Tuesday, June 2, 2020
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ग्राउंड रिपोर्ट #3: दिल्ली की बीमार यमुना कैसे और क्यों प्रयागराज में दिखने लगी साफ?

कुंभ के दौरान 27,500 अस्थाई शौचालय बनाने के लिए सरकार ने 113 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। यही नहीं कुंभ में 6 मुख्य घाटों और 3 शवदाह गृहों के लिए भी सरकार ने 88.03 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

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अनुराग आनंद
अनुराग आनंद मूल रूप से (बांका ) बिहार के रहने वाले हैं। बैचलर की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया से पीजी डिप्लोमा इन हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद राजस्थान पत्रिका व दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों में काम किया। अनुराग आनंद को कहानी और कविता लिखने का भी शौक है।

मैं अपनी यात्रा के तीसरे दिन बनारस से प्रयागराज जा रहा था। प्रयागराज जाने के समय मुझे क़मर जमील की वो पंक्ति याद आ गई, जिसमें उन्होंने कहा है, “या इलाहाबाद में रहिए जहाँ संगम भी हो, या बनारस में जहाँ हर घाट पर सैलाब है।” बनारस के घाटों पर सैलाब देखने के बाद अब मैं प्रयागराज को देखना चाह रहा था। क़मर जमील की शायरी में जिस इलाहाबाद की चर्चा है, उसी शहर का नाम अब प्रयागराज है।

पिछले कुछ सालों में सरकारी लूटपाट और भ्रष्टाचार की चपेट में फँसकर प्रयागराज शहर की ख़ूबसूरती धूमिल हो गई थी। कभी इसी प्रयागराज में संगम के किनारे बैठकर कोई नास्तिक हो या आस्तिक, हिंदू हो या मुस्लिम सभी तरह के लोग प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य में लीन हो जाते थे। जहाँ कुछ देर बैठने भर से लोगों को शांति और सुख की प्राप्ति होती थी।

पिछले कुछ सालों में उसी संगम में मिलने वाली दो प्रमुख नदियों गंगा और यमुना का पानी इतना गंदा हो गया था कि लोगों का संगम पर बैठना भी मुश्किल हो गया था। गंगा और यमुना दोनों ही नदियों में शहरों से निकलने वाले गटर और औद्योगिक कचरे को गिराया जाता रहा। सत्ता में बैठे लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए गंगा व यमुना जैसी नदियों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। ऐसे में जिस संगम में डुबकी लगाने के लिए देश-विदेश के करोड़ों लोग जमा हो रहे हैं, उस संगम को नज़दीक से देखना और महसूस करना बतौर रिपोर्टर मेरे लिए जरूरी था।

दो दिनों से लगातार गाड़ी की सवारी करके थक चुका था। ऐसे में वाराणसी से प्रयागराज जाने के दौरान रास्ते में भदोही नाम की जगह हमलोग चाय पीने के लिए रुके। हमारे साथ अलग-अलग संस्थानों के कुछ और भी पत्रकार थे, लेकिन यहाँ आपस में बात करने की बजाय मैंने समय का सदुपयोग करते हुए स्थानीय लोगों से बात करना उचित समझा।

चारों तरफ़ देखने पर ढाबे पर ही कुछ लोगों के साथ गहरे लाल रंग का लहँगा पहने एक लड़की पर मेरी नज़र गई। शायद वह लड़की भी यात्रा के दौरान चाय पीने के लिए ढाबे पर रुकी थी। पहली नज़र में देखने पर मुझे लगा कि लड़की किसी शादी समारोह से लौट रही है। मैं हर हाल में देश के वर्तमान हालात पर इस लड़की के विचार को जानना चाह रहा था। ऐसे में जैसे ही उस लड़की के करीब आकर मैंने हाइवे के बहाने बात छेड़ी, लड़की वहाँ से हट गई लेकिन उसके साथ खड़े गौरव श्रीवास्तव नाम के शख़्स ने बोलना शुरू कर दिया।

गौरव ने मुझे बताया, “भैया देखिए हाइवे कितना बेहतरीन बना है। अब दो से ढाई घंटे में वाराणसी से प्रयागराज आराम से जाया जा सकता है। रात में वाराणसी से शादी समारोह में हिस्सा लेकर इलाहाबाद लौट रहा हूँ, लेकिन रास्ते में जरा भी थकान महसूस नहीं हो रही है।”

