Tuesday, August 3, 2021
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दूध माँगोगे तो भी चीर देंगे: जब पाक की पूँछ के नीचे पेट्रोल डालकर भारत अपने काम करता रहा

देश सेना के साथ खड़ा है, विकास के कार्य लगातार शुरु और खत्म किए जा रहे हैं। वहीं पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी शुद्ध हिन्दी में कश्मीर समस्या के समाधान के लिए शांति और मानव विकास के मार्ग प्रशस्त करने वाले के लिए नोबेल पुरस्कार की बात कर रही है।

जब अजित डोभाल ने ‘ऑफेन्सिव डिफ़ेंस’ की नीति की बात की थी, तो बहुतों को वो थ्योरेटिकल लगती थी। लगता था कि ये सब कहने की बातें हैं, इसका इस्तेमाल कब होगा। कुछ लोग यह भी मानते थे कि पाकिस्तान से शांति वार्ता ही अंतिम विकल्प है। हालाँकि, पिछले तीन सप्ताह में भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को पता चल गया ये नीति क्या है और विकल्प कितने हैं।

हमले, एयर स्ट्राइक, पाकिस्तानी घुसपैठ, F16 को गिराना, अभिनंदन की कस्टडी, अभिनंदन की वापसी, कराची-रावलपिंडी-लाहौर आदि शहरों पर गूँजते जेटों की आवाज से डरा पाकिस्तान और हरे झंडे के साथ ‘शांति’ की भीख माँगता इमरान खान। ये सब ऐसे हुआ, और इतने दिनों में कॉन्सपिरेसी में लीन पाकिस्तान अकुपाइड पत्रकारों (Pak Occupied Patrakaar) ने इतनी पलटियाँ मारीं, कि देश को दिख गया कि किसकी ज़मीन कहाँ है। 

ट्विटर पर कराची के ऊपर उड़ते पाकिस्तानी विमानों की आवाज सुनकर, ‘युद्ध होगा तो क्या होगा’ की स्थिति से डरे पाकिस्तानी लगातार ‘अल्ला रहम करे’, ‘अल्ला खैर करे’ की दुहाइयाँ दे रहे थे। वही हाल रावलपिंडी का भी था जहाँ अलर्ट जारी हो गए थे, रातों में बिजली काट दी गई थी, और अस्पतालों से कहा गया था कि बिस्तर खाली रखें। हालाँकि, पाकिस्तान द्वारा खुद को इस तरह से युद्ध के लिए तैयार दिखाने का दूसरा आयाम भी था, जिस पर हम आगे चर्चा करेंगे, लेकिन आम जनता को भारतीय हमले का ख़ौफ़ दिख रहा था।  

पहले ऐसे हर आतंकी हमले के बाद भारत, पाकिस्तान के ‘न्यूक्लिअर ब्लफ’ को कुछ ज्यादा ही गम्भीरता से लेता था। अगर सेना तैयार होती तो मनमोहन डर जाते कि न जाने पाकिस्तान क्या कर बैठेगा, वो तो एक बदमाश देश है, न्यूक्लिअर वॉर हो जाएगा आदि। इस बार भी पाकिस्तान ने अपने न्यूक्लिअर कमांड अथॉरिटी की मीटिंग बुलाकर ब्लफ खेलने की कोशिश की थी, लेकिन परिणाम में उसे भारत की चुप्पी की जगह, उसके अत्याधुनिक फ़ाइटर जेट को पुराने भारतीय मिग का शिकार होना पड़ा।

इसके साथ ही, भारत ने एक के बाद एक वो सारे निर्णय लिए जो भारत-पाक मामलों के जानकार सालों से कहते आ रहे थे: मोस्ट फेवर्ड नेशन का स्टेटस हटाना, सिंधु जल समझौते को अपने फ़ायदे के लिए बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना, अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाकर भारत की छवि मजबूत और पाकिस्तान की छवि धूमिल करना।

