Thursday, September 24, 2020
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शरद पवार की 2 डिमांड पूरी कर देते मोदी-शाह तो उद्धव ठाकरे नहीं बनते महाराष्ट्र के सीएम

"जब शरद पवार लगा कि भाजपा उनकी मॉंगों को नहीं मानने वाली है, तो उन्होंने आखिरकार कॉन्ग्रेस-शिवसेना के साथ पहले से सरकार बनाने को लेकर चल रही बातचीत को ही मुकाम पर पहुॅंचाने का फैसला किया।"

महाराष्ट्र में जब से शिवसेना ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिल कर सरकार बनाई है, तब से ही उसकी उम्र को लेकर अटकलें लग रही है। इस बीच, जो खबरें सामने आ रही है उसके मुताबिक एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने मजबूरी में उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पवार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहते थे। भाजपा को समर्थन के एवज में उन्होंने दो मॉंगे रखी थी, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष एवं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ठुकरा दिया। मजबूरन, पवार को शिवसेना और कॉन्ग्रेस के साथ सरकार बनानी पड़ी।

जानकारी के मुताबिक पवार की पहली माँग थी कि उनकी सांसद बेटी सुप्रिया सुले को मोदी कैबिनेट में कृषि मंत्री की जिम्मेदारी मिले। उनकी दूसरी माँग थी कि भाजपा देवेंद्र फडणवीस की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाए। मोदी ने उनकी दोनों मॉंगें ठुकरा दी।

न्यूज एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक एनसीपी को कृषि मंत्रालय देने की सूरत में बिहार में बीजेपी की सहयोगी जदयू रेल मंत्रालय मॉंग सकती थी। भाजपा नहीं चाहती थी कि ऐसी कोई भी सूरत पैदा हो जिसमें अपने दम पर बहुमत होने के बावजूद पार्टी के हाथ से दो बड़े मंत्रालय निकल जाए।

पवार की दूसरी माँग पूरी करने के लिए फडणवीस को बदलने पर भी भाजपा राजी नहीं थी। बिना किसी विवाद और आरोप के जिस तरीके से फडणवीस ने पॉंच साल सरकार चलाई उससे पार्टी नेतृत्व काफी प्रभावित था। फडणवीस बीते 47 साल में महाराष्ट्र के पहले ऐसे सीएम थे जिसने पॉंच साल का कार्यकाल पूरा किया।

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साथ ही पार्टी ने फडणवीस के चेहरे को प्रोजेक्ट कर ही चुनाव लड़ा था। प्रधानमंत्री ने खुद को 24 अक्टूबर को भाजपा मुख्यालय से पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि सरकार बनने पर फडणवीस ही सीएम होंगे। लिहाजा, पवार की यह मॉंग पूरी करना भी पार्टी नेतृत्व को उचित नहीं लगी।

पवार ने अपनी मॉंगों को लेकर मोदी और शाह को संदेशा भिजवाया था। विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद उन्होंने भाजपा के खिलाफ कोई कड़ी टिप्पणी भी नहीं की है। जब माँगों पर भाजपा की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तो पवार ने 20 नवंबर को पीएम मोदी के साथ 45-50 मिनट लंबी बैठक भी की। इस बैठक का भी कोई परिणाम नहीं निकला। प्रधानमंत्री एनसीपी की माँगों पर सहमत नहीं हुए।

इसके बाद 22 नवंबर को शरद पवार के भतीजे और एनसीपी विधायक दल के नेता रहे अजित पवार ने भाजपा को समर्थन की पेशकश कर दी। उनकी तरफ से बताया गया कि पार्टी के करीब 30-35 विधायक भाजपा का समर्थन करने को तैयार हैं। उस समय यह भी अनुमान लगाया गया था कि शायद पवार ने अपने भतीजे को इस कदम के लिए अपनी सहमति दी है। लेकिन, बाद में उन्होंने ट्विटर के माध्यम से भाजपा के साथ एनसीपी के गठबंधन को नकार दिया।

बताया जा रहा है कि अजित पवार के कदम से सार्वजनिक तौर पर भले शरद पवार ने दूरी बना रखी थी, लेकिन इसे उनका मौन समर्थन हासिल था। उन्हें उम्मीद थी कि आखिर में भाजपा उनकी शर्तें मान लेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने अजित पवार को पीछे हटने का संदेशा दिया और शिवसेना तथा कॉन्ग्रेस के साथ सरकार बना ली।

आरएसएस के विचारक दिलीप देवधर के हवाले से आईएनएस ने बताया है कि पवार की मॉंग पर संघ परिवार में काफी चर्चा हुई। लेकिन, उससे भी ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी के उनके दबाव के आगे नहीं झुकने की रही। उन्होंने कहा कि किसानों का मसला महाराष्ट्र में प्रमुख मुद्दा होने के कारण कृषि मंत्रालय राजनीतिक रूप से काफी मुफीद रहता। पवार खुद भी केंद्र में कृषि मंत्री रह चुके हैं।

देवधर ने बताया, “मुख्यमंत्री पद के लिए फडणवीस मोदी की ही खोज रहे हैं। ऐसे में उन्हें किनारे करने का सवाल ही नहीं उठता। जब शरद पवार लगा कि भाजपा उनकी मॉंगों को नहीं मानने वाली है, तो उन्होंने आखिरकार कॉन्ग्रेस-शिवसेना के साथ पहले से सरकार बनाने को लेकर चल रही बातचीत को ही मुकाम पर पहुॅंचाने का फैसला किया।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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