Wednesday, August 12, 2020
Home बड़ी ख़बर प्रतिबंध किस पर है? कम्युनिस्टों के खिलाफ बोलने पर या देश के वीरों की...

प्रतिबंध किस पर है? कम्युनिस्टों के खिलाफ बोलने पर या देश के वीरों की गाथाएँ सुनाने पर

इस देश में छः दशकों तक सत्ता संस्थानों में एक पार्टी विशेष का सीधा दखल रहा है जिसके कारण प्रचार तंत्र पर उस पार्टी के पाले हुए बुद्धिजीवियों का कब्जा रहा है। वामपंथी विचारधारा से ग्रसित प्रकाशक, लेखक और कथित विद्वानों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपनी रखैल बनाकर रखा। आज देश उस मानसिकता से उबरने का प्रयास कर रहा है।

निर्वाचन आयोग इन दिनों ‘प्रतिबंध आयोग’ की भूमिका निभा रहा है। देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व जिस संस्थान के ऊपर है वह कभी सिनेमा पर प्रतिबंध लगा रहा है तो कभी भाषण देने पर। इसी क्रम में आयोग ने दो पुस्तकों के लोकार्पण पर प्रतिबंध लगा दिया। इनमें से एक है मानोशी सिन्हा रावल की ‘Saffron Swords’ और दूसरी आभास मालदाहियार की ‘#Modi Again’ नामक पुस्तक।

जिन रिटर्निंग ऑफिसर महोदया ने जेएनयू में होने वाले इन दोनों पुस्तकों के लॉन्च पर नोटिस जारी किया उनका कहना है कि भले ही यह पुस्तकें पहले से वितरण में हों, पर इस कार्यक्रम को देखकर इसके राजनीतिक होने का आभास होता है; ऐसा लगता है कि एक नेता विशेष का प्रचार हो रहा है इसलिए यह नोटिस जारी किया गया। आयोग की ओर से नियुक्त अधिकारी महोदया का यह कथन अपने आप में ही बड़ा विचित्र है।

पहली बात तो यह कि इन दोनों पुस्तकों के पिछले कई महीनों से बाज़ार में उपलब्ध होने का अर्थ यह है कि इनके पाठकों की संख्या उनसे कई गुना अधिक है जो निमंत्रण पाकर या गाहे बगाहे बुक लॉन्च में पहुँचते। आज के समय में बुक लॉन्च जैसे आयोजन लेखकों को अपनी वह बात कहने का मंच देते हैं जो वे पुस्तक में नहीं लिख पाते। पुस्तक की अपनी एक सीमा होती है। कथेतर (non-fiction) विधा के नए नवेले लेखक अपनी बात कहने के लिए पुस्तक की विषयवस्तु को ज्यादा से ज्यादा 200 पेज में ही समेटना चाहते हैं क्योंकि इससे पुस्तक की मार्केटिंग में सहायता मिलती है।

कोई भी पाठक किसी नए लेखक की भारी भरकम पुस्तक तब तक नहीं पढ़ना चाहता जब तक वह लेखक कोई विशेषज्ञ या प्रसिद्ध व्यक्ति न हो। बुक लॉन्च किसी भी लेखक के लिए पाठकों से संवाद करने का अवसर प्रदान करने वाला आयोजन होता है। मानोशी रावल और आभास मालदाहियार ने यही सोचकर जेएनयू जैसे संस्थान में अपना बुक लॉन्च रखा होगा कि उन्हें विद्यार्थियों से संवाद करने का अवसर मिलेगा। इस देश में लाखों पुस्तकें प्रतिदिन प्रकाशित होती हैं जिनमें से आधे से अधिक बाज़ार का मुँह तक नहीं देख पातीं। न जाने कितनी पुस्तकें गोदामों में रखी सड़ जाती हैं।

