Homeराजनीतिभारत के इतिहास में याद रखा जाएगा 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक, इसके विरोध में...

भारत के इतिहास में याद रखा जाएगा 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक, इसके विरोध में एक हुईं महिला विरोधी पार्टियाँ: पढ़ें कैसे एक्सपोज हुए कॉन्ग्रेस-सपा-DMK-TMC

131वें संविधान संशोधन का उद्देश्य महिलाओं के लिए आरक्षण को '2023 के बाद होने वाली पहली जनगणना' की शर्त से अलग करना था, ताकि इसे 2026-27 की जनगणना के परिणामों का इंतजार किए बिना ही लागू किया जा सके।

17 अप्रैल 2026 को भारत के संसदीय इतिहास में याद रखा जाएगा। देश के चुनावी ढाँचे में अहम बदलाव करने के लिए लाए गए 3 संविधान संशोधन बिल को विपक्ष ने पारित नहीं होने दिया। महिलाओं के लिहाज से नारी शक्ति वंदन अधिनियम अहम था। अगर यह पारित हो जाता और कानून का रूप अख्तियार कर लेता तो 2029 का लोकसभा चुनाव का परिदृश्य ही बदल जाता।

विधेयक के पक्ष में 278 वोट और विरोध में 211 वोट पड़े। इस दौरान 489 सदस्य उपस्थित थे और सभी ने मतदान किया। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन जरूरी है।

यह वोट केंद्र सरकार द्वारा संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 को अधिसूचित किए जाने के एक दिन बाद हुआ। इस अधिनियम के तहत 16 अप्रैल से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करने वाला कानून लागू हो गया है।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसके साथ जुड़े परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 को वापस लेने का प्रस्ताव रखा। ये विधेयक 131वें संशोधन से जुड़े हुए थे। सीटों की सीमा और जनगणना के मानदंडों में बदलाव करने का संवैधानिक अधिकार न होने के कारण, ये सहायक विधेयक कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं रह गए थे।

यह सरकार की योजनाओं के लिए एक बड़ा झटका है। लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी को रोक दिया गया है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने महिला आरक्षण अधिनियम के कार्यान्वयन को अनिश्चितता के अँधेरे में डाल दिया गया है।

131वाँ संशोधन विधेयक क्या है?

131वाँ संशोधन विधेयक मूल रूप से भारत के चुनावों के स्वरूप को पूरी तरह से बदलने की एक योजना थी। लोकसभा में सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई थी, जो आज भी जारी है। यह विधेयक के पारित होने से लोकसभा में सीटों की अधिकतम संख्या को 550 से बढ़ाकर 850 हो जाता।

इनमें से 815 सीटें राज्यों से और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों से आती। दरअसल यह उस सिद्धांत का समर्थन करता है, जिसमें प्रत्येक राज्य को उसकी वास्तविक जनसंख्या के अनुपात में सीटें मिलने की बात कही गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि देश भर में प्रत्येक नागरिक के वोट का महत्व लगभग समान हो।

केवल सीटें जोड़ने के अलावा, इस विधेयक ने संसद को यह तय करने की शक्ति मिल जाती कि अगला ‘परिसीमन’ (निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया) कब होगा और किस जनगणना का उपयोग किया जाएगा। इसके साथ आया परिसीमन विधेयक यह स्पष्ट करता था कि वे इस चरण के लिए 2011 की जनगणना का उपयोग करेंगे।

आम नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस विधेयक को उन तकनीकी बाधाओं को दूर करने के लिए डिजाइन किया गया था, जो महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को रोक रही थीं। इसने आरक्षण की शुरुआत को “2023 के बाद की पहली जनगणना” की शर्त से अलग करने की माँग की, ताकि आरक्षण कानून को 2026-27 की जनगणना के परिणामों का इंतजार किए बिना लागू किया जा सके। इसका उद्देश्य तत्काल परिसीमन प्रक्रिया से जोड़कर महिलाओं को उनका हक दिलाना था।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023

नारी शक्ति वंदन अधिनियम या महिला आरक्षण विधेयक सितंबर 2023 में पारित किया गया था। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में जानकारी दी थी कि कैसे 1996 से ही देरी हो रही थी। 2023 का यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सभी सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़ी महिलाओं के लिए एक उप-कोटा भी शामिल था, जिससे यह पक्का हो सके कि सत्ता के गलियारों में सबसे ज्यादा हाशिए पर पड़ी आवाजों को भी सुना जाए।

