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बिहार में ‘महागठबंधन’ में मची सिर फुटव्वल, एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी उतार रहे RJD-कॉन्ग्रेस-वामपंथी-VIP: तेजस्वी यादव के सहारे खोई सियासी जमीन की तलाश में राहुल गाँधी

यह सवाल उठने लगा है कि क्या महागठबंधन अब बिहार में किसी साझा लड़ाई के लायक बचा है या फिर यह सिर्फ नाममात्र का गठबंधन है, जो इस चुनावी दौर में सत्ता की लालसा तक ही सीमित रह गया है।

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए नामांकन की समय सीमा शनिवार (17 अक्टूबर 2025) को खत्म हो गई है लेकिन अब तक विपक्षी गठबंधन के बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला ही तय नहीं हो पाया है। NDA से लड़ाई की तैयारी के बीच महागठबंधन के दल आपस में ही भिड़े हुए हैं और कई सीटों पर तो राजद और कॉन्ग्रेस ने एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी उतार दिए हैं।

इस कथित महागठबंधन की मौजूदा स्थिति दिखाती है कि इनकी चुनाव लड़ने की ही कोई साझा रणनीति या विचारधारा नहीं है। इस गठबंधन में केवल सत्ता की लालसा के लिए एकजुटता दिखने की कोशिश की जा रही है। कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े चेहरे राहुल गाँधी बिहार चुनाव के बीच विदेश में छुट्टियाँ मना रहे थे और जब लौटे तब भी उन्होंने सीट बँटवारे के लिए तेजस्वी के साथ बैठक नहीं की है।

तेजस्वी यादव सीट बँटवारे की समस्या के समाधान के लिए दिल्ली तक आए भी लेकिन उनकी राहुल गाँधी के साथ बैठक नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से मिलकर इस समस्या का समाधान खोजने की सलाह दी है लेकिन इससे भी कोई बात नहीं बनी है। अब भी यह रार लगातार जारी है और बढ़ती ही जा रही है।

RJD के सहारे बिहार में सियासी पैर जमाने की कोशिश में कॉन्ग्रेस

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि कॉन्ग्रेस किसी भी हाल में अपनी पसंद की सीटों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। पार्टी करीब 60 सीटों पर दावेदारी कर रही है और इनमें कई ऐसी सीटें हैं जिन पर राजद की नजर भी है।

राजद, कॉन्ग्रेस को लगभग 60–61 सीटें देने को तैयार तो है लेकिन असली विवाद इस बात पर अटका है कि कौन-सी सीटें किसके खाते में जाएँगी। यानी यहाँ मामला सिर्फ संख्या का नहीं बल्कि सियासी जमीन के कब्जे का है।

महागठबंधन में राजद और कॉन्ग्रेस के अलावा वामपंथी दल और मुकेश सहनी की वीआईपी भी शामिल हैं लेकिन असली मुकाबला फिलहाल दो बड़े दलों के बीच है। कॉन्ग्रेस सीमांचल और दलित-मुस्लिम समीकरण वाली सीटों पर अपना दावा ठोक रही है।

पार्टी का मानना है कि इन इलाकों में उसका सामाजिक आधार मजबूत है जबकि राजद इस बात से भली-भाँति वाकिफ है कि अगर उसने इन क्षेत्रों में कॉन्ग्रेस को मौका दिया, तो भविष्य में इन इलाकों में उसकी पकड़ ढीली पड़ सकती है। कॉन्ग्रेस, राजद के कँधे पर चढ़कर अपने दशकों पुराने जनाधार को फिर से वापस पाने के जुगाड़ में लगी है।

हालाँकि, इसमें यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बिहार में कॉन्ग्रेस का अपना आधार राजद के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है फिर भी वो राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते अपनी ताकत को भुनाने की कोशिश में है। कॉन्ग्रेस का यह भी दावा है कि राहुल गाँधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से चुनाव का माहौल महागठबंधन के पक्ष में हो गया है और वे अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर सकते हैं।

