Wednesday, September 28, 2022
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शरद पवार से आर-पार के मूड में उद्धव ठाकरे, बता दिया- देशद्रोह के मामले में घुटने नहीं टेकेंगे

भीमा-कोरेगॉंव के मसले से पवार के सारे मंसूबे धरे के धरे रह गए। उन्होंने नाराजगी भी दिखाई, आनन-फानन में अपने मंत्रियों की बैठक भी बुलाई। बावजूद इसके उद्धव इस मसले पर दबाव में आते नहीं दिख रहे हैं।

भाजपा की स्वभाविक साझेदार शिवसेना के साथ महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की सरकार बनाकर एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने राज्य का सुपर सीएम बनने के सपने बुन रखे थे। उन्होंने सोचा था कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भले सरकार का चेहरा रहें, लेकिन पर्दे के पीछे से बागडोर उन्हीं के हाथों में रहेगी। महाराष्ट्र कैबिनेट के मलाईदार विभागों को झपट उन्होंने इसकी बानगी भी पेश की थी।

लेकिन, भीमा-कोरेगॉंव के मसले से उनके सारे मंसूबे धरे के धरे रह गए। उन्होंने नाराजगी भी दिखाई, आनन-फानन में अपने मंत्रियों की बैठक भी बुलाई। बावजूद इसके उद्धव इस मसले पर दबाव में आते नहीं दिख रहे हैं। इस मामले में अब तक उद्धव ने जो स्टैंड दिखाया है उससे जाहिर है कि सत्ता में साझेदारी को लेकर भले वे सहयोगी कॉन्ग्रेस और एनसीपी के दबाव में आ जाएँ, लेकिन देशद्रोह के मामले में वे घुटने टेक खुद को कमजोर पड़ते नहीं दिखा सकते।

यही कारण है कि तीन महीने पुरानी गठबंधन सरकार के मतभेद एल्गार परिषद और भीमा-कोरेगाँव की हिंसा मामले में जाँच को लेकर खुलकर सामने आ गए हैं। उद्धव ठाकरे ने एल्गार परिषद की जाँच NIA को सौंपने को मँजूरी दे देशद्रोह और सामान्य हिंसा के मामले के बीच एक लकीर खींचने का काम किया है। ऐसा कर उन्होंने संदेश दिया है कि वे देशद्रोह के मामले में नहीं झुकेंगे। दूसरी तरफ पवार इस बात पर अड़े हैं कि इसकी जाँच एसआईटी से भी समानांतर रूप से करवाई जाए।

गौरतलब है कि इससे पहले एल्गार मामले पर पवार सहित एनसीपी के ज्यादातर नेता SIT जाँच पर अपनी सहमति दे चुके थे। लेकिन, उद्धव ठाकरे का पक्ष जानने के बाद वह इस बात से नाराज हैं कि मुख्यमंत्री ने एनआईए जाँच को मंजूरी क्यों दी?

बता दें, शरद पवार ने एल्गार परिषद की जाँच एनआईए से करवाने के उद्धव के फैसले पर कड़ी आलोचना की थी। शरद पवार ने एनआईए एक्ट की धारा 10 का हवाला देते हुए यह माँग की थी कि एनआईए जाँच के अलावा राज्य सरकार एल्गार परिषद केस की समानांतर जाँच कराए।

यहाँ साफ कर दें कि एल्गार परिषद की जाँच NIA को सौंपने और भीमा-कोरेगॉंव हिंसा की जाँच एसआईटी से कराने के उद्धव के फैसले के पीछे माना जा रहा है कि वह इसके जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी पार्टी देशद्रोह के मुद्दे पर नहीं झुकेगी। इसके चलते ही उन्होंने एल्गार परिषद और भीमा-कोरेगाँव को अलग-अलग मामला बताते हुए साफ किया है कि एल्गार परिषद का केस देशद्रोह की साजिशों से संबंधित है इसलिए सरकार को इसे NIA को सौंपने में कोई ऐतराज नहीं है।

उधर, NCP चीफ शरद पवार ने एसआईटी गठन के मुद्दे पर मुख्यमंत्री से समन्वय की जिम्मेदारी अपने नेता गृह मंत्री अनिल देशमुख को सौंपी है। देशमुख का काम इस बारे में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से सलाह कर जल्द ही एसआईटी गठन की घोषणा करना है। इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून CAA को लेकर भी पवार और उद्धव के मतभेद सामने आ चुके हैं। उद्धव ने राज्य में सीएए लागू करने का इशारा करते हुए कहा था, “CAA और NRC दोनों अलग है। NPR भी अलग है। अगर CAA लागू होता है तो इसके लिए किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है। NRC अभी नहीं है और इसे राज्य में लागू नहीं किया जाएगा।” इसे खारिज करते हुए शरद पवार ने कहा था, “ये महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे का अपना नजरिया है, लेकिन जहाँ तक एनसीपी की बात है, हमने इसके खिलाफ वोट किया है।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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