Monday, April 19, 2021
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नक़ाबपोश एक्सपर्ट के समर्थकों, तुम्हारे कपड़ों का ही नक़ाब उसने पहना है!

'थूक कर भागने वालों का सक्रिय गिरोह' जब नैरेटिव में दोबारा इस तरह की बातें ला सकता है, तो हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम भी एक स्टैंड लें और सारी बातें क्लियर करें कि ईवीएम हैकिंग क्यों संभव नहीं है।

कल शाम एक भद्दा मजाक हुआ ‘ईवीएम हैकिंग’ के नाम पर। यूँ तो, ये वाक्यांश इतनी बेहूदगी से, इतनी बार दोहराया जा चुका है कि नक़ाबपोश एक्सपर्ट की पहचान के विशेषणों को सुनने के बाद ही किसी भी चैनल या मीडिया को इसे गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए था, लेकिन खलिहर मीडिया इसे लाइव और लाइव ब्लॉग बनाकर चलाती रही। मैंने भी अपनी वाल पर एक विडियो डाली उस कैरिकेचर के कैरिकेचर की, नक़ाब लगाकर। उस व्यक्ति और इस मुद्दे का हासिल अब इतना ही है कि लोगों को उसे सुनकर आगे बढ़ जाना चाहिए।

लेकिन कुछ लोग अटक जाते हैं, क्योंकि कुछ लोग अटकना चाहते हैं। इसी में से एक व्यक्ति है जो स्वयं को ही ‘निष्पक्ष पत्रकारिता’ का एकमेव मानदंड मानता है। उसने अपने प्राइम टाइम शो में इस पूरी नौटंकी का ज़िक्र करते हुए जो एक लाइन कही वह इस लिहाज़ से सोचने योग्य है कि आख़िर पत्रकारिता के नाम पर स्टूडियो से महागठबंधन की रैली कब तक चलती रहेगी? 

पत्रकार श्रेष्ठ ने बड़े ही क्यूट अंदाज में पूछा कि जब हैकर बता रहा है कि उसे बारह दलों ने हैकिंग के लिए सम्पर्क किया था, तो इस पर जाँच क्यों नहीं हो सकती? बहुत ही सहज भाव से, सीरियस चेहरा लेकर पत्रकार महोदय पूछ देते हैं कि कोई अगर सवाल उठा रहा है तो जाँच में क्या समस्या है? अब यही पत्रकार यह बात भूल जाता है कि चुनाव आयोग ने सारी पार्टियों को न्योता दिया था कि ईवीएम मशीन लो, और हैक करके दिखाओ। ये बात और है कि कुछ पार्टियाँ और पत्रकार उसे घर ले जाने की बात कर रहे थे। 

आख़िर सवाल यह है कि क्यों करा ली जाए जाँच? क्या लगातार हो रहे चुनावों में अलग-अलग पार्टियों की जीत इस सवाल का स्वतः जवाब नहीं दे देती? या फिर हमारे देश के नेता और पार्टियाँ सत्ता में होते हुए, दूसरी पार्टियों को ईवीएम हैक करने दे दे रहे हैं ताकि लोगों का लोकतंत्र में विश्वास बना रहे? 

आख़िर जाँच किस आधार पर हो? एक नक़ाबपोश के कहने पर कि कॉन्ग्रेस को तो 245 सीटें आने वाली थीं, उसे हैकिंग से 201 सीटों का नुकसान हो गया? एक ऐसे व्यक्ति के विडियो कॉन्फ़्रेंस के आधार पर जिसने उन्हीं लोगों का नाम लिया जो मर चुके हैं, क्योंकि वो उसकी बातों का खंडन करने नहीं आ सकते? 

