी रिपोर्टिंग का अंदाज़ ही जुदा हो जाता है, इस समय उन्हें पर्यावरण या गरीबी याद आ जाती है। ऐसे मौकों पर ‘बागों में बहार है?’ पूछने वाले रवीश कुमार ‘मैं ना बोलूँगा’ वाले सिद्धांत पर ही काम करते हैं।

रवीश कुमार और उनके लॉबी के दूसरे पत्रकार अपने एजेंडावादी पत्रकारिता के बचाव में कहते हैं, कि पत्रकार का काम है सरकार से सवाल करना। यह सही है कि भारत की जनता भोली-भाली है, लेकिन उसकी याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं है। कसम नीरा राडिया टेप केस की, 2014 से पहले रवीश कुमार कितना सरकार से सवाल पूछते थे? उस पर कुछ ना बोला जाए तो ही अच्छा है। वास्तव में 2014 में देश में मोदी सरकार बनते ही रवीश कुमार का जो कंफर्ट जोन था वह खत्म हो गया। आराम से स्टूडियो में बैठकर ‘कौन जात हो भाई?‘ वाला पत्रकारिता का मॉडल फेल हो गया और इसीलिए 2014 के पहले जो रवीश कुमार कहते थे बागों में बहार है, अब वह उजड़ा चमन में बदल चुके हैं। उस पर बौखलाहट का एक और कारण ये कि अब लगभग हर दर्शक के हाथ में इंटरनेट की सुविधा वाला मोबाइल फोन है,और वे प्रतिक्रिया करना चाहते हैं इसी वजह से सभी रवीश कुमार के दोहरे मापदंड वाली पत्रकारिता पर प्रश्न करते हैं।

निष्पक्ष रवीश

वैसे तो यह लाइन ‘निष्पक्ष रवीश’ ‘मीठा नमक’ और ‘खट्टा चीनी’ के समान विरोधाभासी शब्द लग रहा है और वास्तव में सच्चाई भी यही है। रवीश कुमार आजकल एक बात करते हैं कि सरकार राष्ट्रवाद के नाम पर मूल मुद्दों से ध्यान हटा रही है। पहली बात, दुनिया के जितने भी देश हैं उनके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा उनका मूल मुद्दा होता है लेकिन, भारत में इससे क्यों बचा जा रहा है? उसका एक कारण है क्योंकि राष्ट्रवाद विपक्षी पार्टियों के लिए दुखती नस के समान है। राष्ट्रवाद की बात जब भी आएगी, लोगों को ध्यान में आने लगेगा JNU कांड के समय बिना कुछ सोचे समझे राहुल गाँधी का और अरविन्द केजरीवाल का JNU में चला जाना, मणि शंकर अय्यर के कुंठित बयानों की तो लंबी लिस्ट है ही, इसके अलावा संदीप दीक्षित द्वारा आर्मी चीफ को सड़क का गुंडा बताना, संजय निरूपम द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक को फर्जीकल स्ट्राइक बताना। यही हाल अधिकांश राजनीतिक दलों का है। इसीलिए राष्ट्रवाद के मुद्दे से वह चुनाव में बचना चाहेंगे क्योंकि राष्ट्रवाद का जहाँ नाम लिया जाएगा, उतना ही जनता इन पार्टियों खिलाफ भड़केगी। इसलिए कॉन्ग्रेस सहित विपक्षी पार्टियाँ और उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले पत्रकार भी राष्ट्रवाद के मुद्दे से भागने की कोशिश करते हैं।

रवीश कुमार आजकल बेरोजगारी की बात करते हैं। UP में जब 2017 में बीजेपी की सरकार बनी तो स्लॉटरहाउस (बूचड़खाने) सख्ताई से बंद किए जाने लगे। जिसके कारण लखनऊ के टुंडे कबाब की दुकान एक-दो दिन के लिए बंद हो गई, फिर क्या था! देश में कोहराम मच गया। रवीश कुमार और उनके लॉबी के पत्रकार और बुद्धिजीवी हो-हल्ला मचाने लगे कि सरकार लोगों के रोजगार छीन रही है। जीरो लॉस थ्योरी के प्रवर्तक कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने तो यहाँ तक कहा कि मोदी सरकार भारत का संस्कृति खत्म कर रही है। टुंडे-कबाब की दुकान के बंद होने से यह बात भी खत्म हो गई।