- विज्ञापन -

इस देश में छः दशकों तक सत्ता संस्थानों में एक पार्टी विशेष का सीधा दखल रहा है जिसके कारण प्रचार तंत्र पर उस पार्टी के पाले हुए बुद्धिजीवियों का कब्जा रहा है। वामपंथी विचारधारा से ग्रसित प्रकाशक, लेखक और कथित विद्वानों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपनी रखैल बनाकर रखा। आज देश उस मानसिकता से उबरने का प्रयास कर रहा है। इसीलिए गरुड़ जैसे प्रकाशक उभर रहे हैं जो लेखन के स्थापित मानदंडों को तोड़ कर भारत केंद्रित विचारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। यह प्रोपगैंडा आधारित लेखन के अंकुशों से बाहर निकलने की जिजीविषा है।

इसी जिजीविषा को उद्घाटित करने वाली पुस्तक है #Modi Again जिसे आभास मालदाहियार ने लिखा है। आभास ने किसी पार्टी या संगठन विशेष के एजेंडे को प्रसारित करने वाली पुस्तक नहीं लिखी है। उन्होंने अपनी पुस्तक में यह लिखा है कि नरेंद्र मोदी के बारे में उनकी विचारधारा में कैसे परिवर्तन आया। पुस्तक के आरंभ में ही वे लिखते हैं कि बचपन में वे लाल झंडे और केसरिया झंडे दोनों को सलाम करते थे। यह ऐसे व्यक्ति के लिए संभव है जो दोनों ही विचारों के सिद्धांतों से अनभिज्ञ हो लेकिन उसके आसपास दोनों ही विचारधाराओं के प्रतीक दिखाई पड़ते हों।

आभास अपनी विचारधारा में परिवर्तन की कहानी केजरीवाल के एंटी करप्शन आंदोलन से प्रारंभ करते हैं और आर्यन इन्वेज़न थ्योरी, अंबेदकर, अयोध्या जैसे मुद्दों पर अपने अनुभव लिखते हुए नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों और विकास योजनाओं तक पहुँचते हैं। यह लेखक की स्वतंत्रता है कि उसका राजनैतिक झुकाव किस तरफ है। यदि आभास की विचारधारा में आए परिवर्तन का झुकाव नरेंद्र मोदी की तरफ है तो इसमें कोई बुराई नहीं। शशि थरूर ने भी संयुक्त राष्ट्र के वेतनभोगी अधिकारी रहते हुए भारत के नेहरू पर रिसर्च किया था और पुस्तकें लिखी थीं।

उन पर कभी किसी ने सवाल नहीं उठाए और न ही कभी उनकी पुस्तकों को प्रतिबंधित किया गया। राजनीति में आने के बाद शशि थरूर ने 2018 में विधानसभा चुनावों से ठीक एक महीना पहले The Paradoxical Prime Minister नामक पुस्तक लिखी थी। यदि किसी पार्टी के नेता की तारीफ करना आचार संहिता का उल्लंघन है तो निर्वाचन आयोग को इसपर भी सोचना चाहिए कि किसी नेता के विरोध में पुस्तक लिखना भी आचार संहिता का उल्लंघन माना जाना चाहिए क्योंकि इससे विरोधी पार्टियों को बल मिलता है।

जहाँ तक मानोशी रावल की पुस्तक Saffron Swords की बात है, वह तो किसी भी दृष्टिकोण से राजनैतिक विचारधारा पर आधारित नहीं है। बल्कि यह पुस्तक तो भारत के उन 50 से अधिक ऐतिहासिक शूरवीरों की कहानी है जिनके बारे में शायद बहुत से सैन्य इतिहासकारों को भी नहीं पता होगा। उदाहरण के लिए राणा सांगा, प्रताप, लक्ष्मीबाई और सियाचिन पर परमवीर चक्र पाने वाले बाना सिंह का नाम तो सबने सुना है लेकिन 300 सैनिकों के साथ आदिलशाह की 12000 की फ़ौज से टकराने वाले बाजीप्रभु देशपांडे का नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा। असम के सेनापति तोनखाम बोरपात्र गोहेन के बारे में कम लोग जानते होंगे जिसने अफ़ग़ान तुरबक खान को 1533 में पराजित किया था।

