Friday, July 1, 2022
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‘2024 में आर्थिक नीतियों का लाभ मुझे मिलेगा या नहीं… मुद्दा यह नहीं बल्कि राष्ट्र तरक्की करेगा, यह है’ – PM मोदी

"...मानसिक रूप से मैं खुद को सत्ता, चकाचौंध और ग्लैमर की इस दुनिया से अलग रखता हूँ और उसी के कारण, मैं एक आम नागरिक की तरह सोच पा रहा हूँ और अपने कर्तव्य के रास्ते पर चल रहा हूँ।"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक इंटरव्यू दिया। इस दौरान उन्होंने गाँधीनगर से नई दिल्ली तक की अपनी यात्रा, शासन की चुनौतियों, दुनिया में भारत के लिए उनके दृष्टिकोण और इसके साथ ही कई अन्य मुद्दों पर बात की।

इस दौरान उनसे गुजरात त्रासदी और उनके उथल-पुथल भरी जीवन यात्रा से लेकर उनके संतोषजनक क्षण के बारे में सवाल पूछा गया। उन्होंने कहा कि उनका राजनीतिक क्षेत्र से कोई लेना-देना नहीं था। उनका परिवेश, उनकी अपनी दुनिया- ये सब बहुत अलग था। उनका बचपन से ही आध्यात्म की तरफ झुकाव था। ‘जन सेवा ही प्रभु सेवा’ के सिद्धांत ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया है। वह स्वामी विवेकानंद को अपनी प्रेरणा मानते हैं।

राजनीति में आने की बात पर उन्होंने कहा कि उनका इससे दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। हालाँकि परिस्थितियाँ ऐसी आईं कि उन्हें राजनीति में आना पड़ा। 2001 में गुजरात में आए विनाशकारी भूकंप के कारण उन्हें प्रशासन का नेतृत्व करने के लिए उस क्षेत्र में घुसना पड़ा, जो उनके लिए पूरी तरह से अनजान था। 

उन्होंने कहा, “लोगों की परेशानी को करीब से देखने के बाद, मेरे पास यह सोचने का समय या अवसर नहीं था कि मेरे जीवन में नए मोड़ का क्या मतलब है। मैं तुरंत राहत, पुनर्वास और गुजरात के पुनर्निर्माण में लग गया। कुछ हासिल करना कभी भी मेरे अस्तित्व का हिस्सा नहीं रहा है। मेरी आंतरिक इच्छा हमेशा दूसरों के लिए कुछ न कुछ करने की रही है। आज मैं जहाँ पर हूँ, जो भी कुछ कर रहा हूँ, उसकी वजह भी लोगों के लिए कुछ करने की इच्छा है। दूसरों के लिए काम करना ही मुझमें हमेशा ‘स्वंतः सुखाय’ या आत्मसंतुष्टि की भावना पैदा करता है।”

पीएम ने आगे कहा, “दुनिया की नजर में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री होना बहुत बड़ी बात हो सकती है लेकिन मेरी नजर में यह लोगों के लिए कुछ करने के तरीके हैं। मानसिक रूप से मैं खुद को सत्ता, चकाचौंध और ग्लैमर की इस दुनिया से अलग रखता हूँ और उसी के कारण, मैं एक आम नागरिक की तरह सोच पा रहा हूँ और अपने कर्तव्य के रास्ते पर चल रहा हूँ।” वहीं उन्होंने ओलंपिक और पैरालंपिक नायकों से मिलने और बातचीत करने को अपना संतोषजनक क्षण बताया।

जब उनसे पूछा गया कि क्या वो चाय बेचने से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक के सफर के उतार-चढ़ाव से वो डरते हैं? इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, वो इस बात का आदर करते हैं कि देश के लोग एक गरीब बच्चे को चुन कर वहाँ पहुँचा देते हैं, जहाँ पर वो आज हैं। वो अपने आप को सौभाग्यशाली मानते हैं कि इस देश के लोगों ने उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारियाँ दी और भरोसा किया। यही लोकतंत्र की ताकत है।

वह कहते हैं, “जहाँ तक ​​मेरे लिए बचपन में चाय बेचने और बाद में हमारे देश का प्रधानमंत्री बनने की बात है, मैं इसे आपके तरीके से बहुत अलग तरीके से देखता हूँ। मुझे लगता है कि भारत के 130 करोड़ लोगों में वही क्षमताएँ हैं, जो मेरे पास हैं। मैंने जो हासिल किया है, उसे कोई भी हासिल कर सकता है। अगर मैं कर सकता हूँ तो कोई भी कर सकता है।”

