Monday, March 8, 2021
Home राजनीति कॉन्ग्रेस ने सत्ता में बने रहने के लिए संविधान के साथ खिलवाड़ किया?

कॉन्ग्रेस ने सत्ता में बने रहने के लिए संविधान के साथ खिलवाड़ किया?

कांग्रेस सरकार ने अपने रास्ते की रूकावटों को दूर करने के लिए कई बार संविधान का संशोधन किया। नेहरू के एक ऐसे ही फैसले का विरोध करते हुए एसपी मुखर्जी ने कहा था कि देश के संविधान के साथ रद्दी कागज जैसा व्यवहार किया जा रहा है।

25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण के दौरान डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा “अध्यक्ष महोदय किसी देश का संविधान कितना अच्छा या बुरा है, यह सिर्फ संविधान की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता है। किसी देश का संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि उसके अनुसरण करने वाले लोग बुरे हो जाएँ।”

इस ऐतिहासिक भाषण के दौरान डॉ अंबेडकर ने जो कुछ भी कहा देश की आजादी के बाद आम जनता को वैसा ही कुछ देखने और सुनने को मिला। आजादी के बाद देश की बागडोर कांग्रेस पार्टी के हाथों में चली गई।

कांग्रेस सरकार ने सत्ता में बने रहने के लिए संविधान को औजार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसके बाद कईयों बार जनता के मौलिक अधिकार को कुचला गया। यही नहीं वक्त पड़ने पर संविधान की मूल आत्मा को भी नजरअंदाज कर दिया गया। आम जनता को कईयों बार अपने मौलिक अधिकारों को बचाने के लिए सरकार के खिलाफ कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पड़े।

आजादी के बाद देश की भोली-भाली जनता को संविधान के बारे में बताकर सही मायने में संविधान को सार्थक बनाने का प्रयास सत्ता में काबिज कांग्रेस पार्टी के नेता नेहरू हो या शास्त्री किसी ने भी नहीं किया। 

समाजवादी नीति के लिए संविधान संशोधन

यह जरूरी नहीं है कि संविधान का संशोधन सिर्फ जनता के हितों को ध्यान में रखकर ही किया जाता है। कई बार सरकारें विचारधारा के आधार पर अपने फायदे के लिए जो फैसला लेती है, उसके रास्ते की रूकावटों को दूर करने के लिए भी संविधान का संशोधन करती है। उदाहरण के लिए संविधान लागू होने के पहले ही साल 1951 में नेहरू सरकार ने संविधान में पहला संशोधन कर दिया। इस संशोधन के जरिये नेहरू ने स्वतंत्रता, समानता एवं संपत्ति से संबंधित मौलिक अधिकारों को लागू किए जाने संबंधी कुछ व्यवहारिक कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास किया। यही नहीं इस संशोधन में नेहरू सरकार द्वारा पहली बार आम लोगों के अभिव्यक्ति के मूल अधिकारों पर उचित प्रतिबंध की व्यवस्था भी की गई। नेहरू के इस फैसले का श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने विरोध किया था।

दरअसल कोर्ट ने नेहरू सरकार के जमींदारी उन्मूलन कार्यक्रम में मौलिक अधिकारों का हनन बताकर सरकार के फैसले को अस्वीकार कर दिया था। कोर्ट के मुताबिक नेहरू सरकार अपने फैसले को जिस तरह से लागू करना चाहती थी, उससे संविधान में दर्ज आर्टिकल 19 व 31 के तहत लोगों के मौलिक अधिकारों की अवहेलना होती। क्योंकि इस समय संपत्ति के अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों में शामिल थे। इस तरह कोर्ट द्वारा सरकार के खिलाफ सुनाए गए फैसले के बाद नेहरू सरकार ने अपने रास्ते में आने वाली रुकावटों को दूर करने के लिए संविधान में संशोधन किया। इस संशोधन के जरिये संविधान के 9वें शेड्यूल का फायदा उठाकर नेहरू ने आमलोगों से सरकार के खिलाफ कोर्ट जाने के अधिकार को छीन लिया। इस तरह अधिकारों के हनन होने की स्थिति में भी सरकार के खिलाफ न्यायिक समीक्षा का रास्ता बंद कर दिया गया।

