Wednesday, August 12, 2020
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‘हिन्दू आतंकवाद’: एक शिगूफ़ा, एक थ्योरी एक नैरेटिव, क्यों ढह गई झूठ की यह इमारत

मीडिया में आई रिपोर्ट से यह स्थापित नहीं किया जा सकता कि हिन्दू आतंकवाद वास्तविकता है अथवा नहीं। हिन्दू आतंकवाद मिथक है अथवा वास्तविकता इस पर विचार करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि आतंकवाद की क्या परिभाषा है।


बीबीसी पत्रकार तुफ़ैल अहमद ने दो साल पहले एक लेख का लिंक देकर कर ट्वीट किया था- ‘Hindu Terrorism is a valid Concept’ अर्थात हिन्दू आतंकवाद कोई अफवाह नहीं बल्कि सत्य और वास्तविक परिघटना है। तुफ़ैल अहमद ने MEMRI की वेबसाइट पर 2010 में प्रकाशित अपने लेख में यह सिद्ध करने का भरसक प्रयास किया था कि हिन्दू भी आतंकवादी हो सकता है। अपने तर्कों के समर्थन में उन्होंने मीडिया में प्रकाशित ढेर सारी रिपोर्ट का संदर्भ दिया था।

तुफ़ैल अहमद निस्संदेह एक सम्मानित पत्रकार हैं और उन्होंने इस्लामिक आतंकवाद पर गहन शोध भी किया है। लेकिन आज उनके नौ वर्ष पुराने उस लेख की चर्चा प्रासंगिक इसलिए हो जाती है क्योंकि अहमद की जमात में शामिल लोग आज फिर से सक्रिय हो गए हैं जो यह कहते हैं कि हिन्दू भी आतंकी हो सकता है। गत कुछ महीनों में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित और असीमानंद को कोर्ट से आंशिक राहत मिलने पर कुछ पत्रकार हद दर्ज़े तक असहिष्णु हो गए हैं। और जब से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने लोकसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है तब से उन्हें ‘आतंकी’ प्रत्याशी कहकर संबोधित किया जा रहा है।

बहरहाल, तुफैल अहमद ने वास्तव में कुछ मीडिया रिपोर्ट को इकट्ठा कर लेख लिखा था। उन्हें शायद यह पता नहीं है कि मीडिया प्रचार का माध्यम है न कि किसी समुदाय को आतंकी घोषित करने की स्थापना करने का। मीडिया में आई रिपोर्ट से यह स्थापित नहीं किया जा सकता कि हिन्दू आतंकवाद वास्तविकता है अथवा नहीं। हिन्दू आतंकवाद मिथक है अथवा वास्तविकता इस पर विचार करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि आतंकवाद की क्या परिभाषा है।

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किसी भी शब्द की परिभाषा दो प्रकार से वैध मानी जाती है- या तो वह शब्द अंतरराष्ट्रीय कानून द्वारा परिभाषित हो अथवा अकादमिक जगत में उसकी सर्वमान्य परिभाषा होनी चाहिए। दोनों ही न होने पर घटनाओं का एक इतिहास होना चाहिए जो उस ‘phenomena’ की व्याख्या करने में सहायक हो। दुर्भाग्य से आतंकवाद की कोई एक परिभाषा अंतरराष्ट्रीय कानून में नहीं लिखी है। अभी तक केवल तीन देशों- जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका के विभिन्न कानूनों में ही आतंकवाद को परिभाषित किया गया है। इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक Comprehensive Convention on International Terrorism नामक संधि विचाराधीन है जिसपर अभी तक सदस्य देशों की सहमति नहीं बन पाई है।

ऐसी स्थिति में हमें आतंकवाद की अकादमिक परिभाषा से काम चलाना पड़ेगा। लेकिन अकादमिक जगत भी आतंकवाद की किसी एक परिभाषा से सहमत नहीं है। तो क्या यह मान लिया जाए कि आतंकवाद कुछ होता ही नहीं है? यह तो संभव नहीं। बिना आग के धुँआ नहीं होता। आधुनिक युग में आतंकवाद का स्वाद पहली बार संभवतः ब्रिटेन ने चखा था जब वहाँ आयरिश रिपब्लिकन आर्मी के लड़ाके राजनैतिक हत्याएँ करते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी में और युद्ध के बाद अमेरिका में कम्युनिस्टों को आतंकवादी कहा जाता था। सन 1964 में फ़लस्तीन को मुक्त करवाने के लिए बने संगठन PLO को आतंकी संगठन का दर्जा दिया गया था।

सोवियत संघ के विघटन के बाद अफ़ग़ानी मुजाहिद जब पाकिस्तान की रणनीति के तहत भारत में खून खराबा करते तो विश्व उसे भारत की आंतरिक कानून व्यवस्था की समस्या बताता था। लेकिन 9/11 के बाद आतंकवाद किसी एक देश की ‘आंतरिक’ समस्या नहीं रह गया था। जब अमेरिका ने आतंकवाद का स्वाद चखा तब उसने ग्लोबल वॉर ऑन टेररिज्म प्रारंभ किया जिसका उद्देश्य अमेरिका के हित साधना ही था।