यह पूछे जाने पर कि उनके विरोधी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि वो उनको पूरी तरह से नहीं जान पाए हैं। पीएम कहते हैं, “यहाँ समस्या मोदी नहीं है। लेकिन जब कोई व्यक्ति पूर्वधारणा से ग्रसित मानसिकता से किसी भी चीज को देखने की कोशिश करता है तो या तो वह आधी नजर से ही देख पाता है या गलत चीजों को ही देख पाता है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपनी गलतियों को आसानी से स्वीकार नहीं करता। अपनी गलत धारणाओं पर सच्चाई को स्वीकार करने के लिए साहस चाहिए। अगर किसी ने केवल मेरे काम का विश्लेषण किया होता, तो उसे मेरे बारे में कोई भ्रम नहीं होता।” इसके बाद उन्होंने अपने द्वारा किए गए कामों के बारे में विस्तार से बताया।

प्रधानमंत्री से जब यह पूछा गया कि उन्हें जोखिम लेने के लिए जाना जाता है, लेकिन वह किसान आंदोलन पर प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं कर रहे? क्या वह इस मुद्दे पर बात करने से डरते हैं? उन्होंने कहा, “हमारे देश की राजनीति ऐसी है कि अब तक हमने एक ही मॉडल देखा है जिसमें अगली सरकार बनाने के लिए सरकारें चलाई जाती हैं। मेरी मौलिक सोच अलग है। मेरा मानना है कि देश बनाने के लिए सरकार चलानी है। अपनी पार्टी को जिताने के लिए सरकार चलाने की परंपरा रही है, लेकिन मेरा मकसद अपने देश को जिताने के लिए सरकार चलाना है और इसी बुनियादी चिंता के कारण मैं गाँधीजी के जंतर के आधार पर निर्णय लेता हूँ।”

उन्होंने बौद्धिक बेईमानी और ‘राजनीतिक धोखेबाजी’ के बारे में बात करते हुए कहा कि कुछ पार्टियाँ चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे करते हैं और उसे अपने घोषणापत्र में भी डालते हैं, लेकिन जब उसे पूरा करने का समय आता है तो वह उससे यू-टर्न मार लेते हैं। अगर आप उन लोगों को देखें जो आज किसान हितैषी सुधारों का विरोध कर रहे हैं, तो आपको बौद्धिक बेईमानी और ‘राजनीतिक धोखेबाजी’ का असली मतलब समझ में आएगा।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि विकास में तेजी लाने, अर्थव्यवस्था और शासन में सुधार और बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने के लिए उनके द्वारा किए गए उपाय सही दिशा में कदम हैं। लेकिन उनका यह भी मानना है कि इसका लाभ मिलने में समय लगेगा, जिसकी वजह से उन्हें 2024 में लाभ नहीं मिलेगा।

इसका जवाब देते हुए वह कहते हैं, “अगर ये सच होता तो लोगों ने मुझे 20 वर्षों तक सरकार के प्रमुख के रूप में काम करने का अवसर नहीं दिया होता। जो लोग यह सोचते हैं, वे न तो अपने देश के लोगों को जानते हैं, न ही उनकी सोच को। देश के लोग इतने समझदार हैं कि अच्छे निस्वार्थ इरादों से किए गए सभी अच्छे कामों को समझ सकते हैं और उसका समर्थन करते हैं। इसलिए मुझे देश की जनता ने लगातार 20 वर्षों तक सरकार के मुखिया के रूप में काम करने का अवसर दिया है। बीज बोने वाले को इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए कि उसका फल किसे मिलेगा। मुद्दा यह नहीं है कि मुझे अपनी आर्थिक नीतियों का लाभ मिलेगा या नहीं, मुद्दा यह है कि राष्ट्र तरक्की करेगा।”

इस दौरान उनसे वन कार्ड वन नेशन, मनरेगा, उज्जवला योजना, खाद्यान्न वितरण, बिजली आदि के बारे में बात करते हुए कहा गया कि उन्होंने कई मायनों में हर मुद्दे के शासन प्रतिमान को बदल दिया है।

इस पर उन्होंने कहा, “आप अच्छी तरह जानते हैं कि मैं किसी शाही परिवार से नहीं आता। मैंने अपना जीवन गरीबी में गुजारा है। मैंने 30-35 साल भटकते सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में बिताए। मैं सत्ता के गलियारों से दूर था और जनता के बीच रहा हूँ और इस वजह से मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आम आदमी की क्या समस्याएँ, आकांक्षाएँ और क्षमताएँ हैं। इसलिए मेरे फैसले (जब देश ने मुझे काम करने का मौका दिया) आम आदमी की मुश्किलें कम करने की दिशा में काम करने का एक प्रयास है।”