इन सबका रिजल्ट यह हुआ कि न सिर्फ यूएन में पाकिस्तान के खिलाफ एक लॉबी खड़ी हुई, बल्कि हर बड़े देश ने भारत द्वारा किए गए एयर स्ट्राइक्स को सही बताते हुए, भारत के हमले करने की स्वतंत्रता का सम्मान किया क्योंकि वो आतंकवादियों के लिए था। साथ ही, सिक्योरिटी काउंसिल से प्रस्ताव पारित कराना भी अपने आप में एक उपलब्धि ही है। इसी पर आगे, मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में चीन भी साथ आता दिख रहा है।

जब 55 घंटे के अंदर भारतीय पायलट वापस ले आया गया तो कुछ लोगों ने कहा कि वो तो समझौते के तहत हुआ। लेकिन वो लोग कैप्टन सौरभ कालिया वाला घटनाक्रम भूल गए। ये भारत की बहुत बड़ी जीत थी, और मोदी ने बार-बार अपने रैलियों के बयानों में पाकिस्तान पर और भी बड़ी कार्रवाइयों के होने का ज़िक्र करना नहीं छोड़ा।

इसका असर यह हुआ कि पाकिस्तान ने, प्रोपेगेंडा के लिए ही सही, दुनिया को यह दिखाना शुरु किया कि उसने दर्जनों आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया है, और आतंकियों को गिरफ़्तार किया जा रहा है। फिर ख़बर फैली कि पाकिस्तान ने कई मदरसों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया है। उसके बाद ख़बर आई कि जैश-ए-मोहम्मद संचालित संगठनों पर सरकार ने कार्रवाई की है।

ये हुआ या नहीं हुआ, ये पाकिस्तान ही बेहतर जानता है, लेकिन ये इसलिए हुआ क्योंकि भारत ने विंग कमांडर अभिनंदन की वापसी के बाद भी अपने ढीले होने के संकेत नहीं दिए। मोदी ने एक रैली में बस यह कह दिया कि ये तो ‘पायलट प्रोजेक्ट‘ था, और पाकिस्तान में युद्ध से निपटने की तैयारी के लिए नियंत्रण रेखा पर सेना और हथियारों की मूवमेंट बढ़ा दी गई। 

ये काम करते हुए पाकिस्तान दो तरह से गेम खेलना चाह रहा था। पहला यह कि अपनी सहमी हुई जनता को यह बताना कि वो लोग तैयार हैं। दूसरी यह कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश जाए कि पाकिस्तान अपने तरफ से आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, लेकिन भारत शांति की जगह युद्ध का बिगुल फूँक रहा है।

खैर, दोनों ही बातों से भारत को कोई असर नहीं पड़ा और नियंत्रण रेखा के पार से होती गोलीबारी का लगातार जवाब दिया जाता रहा।

इन सबके बीच, पाकिस्तान जैसे देश की, जो भीख माँगकर गुज़ारा करने पर मजबूर है, लगातार दस दिनों से हवाई परिवहन को बंद करने की मजबूरी से उसे कितना नुकसान पहुँचा है, ये भी वही बता पाएगा। गधे बेचना, भैंस बेचना, कार बेचना और अपने बजट से आतंकियों को स्पॉन्सर करना पाकिस्तान की वो नियति है, जिससे वो भाग नहीं सकता।

दो-चार इस्लामी देश और चीन की शह पर कूदने वाले पाकिस्तान को चार हिस्सों में बाँटने की भी नीति की बात होती रहती है। बलूचिस्तान एक संवेदनशील इलाक़ा है, और वहाँ लगातार विद्रोह होते रहते हैं। आतंरिक कलह, शिया-सुन्नी के आपसी बम धमाकों के आतंक और लगातार बर्बाद होती अर्थव्यवस्था से उबर पाना पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

नया पाकिस्तान‘ का नारा लगाने से वो नया नहीं हो जाता, जबकि सिवाय इस बात के कि वहाँ का पीएम एक क्रिकेटर बन गया है, पाकिस्तानियों के लिए नया कुछ नहीं है। बुनियादी अधिकारों से वंचित लोग, कट्टरपंथी इस्लामी आतंक और आम समाज में दूसरे मतों को लिए घृणा पालते लोग, बिजली-पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों से हर दिन लड़ते बड़े शहर, करप्शन और सामंतवादी सोच से चलते पोलिटिकल सिस्टम ने पाकिस्तान को हर तरफ से जकड़ा हुआ है।

