Friday, June 18, 2021
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बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया… और IAF है दुधारू गैया

कहानी इसलिए क्योंकि सिर्फ नेता ही भ्रष्ट हैं, यह संदेश न जाए। टॉप पर बैठा अधिकारी (जिसकी कलम में रक्षा सौदों से लेकर यूनिफॉर्म पहनने-पहनाने तक की ताकत होती है) भी इसी समाज का होता है, वो भी उतना ही भ्रष्ट हो सकता है, जितना हम और आप।

ख़बर पुरानी है। एक फरवरी की। मीडिया भूल चुका है। सोशल मीडिया पर कभी कुछ आ जाता है, तो भले ही मीडिया कुछ देर के लिए चला दे, कुछ छाप दे वरना डिब्बा बंद। ख़बर है फाइटर प्लेन मिराज-2000 के क्रैश होने की और दो पायलटों के मौत की। इससे पहले कि हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) या भारतीय वायु सेना (IAF) की जाँच की ख़बर आए, आइए सुनते हैं फौज (खासकर एयर फोर्स) की कहानी।

खासकर एयरफोर्स इसलिए क्योंकि इससे मेरा नाता है – पेशेवर तौर पर तो नहीं लेकिन पारिवारिक तौर पर जरूर है। मेरे परिवार के एक बेहद करीबी (एकदम करीबी, लेकिन नाम नहीं बता पाऊँगा) हैं, जो पायलट हैं एयर फोर्स में। 18-19 साल का फ्लाइंग करियर है उनका। साल बताने का मकसद सीनियरिटी बताना कतई नहीं। मतलब यह है कि इतने साल किसी सिस्टम में रहने वाला बंदा उससे भली-भाँति वाकिफ़ होता है – अच्छाइयों से भी, बुराइयों से भी।

भगवान नहीं, मुक्के भरोसे फ्लाइंग

थोड़ा अटपटा है, लेकिन 16 आने सच। कैसे? कार तो देखी होगी आपने। उसके डैशबोर्ड में लगे 4-5 मीटर भी देखे होंगे। बस। इसी डैशबोर्ड को बड़ा कर दीजिए, मीटर 10-20 लगा दीजिए। एयरफोर्स के चॉपर या फाइटर प्लेन में पायलेट इन्हीं मीटरों के सहारे उड़ता है। इन्हीं में एक होता है – ऑल्टिमीटर। यह ऊँचाई बताने का काम करती है। सोचिए 10-20 हजार फीट की ऊँचाई पर अगर यह मीटर काम करना बंद कर दे तो क्या होगा? हाथ-पाँव फूल जाएँगे! और अगर लो-फ्लाइंग (2000 फीट से भी नीचे) के दौरान ऐसा हो तो? बाप-रे-बाप! लेकिन एयर फोर्स के पायलटों के लिए यह आम बात है। इतना आम कि जब भी ऐसा होता है, वो डैशबोर्ड पर मुक्का मारते हैं, ऑल्टिमीटर चलने लगता है। कभी एक मुक्के से तो कभी 2-4 मुक्के से।

रूस में इंद्र

2017 के आख़िर में भारतीय फौजें रूस गईं थीं। शहर का नाम था – व्लादिवोस्तो (Vladivostok)। 11 दिनों तक यहाँ भारत-रूस संयुक्त युद्धाभ्यास किया गया था। इस युद्धाभ्यास का नाम ही इंद्र (Indra-2017) था। इंद्र थल-जल-नभ तीनों सेनाओं का संयुक्त युद्धाभ्यास था। इंद्र का उद्देश्य था – शहरी आबादी में ISIS जैसे बड़े आतंकवादी संगठन के हमले को नाकाम करना। इसके लिए नकली तौर पर पूरा का पूरा एक शहर बसाया गया था, जिसे ISIS के नकली आतंकियों ने घेर लिया था।

भारतीय वायुसेना और रशियन वायुसेना दोनों को मिशन दिया गया – शहर से आतंकियों का सफाया। लेकिन नागरिक हितों की रक्षा के साथ-साथ। संयुक्त युद्धाभ्यास (डिफेंस डील के लेवल पर मैत्री देश हो तभी) में होता यह भी है कि आप मेरे साथ मेरे चॉपर में बैठ जाओ, मैं आपके साथ आपके चॉपर में बैठ जाऊँगा। ऐसा सिर्फ दोस्ती के लिए नहीं बल्कि तकनीक के साझा इस्तेमाल व समझ के लिए किया जाता है। इक्के-दुक्के मौकों को छोड़ दिया जाए तो भारत ने लगभग सारी मशीनें रूस से ही खरीदी हैं। मतलब जिस कंपनी, जिस मॉडल के चॉपर रशियन एयरफोर्स के पास था, वही चॉपर इंडियन एयरफोर्स के पास भी। यहीं से कहानी में ट्विस्ट है।