लेकिन, 2023 के उस कानून में एक अहम शर्त, अनुच्छेद 334A(1) जोड़ी गई थी। इसमें कहा गया था कि आरक्षण तभी लागू होगा, जब नई जनगणना हो जाएगी और सीटों के बँटवारे (परिसीमन) का काम पूरा हो जाएगा। चूँकि 2021 की जनगणना COVID-19 की वजह से टल गई थी और अब इसकी प्रक्रिया शुरू हो रही है जो 2027 तक पूरी होगी। इसलिए असल में आरक्षण मिलना 2029 के चुनावों या उसके बाद की ही बात लग रही थी।

131वाँ संशोधन सरकार की इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने की एक कोशिश थी। यह एक ऐसा जरूरी बिल था, जो इस रास्ते को साफ कर देता। 131वाँ संशोधन पास न होने देने से, 2023 के कानून के तहत महिला आरक्षण 2034 से पहले लागू नहीं हो पाएगा, क्योंकि इसे 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने से जोड़ा गया था।

परिसीमन बिल

इसी तरह, 2026 का प्रस्तावित परिसीमन बिल 131वें संशोधन का ही सीधा नतीजा था। परिसीमन वह प्रक्रिया है, जिसमें सीटों की सीमाएँ फिर से तय की जाती हैं, ताकि हर सांसद लगभग बराबर लोगों की नुमाइंदगी कर सके। अभी राज्यों को सीटों का बँटवारा 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही तय है। ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि उन राज्यों को नुकसान न हो, जिन्होंने आबादी पर काबू पाने के उपायों को कामयाबी से लागू किया है। लेकिन, 131वें संशोधन का मकसद इस रोक को हटाना था, ताकि भारत की आज की आबादी की असलियत को सीटों के बँटवारे में दिखाया जा सके।

परिसीमन बिल के तहत एक आयोग बनाया जाता, जिसकी अगुवाई सुप्रीम कोर्ट का कोई जज करता। यह आयोग हाल ही में जारी हुए आँकड़ों के आधार पर सीटों की सीमाएँ फिर से तय करता। महिलाओं को नुमाइंदगी देने के लिए यह प्रक्रिया बहुत जरूरी है, क्योंकि कानून के मुताबिक कुछ खास ‘आरक्षित’ सीटों की पहचान करना जरूरी है और यह काम सिर्फ परिसीमन की प्रक्रिया द्वारा ही पूरा किया जा सकता है।

संवैधानिक संशोधन के खिलाफ वोट देकर विपक्ष ने न सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने का काम रोक दिया है, बल्कि सीटों की सीमाएँ फिर से तय करने का काम भी अटका दिया है। इसी प्रक्रिया के तहत 33% सीटें खास तौर पर महिलाओं के लिए तय की जानी थीं।

विपक्ष का तर्क था कि 2011 की जनगणना के आँकड़ों का इस्तेमाल करने से दक्षिण और उत्तर-पूर्वी राज्यों को नुकसान होगा, क्योंकि इन राज्यों में आबादी बढ़ने की रफ्तार धीमी रही है। लेकिन सरकार सरकार का जवाब था कि आप ऐसा लोकतंत्र नहीं चला सकते, जिसमें कुछ लोगों के वोटों का महत्व दूसरों के वोटों से ज्यादा हो और आप निश्चित रूप से नक्शे को फिर से बनाए बिना महिलाओं के लिए आरक्षण लागू नहीं कर सकते।

इस बिल के पारित नहीं होने पर विपक्ष के नियत पर सवाल खड़े हो गए हैं। इस कदम से INDI गठबंधन के भीतर ‘महिला-विरोधी’ पूर्वाग्रह का पता चलता है। जहाँ एक ओर विपक्ष ने 2023 में महिलाओं के लिए आरक्षण का समर्थन करने का दावा किया था, वहीं शुक्रवार को उनके कार्यों ने एक अलग ही कहानी बयाँ की। 131वें संशोधन के खिलाफ वोट देकर विपक्ष ने प्रभावी रूप से 70 करोड़ महिलाओं से यह कह दिया है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए अभी और लंबा इंतजार करना होगा। वे 2023 के कानून का समर्थन करने का दावा करते हैं, लेकिन उन्होंने उसी बिल को खारिज कर दिया, जो उस कानून को लागू करने के लिए ज़रूरी था।