टुंडे-कवाब का रोजगार बंद हो जाने के कुछ समय बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में स्वरोजगार का जिक्र करते हुए पकौड़ा बनाने वाले का उदाहरण दिया था। बुद्विजीवी गिरोहों में एक बार फिर कोहराम मच गया। रवीश कुमार और उनके लॉबी के पत्रकार प्रधानमंत्री के बयान का मजाक उड़ाने लगे कि पकोड़े तलने का बयान कैसे दिया। तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ है कि यह वही लोग थे जो टुंडे-कबाब को बोल रहे थे कि यह लोगों का रोजगार है, लेकिन पकोड़े के ऊपर मजाक उड़ा रहे हैं। बहुत देर बाद में समझ में आया शायद अंतर कबाब और पकोड़े के नेचर में हैं। असल में कबाब सेक्यूलर है और पकौड़ा कम्युनल, इसीलिए यह लोग कबाब बेचने को तो रोजगार मानते हैं, लेकिन पकौड़ा बेचने पर व्यंग्य कस रहे हैं। रोजगार पर याद आया कि मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार रोजगार के ऊपर बहुत अच्छे कार्य कर रही है, जैसे पशुओं को चराना। इसके अलावा शादियों में बैंड बाजा बजाना। रवीश कुमार जी ने पता नहीं इसके ऊपर कोई प्रोग्राम किया या नहीं?

इसके अलावा रवीश कुमार आजकल भारत की अर्थव्यवस्था पर भी काफी दिलचस्पी लेने लगे हैं। और खासकर 2014 के बाद से। यह वही रवीश कुमार और उनकी लिबरल लॉबी है, जिसने अभी डेढ़ साल पहले रेटिंग एजेंसी मूडीज द्वारा भारत की तारीफ करने पर मूडीज की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिया था। वह इतने पर ही नहीं रुके। चूँकी ‘मूडीज’ ने मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत की आर्थिक नीतियों की तारीफ कर डाली थी, इसलिए ‘मूडीज’ को दंड भी देना था। लेकिन मूडीज कोई व्यक्ति विशेष तो है नहीं, यह तो एक संस्था है। लिबरल गिरोह में संकट फ़ैल गया कि अब किसे सजा दी जाए, तो यह तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिबरल समर्थक ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट खिलाड़ी ‘टॉम मूडी’ को जा कर गाली दे रहे थे। शायद इस आधार पर कि रेटिंग एजेंसी मूडीज और टॉम मूडी का नाम समान है। यह तो इनके लिबरल समर्थकों का बौद्धिक स्तर। मूल बात थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में रेटिंग एजेंसी मूडीज द्वारा भारत की तारीफ होने पर यह लोग उसकी प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े कर देते हैं। वहीं अगर किसी छोटे-मोटे छुटभैय्या अर्थशास्त्री या पेड कॉमेडियन द्वारा अगर मोदी की किसी नीति से असहमति या फिर आंशिक विरोधी हो, तो उसपर मीडिया का यही समुदाय विशेष आसमान सर पर उठा लेता है।

देश बाद में, पहले एजेंडा

फरवरी 2019 में हुए पुलवामा आतंकी हमले के समय भी रवीश की रिपोर्टिंग अपने एजेंडे पर ही चल रही थी। जब देश के 40 से अधिक जवान बलिदान हो गए हों, उस देश में सबका आक्रोशित होना स्वभाविक है। उसके उपरांत सामान्य देशवासी सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। उसे रवीश कुमार ने उन्माद बताया। जब 6 फुट का CRPF का जवान अपने घर 200 ग्राम के मांस के बंडल में पहुँच रहा है, उसकी स्थिति को देखकर जो लोग दुखी हैं, उनको रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में उन्मादी बता रहे हैं। इस पर तो कुछ बोलना ही शेष नहीं रह जाता और यह वही रवीश कुमार हैं, जो JNU कांड के समय अफजल गुरु का फोटो लेकर नारे लगाने वालों के बचाव में अपनी स्क्रीन काली कर रहे थे।