आर्मी के जवानों को उतारना हो या घायलों को रेस्क्यू करना, युद्ध के हालात ऊपर से शहरी आबादी में बिना हेलिपैड के चॉपर को उतारना बहुत कठिन काम होता है। यह कठिन काम रशियन एयरफोर्स के चॉपर ने बहुत ही कुशलता (मक्खन की तरह – यही शब्द थे मेरे करीबी के) से कर लिया। बिना किसी शोर-शराबे (चॉपर के अंदर) के। उसी कंपनी, उसी मॉडल के इंडियन एयरफोर्स के चॉपर ने जब यही काम किया तो नानी याद आ गई। चॉपर के अंदर इतना शोर-शराबा, जैसे ट्रैक्टर (उनके शब्द) चल रहा हो।

दर्जी एक, सैनिक अनेक

व्लादिवोस्तो जाने के लिए शायद कुछ स्पेशल कपड़ों या बैज़ (ठीक से याद नहीं) की ज़रूरत थी। एयरफोर्स के ऑफिसर-नॉन ऑफिसर मिलाकर लगभग 350 लोगों की टीम को वहाँ जाना था। ये 350 लोग भारत के अलग-अलग एयरबेस के थे। सबको दिल्ली आकर यहीं से जाना था। यह जरूरी होता है इतने बड़े स्तर पर किसी भी मूवमेंट के लिए। लेकिन यहाँ भी पेंच है। पेंच है लालफीताशाही का। इन सभी 350 लोगों को स्पेशल कपड़ा या बैज़ भी दिल्ली से ही इश्यू होना था। और ऐसा करने के लिए जिस ठेकेदार को यह काम दिया गया था, उसकी संख्या थी – एक। हुआ वही, जो होना था। कुछ को मिला, कुछ को ऐसे ही जाना पड़ा। बाद में किसी तरीके से उन्हें भेजा गया।

10-20-50-1000 रुपए के कपड़े से लेकर 1000-2000-50000 रुपए के ऑल्टिमीटर से लेकर 10-20-500 करोड़ रुपए के मशीन (चॉपर, फाइटर, मिसाइल, रडार कुछ भी) तक का उदाहरण क्यों? क्योंकि कभी स्क्वाड्रन लीडर समीर अबरोल मर जाता है। तो कभी स्क्वाड्रन लीडर सिध्दार्थ नेगी को भुला दिया जाएगा। उदाहरण इसलिए क्योंकि आपको मतलब हो या न हो, पार्टी आलाकमानों के बड्डे याद कराना नहीं भूलते नेता’जी’ लोग। उदाहरण इसलिए ताकि शहीद होने पर भी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को ‘कुत्ता भी घर पर नहीं जाएगा‘ न सुनना पड़े।

ऊपर के सारे उदाहरण इसलिए क्योंकि इसी देश में वजन बढ़ते रहने के बावजूद भूख हड़ताल कर रहे नेता’जी’ को मीडिया 10-20 दिन तक का कवरेज़ तक दे देता है। किसी छात्र नेता’जी’ को बेल मिली या नहीं, इस पर न जाने कितने प्राइम टाइम करते हुए देश की करोड़ों जनता का प्राइम टाइम ख़राब कर चुका है मीडिया। ऊपर के सारे उदाहरण इसलिए क्योंकि सिर्फ नेता ही भ्रष्ट हैं, यह संदेश न जाए। टॉप पर बैठा अधिकारी (जिसकी कलम में रक्षा सौदों से लेकर यूनिफॉर्म पहनने-पहनाने तक की ताकत होती है) भी इसी समाज का होता है, वो भी उतना ही भ्रष्ट हो सकता है, जितना हम और आप। इसलिए निशाने पर वो भी है। ये सारे उदाहरण इसलिए भी ताकि कुछ सुधार हो और फिर किसी सर्विंग ऑफिसर (लेफ्टिनेंट कर्नल संदीप अहलावत) को इतना तीखा न लिखना पड़े कि उसके कारण बताओ नोटिस जारी हो जाए।

IAF की समास्याएँ

राफ़ेल सुन-सुन कर कान पक चुके हैं तो यह जान लें कि इंडियन एयरफोर्स का अस्तित्व सिर्फ लड़ाकू विमानों के दम पर नहीं है। लड़ाकू विमान महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सिर्फ एक हिस्सा भर है। चॉपर, ट्रांसपोर्ट विमान, बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट, इंटरमिडयरी जेट ट्रेनर, एडवांस्ड जेट ट्रेनर, मिड-एयर रिफ्यूलर, रडार इन सब से मिलकर इंडियन एयरफोर्स मजबूत होता है। अफसोस यह कि इन सभी को अपग्रेड करने का काम दशकों पीछे चल रहा है। विदेशी खरीद पर हमारी निर्भरता इसलिए क्योंकि HAL समय पर माँग (क्वॉलिटी से समझौता किए बिना) की पूर्ति करने में सक्षम अभी तक तो नहीं हो पाई है।

IAF में भी ‘जुगाड़’