विपक्ष का महिला-विरोधी रवैया

बिल के गिर जाने के बाद विपक्ष का जश्न धोखा की तरह है। जहाँ राहुल गाँधी जैसे नेताओं ने इस बिल को ‘असंवैधानिक चाल’ कहा, वहीं विपक्ष का असली डर राजनीतिक सत्ता में आने वाला वह बदलाव था, जो सीटों के विस्तार के साथ आता है। उन्होंने महिलाओं के ऐतिहासिक सशक्तिकरण को रोक दिया।

महिलाओं का हितैषी बनने की कोशिश करने वाले समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने आरक्षण के भीतर धर्म-आधारित कोटे की असंवैधानिक माँगों को लेकर इस बिल का विरोध किया। इस तरह की राजनीति दिखाती है कि विपक्ष के लिए महिला सशक्तिकरण एक अच्छा नारा तो है, लेकिन जब बात उनके अपने राजनीतिक अस्तित्व की आती है, तो यह एक गौण प्राथमिकता बन जाता है।

प्रधानमंत्री ने दी चेतावनी

18 अप्रैल को कैबिनेट की बैठक में पीएम मोदी ने विपक्षी दलों को महिला आरक्षण बिल में रोड़े अटकाने पर महिलाओं के गुस्से का सामना करने की बात कही। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, PM मोदी ने कहा कि विपक्ष ने एक बहुत बड़ी गलती की है और उन्हें इसके परिणाम भुगतने होंगे। PM ने अपनी कैबिनेट से कहा, “उन्होंने देश की महिलाओं को निराश किया है। यह संदेश हर एक व्यक्ति तक, हर एक गाँव तक पहुँचाया जाना चाहिए।”

उन्होंने सदन में व्यक्तिगत गारंटी देने की बात भी कही थी कि किसी भी राज्य को घाटा नहीं होगा। कोई अन्याय नहीं होगा, भले ही सीटों की संख्या बढ़कर 816 हो जाए।

प्रधानमंत्री की यह निराशा सरकार में कई अन्य लोगों द्वारा भी साझा की जाती है। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष के इस कदम को ‘कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों पर एक काला धब्बा’ करार दिया, जिसे वे कभी मिटा नहीं पाएँगे। गृह मंत्री अमित शाह ने भी विपक्ष के ‘जश्न’ पर निशाना साधते हुए कहा, “देश की आधी आबादी को धोखा देने के बाद… और उनका भरोसा खोने के बाद कोई जीत का जश्न कैसे मना सकता है?”

आज की स्थिति यह है कि हमारी संसद में 33% महिलाओं को देखने का सपना फिर से ठंडे बस्ते में चला गया है। 131वें संशोधन का पारित न होना केवल NDA के लिए एक राजनीतिक नुकसान ही नहीं है, बल्कि भारत की महिलाओं के लिए भी एक बड़ा झटका है। इन्होंने मान लिया था कि आखिरकार इनका ‘टाइम’ आ गया है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Shriti Sagar
Shriti Sagar
Journalist

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

अरे लावण्या नारायण… तुर्की-पाक खिलाड़ी खेल में मजहब लाएँ तो ‘माशाल्लाह’ और IPL में शिव तांडव गूँजे तो पेट में चुभन? बंद करो ये...

'The Hindu' की पत्रकार लावण्या को IPL में शिव स्तोत्रम बजने पर मिर्ची लगी। लेकिन मैदान पर नमाज पढ़ने, रोजा खोलने पर 'माशाल्लाह' प्रेम दिखा है।

सुनो आरफा, हैंडसम नहीं होते तुम्हारे (मुस्लिम) मर्द, नीच-गलीच होते हैं: वामपंथन निवेदिता मेनन नहीं बताएगी लव जिहादियों की जो मक्कारी, वो हमसे सुनो

तुम्हारे (मुस्लिम) 'मर्द' 'हैंडसम' और 'खूबसूरती' नहीं है आरफा और निवेदिता, वे महिलाओं को सुरमा लगाकर नहीं फँसाते बल्कि माथे पर टीका और हाथ में कलावा पहनकर आते हैं।
- विज्ञापन -