पीएम ने कहा, “शौचालय को कभी किसी ने लोगों की सेवा करने के तरीके के रूप में नहीं देखा। लेकिन मुझे लगा कि शौचालय लोगों की सेवा करने का एक तरीका है और इसलिए जब मैं निर्णय लेता हूँ तो आम आदमी को लगता है कि यह प्रधानमंत्री हमें समझता है, हमारी तरह सोचता है और हम में से एक है। उनके बीच अपनेपन की यह भावना हर परिवार को यह महसूस कराती है कि मोदी हमारे परिवार के सदस्य की तरह हैं। यह विश्वास पीआर द्वारा बनाई गई धारणा के कारण विकसित नहीं हुआ है। यह विश्वास पसीने और मेहनत से अर्जित किया गया है। मैंने ऐसा जीवन जीने का प्रयास किया है जहाँ मैं चाकू की धार पर चलता हूँ, लोगों से संबंधित हर मुद्दे का अनुभव करता हूँ और जीता हूँ।”

“जब मैं सत्ता में आया था तो लोगों से तीन चीजों का वादा किया: मैं अपने लिए कुछ नहीं करूँगा। मैं गलत इरादे से कोई काम नहीं करूँगा। मेहनत की नई मिसाल गढ़ूँगा। मेरी इस निजी प्रतिबद्धता को लोग आज भी देखते हैं।”

इस दौरान उनसे पिछले 74 वर्षों में नेहरू, इंदिरा गाँधी, पीवी नरसिम्हा राव और फिर मोदी के कार्यकाल पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, “हमारे देश में बनी सभी सरकारें मूल रूप से कॉन्ग्रेस गोत्र के एक व्यक्ति के नेतृत्व में बनी हैं और इसीलिए, उनमें से प्रत्येक के लिए, उनकी राजनीतिक विचार प्रक्रिया और आर्थिक विचार प्रक्रिया में कोई अंतर नहीं था। अटलजी को लोगों ने मौका दिया लेकिन उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं था, यह गठबंधन सरकार थी। मैं भाग्यशाली हूँ कि यह पहली गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार है जिसे लोगों ने पूर्ण बहुमत दिया था। इसका मतलब है कि इस देश के लोगों ने पूर्ण परिवर्तन के लिए मतदान किया।” इस दौरान उनसे वैक्सीन के डिजिटलीकरण को लेकर भी बात की गई।

हमारी राजनीति चुनावी सफलता के लिए भारतीयों के बीच विभाजन को प्राथमिकता देती है। पिछले सात वर्षों में प्रधानमंत्री के रूप में, राजनीतिक व्यवस्था में एकीकृत विचारों को स्वीकार करना उनके लिए कितना मुश्किल रहा है? इस पर पीएम ने अपने पुराने भाषणों को सुनने का आग्रह किया, चाहे वह उनके गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में हो या भारत के प्रधानमंत्री के रूप में। उन्होंने हमेशा ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सब का प्रयास’ का नारा दिया।

कोविड -19 लड़ाई के दौरान राज्य और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की तैयारियों के बारे में क्या सबक हैं जिन्हें अब वह बदलने की योजना बना रहे हैं? इस पर उन्होंने कहा, “भारत से पहले अन्य देशों में महामारी की शुरुआत हुई थी। मैं वैश्विक स्थिति और रुझानों को देख रहा था। मैं हर जगह भ्रम और व्यक्तिगत स्तर पर गंभीरता की कमी भी देख रहा था। हम जानते थे कि भारत भी हमेशा के लिए प्रभावित होगा। मैंने योजना बनाना शुरू कर दिया कि कैसे पूरे देश को इसके लिए एक साथ लाया जाए। आखिरकार, यह लोगों का संकल्प और अनुशासन था, जिसके बिना, इस महामारी से निपटना असंभव था। तभी मेरे मन में जनता कर्फ्यू का ख्याल आया। यह एक बड़ी सफलता की कहानी है।”

उन्होंने आगे कहा कि इसी तरह, महामारी में सबसे बड़ी भूमिका स्वास्थ्य सेवा और फ्रेटलाइन वर्करों की थी। उनका मनोबल बढ़ाने की जरूरत है। थालियों की धुनाई और दीये जलाने का हुजूम उमड़ा। इसने हमारे स्वास्थ्य कर्मियों के मनोबल को बढ़ाने में मदद की। यह एक बड़ा केस स्टडी हो सकता है। इससे चिकित्साकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार के मामले भी कम हुए और उनके प्रति सम्मान बढ़ा। लोग सफेद कोट में चिकित्सा कर्मियों को भगवान के रूप में देखने लगे। इसके बाद पीएम ने चिकित्सा सेवा के बारे में हो रहे विस्तार के बारे में बताया।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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