इसके बाद गौरव से जब मोदी सरकार के कामकाज के बारे में हमने पूछा तो गौरव बताते हैं कि साहब सिर्फ़ शहर का नाम ही इलाहाबाद से प्रयागराज नहीं हुआ है, बल्कि नाम बदलने के साथ ही शहर में माफ़ियाओं के आतंक का भी अंत हो गया है। शहर की सड़कें चमचमाने लगी हैं। प्रयागराज की जो रौनक गुम हो गई थी, केंद्र व राज्य की भाजपा सरकार ने उसे वापस लाने का काम किया है। गौरव श्रीवास्तव ने बातचीत के दौरान ही बताया कि वो इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकील हैं।

इस तरह मैं भले ही उस लड़की की राय नहीं जान पाया, जिसका मुझे मलाल इसलिए है क्योंकि विकास के मुद्दों पर मेरे हिसाब से महिलाओं की राय पुरुषों से ज्यादा मायने रखती है। लेकिन उसके रिश्तेदार गौरव श्रीवास्तव से मुझे अपने रिपोर्ट का कच्चा माल मिल गया था। इसके बाद एक बार फिर हमारी गाड़ी हाइवे पर प्रयागराज की तरफ़ चल पड़ी।

प्रयागराज शहर में प्रवेश करने के बाद गाड़ी से उतरते ही मैंने एक बेहद ठंडी हवा के स्पर्श को महसूस किया। मैं इस समय गंगा पर बने उस ब्रिज पर खड़ा था, जहाँ से कई किलोमीटर दूर तक सिर्फ साधू-संतों की लंबी कतारें और उनके रहने के लिए लगाए गए तंबू व टेंट दिख रहा था। ब्रिज के नीचे से गंगा अपने रफ़्तार में बह रही थी, जबकि कुछ दूरी पर यमुना को गंगा में मिलते देखा जा सकता था।

मैं अपने साथियों के साथ संगम पर पहुँचा। ब्रिज से संगम की दूरी करीब 6-7 किलोमीटर है। मेरे साथ कई लोग थे और समय कम था इसलिए मुझे यह दूरी गाड़ी से ही तय करनी पड़ी। लेकिन मैंने महसूस किया कि कुंभ आने का असली मजा संगम पर बने इन अस्थाई तंबूओं के चारों ओर की गलियों में पैदल घूमने का ही है।

कुंभ में श्रद्धालुओं के लिए पूजा सामग्री बेचते स्थानीय लोग

इस बार का कुंभ कई मायने में अलग व अद्भुत है। उत्तर प्रदेश जल निगम के अधिकारी पीके अग्रवाल ने मुझे बताया कि वो बचपन से कई बार कुंभ आता रहे हैं, लेकिन इस बार कुंभ जितना अधिक साफ और पवित्र है, इतना पहले कभी नहीं था।

पीके अग्रवाल के बयान के बाद मैंने कुंभ को एक पत्रकार के नजरिए से देखना शुरू कर दिया। मैं देखना चाहता था कि क्या वाकई में कुंभ में पहुँचने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए अच्छी तैयारी की गई है या सबकुछ कागजी और हवा-हवाई है?

मैंने जैसे ही लघुशंका जाने की इच्छा ज़ाहिर की, पास खड़े एक सिपाही ने एक गलियारे की तरफ़ इशारा कर दिया। मैं जैसे ही उस गलियारे की तरफ़ बढ़ा तो देखा कि वहाँ सैकड़ों अस्थाई शौचालय बने हुए हैं। जब मैंने इसके बारे में पता किया तो पीके अग्रवाल ने मुझे बताया कि सरकार ने इस साल होने वाले कुंभ को हर हाल में स्वच्छ कुंभ बनाने का सोचा है।

यही वजह है कि कुंभ के दौरान 27,500 अस्थाई शौचालय बनाने के लिए सरकार ने 113 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। यही नहीं, कुंभ में 6 मुख्य घाटों और 3 शवदाह गृहों के लिए भी सरकार ने 88.03 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इसके अलावा 21 अन्य घाटों के लिए भी सरकार ने 3.3 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