इंटरमिडयरी जेट ट्रेनर (IJT) की ही बात करें तो HAL ने फेज़ आउट हो रहे HJT-16 किरन का अभी तक कोई विकल्प उपलब्ध नहीं कराया है। पिछले साल सीएजी ने एचएएल को इंटरमिडयरी जेट ट्रेनर डेवलप करने में 14 वर्षों की देरी पर जमकर क्लास लगाई थी। 14 साल की देरी! जी हाँ। लेकिन चल रहा है। एयरफोर्स के कैडेट ट्रेनिंग ले रहे हैं – कैसे? जुगाड़ से। यह मैं नहीं पूर्व एयर चीफ मार्शल अरुप राहा का कहना है। इंटरमिडयरी जेट ट्रेनर की कमी के कारण तीन स्टेज की ट्रेनिंग को घटाकर दो स्टेज की ट्रेनिंग कर दी गई है।

ट्रेनी पायलट पहले पिलैटस PC-7 टर्बो ट्रेनर (Pilatus PC-7 Turbo Trainer) के बाद डायरेक्ट एडवांस्ड जेट ट्रेनर हॉक (Advanced Jet Trainer Hawk) पर ट्रेनिंग ले रहे हैं। दुखद यह है कि पिलैटस PC-7 और एडवांस्ड जेट ट्रेनर हॉक – दोनों ही विदेशी प्रोडक्ट हैं। HAL ने इस स्तर पर भी कोई योगदान नहीं दिया है। बेसिक ट्रेनर HTT40 को डेवलप करने में भी HAL पाँच साल पीछे चल रहा है। और सब कुछ ठीक-ठाक रहने पर भी इसके 2021 तक फ्लाइंग सर्टिफिकेट मिलने की उम्मीद बहुत ही कम है।

तेजस से ‘तेज’ गायब

इंडियन एयरफोर्स तेजस को अपने बेड़े में शामिल करने को लेकर बहुत उत्सुक नहीं है। क्यों? क्योंकि इसके साथ तीन मुख्य समस्याएँ हैं – (i) उड़ान स्थिरता सिर्फ 1 घंटे की (ii) उड़ान की रेंज सिर्फ 400 किलोमीटर के रेडियस तक (iii) हथियार ढोने की क्षमता 3 टन। अब तुलना करते हैं इसी के समान विदेशी सिंगल-इंजन फाइटर प्लेन की। स्वीडिश ग्रिपेन-ई (Gripen-E) और अमेरिकन एफ-16 के हथियार ढोने की क्षमता तेजस से दोगुनी है जबकि उड़ान स्थिरता तीन गुनी है।

Holy दुधारू Cow

जिस तेजस को एयरफोर्स लगभग नकार चुकी है, उसके लिए HAL को रक्षा मंत्रालय से दिसंबर 2017 में 330 बिलियन (33,000 करोड़) रुपए की मंजूरी मिली थी। इतनी बड़ी रकम की मंजूरी इसलिए मिली थी ताकि 2020-21 से HAL हर साल 16 की संख्या (लगभग एक स्क्वाड्रन हर साल तैयार) में तेजस मार्क 1A का निर्माण कर एयरफोर्स को सौंप सके। जब तेजस मार्क 1 में ही इतनी देरी हो रही है, तो तेजस मार्क 1A का भविष्य क्या होगा, पता नहीं!

एयरफोर्स डील में भ्रष्टाचार की बात करें तो यह राजनीतिक स्तर तक ही सीमित नहीं है। पूर्व एयर चीफ मार्शल एसपी त्यागी तक का नाम इन सबमें आ चुका है और सीबीआई द्वारा उनको गिरफ़्तारी भी किया जा चुका है। अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में क्रिस्चियन मिशेल के बाद दीपक तलवार और राजीव सक्सेना की गिरफ़्तारी से भविष्य में और भी बड़े नामों के आने की उम्मीद है।

भारत दो तरफ से दुश्मन देशों से घिरा है। जिसमें चीन तो विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के रास्ते पर है, साथ ही वो अति-महत्वाकांक्षी भी है। ऐसे में फेज़ आउट होते मिग से घटती स्क्वाड्रन की संख्या चिंता का विषय होना चाहिए। फिर भी 126 MMRCA (Medium Multi-Role Combat Aircraft) डील, जिसे यूपीए के शासन काल में ‘मदर ऑफ ऑल डील’ तक कहा जाने लगा था, उसे अधर में लटका कर VVIP चॉपर डील पर तत्परता मेरे समझ से बाहर है।

जो जरूरी है, उसे टालते जाना! स्वदेशी लेकिन क्वॉलिटी पर खरा नहीं उतर पा रहा हो, जो समय पर प्रोडक्ट नहीं दे पा रहा हो, उस पर भरोसा करते जाना, उसके लिए बड़े-बड़े बजट पास करते जाना! जो जरूरी नहीं है, उसके लिए हड़बड़ी दिखाना! विदेशी कंपनियों से उस प्रोडक्ट को खरीदना! ये जितने भी विस्मयकारी चिन्ह लगाए गए हैं, ये मूलतः उस ओर इशारा कर रहे हैं कि कुछ नहीं, सबकुछ गड़बड़ है। सिस्टम के उलटफेर की जरूरत है।

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चंदन कुमारhttps://hindi.opindia.com/
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