गौरी लंकेश उस व्यक्ति की बातों को छापने वाली थी, और उसकी हत्या कर दी गई! गोपीनाथ मुंडे को पता था, तो उसकी हत्या हो गई! तंज़ील अहमद प्राथमिकी दर्ज़ करने वाले थे, और उनकी मृत्यु हो गई! ऐसी बातें करने वाले व्यक्ति के आरोप पर विश्वास कर लिया जाए जिसकी पहचान में ‘भारतीय मूल के अमेरिकी साइबर एक्सपर्ट ने लंदन में की विडियो चैट के ज़रिए प्रेस कॉन्फ़्रेंस’ लिखा आ रहा था?

मुझे ख़ुद पर ही आश्चर्य हो रहा है कि मैं ही इस इस व्यक्ति को इतना महत्व क्यों दे रहा हूँ? फिर लगता है कि ‘थूक कर भागने वालों का सक्रिय गिरोह’ जब नैरेटिव में दोबारा इस तरह की बातें ला सकता है, तो हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम भी एक स्टैंड लें और सारी बातें क्लियर करें कि ईवीएम हैकिंग क्यों संभव नहीं है। 

आप चुनाव आयोग की वेबसाइट से इस पूरी प्रक्रिया को लेकर तय प्रोटोकॉल की हैंडबुक पढ़ सकते हैं। और, आप जान लीजिए कि केन्द्रीय चुनाव आयोग से लेकर, राज्यों को चुनाव आयोगों से होते हुए, ज़िला, प्रखंड, पंचायत और बूथ के स्तर तक, ईवीएम को लेकर बरते जाने वाले एहतियात इतने सारे हैं, और इतने रैंडम हैं, जहाँ हर पार्टी के प्रतिनिधियों/पोलिंग एजेंटों का होना ज़रूरी होता है, कि छेड़-छाड़ की गुंजाइश नगण्य है। 

इससे इनकार नहीं है कि कुछ मशीनें ख़राब होती हैं। चुनाव आयोग स्वयं इस बात को स्वीकारता है कि पाँच प्रतिशत मशीनें ‘तकनीकी कारणों’ से ख़राब हो सकती हैं। इसके लिए इंतज़ाम होते हैं। मध्यप्रदेश के चुनावों में कुल 65,000 बूथ थे, जिनमें 1500 वीवीपैट, 383 कंट्रोल यूनिट और 563 बैलट यूनिट ख़राब निकले। आप प्रतिशत निकाल लीजिए, अगर एक बूथ पर एक सेट ही इस्तेमाल हुआ हो फिर भी।  ऐसा कभी नहीं होता कि आपको ख़बर मिले कि फ़लाँ जगह मशीन में ख़राबी आ गई, तो वो मशीन बदली नहीं जाती। आप वो इसलिए नहीं सुनते क्योंकि मशीन का ख़राब होना, हर वोट किसी एक ही पार्टी को जाना आदि ख़बरें बिकने योग्य हैं, जबकि ‘ख़राब ईवीएम को आधे घंटे में चुनाव आयोग ने बदला’ एक बोरिंग और बेकार हेडलाइन है। 

अपनी पूरी बकवास के दौरान शूजा नाम के इस तथाकथित एक्सपर्ट ने ऐसी हास्यास्पद बातें बोली हैं जो कोई भी बोलने से पहले एक बार ज़रूर सोचेगा। इन सबमें सबसे लम्बी छलाँग कॉन्ग्रेस को 201 सीटों का घाटा थी। उसके बाद उसका यह कहना कि मशीन को लो-फ़्रीक्वेंसी सिग्नल से बाधित किया जा सकता है, टेक जार्गन फेंक कर लोगों को पागल बनाने के अलावा कुछ भी नहीं है। चुनाव आयोग ने दसियों बार इस बात को नकारा है, और लोगों को बुलाकर स्वयं को गलत साबित करने कहा है, कि मशीनों को किसी भी तरह के ब्लूटूथ, वाई-फ़ाई या वैसे ही तरंगों के ज़रिए हैक नहीं किया जा सकता क्योंकि उसमें वायरलेस नेटवर्किंग की कोई सुविधा है ही नहीं।