कुंभ में 27,500 से अधिक अस्थाई शौचालय बनाए गए हैं

संगम में नहाने से पहले मेरे दिमाग में दिल्ली की यमुना की तस्वीर उभर आई। लेकिन जब घाट पर खड़े होकर हमने संगम की तरफ़ देखा तो दिल्ली में बीमार नज़र आने वाली यमुना प्रयागराज में बलखाती नजर आ रही थी। संगम पर खड़े होने के बाद शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो ख़ुद को संगम में डुबकी लगाने से रोक पाए।

मैंने भी कुछ पत्रकार साथी और नमामि गंगे के अधिकारी रजत गुप्ता के साथ संगम में डुबकी लगाई। इस दौरान जब मैंने रजत गुप्ता से पूछा कि तमाम बड़े शहरों की गंदगी को साथ लेकर प्रयाग आने वाली नदियों का पानी यहाँ साफ कैसे नजर आ रहा है, तो इसके जवाब में रजत गुप्ता ने बताया कि प्रयागराज शहर से निकलने वाले गंदे पानी को कुंभ के दौरान गंगा में मिलने से रोक दिया गया है। यही नहीं शहर के हर छोटे-बड़े नाले के पानी को गंगा में मिलने से पहले साफ किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इन नदियों में खुद ही पानी साफ़ करने की क्षमता काफ़ी अधिक है, लेकिन संगम साफ रहे इसके लिए स्थानीय शहरों के गंदे पानी को रोकना जरूरी है।

प्रयागराज के नैनी STP में पानी को साफ किया जा रहा है

इसके लिए नमामि गंगे के तहत शहर में 10 नए प्रोजेक्ट को 2915.78 करोड़ रुपए की मदद से शुरू किया गया है। इसमें 6 प्रोजेक्ट कुंभ से पहले पूरा किया जा चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान समय में प्रयागराज से लगभग 215 मिलियन लीटर गंदा पानी प्रति दिन गंगा में मिलता है। सरकारी अनुमान के मुताबिक 2035 तक 300 मिलियन लीटर गंदा पानी प्रतिदिन गंगा में मिलने की संभावना है। यही वजह है कि सरकार ने अगले 15 से 16 वर्षों को ध्यान में रखकर गंगा को साफ करने का रोडमैप बनाया है।

शहर के गंदे पानी को गंगा व यमुना दोनों नदियों में मिलने से रोकने के लिए सरकार ने शहर को सात हिस्से में बाँट दिया है। हर हिस्से के पानी को साफ करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है। यही नहीं, छोटे नालों के पानी को भी साफ करने के लिए सरकार ने बायोरेमिडेशन व जियो सिंथेटिक ट्यूब जैसी नई तकनीक का भी इस्तेमाल किया है। हम इन सारी तकनीकों पर विस्तृत चर्चा लेख की अगली कड़ी में करेंगे।

कुंभ में श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह पर मुफ़्त में स्वच्छ पानी के लिए स्टॉल लगाया गया है

यही वजह है कि संगम पर पानी पहले की तुलना में ज्यादा साफ नजर आता है। इसके अलावा कुंभ में जगह-जगह स्वच्छ पानी व एम्बुलेंस की भी चाकचौबंद व्यवस्था की गई है।

देश की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी और प्रयागराज की पहचान मुख्य रूप से दो पवित्र नदियाँ गंगा व यमुना की वजह से ही है। हमारे सांस्कृतिक व समाजिक विकास में इन नदियों का बेहद अहम योगदान है। ऐसे में इन नदियों को जिंदा रखना अपनी पहचान को जिंदा रखने जितना जरूरी है।

इसी कड़ी का दूसरा लेख यहाँ पढ़ें: ग्राउंड रिपोर्ट #2: नमामि गंगे योजना से लौटी काशी की रौनक – सिर्फ अभी का नहीं, 2035 तक का है प्लान

इसी कड़ी का पहला लेख यहाँ पढ़ें:ग्राउंड रिपोर्ट #1: मोदी सरकार के काम-काज के बारे में क्या सोचते हैं बनारसी लोग?

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अनुराग आनंद
अनुराग आनंद मूल रूप से (बांका ) बिहार के रहने वाले हैं। बैचलर की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया से पीजी डिप्लोमा इन हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद राजस्थान पत्रिका व दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों में काम किया। अनुराग आनंद को कहानी और कविता लिखने का भी शौक है।

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