1951 में मुख्यमंत्रियों को भेजे गए एक पत्र में नेहरू ने लिखा कि संविधान के मुताबिक न्यायपालिका की भूमिका चुनौती देने से बाहर है। लेकिन अगर संविधान हमारे रास्ते के बीच में आ जाए तो हर हाल में संविधान में परिवर्तन करना चाहिए। नेहरू ने सत्ता में आने के बाद सत्ता में बने रहने के लिए पत्र में लिखे बातों का अक्षरशः पालन करते हुए संविधान को हथियार के रूप में ही इस्तेमाल किया। नेहरू के इस फैसले ने न सिर्फ गलत मिसाल पेश की बल्कि इसने संविधान में नई अनुसूची को भी जन्म दिया।

तब नेहरू के इस फैसले का विरोध करते हुए एसपी मुखर्जी ने कहा था कि देश के संविधान के साथ रद्दी काग़ज़ जैसा व्यवहार किया जा रहा है। इस संशोधन के तीन साल बाद 1954 में एक बार फिर अपनी विचारधारा की सनक पर आधारित विकास मॉडल को जमीन देने के लिए नेहरू ने संविधान में चौथा संशोधन कर दिया। इस बार सरकार की कोशिश इस बात की थी कि अगर सरकार निजी संपत्तियों का अधिग्रहण करती है, तो मुआवजे को लेकर सरकार से सवाल पूछने का कोई हक कोर्ट के पास नहीं हो।

इस तरह एक बार फिर नेहरू सरकार ने न्यायपालिका के अधिकार को कम कर दिया। नेहरू ने संविधान में संशोधन के जरिये लोगों के मौलिक अधिकारों को कम करने की एक गलत परिपाटी शुरू की। इसका बुरा परिणाम यह हुआ कि आगे आने वाले समय में कई सरकारों ने संविधान संशोधन के जरिये न्यायपालिका समेत आम लोगों के अधिकारों को कम करना शुरू कर दिया। फलस्वरूप 1973 में केशवानंद केस में 13 जजों की बेंच ने नेहरू और बाद में इंदिरा सरकार के फैसलों को एक तरह से गलत साबित कर दिया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कोई भी सरकार संविधान के मौलिक स्ट्रक्चर में कोई बदलाव नहीं कर सकती है। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में कोर्ट को न्यायिक समीक्षा करने से भी कोई नहीं रोक सकता है।

क्या आप जानते हैं ?

दुनिया भर के दूसरे देशों की तुलना में भारतीय संविधान का आकार काफी बड़ा है। वर्तमान समय में हमारे देश का संविधान 465 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियाँ और 22 भागों में विभाजित है। इतनी सारी चीजों को एक साथ अपने अंदर समेटने की वजह से आमलोगों के लिए संविधान को समझ पाना बेहद जटिल हो गया है। इस जटिलता की वजह से ही संविधान को वकीलों का स्वर्ग भी कहा जाता है। जटिलता का फायदा उठाकर कई बार सरकारें अपने फायदे के लिए संविधान संशोधन कर देती है। लेकिन इस संशोधन के बाद जनता के हिस्से में क्या आया? यह न तो जनता जानना चाहती है और न ही सरकार बताना चाहती है। जनता के संवैधानिक अधिकारों के साथ छलावा न हो इसके लिए पहली बार नरेंन्द्र मोदी की सरकार ने 26 नवंबर 2015 से देश भर में संविधान दिवस मनाने का फैसला किया। संविधान दिवस मनाने का मकसद नागरिकों में संविधान के प्रति जागरूकता पैदा करना है।