मानोशी की पुस्तक में ऐसी ही दुर्लभ कहानियों का संग्रह है। इस पर निर्वाचन आयोग को क्या आपत्ति हो सकती थी यह समझ से बाहर है। एक तो वैसे ही देश में इतिहास लेखन हद दर्ज़े तक एकपक्षीय और तुष्टिकरण वाला रहा है। उस पर यदि कोई शोध करके कुछ नया लिख रहा है तो यूनिवर्सिटी में चार विद्यार्थियों के सामने उसका बुक लॉन्च आचार संहिता का उल्लंघन मान लिया जाता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि चुनावों का मौसम शुरू होने से ऐन पहले ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने भी एक पुस्तक लिखी है जिसमें वो सोशल मीडिया पर कथित तौर पर फैलाए जाने वाली फेक न्यूज़ का भंडाफोड़ करने की बात कहते हैं जबकि अधिकतर फेक न्यूज़ उनके द्वारा ही जनित होती है। क्या सिन्हा के विश्लेषण में राजनैतिक दुर्भावना का अंश होना पूरी तरह नकारा जा सकता है जबकि आज सोशल मीडिया को पार्टियों द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का एक हथकंडा बना दिया गया है। क्या निर्वाचन आयोग को इसका संज्ञान नहीं लेना चाहिए? क्या निष्पक्ष दिखने वाले वास्तव में निष्पक्ष हैं, यह भी चर्चा का विषय होना चाहिए।

बहरहाल, जेएनयू में भले ही दोनों पुस्तकों के लॉन्च पर प्रतिबंध लगा दिया गया हो लेकिन निर्वाचन आयोग के इस निर्णय से इन पुस्तकों की बिक्री अवश्य बढ़ गई है। मानोशी की पुस्तक अमेज़न पर नंबर 9 पर पहुँच गई है और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों ने आभास की पुस्तक पर अकादमिक विमर्श के लिए सहमति दी है।


  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

भूमिपूजन पर भगवा झंडे-पटाखे दिए जलाना डरा रहा है मुसलमानों को : शन्नो की शिकायत पर ‘वायर’ की तरफदारी

स्थानीय लोगों ने बताया कि सब कुछ सामान्य ही था लेकिन इसके कुछ दिन बाद मुस्लिम पत्रकारों ने वहाँ मौजूद परिवारों से बातचीत कर इसे मजहबी रंग देने का प्रयास किया।

सचिन पायलट की वापसी से और गहराया संकट: फूट पड़ी कॉन्ग्रेस में, थूका-चाटा कॉन्ग्रेसियों ने, लेकिन दोषी कौन है? भाजपा…

ये झटका किसे है? सचिन पायलट अब राजस्थान में कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नहीं रहे। न ही वो अब राज्य के उप-मुख्यमंत्री हैं। महीने भर उनका अपमान हुआ। कॉन्ग्रेस नेताओं ने उन्हें भला-बुरा कहा।

शेहला रशीद के लिए मेडिकल किट बुर्का है, और मास्क हिजाब… बकैती से कुप्रथाओं का कर रही समर्थन

शेहला रशीद बुर्के और नकाब का समर्थन करते हुए कहती हैं, "अंकल अब तो पूरी दुनिया बुर्का (पीपीई) और निकाब (मास्क) पहन रही है। शांत हो जाओ।"

‘किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़े ही है’ के शायर राहत इंदौरी का निधन, इंटरनेट पर प्रशंसक सदमे में

मशहूर शायर राहत इंदौरी का कोरोना वायरस संक्रमण के कारण निधन हो गया है। उनका कोरोना वायरस टेस्ट पॉजिटिव आया था।

राम मंदिर के साथ Happy Independence Day का पोस्टर: पुलिस ने उतार दिया हैदराबाद में, BJP ने की जाँच की माँग

