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चीन को झटका, तिब्बतियों ने पूरी दुनिया में किया मतदान: Sikyong चुनाव के लिए भारत के साथ ट्रंप का भी सख्त फैसला

“यह बीजिंग को साफ संदेश है कि कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह तिब्बतियों को जितना भी दबा लें, लोकतंत्र तिब्बत में अनिवार्य रहेगा। भारत समेत कई देशों में रहने वाले सैंकड़ों तिब्बतियों ने...”

चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका की नई तिब्बती नीति और समर्थन कानून के पास होने के बाद रविवार (जनवरी 3, 2021) को विश्व्यापी स्तर पर निर्वासित तिब्बती संसद के लिए मतदान आरंभ हुआ। भारत समेत कई देशों में रहने वाले सैंकड़ों तिब्बतियों ने इस मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया। 

निर्वासित तिब्बती नेता लोबसांग सांगेय (Lobsang Sangay) ने व्यापक स्तर पर हुए मतदान के मद्देनजर कहा कि ये चीन के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि तिब्बत में लोकतंत्र कितना अटल है। तिब्बती नेता लोबसांग ने कहा, “यह बीजिंग को साफ संदेश है कि कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह तिब्बतियों को जितना भी दबा लें, लोकतंत्र तिब्बत में अनिवार्य रहेगा।” 

उन्होंने भारत में बने Tibetan Government-in-Exile (निर्वासन में तिब्बती सरकार) के अध्यक्ष होने के नाते जिसे सेंट्रल तिब्बती प्रशासन भी कहा जाता है, इस मतदान को लेकर बोला कि इससे तिब्बतियों को आशा का संदेश दिया गया है।

लोबसांग सांगेय ने रविवार को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अपना मतदान दिया। यहीं TGIE (Tibetan Government-in-Exile) का हेडक्वार्टर भी है। इन चुनावों में 2 उम्मीदवार हैं। यूएस समेत कई देशों में रहने वाले निर्वासित तिब्बती इनमें से जिसे ज्यादा वोट देंगे, उसके हाथ अगले 5 साल यानी 2026 तक के लिए पद की कमान चली जाएगी।

सांगेय ने कहा, “परम पावन दलाई लामा ने हमें उपहार के रूप में लोकतंत्र दिया है। पुरानी पीढ़ी ने इसे संरक्षित रखा और युवा पीढ़ी इसके लिए अभ्यस्त है। ये आगे भी ऐसे ही सशक्त होगी और तिब्बत के आजादी अभियान को मजबूत करेगी।”

बता दें कि लोबसांग को साल 2011 में इस शीर्ष पद के लिए निर्वाचित किया गया था। इसके बाद उन्होंने 2016 में भी इस पद पर अपनी जगह को बनाए रखा। लेकिन अब, वह अध्यक्ष पद के लिए नए चेहरे की उम्मीद कर रहे हैं। उनकी भाषा में कहें तो अगले Sikyong की। हालाँकि, बीजिंग इन चुनावों में महत्व नहीं देता है और कई बार दिल्ली में संदेश देकर ऐसे मतदान रुकवाने की गुहार लगा चुका है।

तिब्बतियों के अधिकार के लिए अमेरिका लेकर आया नया कानून

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष तिब्बती संसद के 17वें चुनाव अधिक महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाते हैं क्योंकि अभी हाल में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता से हटने से पहले तिब्बत की धार्मिक आज़ादी को समर्थन देते हुए एक नया कानून पास किया था, जिसका चीन ने विरोध भी किया। नए कानून को बनाने से पहले यूएसआईडी पहले ही फंड शुरू कर चुका था। ट्रंप काल में लाए गए इस नए कानून का नाम- Tibetan Policy and Support Act of 2020 है। इसे चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका की विदेश नीति की नई शुरुआत की तरह देखा जा रहा है। 

इस कानून में कई बड़ी बातें कही गई हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ तिब्बत के लोगों को ही अपना अगला दलाई लामा चुनने का अधिकार है और इस प्रक्रिया में चीन किसी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। इसके अलावा इसमें ये भी कहा गया है कि तिब्बत के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए अमेरिका एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बना सकता है। बावजूद अगर चीन की सरकार ने अगला दलाई लामा चुनने की कोशिश की, तो अमेरिका उस पर आर्थिक प्रतिबंध भी लगा सकता है।

तिब्बत की निर्वासित सरकार 

तिब्बत की निर्वासित सरकार और संसद को आमतौर पर केंद्रीय तिब्बती प्रशासन कहते हैं, जो भारत से ही अपना काम कर रही है। इसके पीछे का इतिहास लंबा है। दरअसल, तिब्बत में चीन के कब्जे के बाद वहाँ के तिब्बती चीन के अधीन रहने को मजबूर हैं। ये कब्जा चीन ने साल 1959 में किया था।

इसके कुछ ही हफ्ते बाद वहाँ के नेता और धर्म गुरु दलाई लामा भाग कर भारत आ गए थे। उनके साथ ही यहाँ आई थी तिब्ब्तियों की एक बड़ी आबादी। जो अब हिमाचल के धर्मशाला से लेकर देश के कई हिस्सों में बस चुकी है। यहीं रहते हुए दलाई लामा ने चीन के खिलाफ आजादी की जंग छेड़ी हुई है, जिससे चीन अक्सर भौखलाया रहता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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