वो पाँच संशोधन जिसने संविधान को नेस्तनाबूद कर दिया

नेहरू ने संविधान संशोधन के जरिये न्यायपालिका के अधिकारों क सीमित करने की शुरूआत की। लेकिन इस मामले में इंदिरा गाँधी अपने पिता से भी आगे निकल गयीं। राम मनोहर लोहिया ने जिस इंदिरा के लिए कई बार ‘गूंगी गुड़िया’ शब्द इस्तेमाल किया, उस इंदिरा ने संविधान के पांच कानून को बदलकर ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ को ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ बना दिया।

1975 में जयप्रकाश नरायण के नेतृत्व में इंदिरा के खिलाफ लोग सड़क पर आ गए। ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ का नारा देश भर में गूँजने लगा। इसी समय इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा के चुनाव को गलत बताते हुए रद्द कर दिया। फिर क्या था देश में 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित कर दिया। यही नहीं 22 जुलाई 1975 को संविधान का 38वाँ संशोधन करके आपातकाल पर न्यायिक समीक्षा का रास्ता बंद कर दिया। सत्ता में बने रहने के लिए इतना ही नहीं किया, बल्कि आगे चलकर प्रधानमंत्री पद पर खुद को बनाए रखने के लिए इंदिरा गाँधी ने संविधान में 39वाँ संशोधन किया।

इसके बाद सरकार द्वारा 40वें व 41वें संशोधन के जरिये 42वां संशोधन लाया गया। इस तरह संविधान में इन पाँच बड़े बदलाव के जरिये देश के पूरे प्रशासनिक तंत्र को इंदिरा ने अपने हाथों की कठपुतली बना दिया। इंदिरा ने 42वें संशोधन के दौरान संविधान के प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता जैसे शब्दों को जोड़ दिया। इंदिरा द्वारा संविधान के प्रस्तावना में किए गए बदलाव के खिलाफ कई बार भाजपा समेत दूसरी पार्टी के नेताओं ने विरोध किया है। यही नहीं इंदिरा के इन फैसलों ने देश के न्यायिक व्यवस्था को एक तरह से पंगू बना दिया। इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी की सरकार ने 43वें संशोधन के जरिये उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय को उनके अधिकार वापस दिलाए।

राजीव ने भी पद के लिए संविधान संशोधन किया

नेहरू और इंदिरा के बाद राजीव गाँधी ने भी सत्ता में आते ही संविधान संशोधन के जरिये अपना मकसद पूरा करने का प्रयास किया। 23 अप्रैल 1985 को  मोहम्मद अहमद खान वर्सेस शहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने 60 वर्षीय महिला शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके फैसले में शाहबानो और उसके पाँच बच्चों को भरण पोषण के लिए उसके पति द्वारा भत्ता दिए जाने की बात कही गयी।

लेकिन मुस्लिम धर्म गुरूओं के दवाब में राजीव गाँधी ने सदन में मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 लाकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया। राजीव गाँधी के इस फैसले का हिंदूवादी संगठनों ने मुस्लिम तुष्टिकरण कहकर आलोचना करना शुरू किया। इस तरह मौका हाथ से निकलते देख हिंदूओं को अपनी तरफ झुकाने के लिए राजीव सरकार ने अयोध्या मंदिर के ताला को खुलवाने में अहम भूमिका निभाई। इस तरह अपनी माँ और नाना के तरह ही राजीव गाँधी ने भी सत्ता पर बने रहने के लिए संविधान को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अनुराग आनंद
अनुराग आनंद मूल रूप से (बांका ) बिहार के रहने वाले हैं। बैचलर की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया से पीजी डिप्लोमा इन हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद राजस्थान पत्रिका व दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों में काम किया। अनुराग आनंद को कहानी और कविता लिखने का भी शौक है।

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

BJP पैसे दे तो ले लो… वोट TMC के लिए करो: ‘अकेली महिला ममता बहन’ को मिला शरद पवार का साथ

“मैं आमना-सामना करने के लिए तैयार हूँ। अगर वे (भाजपा) वोट खरीदना चाहते हैं तो पैसे ले लो और वोट टीएमसी के लिए करो।”

‘सबसे बड़ा रक्षक’ नक्सल नेता का दोस्त गौरांग क्यों बना मिथुन? 1.2 करोड़ रुपए के लिए क्यों छोड़ा TMC का साथ?