"पोस्टर में लिखे जिस नारे को लेकर विवाद हो रहा है, वह भगत सिंह ने कहा था और उनके नारे को पोस्टर में लिखना किसी भी तरह से अनुचित नहीं है।"

PTI का पकड़ा गया झूठ: PM मोदी के कोरोना आँकड़ों से गायब किया शब्द, बदल गए मायने

PTI जैसी संस्था सोशल मीडिया पर पड़ती गाली को देख कर अपना ट्वीट डिलीट भी कर सकती है। इसलिए उसका ट्वीट नहीं बल्कि स्क्रीनशॉट से...

प्रचलित ख़बरें

मस्जिद के अवैध निर्माण के खिलाफ याचिका डालने वाले वकील पर फायरिंग, अतीक अहमद गैंग का हाथ होने का दावा

प्रयागराज में बदमाशों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील अभिषेक शुक्ला पर फायरिंग की। हमले में वे बाल-बाल बच गए।

बुर्के वाली औरतों की टीम तैयार की गई थी, DU के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने दंगों का दिया था मैसेज: गुलफिशा ने उगले राज

"प्रोफेसर ने हमे दंगों के लिए मैसेज दिया था। पत्थर, खाली बोतलें, एसिड, छुरियाँ इकठ्ठा करने के लिए कहा गया था। सभी महिलाओं को लाल मिर्च पाउडर रखने के लिए बोला था।"

ऑटो में महिलाओं से रेप करने वाले नदीम और इमरान को मारी गोली: ‘जान बच गई पर विकलांग हो सकते हैं’

पूछताछ के दौरान नदीम और इमरान ने बताया कि वे महिला सवारी को ऑटो रिक्शा में बैठाते थे। बंधक बनाकर उन्हें सुनसान जगह पर ले जाते और बलात्कार करते थे।

महेश भट्ट की ‘सड़क-2’ में किया जाएगा हिन्दुओं को बदनाम: आश्रम के साधु के ‘असली चेहरे’ को एक्सपोज करेगी आलिया

21 साल बाद निर्देशन में लौट रहे महेश भट्ट की फिल्म सड़क-2 में एक साधु को बुरा दिखाया जाएगा, आलिया द्वारा उसके 'काले कृत्यों' का खुलासा...

मस्जिद में कुरान पढ़ती बच्ची से रेप का Video आया सामने, मौलवी फरार: पाकिस्तान के सिंध प्रांत की घटना

पाकिस्तान के सिंध प्रान्त स्थित कंदियारो की एक मस्जिद में बच्ची से रेप का मामला सामने आया है। आरोपित मौलवी अब्बास फरार बताया जा रहा है।

लटका मिला था भाजपा MLA देबेन्द्र नाथ रॉय का शव: मुख्य आरोपी माबूद अली गिरफ्तार, नाव से भागने की थी योजना

भाजपा MLA देबेन्द्र नाथ रॉय के कथित आत्महत्या मामले में मुख्य आरोपित माबूद अली को गिरफ्तार कर लिया गया है। नॉर्थ दिनाजपुर के हेमताबद में...

रिया चक्रवर्ती ने ‘AU’ को किए 44 कॉल, सुशांत सिंह राजपूत की मौत से पहले और बाद भी किए गए कई कॉल: रिपोर्ट्स

TrueCaller में भी यह नंबर SU के नाम से रजिस्टर्ड है। 44 आउटगोइंग कॉल और 2 एसएमएस के अलावा 17 इनकमिंग कॉल थे। बॉलीवुड अभिनेता की मृत्यु से एक दिन पहले 13 जून को भी........