ईवीएम के दो हिस्से, बैलेट यूनिट और कंट्रोल यूनिट, आपस में तार से जुड़े होते हैं, और बैटरी से उनको ऊर्जा मिलती है। इसमें न तो कोई तार बाहर से जाता है जो कि पोलिंग अफ़सरों की नज़र से दूर हो, न ही बाहर से किसी भी तरह के सिग्नल से प्रभावित किया जा सकता है। इसमें या तो पूरा गाँव, शहर, या राज्य ही मिल जाए, और सारी पार्टियाँ साथ होकर किसी एक को जिताने का तय कर ले, तभी कुछ हो सकता है। उस स्थिति में भी जिसके नाम का बटन दबेगा, वोट उसी को जाएगा, न कि किसी और को। क्योंकि, अगर हर पार्टी के पोलिंग एजेंट नहीं मिले रहेंगे तो सुबह में हर बूथ पर हुई मॉक वोटिंग में ही, मशीनों के ख़राब होने पर पता चल जाएगा। 

शूजा बोलते-बोलते इतना बोल गया कि रिलायंस जियो ने भाजपा को ‘लो-फ़्रीक्वेंसी सिग्नल’ उपलब्ध कराए थे। बेहतरीन बात यह है कि जियो 2015 के दिसंबर में अनाउंस हुई, और अगले साल लॉन्च हुई।

शूजा के सारे दावे बिना किसी प्रूफ़ या एक्सप्लेनेशन के हैं। वो बस आरोप लगाता रहा, नाम गिनाता रहा, और टेक्निकल टर्म्स के नाम पर ‘सायबर एक्सपर्ट’ और ‘लो फ़्रीक्वेंसी’ के अलावा कुछ भी नहीं बोल पाया। ‘लो फ्रीक्वेंसी’ से क्या होता है, कैसे होता है, हैकिंग कैसे की जाती है, ऐसी बातों को बताने की ज़रूरत नहीं समझी गई। 

सत्ता से दूर एक पार्टी सत्ता को हथियाने के सारे हथकंडे इस्तेमाल करना चाहती है। वो पहले राफ़ेल का गीत गाती है, और संसद से लेकर सोशल मीडिया तक अपनी भद पिटवाती है। राज्यों में नई सरकारों के बावजूद वो जानती है कि उन्हीं राज्यों में लोकसभा चुनाव जीतना कितना कठिन होगा। इसलिए ईवीएम हैकिंग की हवा फिर से बाँधी जा रही है। 

लगातार चल रहे विकास कार्यों और राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी की बढ़ती स्वीकार्यता, जिसने ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, राजे तेरी ख़ैर नहीं’ जैसे नारों को जन्म दिया, बताता है कि भाजपा का रथ एक तय गति से आगे बढ़ रहा है, और उसे धक्का देने वाले वो करोड़ों लोग हैं जिन्हें लोकतंत्र के ज़रिए अपने जीवन में बेहतरी की संभावना फिर से दिखने लगी है। 

इसलिए, ये गिरोह सक्रिय होकर नई बातें कर रहा है। इसीलिए हर चुनाव से पहले भाजपा ही नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक पर भ्रष्टाचार के बेबुनियाद आरोप लगा रहा है। इसलिए लोगों को जागरुक होकर, झूठ के नैरेटिव को बेहतर तर्कों से काटना होगा। अभी ईवीएम का राग फिर से फूटा है, कुछ दिन में विवेक और शौर्य डोभाल पर काले धन और टैक्स चोरी के आरोप लगाने वालों से जब न्यायालय में जवाब माँगा जाएगा, तो आपातकाल भी आएगा, और प्रेस फ़्रीडम पर हमला भी होगा।

देखते रहिए, चिल मारिए और इस नंगी बेहयाई का आनंद लीजिए, क्योंकि इस एक्सपर्ट के नक़ाब बुनने के लिए इस गिरोह के लोगों ने पैंट उतारकर दान किया है। 

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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