मनोहर पर्रिकर के निधन पर ‘हँसने’ वाले इस्लामोफोबिया को बढ़ाते हैं

आप यह कहकर बच नहीं सकते कि ये लोग 'अच्छे मुसलमान' नहीं हैं। फिर तो, बाकी दुनिया भी किसी दाढ़ी वाले व्यक्ति को किसी अमेरिकी महिला द्वारा ट्रेन की ट्रैक पर ढकेल देने पर यही कहेगी कि वो 'अच्छी ईसाई' नहीं थी। न्यूज़ीलैंड के मस्जिदों पर गोली बरसाने वाला भी 'अच्छा आदमी' नहीं था।

एक प्रयोग कर लीजिए अभी आप लोग। जिस किसी भी न्यूज़ चैनल/साइट/पोर्टल को आप फॉलो करते हैं उनके पेज पर जाइए और मनोहर पर्रिकर की मृत्यु की खबर पर ‘रिएक्शन्स’ पर क्लिक करके ‘हा-हा’ के नीचे के नाम पढ़ लीजिए। इस बार मैं स्क्रीनशॉट्स नहीं लगा रहा, क्योंकि आपकी जब इच्छा हो खुद जाकर देख सकते हैं। इसके साथ ही, यह कहना भी ज़रूरी है कि एक ख़ास तरह के नामों के अलावा इस तरह की संवेदनहीनता दिखाने में कई और लोग भी थे, जो दूसरी विचारधारा के थे। फिर भी, ऐसे हर मौके पर एक ही तरह के नाम का आना उन लोगों को प्रभावित करता है जिन्हें यह समझ में नहीं आता कि किसी की मौत पर कोई खुश कैसे हो सकता है।

कुछ लोग कहेंगे क्या साबित होता है इससे। ये लोग वो लोग हैं जो दिन भर ‘गरिमा’, ‘नैतिकता’, ‘लोक व्यवहार’ आदि के नाम पर फेसबुक पेज से लेकर नेता, व्यक्ति या संस्थानों को गरियाते दिखते हैं। 

इससे साबित इतना ही होता है कि समाज में एक सम्प्रदाय के कुछ लोगों की सामूहिक संवेदनहीनता हर ऐसे मौके पर दिख जाती है। इस्लामोफोबिया या मुसलमानों से घृणा का भाव आकाश से नहीं टपकता। यही वो मौके हैं जब वैसे लोग सोचने लगते हैं कि ये किस तरह के लोग हैं?

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कुछ मुसलमानों के संवेदनहीनता के आधार पर सबको जज करना गैरज़रूरी है, लेकिन वास्तविकता यही है कि ऐसे लोग ही इस्लामोफोबिया के बड़े कारण हैं। इस्लामी आतंकवाद तो एक कारण है ही, लेकिन पुलवामा हमले के बाद सैनिकों के बलिदान होने की खबर पर ‘हा-हा’ करने वालों का भी रिलिजन था, पर्रिकर की मृत्यु की खबर पर हँसने वालों का भी और पुलवामा में आत्मघाती हमला करने वालों का भी।

किसी भी समाज या सम्प्रदाय से सामूहिक रूप से घृणा करना सही नहीं, लेकिन उसकी वजहें होती हैं। हो सकता है कि आप उन लोगों के ऐसे कार्यों से सीधे तौर पर प्रभावित न हो रहे हों, आपको पूरे जीवन उनसे कोई काम न पड़े, लेकिन मानवीय संवेदनाएँ निजी तौर पर ही हमें प्रभावित नहीं करती। अगर कोई चालीस जवानों के बलिदान पर ‘हँस’ रहा है, तो ज़ाहिर है कि उसकी संवेदना जवानों के साथ, उनके परिवारों के साथ तो नहीं ही है। 