भूमिपूजन पर भगवा झंडे-पटाखे दिए जलाना डरा रहा है मुसलमानों को : शन्नो की शिकायत पर ‘वायर’ की तरफदारी

स्थानीय लोगों ने बताया कि सब कुछ सामान्य ही था लेकिन इसके कुछ दिन बाद मुस्लिम पत्रकारों ने वहाँ मौजूद परिवारों से बातचीत कर इसे मजहबी रंग देने का प्रयास किया।

‘मैं कहाँ चला जाऊँ, राजदीप? मैं तो गर्त में हूँ!’ भूमिपूजन पर विलाप करते ओवैसी के जवाब पर राजदीप हुए ट्रोल

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “राजदीप, आप मुझे कहाँ ले जाना चाहते हो? मैं पहले से ही गर्त में हूँ।” उन्होंने पूरे मामले पर 'धर्मनिरपेक्ष दलों' को भी उनकी चुप्पी के लिए जमकर फटकार लगाई।

‘मेरठ से हूँ, हिन्दुस्तान किसी के बाप का नहीं.. पता दे फिर देखते हैं किसमें कितना दम है’: हम्जा ने धमकी के बाद अकाउंट...

"मैं भी मेरठ से हूँ, हापुड़ रोड मेरठ। कहाँ से है तू? और हम भी हिन्दुस्तानी हैं, हिन्दुस्तान किसी के बाप का नहीं है, समझा? एड्रेस दे अपना, देखते हैं किसमें कितना दम है।"

किसी ने सुशांत को लटकते हुए नहीं देखा, गले पर बेल्ट के निशान दिख रहे थे: SC में बोले सुशांत के पिता

सुशांत के पिता ने कहा कि किसी ने भी सुशांत की बॉडी को पंखे से लटकते हुए नहीं देखा था और जब उनकी बहन कमरे के अंदर घुसी, तब तक बॉडी उतारी जा चुकी थी।

मेरठ में जुनैद समेत दर्जन भर मुस्लिमों ने किया हिंदू युवकों पर तलवार, चाकू, बेल्ट से हमला: 3 घायल, FIR दर्ज

संप्रदाय विशेष के जुनैद पुत्र फराहीम समेत दर्जन भर युवक डंडे, हॉकी और चाकू और तलवार से लैस होकर वहाँ पहुँचे और तीनों हिंदू युवकों पर हमला कर दिया।
00:14:24

शाह फैसल ने छोड़ी राजनीति, दोबारा बनेंगे IAS? अजीत भारती का वीडियो | Ajeet Bharti on Shah Faesal Quitting Politics

शाह फैसल के राजनीति में आने पर मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर दान दिया और समर्थन दिया था और अब जब उनके वापस से प्रशासनिक सेवा में जुड़ने की खबर आ रही है, तो वो लोग इसे कौम के साथ गद्दारी बता रहे हैं।

राम मंदिर का समर्थन करने पर अजीत पवार के बेटे को NCP सांसद सुप्रिया सुले ने अनुभवहीन बताकर किया किनारा

NCP सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि राम मंदिर पर पार्थ ने जो कहा, वह सब उनकी निजी राय है और लोकतंत्र में सभी को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है।

हिंदुओं को भगाने, मंदिरों को बम से उड़ाने की धमकी देने वाले साजिद को यूपी पुलिस ने किया गिरफ्तार

UP पुलिस ने साजिद नाम के एक शख्स को नाबालिग लड़की के बलात्कार की धमकी देने और हिंदू समुदाय के खिलाफ फेसबुक पर हिंसक टिप्पणी शेयर करने के आरोप में गिरफ्तार किया है।

सचिन पायलट की वापसी से और गहराया संकट: फूट पड़ी कॉन्ग्रेस में, थूका-चाटा कॉन्ग्रेसियों ने, लेकिन दोषी कौन है? भाजपा…

ये झटका किसे है? सचिन पायलट अब राजस्थान में कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नहीं रहे। न ही वो अब राज्य के उप-मुख्यमंत्री हैं। महीने भर उनका अपमान हुआ। कॉन्ग्रेस नेताओं ने उन्हें भला-बुरा कहा।

हमसे जुड़ें

246,500FansLike
64,563FollowersFollow
295,000SubscribersSubscribe
Advertisements