तब मिथुन नक्सली थे। उनके एकलौते भाई की करंट लगने से मौत हो गई थी। फिर परिवार के पास उन्हें वापस लौटना पड़ा था। लेकिन खतरा था...

अनुराग-तापसी को ‘किसान आंदोलन’ की सजा: शिवसेना ने लिख कर किया दावा, बॉलीवुड और गंगाजल पर कसा तंज

संपादकीय में कहा गया कि उनके खिलाफ कार्रवाई इसलिए की जा रही है, क्योंकि उन लोगों ने ‘किसानों’ के विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया है।

‘मासूमियत और गरिमा के साथ Kiss करो’: महेश भट्ट ने अपनी बेटी को साइड ले जाकर समझाया – ‘इसे वल्गर मत समझो’

संजय दत्त के साथ किसिंग सीन को करने में पूजा भट्ट असहज थीं। तब निर्देशक महेश भट्ट ने अपनी बेटी की सारी शंकाएँ दूर कीं।

‘कॉन्ग्रेस का काला हाथ वामपंथियों के लिए गोरा कैसे हो गया?’: कोलकाता में PM मोदी ने कहा – घुसपैठ रुकेगा, निवेश बढ़ेगा

कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में अपनी पहली चुनावी जनसभा को सम्बोधित किया। मिथुन भी मंच पर।

मिथुन चक्रवर्ती के BJP में शामिल होते ही ट्विटर पर Memes की बौछार

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मिथुन चक्रवर्ती ने कोलकाता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में भाजपा का दामन थाम लिया।

प्रचलित ख़बरें

मौलाना पर सवाल तो लगाया कुरान के अपमान का आरोप: मॉब लिंचिंग पर उतारू इस्लामी भीड़ का Video

पुलिस देखती रही और 'नारा-ए-तकबीर' और 'अल्लाहु अकबर' के नारे लगा रही भीड़ पीड़ित को बाहर खींच लाई।

14 साल के किशोर से 23 साल की महिला ने किया रेप, अदालत से कहा- मैं उसके बच्ची की माँ बनने वाली हूँ

अमेरिका में 14 साल के किशोर से रेप के आरोप में गिरफ्तार की गई ब्रिटनी ग्रे ने दावा किया है कि वह पीड़ित के बच्चे की माँ बनने वाली है।

आज मनसुख हिरेन, 12 साल पहले भरत बोर्गे: अंबानी के खिलाफ साजिश में संदिग्ध मौतों का ये कैसा संयोग!

मनसुख हिरेन की मौत के पीछे साजिश की आशंका जताई जा रही है। 2009 में ऐसे ही भरत बोर्गे की भी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी।

‘ठकबाजी गीता’: हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अकील कुरैशी ने FIR रद्द की, नहीं माना धार्मिक भावनाओं का अपमान

चीफ जस्टिस अकील कुरैशी ने कहा, "धारा 295 ए धर्म और धार्मिक विश्वासों के अपमान या अपमान की कोशिश के किसी और प्रत्येक कृत्य को दंडित नहीं करता है।"

‘40 साल के मोहम्मद इंतजार से नाबालिग हिंदू का हो रहा था निकाह’: दिल्ली पुलिस ने हिंदू संगठनों के आरोपों को नकारा

दिल्ली के अमन विहार में 'लव जिहाद' के आरोपों के बाद धारा-144 लागू कर दी गई है। भारी पुलिस बल की तैनाती है।

माँ-बाप-भाई एक-एक कर मर गए, अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होने दिया: 20 साल विष्णु को किस जुर्म की सजा?

20 साल जेल में बिताने के बाद बरी किए गए विष्णु तिवारी के मामले में NHRC ने स्वत: संज्ञान लिया है।
- विज्ञापन -

 

हमसे जुड़ें

292,301FansLike
81,958FollowersFollow
393,000SubscribersSubscribe