ऐसे लोगों की संवेदना पर चर्चा करना भी अजीब ही है क्योंकि ऐसे लोग हर ऐसी घटना पर सामने आ जाते हैं। मनोहर पर्रिकर की मृत्यु पर ‘हा-हा’ करता हुआ मुसलमान नाम वाला व्यक्ति इस ख़बर से किस स्तर पर प्रभावित हो रहा है, ये हम या आप नहीं समझ सकते। उसे बस एक विरोधी (शायद) विचारधारा या पार्टी के नेता की मृत्यु की खुशी है। उसे उस सरकार के कार्यकाल में वीरगति को प्राप्त हुए भारतीय सैनिकों की मृत्यु की खुशी है। खुशी का कारण यह भी हो सकता है कि जिसने आत्मघाती हमला किया वो भी उसी धर्म का हो।

यहाँ घृणा एक स्तर पर ही नहीं है। यहाँ घृणा, एक समूह के द्वारा, जिनकी पहचान उनके नामों से खुलकर सामने आती है, और वो ऐसा करने से छुपते नहीं, कहीं नाम छुपाकर ऐसी बातें नहीं करते, जो हर ऐसे मौक़े पर सरकार या दूसरे धर्म से संबंधित लोगों की मृत्यु पर हँसते हैं। ये एक बुनियादी मानवीय गुण है कि किसी की मृत्यु पर अगर अच्छी बातें नहीं बोल सकते, तो चुप रहना पसंद कर सकते हैं। 

लेकिन कुछ लोगों की घृणा का स्तर इतना ज़्यादा होता है कि वो अपनी भावनाओं को छुपा नहीं पाते। यही कारण है कि ऐसे कुछ लोगों की बेहूदगी के कारण इस्लामोफोबिया, या इस्लाम मज़हब से नफ़रत, को हवा मिलती है। ये मुसलमान वैसे मुसलमान हैं जो चाहते हैं कि लोग उनसे घृणा करें। वरना आज के समाज में, जहाँ करुणा और दया की बात करते हुए दीवाली पर पटाखों के शोर से परेशान होने वाले जानवरों की हालत पर चर्चाएँ होती हैं, वहाँ ऐसे लोग इस तरह के काम भला क्यों करते हैं! 

मेरी अपील है इस मज़हब के बेहतर लोगों से कि वो सामने आएँ और ऐसे लोगों को धिक्कारें। वो अगर पचास हैं, तो आप में से सौ को आगे आकर इस पर लिखना और बोलना चाहिए कि ये गलत है। आप यह कहकर बच नहीं सकते कि ये लोग ‘अच्छे मुसलमान’ नहीं हैं। फिर तो, बाकी दुनिया भी किसी दाढ़ी वाले व्यक्ति को किसी अमेरिकी महिला द्वारा ट्रेन की ट्रैक पर ढकेल देने पर यही कहेगी कि वो ‘अच्छी ईसाई’ नहीं थी

ये ‘अच्छा मुसलमान’ और ‘हमारा मज़हब यह नहीं सिखाता’ की नकारी सोच से ऊपर उठकर, एक बेहतर समाज के लिए अपने भीतर से ही सफ़ाई जरूरी है। अगर पूरा समुदाय ऐसे समय पर भर्त्सना नहीं करता, जैसा कि कई लोगों ने न्यूज़ीलैंड हमले के बाद ‘खुश होने वाले’ लोगों के साथ किया था, तब तक मुसलमानों से घृणा की हवा और तेज ही बहेगी। और यही नफ़रत किसी युवक को मस्जिदों में पंद्रह मिनट तक गोली चलाने तक पहुँचा देती है। 

इस नफ़रत को फेसबुक जैसी जगहों से ही रोकना ज़रूरी है क्योंकि अगर वहाँ आप उस पर कड़ा रुख़ नहीं रख पा रहे, तो वहाँ उन नामों को भी वह रास्ता चुनने में सहजता होगी जो अभी तक इस तरह की घृणा पान की दुकान पर, सड़क के किनारे या चाय पीते हुए चार लोगों के बीच फैलाते थे।

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