इसके बाद IAF द्वारा बालाकोट एयर स्ट्राइक की घटना के बादविंग कमांडर अभिनंदन का पाकिस्तान के द्वारा पकड़े जाने के बाद देश में बहुत सारे लिबरल खुश हुए थे। इनका मानना था कि अगर लोकसभा चुनाव तक विंग कमांडर अभिनंदन की वतन वापसी नहीं होती है तो विपक्ष और मीडिया गिरोह के लिए यह बड़ी जीत थी क्योंकि मोदी सरकार को घेरने के लिए इसी मीडिया गिरोह ने ’56 इंच की सरकार’ पर खूब कटाक्ष किया था। लेकिन भारत सरकार की वैश्विक कूटनीति ने अपना असर दिखाया। पाकिस्तान को मात्र 72 घंटे के अंदर विंग कमांडर अभिनंदन को रिहा करना पड़ा। अब चूँकि इसका क्रेडिट मोदी सरकार को जाता, तो फिर पाक ऑकुपाइड पत्रकारों ने एक दूसरी योजना शुरू की जिसके अंतर्गत इमरान खान को धन्यवाद देना तय हुआ।

रवीश कुमार ने भी अपने प्राइम टाइम शो में कहा कि अगर लोग इस पर इमरान को धन्यवाद नहीं दे रहे हैं तो यह दुखद है। यानी, सिर्फ इस वजह से कि इस बड़ी जीत के लिए नरेंद्र मोदी को तारीफ न मिल जाए, ये लोग इमरान खान की तारीफ करने के लिए तैयार हो गए। सवाल ये है कि आखिर किस मुँह से कोई भारतीय पाकिस्तान की तारीफ करने को राजी हो सकता है? भारत ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के एक लाख से अधिक जवान रिहा किए, लेकिन पाकिस्तान ने हमारे एक कैप्टन सौरभ कालिया को पकड़ लिया और उनके साथ उस तरह का सलूक किया, जैसा शायद ही कोई इंसान करता हो।

पाकिस्तान ने कैप्टेन सौरभ कालिया के कान के पर्दे फाड़ डाले, उनके जिंदा रहते ही उनके हाथ के नाखून नोचे गए, तड़पा-तड़पा कर उन्हें मारा गया, जिससे समझ नहीं आया कि पाकिस्तान की आर्मी कोई प्रोफेशनल आर्मी है या फिर दो पैरों पर चलने वाले कोई जानवरों का समूह! कोई जिंदा इंसान की तरह इस तरह हैवानियत कैसे कर सकता है। वह इमरान खान जो खुद पाकिस्तान में तालिबान खान के नाम से मशहूर है, जिनके साथ पाकिस्तान की हिंदू लड़कियों को टारगेट करने वाले मियाँ मिट्ठू के साथ इमरान खान की फोटो वायरल हो ही रही है। आजकल उसी इमरान खान के लिए नोबेल शान्ति पुरस्कार तक की माँग की गई, वो भी सिर्फ मोदी विरोध के नाम पर।

NDTV: एजेंडा तू न गई मेरे मन से

वास्तव में यदि देखा जाए, तो रवीश कुमार मात्र एक प्रोडक्ट हैं, मुख्य फैक्ट्री तो NDTV है। जिसमें इस तरह के प्रोडक्ट बन रहे हैं, जिनकी तारीफ भारत का सबसे बड़ा दुश्मन हाफिज सईद करता है। जिस चैनल के एक पत्रकार निधि सेठी ने अभी हाल ही में पुलवामा हमले पर बलिदान हुए जवानों का मजाक उड़ाया। वास्तव में NDTV से ज्यादा भारत का पक्ष तो कई बार लगता है कि पाकिस्तान का जिओ न्यूज़ ले लेता होगा। 26/11 हमले के बाद जिओ न्यूज के रिपोर्टर कसाब के गाँव गए थे और उस पर प्रोग्राम किया था। जिसके बाद पाकिस्तान चाह कर भी 26/11 हमले में अपनी भूमिका को नकार नहीं पाया और एक तरफ NDTV पाक ऑकुपाइड पत्रकार बरखा दत्त थी, जो बुरहान वानी को हेड मास्टर का बेटा बता रही थी। अब आप तय कीजिए, क्या रवीश कुमार KFC रेस्टोरेंट में बैठकर शाकाहार पर प्रवचन करते हैं या नहीं करते हैं?

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