वहीं, भारतीय जनमानस में जो संवेदनाजन्य आक्रोश था, उसके लिए हमारी सेना जितना कर सकती थी, उन्होंने उससे कहीं ज़्यादा किया। यह बात एक सत्य है कि जो बलिदान हो गए, वो वापस नहीं आ सकते, लेकिन शत्रु को उसकी औक़ात बताना, और बलिदानियों के परिवार के बेहतर भविष्य के साथ इस महान देश की सीमाओं को भी सुरक्षित रखने की हर संभव कोशिश की जा रही है।

पाकिस्तान को जितनी डिप्लोमैटिक समझदारी से अलग-थलग करते हुए, पीएम द्वारा उसको उसकी औक़ात बताते हुए कि तुम्हारा नाम लेना भी ज़रूरी नहीं क्योंकि तुम उतनी बड़ी समस्या नहीं हो, पाकिस्तान को उसकी जगह बता दी गई। वहीं, सेना ने जितनी जल्दी, जिस स्तर से पाकिस्तान को क्षति पहुँचाई है, उस हिसाब से न्यूक्लिअर कमांड अथॉरिटी की मीटिंग बुलाकर इमरान जो दबाव बनाना चाहता था, वो कितना बना, सबके सामने है। 

अब हालत यह है कि पाकिस्तान को अमेरिका भी पूछ रहा है कि उसका F16 क्यों इस्तेमाल किया गया, और पाकिस्तान इस बुरी स्थिति में है कि अपने एक शहीद पायलट का नाम तक नहीं ले पा रहा है। ज्ञात हो कि पाकिस्तान ने ही बताया था कि उन्होंने दो पायलट पकड़े हैं, एक हमारे विंग कमांडर अभिनंदन थे, और दूसरे के बारे में कहा गया कि उनका उपचार चल रहा है। 

बाद में पता चला, वो उन्हीं का पायलट था, और सोशल मीडिया में उस शहीद को उसका हक़ दिलाने के लिए पाकिस्तान में खूब कैम्पेन चले। लेकिन, पाकिस्तानी मीडिया से अचानक उस पायलट की कवरेज तक गायब हो गई, और विंग कमांडर शहज़ाज़ुद्दीन को पाकिस्तानी हुकूमत ने, अपनी पुरानी करतूतों की ही तरह, भुला दिया। नहीं भुलाते तो उन्हें अमेरिका को जवाब देने में और भी मुश्किल होती कि उन्होंने भारतीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किस विमान का इस्तेमाल किया था।

कुल मिलाकर बात यह है कि पाकिस्तान का पुराना ब्लफ बाहर आ गया, और भले ही विदेशी प्रोपेगेंडा अख़बारों में ‘साउथ एशिया में न्यूक्लिअर वॉर के आसार’ लिखे जाते रहें, लेकिन पाकिस्तान को बेहतर पता है कि भारत इस बार क्या कर सकता है। युद्ध में क्षति तो होती है, दोनों तरफ से होती है, लेकिन पाकिस्तान ने अगर ऐसा चाहा तो उसके समूचे अस्तित्व पर बड़ा संकट आ सकता है। 

भारत का क्या है, यहाँ सामान्य गति से हर संस्था अपना कार्य कर रही है। आम नागरिकों से लेकर बड़े, रसूखदार लोगों ने हर बलिदानी के परिवार तक अपनी मदद पहुँचाई है। देश सेना के साथ खड़ा है, विकास के कार्य लगातार शुरु और खत्म किए जा रहे हैं। वहीं पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी शुद्ध हिन्दी में कश्मीर समस्या के समाधान के लिए शांति और मानव विकास के मार्ग प्रशस्त करने वाले के लिए नोबेल पुरस्कार की बात कर रही है। 

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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