बहरहाल, आतंकवाद के इतिहास से हमें यह समझ में आता है कि आज के वैश्विक परिदृश्य में आतंकवाद एक ऐसी परिघटना है जिसमें राजनैतिक हितों को साधने के लिए सामान्य जीवन जी रहे निर्दोष लोगों का खून बहाया जाता हो। यहाँ ‘राजनैतिक हित’ का लक्ष्य किसी देश की सत्ता से सीधा टकराव हो सकता है। इसकी प्रेरणा राजनैतिक स्वार्थ भी हो सकती है और मजहबी उन्माद भी हो सकता है। जब विशुद्ध राजनैतिक कारण हों तब ‘किसी के लिए आतंकवादी, किसी दूसरे के लिए क्रांतिकारी’ बन जाता है। उसी तरह जैसे क्रांतिकारी भगत सिंह जो अपनी मातृभूमि के लिए लड़े थे, अंग्रेजों के लिए आतंकवादी थे।

लेकिन जब मजहबी उन्माद जैसे कारण हों तब क्रांतिकारी और आतंकवादी एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं हो सकते। जब 9/11 की घटना को अंजाम देने वाले मोहम्मद अट्टा की ज़ुबान पर क़ुरआन की आयतें हों तब वह केवल आतंकवादी ही हो सकता है। क्योंकि मजहब व्यक्तियों के समूहों को जीवन जीने का तरीका सिखाता है। यदि उस तरीके को गलत रूप में पेश करने वाले लोग दूसरे मत या मजहब को मानने वालों की निर्मम हत्या करना सिखाते हों तो ऐसे लोगों को क्रांतिकारी नहीं कहा जा सकता।

अब यदि हम इस कसौटी पर ‘हिन्दू आतंकवाद’ के जुमले को कसें तो पाएंगे कि हिन्दू आतंकवाद न तो आतंकवाद की किसी कानूनी परिभाषा पर सही बैठता है न अकादमिक पुस्तकों में लिखी किसी परिभाषा से मेल खाता है और न ही ऐसा कोई इतिहास रहा है जो यह कहता हो कि हिन्दू समाज कभी आतंकी रहा है। ऐसे में जो लोग यह कहते हैं कि हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविक परिघटना है उन्हें अपनी बौद्धिक क्षमता पर पुनर्विचार करना चाहिए।      

हिन्दू आतंकवाद वास्तव में भारत की एक राजनैतिक पार्टी द्वारा एक समुदाय विशेष के तुष्टिकरण के लिए गढ़ा गया नैरेटिव था जिसकी बुनियाद ही झूठ पर रखी गई थी। इस पूरी कहानी की पोल गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आर वी एस मणि ने अपनी पुस्तक The Myth of Hindu Terror में खोली थी। मणि अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि NIA ने 2008 के मुंबई हमले के बाद 2009-10 तक जितनी भी जाँच की वह हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी को प्रमाणित करने के उद्देश्य से की। समझौता, मालेगाँव और अजमेर शरीफ ब्लास्ट से जुड़े हर केस की हर जाँच में प्राथमिक साक्ष्य छोड़कर हिन्दू आतंकवाद को स्थापित करने की दिशा में जाँच की गई। गृह मंत्रालय में अधिकारी रहते हुए मणि पर भी दबाव डाला जाता था कि वे हिन्दू आतंकवाद को सिद्ध करने में साथ दें नहीं तो उनकी जान को खतरा था।

स्थिति यह थी कि गोवा में जब एक जगह हिन्दू जागरण मंच और सनातन संस्था ने दिवाली पर पुतले जलाने का कार्यक्रम किया तो NIA ने उसकी जाँच कर निष्कर्ष निकाल लिया कि वे लोग IED प्लांट करने की योजना बना रहे थे। मणि ने लिखा है कि किस तरह 26/11 के हमले को कथित हिन्दू आतंकवादियों के सिर मढ़ने का षड्यंत्र गृह मंत्रालय में चलाया जा रहा था। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, असीमानन्द और कर्नल पुरोहित समेत संघ के भी बड़े नेताओं को इसमें फँसाने की पूरी साज़िश थी।

आज भले ही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के ऊपर से मामला पूरी तरह खतम न हुआ हो लेकिन यह भी सच है कि कॉन्ग्रेस के कार्यकाल में ऐसा कोई भी व्यक्ति दंडित नहीं किया जा सका जिसे हिन्दू आतंकी कहा गया। यदि साक्ष्य और प्रमाण मौजूद थे तो मोदी सरकार आने से पहले कथित हिन्दू आतंकियों को सज़ा क्यों नहीं मिल सकी? आज जब साध्वी प्रज्ञा अपने ऊपर किए गए टॉर्चर को बताती हैं तो कोई पुलिस अधिकारी सामने आकर क्यों नहीं कहता कि यह झूठ है?

समझौता, मालेगाँव और अजमेर ब्लास्ट में पाए गए विस्फोटक भी पाकिस्तान की तरफ इशारा करते थे लेकिन जानबूझकर आज से दस साल पहले इस प्रकार का नैरेटिव गढ़ा गया ताकि हिन्दू आतंकवाद का एक इतिहास लिखा जा सके जिसके बल पर इस थ्योरी को प्रमाणित किया जा सके। संयोग से कॉन्ग्रेस के जाते ही इस नैरेटिव की बखिया उधड़नी प्रारंभ हो गईं। आज जो बुद्धिजीवी साध्वी प्रज्ञा के चुनाव लड़ने पर आतंकी कह कर सवाल उठा रहे हैं उनके प्रयास सफल नहीं होने वाले। हिन्दू आतंक का शिगूफा बहुत जल्दी ही जनता की स्मृति से ओझल हो चुका है क्योंकि किसी भी प्रोपगैंडा को जीवित रहने के लिए घटनाओं की एक शृंखला खड़ी करनी पड़ती है। दुर्भाग्य से तीन चार घटनाओं को छोड़कर हिन्दू आतंक को प्रमाणित वाली कोई घटना घटी ही नहीं।

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