एक-दूसरे पर शायराना वार कर रहे RJD-कॉन्ग्रेस

बिहार में सीट बँटवारे की खींचतान में ‘शायरी वार’ भी देखने को मिल रहा है। राजद और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने अपनी नोकझोंक को अब कविताओं के जरिए बयाँ करना शुरू कर दिया है।

राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने X पर गठबंधन के बीच रार को लेकर लिखा, “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय, टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ परिजाय…”। उन्होंने इसे ‘हर अवसर के लिए प्रासंगिक’ बताया है।

कुछ ही समय में कॉन्ग्रेस का भी इस पर जवाब आ गया। कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने इस पर तंज करते हुए लिखा, “पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है, अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है।”

आधा दर्जन से अधिक सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ महागठबंधन के प्रत्याशी

बिहार विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे को सीधी चुनौती दे रहे हैं। कहलगाँव में राजद के रजनीश यादव और कॉन्ग्रेस के प्रवीण कुशवाहा आमने-सामने हैं जबकि तारापुर में राजद के अरुण शाह का मुकाबला वीआईपी के सकलदेव सिंह से है।

बछवाड़ा, बिहारशरीफ, रोसड़ा और राजपाकर सीटों पर कॉन्ग्रेस और सीपीआई के उम्मीदवारों के बीच सीधी है। बछवाड़ा से कॉन्ग्रेस के प्रकाश दास और सीपीआई के अवधेश राय, बिहारशरीफ से कॉन्ग्रेस के उमैर खान और सीपीआई के शिव प्रसाद यादव, रोसड़ा से कॉन्ग्रेस के बीके रवि और सीपीआई के लक्ष्मण पासवान जबकि राजपाकर से कॉन्ग्रेस की प्रतिमा कुमारी और सीपीआई के मोहित पासवान मैदान में हैं।

वहीं, वैशाली सीट पर राजद के अजय कुशवाहा और कॉन्ग्रेस के ई. संजीव सिंह के बीच टक्कर है। सबसे चर्चित लालगंज सीट पर राजद ने बाहुबली नेता मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला को मैदान में उतारा है तो कॉन्ग्रेस से आदित्य कुमार राजा ने मोर्चा सँभाल लिया है।

बीबीसी ने राजद की एक पूर्व प्रवक्ता के हवाल से बताया है कि राजद और कॉन्ग्रेस की कई सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ होगी। इस प्रवक्ता ने नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा है, “लगभग छह से सात ऐसी सीटें ऐसी हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस और राजद आमने-सामने हो सकते हैं।”

अविश्वास से भरी आगे की राह

यह भी स्पष्ट है कि राजद और कॉन्ग्रेस दोनों एक-दूसरे पर दबाव की राजनीति का खेल खेल रहे हैं। एक दल खुद को राष्ट्रीय स्तर की ताकत बताकर झुकने को तैयार नहीं, तो दूसरा दल अपने क्षेत्रीय प्रभाव की ताकत को आजमा रहा है। यही कारण है कि कई सीटों पर दोनों के उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतर चुके हैं।

अगर देखा जाए तो यह केवल ‘सीट शेयरिंग’ का विवाद नहीं रहा बल्कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या महागठबंधन अब भी किसी साझा लड़ाई के लायक बचा है या फिर यह सिर्फ नाममात्र का गठबंधन है, जो इस चुनावी दौर में सत्ता की लालसा तक ही सीमित रह गया है।

इसके अलावा यह स्थिति बिहार की राजनीति में विपक्ष के लिए शुभ संकेत नहीं है। जनता यह देख रही है कि जो दल अपने भीतर तालमेल नहीं बना पा रहे, वे राज्य को स्थिर नेतृत्व कैसे देंगे? महागठबंधन लोगों के लिए अविश्वास के प्रतीक की तरह बन गए है। जहाँ साथी दल ही एक-दूसरे की जड़ों के मट्ठा डालने में लगे हुए हैं।

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शिव
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