‘द वायर’ ने बर्खास्त, बेआबरू पुलिस अफसर संजीव भट्ट की उम्रकैद में भी घुसा दी अपनी मोदी-घृणा

जबकि 'लायर' The Wire को अच्छी तरह पता है कि किस मामले में संजीव भट्ट को सजा हुई है और वो भी 30 साल पुराने मामले में, जहाँ न्याय की जल्द से जल्द दरकार थी। खैर, यहाँ प्रोपेगेंडा पोर्टल Wire का न्याय से कोई मतलब नहीं है, मतलब है तो बस अपने अजेंडे से और अजेंडा एकसूत्री है- येन-केन-प्रकारेण मोदी विरोध।

‘The Wire’ मामला कुछ भी हो पर अजेंडाबाजी से कभी पीछे नहीं हटता। ऐसे पोर्टल न कोर्ट की सुनते हैं, न मानते हैं और न कानून की इन्हें परवाह है। तभी तो 30 साल पुराने मामले में एक आरोपित पूर्व आईपीएस, आरोप सिद्ध होने के बाद उम्र कैद की सजा पाता है, तो ‘अजेंडा परमो धर्मः’ की राह पर चलने वाला Wire बड़ी चालाकी से अपने हैडलाइन में लिखता है, “IPS Officer Who Questioned Modi’s Role in Gujarat Riots Gets Life in 30-Year-Old Case” जैसे कोर्ट ने अपराधी संजीव भट्ट को उम्र कैद की सजा उसके 30 साल पुराने अपराध के कारण नहीं बल्कि ‘मोदी के गुजरात दंगों शामिल’ होने की बात कहने के लिए दिया गया है।

जबकि ‘लायर’ The Wire को अच्छी तरह पता है कि किस मामले में संजीव भट्ट को सजा हुई है और वो भी 30 साल पुराने मामले में, जहाँ न्याय की जल्द से जल्द दरकार थी। खैर, यहाँ प्रोपेगेंडा पोर्टल Wire का न्याय से कोई मतलब नहीं है, मतलब है तो बस अपने अजेंडे से और अजेंडा एकसूत्री है- येन-केन-प्रकारेण मोदी विरोध। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मोदी के गुजरात दंगों के मामले में सभी आरोपों से बरी होने के बाद भी, ऐसे प्रोपेगेंडा पोर्टल के स्वघोषित जज बार-बार ऐसा दिखाने और लिखने का प्रयास करते हैं जैसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला इन्हें आज भी मान्य नहीं है क्योंकि वह इनके नैरेटिव को सूट नहीं कर रहा। इससे इनके अजेंडाबाजी में बाधा उत्पन्न हो रही है।

जबकि इसी वायर ने अपने हिंदी साइट पर ऐसी हरकतों से बचा है। वहाँ पर जो खबर है वही रिपोर्ट हुई है। लेकिन The Wire अपने अजेंडे पर कायम है। खैर,यह पहली बार नहीं है जब The Wire ने इस तरह की रिपोर्टिंग की हो। पहले भी सत्ता विरोध के नाम पर कई बार ये फेक न्यूज़ या भड़काऊ आर्टिकल पोस्ट करते नज़र आए हैं।

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चलिए जान लीजिए कि पूरा मामला क्या है, क्यों यहाँ जानबूझकर The Wire ट्विस्ट दे रहा है। गुजरात के बरख़ास्त आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को कोर्ट ने उम्रकैद की सज़ा दी जो कि कस्टोडियल डेथ के मामले में सुनाई गई। यह 1990 का मामला है और यह घटना जोधपुर की है। हिरासत में हुई मौत का यह मामला 30 साल पुराना है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने संजीव भट्ट से पूछा था कि उन्होंने हाई कोर्ट के 16 अप्रैल के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में पहले क्यों चुनौती नहीं दी? सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में निचली अदालत ने फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है और फैसला सुनाने की तारीख़ तय कर दी है। आज वही निर्णय निचली अदालत ने सुनाया।

विवादित आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट का आरोप था कि इस घटना में 300 गवाह थे जबकि पुलिस ने सिर्फ़ 32 गवाहों को ही बुलाया। दरअसल, 1990 में भारत बंद के दौरान गुजरात के जामनगर में भी हिंसा हुई थी। उस समय संजीव भट्ट वहाँ पर एएसपी के रूप में पदस्थापित थे। उस दौरान पुलिस ने 133 लोगों को गिरफ़्तार किया था, जिसमें से 25 घायल हुए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उस दौरान प्रभुदास नामक व्यक्ति की हिरासत में ही मौत हो गई थी।

बता दें कि संजीव भट्ट सोशल मीडिया पर विवादित ट्वीट्स करने के लिए भी कुख्यात हैं। उनके ट्वीट्स अक़्सर विवाद का विषय बनते थे। उनकी पत्नी ने उनके जेल जाने के बाद मोदी सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि मोदी के पीएम बनने के बाद से ही उन पर कार्रवाई शुरू हो गई।

वैसे, चाहे जितनी बार, The Wire जैसे पोर्टल बदनाम क्यों न हो जाए लेकिन अजेंडेबाज़ी से बाज आ जाएँ तो करेंगे क्या? यही प्रमुख कारण है कि ऐसे पोर्टल अपनी विश्वश्नीयता खोते जा रहे हैं।

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