बीवी को टिकट या अपनी प्रतिष्ठा बचाने की जद्दोजहद: कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता का इस्तीफा देने का ऑडियो वायरल

जाहिर है कि राहुल गाँधी कितना ही पीएम मोदी और भाजपा को कोस लें, लेकिन वो अपनी पार्टी के नेताओं को संतुष्ट कर पाने में असफल रहे हैं।

लोकसभा चुनाव का समय नजदीक है। हर दिन कोई न कोई ऐसी बातें सामने आ जाती हैं, जो कि राजनीतिक गलियारे में तहलका मचा देती है। इसी बीच शनिवार की शाम महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अशोक चव्हाण का एक ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वो चंद्रपुर के एक कार्यकर्ता से बात करने के दौरान इस्तीफा देने की बात कर रहे हैं। हालाँकि चुनाव के मौके पर ये ऑडियो क्लिप वायरल होने से कॉन्ग्रेस में खलबली मच गई थी, मगर चव्हाण ने पार्टी स्तर पर इस ऑडियो को लेकर अपनी सफाई देते हुए कहा कि उन्हें ऑडियो क्लिप के बारे में जानकारी नहीं है, लेकिन इस तरह से किसी की निजी बातों को सार्वजनिक करना गलत है। वो ना तो इस्तीफा देने जा रहे हैं और ना ही ऐसा कुछ सोच रहे हैं।

इसके बाद अशोक चव्हाण ने महागठबंधन के प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि वो पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते एक पार्टी कार्यकर्ता के मनोबल को बढ़ाने का काम कर रहे थे। बता दें कि कॉन्ग्रेस ने चंद्रपुर से विनायक बांगड़े को उम्मीदवारी दी है। इससे स्थानीय कार्यकर्ता नाराज हैं। वायरल हुए इस ऑडियो में वो चंद्रपुर के एक कार्यकर्ता को समझाते हुए कहते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष होने के बावजूद उनकी कोई नहीं सुनता। इसलिए बेहतर होगा कि वो उनसे बात करने की बजाय कॉन्ग्रेस महासचिव मुकुल वासनिक से बात करें। साथ ही चव्हाण ने ये भी कहा कि वो भी पार्टी से इस्तीफा देने की सोच रहे हैं।

अशोक चव्हाण अब लाख टालमटोल करें, इस ऑडियो के जारी होने से एक बात तो साफ है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में असंतोष और निराशा व्याप्त है। परिवारवाद तो खैर हमेशा से ही कॉन्ग्रेस की परिचायक रही है। चव्हाण, जो इस्तीफा देने की बात करने के बाद अब मुकर रहे हैं, अगर आप इस ख़बर की तह तक जाएँगे तो इसके पीछ भी परिवारवाद का ही मुद्दा है। दरअसल चव्हाण चाहते थे कि औरंगाबाद से पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार और नांदेड़ से उनकी पत्नी अमृता चव्हाण को टिकट मिले। जबकि पार्टी ने औरंगाबाद से सुभाष झांबड़ को उम्मीदवारी दी। पार्टी ने चव्हाण की पत्नी को टिकट देना भी मुनासिब नहीं समझा।

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वैसे तो टिकट बँटवारे के बाद हर पार्टी में थोड़ी बहुत खटपट देखने को मिलती है, लेकिन कॉन्ग्रेस में तो यह कुछ ज्यादा ही हो गया है, जब प्रदेश अध्यक्ष खुद अपने इस्तीफे की बात करने लगा। हालाँकि कॉन्ग्रेस नेताओं की एक खास बात ये भी है कि ये खुलकर विरोध तक नहीं कर पाते। अगर मन की बात निकल भी गई तो उससे मुकरने में भी पीछे नहीं हटते। पार्टी में फैले निराशा और असंतोष की वजह से ही चुनाव के समय में कई दिग्गज नेताओं ने पार्टी से किनारा करना ही उचित समझा है।

इनमें कॉन्ग्रेस के बड़े नेता टॉम वडक्कन, हरियाणा के पूर्व कॉन्ग्रेस सांसद अरविंद शर्मा, प्रवीण छेड़ा, एसएम कृष्णा, कर्नाटक के पूर्व विधायक उमेश जाधव, ओडिशा के विधायक प्रकाश चंद्र बेहरा, जो कि पिछले 20 साल से कॉन्ग्रेस में थे, ने पार्टी का हाथ छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया। इससे साफ जाहिर होता है कि राहुल गाँधी कितना ही पीएम मोदी और भाजपा को कोस लें, लेकिन वो अपनी पार्टी के नेताओं को संतुष्ट कर पाने में असफल रहे हैं।


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